My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

Killer mining

 हत्यारा होता खनन

पंकज चतुर्वेदी



 

हरियाणा के नूंह जिला के तावडू थाना क्षेत्र के गांव पचगांव में  अवैध खनन की सूचना मिलने पर कार्यवाही को गए डीएसपी सुरेंद्र विश्नोई को 19 जुलाई को जिस तरह पत्थर के अवैध खनन  से भरे  ट्रक से कुचल कर मार डाला गया , अभी मामले की जांच पूरी हुई नहीं और 10 सितम्बर को नूह में एक अवैध खनन स्थल पर छापेमारी के दौरान अज्ञात लोगों ने पुलिस और जिला खनन विभाग की संयुक्त टीम पर हमला कर दिया . एक पुलिस वाला घायल  भी हुआ . उससे एक बार फिर खनन माफिया के निरंकुश इरादे उजागर हुए हैं . यह घटना  अरावली पर्वतमाला से अवैध खनन की है , वही  अरावली जिसका अस्तित्व है तो गुजरात से दिल्ली तक कोई 690 किलोमीटर का इलाका  पाकिस्तान की तरफ से आने वाली रेत की आंधी से निरापद है और रेगिस्तान होने से बचा है . व्ही अरावली है जहां के वन्य क्षेत्र में कथित अतिक्रमण के कारण पिछले साल लगभग इन्हीं दिनों सवा लाख लोगों की आबादी वाले खोरी गाँव को उजाड़ा गया था,  यह वही अरावली है जिसके बारे में  सुप्रीम कोर्ट ने अक्तूबर 2018 जब सरकार से पूछा कि राजस्थान की कुल 128 पहाड़ियों में से 31 को क्या हनुमानजी उठा कर ले गए? तब सभी जागरूक लोग चौंके कि इतनी सारी पांबदी के बाद भी अरावली पर चल रहे अवैध खनन से किस तरह भारत पर खतरा है.


जब चौड़ी सडकें , गगन चुम्बी इमारतें और भव्य प्रासाद किसी क्षेत्र के विकास का एकमात्र पैमाना बन जाएँ तो जाहिर है कि इसका खामियाजा वहां की जमीन , जल और  जन को ही उठाना पडेगा . निर्माण कार्य से जुडी प्राकृतिक  संपदा  का गैरकानूनी खनन खासकर पहाड़ से पत्थर और नदी से बालू , अब हर राज्य की राजनीति का हिस्सा बन गया है , पंजाब हो या मप्र या बिहार या फिर  तमिलनाडु , रेत खनन के आरोप प्रत्यारोप से कोई भी दल अछूता नहीं हैं . असल में इस दिशा में हमारी नीतियाँ हीं- “गुड खा कर गुलगुले से परहेज” की हैं.



जरा देखिये -बरसात के दिनों में छोटी –बड़ी नदियाँ सलीके से बह सकें , उनके मार्ग में नैसर्गिक गतिविधियाँ हो सकें, इस उद्देश्य से राष्ट्रीय हरित न्यायलय ने समूचे देश में नदियों से रेत निकालने पर 30 जून से चार महीने के लिए पाबन्दी लगाईं हुई है , लेकिन क्या इस तरह के आदेश जमीनी स्तर पर क्रियान्वयित होते हैं ? मप्र के भिंड  जिले में प्रशासन को खबर मिली कि लहार क्षेत्र की पर्रायच रेत खदान पर सिंध नदी में अचानक नदी में आए तेज बहाव के चलते कई ट्रक फँस गए हैं . जब सरकारी बचाव दल वहां गया तो उजागर हुआ कि 72 से अधिक डम्पर और ट्रक बीच नदी में खड़े हो कर  बालू निकाल रहे थे ..



  बस राज्य, शहर, नदी के नाम बदलते जाएँ , अवैध खनन सारे देश में  कानूनों से बेखबर ऐसे ही होता है , यह भी समझ लें कि इस तरह अवैध तरीके से निकाले गए पत्थर या रेत का अधिकांश इस्तेमाल सरकारी योजनाओं ने होता है और किसी भी राज्य में सरकारी या निजी निर्माण कार्य पर कोई रोक है नहीं, सरकारी निर्माण कार्य की तय समय- सीमा भी है – फिर बगैर  रेत-पत्थर के कोई निर्माण जारी रह नहीं सकता. जाहिर है कि कागजी कार्यवाही ही होगी और उससे प्रकृति  बचने से रही .

यह किसी से छुपा नहीं था कि यहां पिछले कुछ सालों के दौरान वैध एवं अवैध खनन की वजह से सोहना से आगे तीन पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं। होडल के नजदीक, नारनौल में नांगल दरगु के नजदीक, महेंद्रगढ़ में ख्वासपुर के नजदीक की पहाड़ी गायब हो चुकी है। इनके अलावा भी कई इलाकों की पहाड़ी गायब हो चुकी है। रात के अंधेरे में खनन कार्य किए जाते हैं। सबसे अधिक अवैध रूप से खनन की शिकायत नूंह जिले से सामने आती है। पत्थरों की चोरी की शिकायत सभी जिलों में है।वैसे तो भूमाफिया की नजर दक्षिण हरियाणा की पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला पर है लेकिन सबसे अधिक नजर गुरुग्राम, फरीदाबाद एवं नूंह इलाके पर है। अधिकतर भूभाग भूमाफिया वर्षों पहले ही खरीद चुके हैं। जिस गाँव में डीएसपी  श्री विश्नोई जहां शहीद  हुए  या हाल ही में जहां  सरकारी टीम पर हमला हुआ , असल में वे  गाँव भी अवैध है . अवैध खनन की पहाड़ी तक जाने का रास्ता इस गाँव के बीच से एक संकरी पगडण्डी से ही जाता है , इस गाँव के हर घर में डम्पर खड़े हैं . यहाँ के रास्तों में जगह जगह अवरोध हैं , गाँव से कोई पुलिस या अनजान गाडी गुजरे तो पहले गाँव से खबर कर दी जाती है जो अवैध खनन कर रहे होते हैं . यही नहीं पहाड़ी पर भी कई लोग इस बात की निगरानी करते हैं और सूचना देते है कि पुलिस की गाडी आ रही है .


अब  इतना सब आखिर हो यों न ! भले ही अरावली गैर खनन  क्षेत्र घोषित हो लेकिन यहाँ क्रशर धड़ल्ले से चल रहे हैं और क्रशर के लिए  कच्चा  माल तो इन अवैध खनन से ही मिलता है . हरियाणा – राजस्थान  सीमा अपर स्टे जमालपुर के बीवन पहाड़ी पर ही 20 क्रशर हैं , जिनके मालिक सभी रसूखदार लोग हैं.  सोहना के रेवासन ज़ोन में आज भी 15 क्रशर चालू हैं . तावडू में भी पत्थर दरने का काम चल रहा है. हालाँकि इन सभी क्रशर के मालिक कहते हैं कि उनको  कच्चा माल  राजस्थान से मिलता है . जबकि हकीकत तो यह है कि पत्थर उन्ही पहाड़ों का है जिन पर पाबंदी है . हरियाण के नूह जिला पुलिस डायरी बताती है कि वर्ष 2006 से अभी तक 86 बार  खनन माफिया ने पुलिस पर हमले किये . यह एक बानगी है कि खनन माफिया पुलिस से टकराने में डरता नहीं हैं .

 अभी सात दिन पहले ही आगरा के एक वीडियों वायरल हुआ जिसमें अवैध खनन वाली तेरह  ट्रेक्टर ट्रोली  टोल प्लाजा का बेरियर तोड़ कर निकल गई . आखिर इतनी हिम्मत केवल  ट्रेक्टर ड्रायवर में होती नहीं  और इतना दुसाहस करने वाले को यह भरोसा रहता है कि उसका रसूख इस अपराध के परिणाम से उन्हें बचा लेगा

नदी के एक जीवित संरचना है और रेत उसके श्वसन  तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा। भीशण गर्मी में सूख गए नदी के आंचल को जिस निर्ममता से उधेड़ा जा रहा है वह इस बार के  विश्व पर्यावरण दिवस के नारे - केवल एक धरतीऔर प्रकृति के साथ सामंजस्य से टिकाऊ जीवन ’’ के बिलकुल विपरीत है।  मानव जीवन के लिए जल से ज्यादा जरूरी जल-धारांए हैं। नदी महज पानी के परिवहन का मार्ग नहीं होती, वह  धरती के तापमान के संतुलन, जल-तंत्र के अन्य अंग जैसे जलीय जीव व पौधों के लिए आसरा होती है।  लेकिन आज अकेले नदी ही नहीं मारी जा रही, उसकी रक्षा का साहस करने वाले भी मारे जा रहे हैं . साल 2012 में मप्र  के  मुरेना में नूह की ही तरह युवा आइपीएस अफसर नरेंद्र कुमार  को पत्थर से भरे ट्रेक्टर से कुचल कर मार डाला था . कुछ दिन वहां सख्ती हुई लेकिन  फिर खनन-माफिया यथावत काम करने लगा , उसी चम्बल में सन  2015 में एक सिपाही को को मार डाला गया था . इसी मुरेना में सन 2018 में एक डिप्टी  रेंजर की ह्त्या ट्रेक्टर से कुचल कर की गई .यह लम्बा सिलसिला है . आगरा. इटावा.फतेहाबाद से ले कर  गुजरात तक ऐसी घटनाएँ हर रोज होती हैं, कुछ दिन उस पर रोष होता है और यह महज एक अपराध घटना के रूप में कहीं गूम हो जाता है  और उस अपराध के कारक अर्थात पर्यावरण संरक्ष्ण और कानून की पालना पर बात होती नहीं है .

यह जान लें की जब तक निर्माण कार्य से पहले उसमें लगने वाले पत्थर , रेत, ईंट की आवश्यकता  का आकलन और उस निर्माण का ठेका लेने वाले से पहले ही सामग्री जुटाने का स्रोत नहीं तलाशा जाता . अवैध खनन  और खनन में रसूखदार लोगों के दखल को रोका जा सकता नहीं है.  आधुनिकता और पर्यावरण के बीच समन्वयक विकास की नीति पर गंभीरता से काम करना जरुरी है .  अवैध खनन जंगल, नदी , पहाड़, पेड़  और अब जन के जान का दुश्मन बन चुका है . यह केवल  कानून का नहीं , मानवीय और पर्यावरणीय अस्तित्व का मसला है .

बुधवार, 7 सितंबर 2022

Carbon bomb warehouse will not be less than trees alone

 अकेले पेड़ों से नहीं  कम होगा कार्बन बम का गोदाम

पंकज चतुर्वेदी



भारत पहले ही संयुक्त राष्ट्र को आश्वस्त  कर चुका है कि 2030 तक  हमारा देश  कार्बन उत्सर्जन की मौजूदा मात्रा को 33 से 35 फीसदी घटा देगा, लेकिन असल समस्या तो उन देशों के साथ है जो मशीनी  विकास व आधुनिकीकरण के चक्र  में पूरी दुनिया को कार्बन उत्सर्जन का दमघोंटू बक्सा बनाए दे रहे हैं और अपने आर्थिक प्रगति की गति के मंथर होने के भय से पर्यावरण के साथ इतने बड़े दुष्कर्म  को थामने को राजी नहीं हैं। पेरिस में जलवायु परिवर्तन के सम्मेलन में विकसित देश नारे तो बड़े-बड़े लगाते रहे लेकिन कार्बन की मात्रा खुद घटाने के बनिस्पत भारत व ऐसे ही तेजी से विकास की राह पर दौड़ रहे देशों पर दवाब बना रहे हैं। चूंकि भारत में अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जो खाना पकाने के लिए लकड़ी या कोयले के चूल्हे इस्तेमाल कर रहे हैं, सो अंतर्राष्ट्रीय  एजेंसियां परंपरागत ईंधन के नाम पर भारत पर दबाव बनाती रहती हैं, जबकि विकसित देशों  में कार्बन उत्सर्जन के अन्य कारण ज्यादा घातक हैं । यह तो सभी जानते हैं कि वायुमंडल में सभी गैसों की मात्रा तय है और 750 अरब टन कार्बन कार्बन डाय आक्साईड के रूप में वातावरण में मौजूद है। कार्बन की मात्रा बढने का दुष्परिणाम  है कि  जलवायु परिवर्तन व धरती के गरम होने जैसे प्रकृतिनाषक बदलाव हम झेल रहे हैं। कार्बन की मात्रा में इजाफे से दुनिया पर तूफान, कीटों के प्रकोप, सुनामी या ज्वालामुखी जैसे खतरे मंडरा रहे हैं। दुनिया पर तेजाबी बारिष की संभावना बढ़ने का कारक भी है कार्बन की बेलगाम मात्रा।


धरती में कार्बन का बड़ा भंडार जंगलों में हरियाली के बीच है। पेड़ , प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से हर साल कोई सौ अरब टन यानि पांच फीसदी कार्बन वातावरण में पुनर्चक्रित करते है। आज विष्व में अमेरिका सबसे ज्यादा 1,03,30,000 किलो टन कार्बन डाय आक्साईड उत्सर्जित करता है जो कि वहां की आबादी के अनुसार प्रति व्यक्ति 7.4 टन है।  उसके बाद कनाड़ा प्रति व्यक्ति 15.7 टन, फिर रूस 12.6 टन हैं । जापान, जर्मनी, द.कोरिया आदि औद्योगिक देशों में भी कार्बन उत्सर्जन 10 टन प्रति व्यक्ति से ज्यादा ही है। इसकी तुलना में भारत महज 20 लाख सत्तर हजार किलो टन या प्रति व्यक्ति महज 1.7 टन कार्बन डाय आक्साईड ही उत्सर्जित करता है। अनुमान है कि यह 2030 तक तीन गुणा यानि अधिकतम पांच तक जा सकता है। इसमें कोई शक  नहीं कि प्राकृतिक आपदाएं देशों की भौगोलिक सीमाएं देख कर तो हमला करती नहीं हैं। चूंकि भारत नदियों का देश  हैवह भी अधिकांश  ऐसी नदियां जो पहाड़ों पर बरफ पिघलने से बनती हैं, सो हमें हरसंभव प्रयास करने ही चाहिए।


कार्बन उत्सर्जन की मात्रा कम करने के लिए हमें एक तो स्वच्छ इंधन  को बढ़ावा देना होगा। हमारे देश  में रसोई गैसे की तो कमी है नहीं, हां सिलेंडर बनाने के लिए जरूरी स्टील, सिलेंडर वितरण के लिए आंचलिक क्षेत्रों तक नेटवर्क को विकसित करना और गरीब लोगों को बेहद कम दाम पर गैस उपलब्ध करवाना ही बड़ी चुनौती है। कार्बन उत्सर्जन घटाने में सबसे बड़ी बाधा वाहनों की बढ़ती संख्या, मिलावटी पेट्रो पदार्थों की बिक्री, घटिया सड़केंव आटो पार्टस की बिक्री व छोटे कस्बों तक यातायात जाम होने की समस्या है। देश  में बढ़ता कचरे का ढेर व उसके निबटान की माकूल व्यवस्था ना होना भी कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण की बड़ी बाधा है। सनद रहे कि कूड़ा जब सड़ता है तो उससे बड़ी मात्रा में मीथेन, कार्बन मोनो व डाय आक्साईड गैसें निकल कर वायुमंडल में कार्बन के घनत्व को बढ़ाती हैं। साथ ही बड़े बांध, सिंचाई नहरों के कारण बढ़ते दल-दल भी कार्बन डाय आक्साईड पैदा करते हैं।



गर्म होती धरती और कार्बन की मात्रा को समझने के लिए वातावरण और ग्रीन हाउस गैसों के बारे में जानकारी लेना जरूरी है। इन्हें सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं. इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड है, मीथेन है, नाइट्रस ऑक्साइड है और वाष्प है। इनमें भी सबसे अधिक उत्सर्जन कार्बन डाइऑक्साइड का होता है। इस गैस का उत्सर्जन सबसे अधिक ईंधन के जलने से होता है, खासतौर पर कोयला, डीजल-पेट्रोल जैसो इंर्धन। ये गैसें वातावरण में बढ़ती जा रही हैं और इससे ओजोन परत की छेद का दायरा बढ़ता ही जा रहा है। पृथ्वी के चारों ओर का वायुमंडल मुख्यतः नाइट्रोजन (78 प्रतिशत  ), ऑक्सीजन (21 प्रतिशत  ) तथा    शेष 1 प्रतिशत  में सूक्ष्ममात्रिक गैसों (ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये बिल्कुल अल्प मात्रा में उपस्थित होती हैं) से मिलकर बना है, जिनमें ग्रीन हाउस गैसें कार्बन


 डाईऑक्साइड
, मीथेन, ओजोन, जलवाष्प, तथा नाइट्रस ऑक्साइड भी शामिल हैं। ये ग्रीनहाउस गैसें आवरण का काम करती है एवं इसे सूर्य की पैराबैंगनी किरणों से बचाती हैं। पृथ्वी की तापमान प्रणाली के प्राकृतिक नियंत्रक के रूप में भी इन्हें देखा जा सकता है। ओजोन की परत ही सूरज और पृथ्वी के बीच एक कवच की तरह है। यह भी साबित हो चुका है कि ग्रीन हाउस जब वायुमंडल में मौजूद होती हैं तो वे सूरज की गर्मी को अवशोषित करती हैं। जिससे कि हमारे वातावरण का तापमान बढ़ता ही है।


अभी तक यह मान्यता रही है कि पेड़ कार्बन डाय आक्साईड को सोख कर आक्सीजन में बदलते रहते है। सो, जंगल बढ़ने से कार्बन का असर कम होगा। यह एक आंशिक  तथ्य है। कार्बन डाय आक्साईड में यह गुण होता है कि यह पेड़े की वृद्धि में सहायक है।


 लेकिन यह तभी संभव होता है जब पेड़ो को नाईट्रोजन सहित सभी पोषक  तत्व सही मात्रा में मिलते रहें। यह किसी से छिपा नहीं है कि खेतों में बेशुमार  रसायनों के इस्तेमाल से बारिश  का बहता पानी कई गैरजरूरी तत्वों को ले कर जंगलों में पेड़ो तक पहुचता है और इससे वहां की जमीन में मौजूद नैसर्गिक तत्वों की गणित गड़बड़ा जाती है। तभी षहरी पेड़ या आबादी के पास के जंगल कार्बन  नियंत्रण में बेअसर रहते है। यह भी जान लेना जरूरी है कि जंगल या पेड़ वातावरण में कार्बन की मात्रा को संतुलित करने भर का काम करते हैं, वे ना तो कार्बन को संचित करते हैं और ना ही उसका निराकरण। दो दषक पहले कनाड़ा में यह सिद्ध हो चुका था कि वहां के जंगल उल्टे कार्बन उत्सर्जित कर रहे थे।

कार्बन की बढ़ती मात्रा दुनिया में भूख, बाढ़, सूखे जैसी विपदाओं का न्यौता है। जाहिर है कि इससे जूझना सारी दुनिया का फर्ज है, लेकिन भारत में मौजूद प्राकृतिक संसाधन व पारपंरकि ज्ञान इसका सबसे सटीक निदान है। छोटे तालाब व कुंए, पारंपरिक मिश्रित जंगल, खेती व परिवहन के पुराने साधन, कुटी उद्योग का सशक्तिकरण  कुछ ऐसे  प्रयास हैं जो बगैर किसी मशीन  या बड़ी तकनीक या फिर अर्थ व्यवस्था को प्रभावित किए बगैर ही कार्बन पर नियंत्रण कर सकते हैं और इसके लिए हमें पश्चिम  से उधार में लिए ज्ञान की जरूरत भी नहीं है।


मंगलवार, 6 सितंबर 2022

Pad Yatra means communication with the public by staying on earth

 पद यात्रा अर्थात धरती पर रह कर जनता से संवाद

पंकज चतुर्वेदी

 इंदिरा गांधी के तानाशाही के खिलाफ बनी जनता पार्टी अपने इरादों  से भटक चुकी थी – सत्ता में बैठे लोग महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों से बेखबर राजनितिक विद्वेष  में लीन  थे और  आज़ादी के बाद की दूसरी लड़ी कहलाने वाली जनक्रांति और जयप्रकाश नारायण के सपने  ध्वस्त हो चुके थे . इंदिरा गांधी पूरी ताकत से खड़ी हो रही थी . विपक्षी एकता दोहरी सदस्यता को ले कर बिखर रही थी और  संघ परिवार नए झंडे-डंडे और इरादों से नई शक्ति का ताना बाना बुनू चुका था- आम लोगों के मुद्दे गौण थे और सारी सियासत इंदिरा गांधी के विरोध और समर्थन में  केन्द्रित हो गई थी – आखिर जनसरोकार, राजनीती में समाजवाद का  सपना  और  रोजी-रोटी के सवाल क्या  बेमानी थे ? 

तभी अध्यक्ष जी यानी चंद्रशेखर ने भारत को पैरों से नापने, आम लोगो की दिक्कतों को भांपने और उसके आधार पर देश के भविष्य का नक्शा  तैयार करने की ठानी – उस समय  लोहिया-नरेंद्र देब का समाजवाद ज़िंदा था और हजारों सोशलिस्ट इसकी तैयारी में जुट  गए . चंद्रशेखर अपनी किताब “रहबरी के सवाल” में लिखते हैं -:

साल 1980 में जनता पार्टी की हार के बाद मैंने प्रतिपक्षी एकता कायम करने की कोशिश की. लेकिन, अधिकतर नेताओं की दिलचस्पी जोड़-तोड़ की राजनीति में थी. ऐसे में एकता असंभव हो गई. एक मसले का समाधान हो, तब तक दूसरा सामने आ जाता था. पार्टी की अध्यक्षता का बीड़ा तीखा अनुभव था. समस्याएं जनता के सवाल को लेकर नहीं, नेताओं के आपसी विवाद को लेकर थीं. पार्टी टूटने के कागार पर थी. इस बीच कर्नाटक में पार्टी की सरकार बन गई. पार्टी के कार्यकर्तओं में आशा का नया संचार हुआ था. इस बीच कुछ नया करने का विचार मन में उठा और मैंने नेताओं के पास पहुंचने के बजाय आम आदमी के पास जाने का फैसला किया.

फिर छः जून1983 को इसी भारत के सुदूर दक्षिण छोर कन्याकुमारी  से  चंद्रशेखर ने पदयात्रा शुरू  की जो 25 जून 84 को दिल्ली के राजघाट पर समाप्त हुई. कोई 3700 किमी की यात्रा में कई सवाल उनके सामने आये और उन्हें जिस दिक्कत ने सबसे ज्यादा झकझोरा, वह थी पानी की दिक्कत और तभी चंद्रशेखर के हाथ जब ताकत आई तो उन्होंने  पानी को हर इन्सान तक पहुंचाने पर गंभीरता से काम भी किया . वह मसला अलग है की अध्यक्ष जी की इस कड़ी मेहनत का सारा लाभा संघ परिवार कैसे उठा गया और वह यात्रा भी  समाज्बदी परिवार को न एक कर पाया और न ही सत्ता के लिए सिद्धनों से समझोते पर रोक लगा पाया .

वह पुरानी याद इस लिए कि हम जैस सैंकड़ों लोग उस यात्रा में भले ही दो कदम चले हों केवल इस लिए साथ थे कि चलो कोई नेता सफ़ेद एम्बेसेडर से उतर कर जनता के बीच जा तो रहा है , वह नेता जो कभी इंदिरा जी का सबसे प्रिय था लेकिन नीति सिद्धांत  को ले कर लड़ गया था .

यह कडवा सच है कि आज की सियासत में जन सरोकार  शून्य है, नशेडी- गंजेड़ी – विवाहेत्तर सम्बन्ध और अन्य कुकर्मों  मने मारे गए लोगों के लिए मिडिया में घंटों चर्चा है लेकिन दिल्ली में हर दिन होने वाले जाम , एक तिहाई आबादी के झुग्गी में रहने  जैसे मूल भूत सवाल गायब हैं – इंदिरा गांधी की ह्त्या ने  नेताओं में पहले भयवश सुरक्षा रखने और फिर  रसूख के दिखावे के लिए हथियारधारियों की जो फौज रखने का  चलना शुरू किया, उससे आम नेता के जनता से सम्पर्क रह नहीं गया – आज भी जाति बिरादरी की गणित, कुछ मुफ्त का लालच और वोट गिरने एक एक रात पहले पौआ –साडी बाँट कर चुनाव जितने वाला नेता उस 16 लेन  के सडक को विकास बताता है जहां आम आदमी साइकिल ले कर या अब तो स्कूटर ले कर भी जा नहीं सकता- जाएगा तो अपनी एंटी से पैसा लगाएगा टोल ले नाम पर – नेता निर्लज्जता से अस्सी अक्रोड को मुफ्त एना देने की बात कर शर्म नहीं करते कि इतना बड़ा मानव श्रम बेकार है और यदि ऐसा ही चला तो देश निकम्मों की जमात बनेगा , नदी में जल की जगह रेत लेने की चाह , पेड़ से फल लेने की जगह  लकड़ी काटने की लिप्सा , पहाड़ से आसरा लेने की जगह पत्थर निकालने की निर्ममता ---  कतिपय उत्सव, छद्म ख़ुशी   और  बिम्बों में घिरा समाज  अपने हे देश को समझ नहीं पा रहा . साम्प्रदायिकता अब  किसी को शर्म पैदा नहीं करती . हिजाब, झटके का मात और अब इन दिनों मदरसे – एक श्रंखला है जो मानवता के बनिस्पत साम्ताप्रदायिकता  को स्थापित कर रही हैं . कारण – हमारा नेता जमीन पर है ही नहीं- टीवी पर दिखता है, सोशल मिडिया पर उसके किराए के आदमी होते हैं और प्रिंट में प्रेसनोट से कागज रंग दिए जा रहे हैं . आत्म मुग्ध समाज , देश से बेखबर –

ऐसे में एक नेता और उसके साथ सौ लोगों का पूरे डेढ़ सौ दिन सडक पर रहना , पैदल चलना – एक विलक्षण घटना है और मेरा मानना है कि हर बड़े नेता को ऐसी यात्रा करना ही चाहिए – थोडा सुरक्षा और चापलूसों का घेरा ढीला रहे तो ही इसके सही परिणाम आ सकते हैं . लोग तो इतने दिनों में सतात जितने की बड़ी योजनायें बनाते हैं लेकिन यह यात्रा तपस्या है जिसमें केवल पैदल चलना है  कोई 3500 किलोमीटर – औसतन हर दिन 23  किलोमीटर – रात वही कंटेनर में – एक तो इतनी लाबी यात्रा में हर जगह कार्यकर्ताओं या आम लोगों से मिलना , बात करना या भाषण देना – फिर चलना एक जीवत वाला कार्य है और इसमें  अपनी उर्जा सहेज कर सलीके से खर्च करने का गुर यदि नहीं आता है तो  यात्रा अपने उद्देश्य से दूर ही रहेगी .

हर जगह स्थानीय समस्याओं को समझना और उसका लेखा जोखा रखना , फिर उसे सिलसिलेवार दस्तावेज का रूप देना और उसके आधार पर जनता के लिए घोषणा पत्र तैयार करना – साथ ही समस्या के निराकरण का विकल्प देना – यदि इसकी कवायद और जानकार और संवेदनशील लोग साथ नहीं हैं  तो  यात्रा को “आन्दोलन जीवी “ लोगन का अखाड़ा कहने वाले सही साबित होंगे – नागरिकी समाज के नाम पर इसमें कई ऐसे  चिचड़ चिपके दिख रहे हैं जो सत्ता बदलाव  के हर मौके पर अपना झंडा- डंडा बदल कर टीवी पर चेहरा चमकाते हैं – अन्ना आन्दोलन सभी को जानकारी थी कि संघ का खेल है फिर भी वहा कौन लोग थे जो यूपी -२ की बदनामी के सूत्रधार बने और अब यहाँ चिपक गए हैं ? क्या पता कि ये अभी भी दीमक बन कर भीतर से खाएं –

एक बात और यदि कोई इस यात्रा के सीधे राजनितिक लाभ गिनेगा तो नील बटे सन्नाटा रहेगा – इसके परिणाम तब ही निकलेंगे जब यात्री  यात्रा समाप्त  कर  इससे हासिल अनुभव पर आधारित दस्तावेज  या विमर्श का आगाज़ा कर पायें . दिग्गी राजा की नर्मदा यात्रा  के परिणाम हमारे सामने हैं – नेता जीते लेकिन बाद में रंग बदल गए- यदि यात्रा से देश-संविधान के प्रति  समर्पित लोगों की टीम नहीं कड़ी हो पाई  तो यह महज एक मिडिया-सुर्खी ही रहेगा .

 

सोमवार, 5 सितंबर 2022

Loktak Lake can not be survive by throwing out community from water

 समाज को उजाड़ कर बस ना पाएगी लोकतक झील

पंकज चतुर्वेदी

 


उत्तर-पूर्वी राज्यों का रमणिक स्थल मणिपुर का नाम मणिपड़ने का यदि कोई सबसे सशक्त कारण नजर आता है तो वह है यहां की लोकटक झील। लगभग 770 मीटर ऊंचाई पर स्थित इस झील का क्षेत्रफल 26 हजार हैक्टर हुआ करता था। मणिपुर घाटी के दक्षिण में विष्णुपुर जिले में स्थित यह झील पूर्वी भारत की सबसे विशाल प्राकृतिक जल निधि है।  हाल ही में लोकटक विकास प्राधिकरण  ने झील में बनी  झोपड़ियों और मछली पकड़ने को स्थापित “अथाफुम्स “ को हटाने के आदेश दे दिए हैं. इससे इस झील पर पुश्तों से निर्भर मैतै  जनजाति के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है , असल में यही समुदाय पीढयों से इस अनूठी झील की देखभाल करता रहा है और स्पष्ट है कि जनभागीदारी और जनसरोकार के बगैर किसी भी प्राकृतिक संरचना को संरक्षित करना संभव्  होता नहीं .

 

लोकटक का अर्थ है - ‘‘धारा का अंत’’।  यहां कई सरिताओं , नदियों का प्रयाण स्थल जो है। यह झील राज्य के सामाजिक-आर्थिक, र्प्यावरण, सांस्कृतिक, परिवहन, जल मुर्गियों के आवास, कई अन्य जानवरों , मछलियों और वनस्पियों को समेटे हुए है। कुछ साल पहले तक यह 223,000 हैक्टर में विस्तारित थी जो सिकुड़ कर 26 हजार हैक्टर पर पहुंच गई है।  आज भी इसकी अधिकतम लंबाई 26 किलोमीटर , चौड़ाई 13 किलोमीटर व गहराई 4.58 मीटर तक है। इसका जल ग्रहण क्षेत्रा 98 हजार हैक्टर और पानी का कुल आयतन 5980.36 लाख घनमीटर है। इस झील में 12 द्वीप है, जिनमें से चार पर आबादी है। इसके किनारे पर पांच शहर व 54 गांव हैं। झील की खासियत है इसमें तैरते हुए 600 से अधिक मकान । पानी में उगने वाली घास, वनस्पति और मिट्टी के मिश्रण से बनी मोटी परतों को स्थानीय भाषा  में फुगदी या फुमडीज कहा जाता है, इस झील की खासियत है। इन फुगदी के स्थलीय भाग का पांचवा हिस्सा जल की सतह पर तैरता है जबकि शेष  भाग पानी में डूबा होता है। इस लिए ये तैरते हुए विशाल द्वीप दिखते हैं। लोकटक में इन्ही तैरते फुगदी पर बस्तियां तो हैं ही, इसके दक्षिण में दुनिया का एकमात्र ‘‘तैरता हुआ संरक्षित वन’’-केईबुल लामजाओ नेशनल पार्क’’ भी है।  यहां देशज, दुर्लभ और संकटापन्न संगईहिरणों का डेरा है। मैतै आदिवासी इस फुगदी को एक छल्ले के आकार मे ढालते हैं और उसमें मछली का जाल लगा देते हैं . यहाँ जाल में आ गई मछलियों को अच्छा पौष्टिक आहार मिलता है और वे कुछ ही समय में आकार में बड़ी व् भारी हो जाती हैं . इस संरचना को ही “अथाफुम्स “ खा जाता है जिसे हटाने के लिए सरकार आमदा है . सरकार का कहना है कि चूँकि यह झील रामासर सूची में शामिल है और इसमें मानवीय दखल के कारण हो रहे पर्यावरणीय नुक्सान से बचाना जरुरी है , सो स्थानीय लोगों द्वारा पर्यटकों के लिए  झील के भीतर बना दी गई झोपड़ियों को हटाना जरुरी है  सरकार मणिपुर लोकटक झील संरक्षण अधिनियम 2006 का हवाला दे कर बताती है कि इस संरक्षित क्षेत्र में झोपडी बनाना अवैध है.

उधर स्थानीय समुदाय का दावा है कि वे तो कई सदियों से इस झील में ही झोपडी बना कर रहते रहे हैं , चूँकि कुछ सालों से स्थानीय समुदाय पर्यटकों को यहाँ ठहरा के कुछ कमा लेता है , वही सरकार को खटक रहा है और सरकार “ईको टूरिज्म” के नाम पर यहाँ बड़ी कंपनियों के होटल खोलने की योजना पर काम कर रही हैं . विदित हो नवम्बर 2011 में भी यहाँ सुरक्षा बलों ने कोई 777 झोपड़ियों  को आग लगा दी थी और उस समय भी व्यापक हिंसा हुई थी . जान लें यदि सरकार अपनी मंशा में सफल हुई तो कोई तीस हज़ार लोगों  का रोजगार और घर  संकट में होगा .

यह भी समझना होगा कि क्या  लोकटक में प्रदुषण का कारण समाज है या और कई अन्य गतिविधियाँ ? अनंत काल से लोकटक लोगों की उम्मीद, हजारों किस्म की वनस्पतियां व जंतुओं को अपने आंचल में आसरा देती रही है।  पूर्वोत्तर के स्वर्ग पर संकट की शुरुआत सन 1971 में सिंचाई व बिजली मंत्रालय की  ‘‘लोकटक बहुउद्देशीय बिजली परियोजना’’  से हुई जिसका संचालन 1983 में राष्ट्रिय  जल विद्धुत निगम ने प्रारंभ किया। 1979 में लोकटक व इंफाल नदी को जोड़ने वाले खोरडक कट पर स्थाई बांध बन गया।  इस योजना के तहत इंफाल नदी की निचली धारा पर इथाई बांधनिर्मित किया गया। यहां 35-35 मेगावाट के तीन यानी कुल 105 मेगावाट क्षमता के टरबाईन लगाए गए। गौर करना होगा  कि इंफाल नदी, लोकटक झील का एक प्रमुख जल आवक मार्ग है और मणिपुर की केंदीय घाटी में जल निकास का एक मात्र जरिया है। बांध बनने से पूर्व  झील पर जीम गाद, गंदगी और फुगदी के बड़े बडे टुकड़े खारडक कट से बह जाते थे। मानसून के दौरान जल द्वारा फुगदी को बहा ले जाना और मानसून के बाद झील के वेट लैंड का सूख जाना, इस क्षेत्र के पर्यावरण संतुलन  को बनाए रखता था।  बांध बनने के बाद झील की प्राकृतिक सफाई होना बंद हो गई, फुगदी व जलीय पौधे यहीं जमा हो रहे हैं, इससे सूर्य की किरणें व आक्सीजन पानी तक पर्याप्त नहीं पहुंच पा रही है , परिणाम है कि यहां के पानी  की हालत खराब हो रही है।  फिर जब जमीन के बड़े हिस्से पर डूब का असर हुआ, लोगों ने पलायन किया तो वे आ कर झील के तैरते इलाकें में बस गए। इससे वहां इंसान की गतिविधियां बढ़ीं, कृषि  इस्तेमाल बढ़ा, पानी का संतुलन गड़बड़ाया और झील के शुभचिंतक होने के दावों पर सरकार व समाज का टकराव बढ़ गया।

इथाई बांध के कारण कोई 83,450 हैक्टर बेहद उर्वरा जमीन डूब गई। इसमें से लगभग बीस हजार हैक्टर जमीन का इस्तेमाल साल में दो फसल लेने के लिए पहले ही होता था।  मेईती जनजाति के तीस हजार लोगों के विस्थापन का कारण बने इस बांध के बनने के बाद लोकटक झील में मिलने वाली मछलियों की कई प्रजातियां जैसे -  नगटोन, खबक, पेंगवा, थराक, नगारा, नगतिन, आदि विलुप्त हो गई।  ये मछलियां पूर्व में म्यांमार के चिंडविन-इरावदी नदी तंत्रसे पलायन कर मणिपुर घाटी की सरिताओं में प्रजनन किया करती थ्ीं। बांध के कारण उनके आवागमन का प्राकृतिक रास्ता ही बंद हो गया। यही नहीं इसके चलते झील में पैदा होने वाली कई साग-सब्जियों -  हैकाक,थांगजींग, थारो, थांबल, लोकेई, पुलई आदि का उगना रूक गया।

लोकटक पर आबादी बढ़ने की शुरूआत बिजली घर परियोजना के समय हो गई थी। जब बांध के लिए लोगों को उनके पुश्तैनी गांव-घरों से भगाया गया तो उन्हें लोकटक पर तैरते घरों का विकल्प ही मुफीद लगा। झील के चार हजार हैक्टर पर पहले से ही खेती हो रही है। आबादी बढ़ने के साथ ही पेट पालने के लिए लोगों द्वारा इसकी जमीन पर कब्जा कर खेती करने का रकबा भी बढ़ रहा है। साथ ही मछली और जंगली बत्तखों का अंधाधुंध शिकार, जंगल कटाई  ने इस इलाके में कई संकट गढ़ दिए हैं। यहां की जमीन बेहद सख्त है और 200 मीटर से कम गहराई पर भूजल नहीं मिलता है। ऐसे में लो गों की जल के लिए पूरी तरह निर्भरता इसी झील पर है। सरकार ने भी झील के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचने के लिए पक्की सड़कों के निर्माण के जैसे कुकर्म  किए, जिसने झील में पानी को और घटा दिया।  झील पर आबादी बढ़ने से दैनिक गंदगी, मल -मूत्र की बेतहाशा मात्रा इसमें  सीधे मिल रही है।

लोकटक जल ग्रहण क्षेत्र में  बेतहाशा जंगल कटाई और उसके कारण हो रहे मिट्टी के क्षरण ने झील को उथला बना दिया है। हर साल पांच हजार हैक्टर जमीन झूम खती के चपेट में आ रही हे। झूम खेती के एक हैक्टर से 41 टन मिट्टी कटती है। जाहिर है कि लोकटक में हर साल दो लाख टन मिट्टी तो झूम खेती के कारण ही जुड़ रही है। परिणाम सामने है , जो झील कभी दस मीटर गहरी होती थी, आज  पांच मीटर गहराई रह गई है।

विडंबना यह है कि झील संरक्षण के संकल्प के साथ अभियान चला रहे कई समूह आपस में कोई संवाद नहीं करते हैं और एकदूसरे को दुश्मन की तरह देखते हैं। परिणाम सामने है - सरकारी सिस्टम लोगों को उजाड़ता है तो आम लोग हताश हो कर सरकारी सिस्टम को झील उजाड़ने का आरोप लगाते हैं। दुर्भाग्य है कि सरकारी लोग विज्ञान और र्प्यावरण के तो माहिर हैं लेकिन स्थानीय नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण से जोडने में असफल रहे हैं। कोई भी विकास आम लोगों की भागीदारी के बगैर सार्थक नहीं होता और यही लोकटक की त्रासदी है।

# Loktak lake 

#manipur 

शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

"Questions of KAVITA and the Communists in India"

क्यों जरुरी है कविता ?

 आज नफरत , विद्वेष और अविश्वास के माहौल में कविता बहुत जरुरी है, तुकांत या अतुकान, छंद वाली या दोहे वाली , किसी भी भाषा में - बस वह कविता जो एक आम आदमी का स्वर हो, उसके लिए हो और उसकी समझ में हों, -- सियासत में भी कविता इसी लिए जरुरी है . सीपीआई (एमएल) लिबरेशन पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक, कविता कृष्णन ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। पार्टी के शीर्ष निकाय यानी पोलित ब्यूरो की सदस्य कविता कृष्णन दो दशक से अधिक समय तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन की केंद्रीय समिति की सदस्य भी थीं।

आखिर कविता कृष्णन के ऐसे कौन से सवाल थे जिनके कारण उन्हें पार्टी को छोड़ना पड़ा , यदि वह सवाल बंच लिए जाएँ तो समझ आ जायेगा कि भारत में साम्यवाद की अधोगति क्यों हैं .
गौरतलब है कि उन्होंने हाल ही में यूक्रेन-रूस संघर्ष पर ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने कहा था कि समाजवादी शासन संसदीय लोकतंत्रों से कहीं अधिक निरंकुश शासन थे। कविता कृष्णन के ये सवाल जाहिर तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी को रास नहीं आए। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि सीपीआई (एमएल) लिबरेशन यकीनन दुनिया में समाजवादी शासन चाहती है। कम्युनिस्ट पार्टी कथित तौर पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) जैसी कम्युनिस्ट पार्टियों से प्रेरणा लेती है। इसलिए कविता कृष्णन का कम्युनिस्ट सरकारों से सवाल पूछना उनकी पार्टी को पसंद नहीं आया।
उन्होंने फेसबुक पर लिखा, "यह पहचानने की जरूरत है कि सोवियत संघ के दौरान स्टालिन के शासन की या फिर विफल चीनी समाजवाद की चर्चा करना अब पर्याप्त नहीं है, बल्कि वे दुनिया के कुछ सबसे खराब सत्तावादी थे जो हर जगह सत्तावादी शासन के लिए एक मॉडल के रूप में काम कर रहे हैं।" वह अपने हालिया सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए भी इन सवालों को उठाती रही हैं जिनके बारे में उन्होंने अपने फेसबुक पर लिखा है। जुलाई में, उन्होंने कहा था कि स्टालिन के तहत सोवियत संघ (यूएसएसआर) का औद्योगीकरण "यूक्रेन के किसानों को हिंसक रूप से गुलाम बनाकर" किया गया था। यह समझना होगा कि कम्युनिस्ट दल और कम्युनिस्ट विचारधारा कोई बाईबिल नहीं हैं जो हर देश में एक सी हो -- भारत में साम्य्बाद की परिभाषा अलग है , पच्चीस साल बंगाल और त्रिपुरा में शासन करने वाले कम्युनिस्ट दुर्गा पूजा पर बड़े बड़े पंडाल बनवाते उर वहां परिक्रमा करते रहे - यही नहीं बंगाल के कम्युनिस्ट और केरल के लाल झंडे की राजनितिक नीतियों में भी फर्क रहा - यह स्वाभाविक है और आम लोगों तक विचार को ले जाने के लिए जरुरी भी . हालाँकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन का बंगाल या केरल में जनाधार इतना नहीं है लेकिन दिल्ली और जनाधिकार के मामले में केवल कविता के कारण पार्टी चर्चा में रही .
भिलाई के सेक्टर-10 के स्कूल से 1990 में हायर सेकंडरी पास करने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई जेएनयू,नई दिल्ली से की। विदित हो कविता के पिता स्व. एएस. कृष्णन भिलाई स्टील प्लांट की ब्लूमिंग एंड बिलेट मिल में डीजीएम थे। वहीं मां प्रो. लक्ष्मी कृष्णन अंग्रेजी की प्राध्यापक व संगीत की जानकार . जे एन यु में वे वामपंथी आंदोलन से जुड़ गई।
सन 2013 में अमेरिकी पत्रिका फॉरेन पॉलिसी ने ग्लोबल थिंकर के तौर पर जारी सूची में कविता को 77 वें स्थान पर रखा था । इसमें रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन, फेसबुक के मार्क जकरबर्ग, जैसे नाम थे .इनमें कविता कृष्णन का नाम लैंगिक हिंसा के खिलाफ मुखर विरोध की वजह से शामिल किया गया.
पार्टी से त्यागपत्र में उन्होंने लिखा, "न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में सत्तावादी और बहुसंख्यक लोकलुभावनवाद के बढ़ते रूपों के खिलाफ उदार लोकतंत्रों को उनकी सभी खामियों के साथ बचाव के महत्व को पहचानने की आवश्यकता है।" उन्होंने कहा कि भारत में फासीवाद और बढ़ते अधिनायकवाद के खिलाफ लोकतंत्र के लिए हमारी लड़ाई सुसंगत होने इसके लिए हमें अतीत और वर्तमान के समाजवादी अधिनायकवादी शासन के विषयों सहित दुनिया भर के सभी लोगों के लिए समान लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार करना चाहिए।
‘अगर हमें ऐसे भारत के लिए संघर्ष करना है तो क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि चीन के लोग भी ऐसा चीन चाहते होंगे? यह कि उइगुर और तिब्बती चाहते हैं कि उनकी स्वतंत्रता के हनन से जुड़ी सच्चाई हम स्वीकारें? क्या उनके उत्पीड़न और पीड़ा को स्वीकारने के लिए हमें पूर्व रूसी और सोवियत उपनिवेशों के लोगों का आभारी नहीं होना चाहिए?’ दीपंकर बाबु या प्रभात जी को सोचना होगा कि भारत में माओ और लेनिन के विचार के साथ पार्टी चलाने का अर्थ यह नहीं कि हम चीन और रूस द्वारा व्यापक जनाधिकारो के कुचलने पर महज लाल झंडा देखा कर मौन रहे , भारत में वाम दलों की संस्कृतिक ईकाई , छात्र शाखा सिकुड़ रही है , वाम के गढ़ जे एन यु से निकलने वाले मोहत पांडे हों या शकील अहमद या कन्हैया कुमार वे व्यापक राजनितिक मैदान के लिए पार्टी से विमुख हो रहे हैं -- बस यही सुखद है कि इन सभी ने कांग्रेसियों की तरह कभी दल से निकल कर अपने दल के निशान या नेतृत्व पर गाली नहीं उछालीं - यही वामपंथी चरित्र भी है . बंगाल में किस तरह वामपंथियों ने ममता के खिलाफ बीजेपी को मजबूत किया , केरल में क्यों सांस्कृतिक मूल्यों में वामपंथी चीन- रूस की तरफ देखते हैं ? ये ज्वलंत सवाल हैं जो कविता कृष्णन के इस्तीफे से उठे हैं . यह तय है कि पार्टी छोड़ने के बाद कविता जैसे कुछ बेड़ियों से मुक्त हुई हैं और अब वे खुल कर जनाधिकार, समानता, लोकतंत्र के मूल्यों पर काम आकर सकेंगी . कविता जैसे लोग देश की जरूरत हैं वे किसी भी परचम के साथ हों
CP
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