My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

बुधवार, 18 अक्टूबर 2023

If ponds are saved, earthquakes will be less.

                            तालाब बचेंगे तो कम आयेंगे भूकम्प

पंकज चतुर्वेदी



04 अक्तूबर 2023 को लगभग सारे उत्तरी भारत के साथ दिल्ली एनसीआर  में कोई 15 सेकंड तक धरती  थरथराई . यह झटका रेक्टर स्केल पर पर  6.2 का था , जिसे अति गंभीर माना जाता है . राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (एनसीएस) ने दिल्ली एनसीआर में भूकम्प के बीते 63 सालों के आंकड़ों के आकलन  में पाया है कि अतिक्रमण व अवैध कब्जों की भेंट चढ़ रहे जलाशयों के ऊपर इमारतें भले खड़ी हो गई हों, लेकिन उनके नीचे पानी अभी ही भूकंप के झटके लगते रहते हैं। एनसीएस के मुताबिक एक जनवरी 1960 से लेकर 31 मार्च 2023 के दरम्यान 63 साल में दिल्ली-एनसीआर में अधिकेंद्र वाले कुल 675 भूकंप आए हैं। लेकिन सन् 2000 तक 40 वर्षों में जहां केवल 73 भूकंप दर्ज किए गए, वहीं इसके बाद 22 वर्षों में 602 भूकंप रिकार्ड किए गए। साल 2020 में दिल्ली व उसके आसपास के दायरे में कुल 51 बार घरती थर्राई।

भारत के कुल् क्षेत्रफल का 54 फीसदी भूकंप संभावित क्षेत्र के रूप में चिन्हित है । दिल्ली को खतरे के लिए तय जोन चार में आंका है। अर्थात यहां भूकंप आने की संभावनांए गंभीर स्तर पर हैं। भूकंप संपत्ति और जन हानि के नजरिए से सबसे भयानक प्राकृतिक आपादा है, एक तो इसका सटीक पूर्वानुमान संभव नहीं, दूसरा इससे बचने के कोई सषक्त तरीके हैं नहीं। महज जागरूकता और अपने आसपास को इस तरह से सज्ज्ति करना कि कभी भी धरती हिल सकती है, बस यही है इसका निदान। हमारी धरती जिन सात टेक्टोनिक प्लेटों पर टिकी है, यदि इनमें कोई हलचल होती है तो धरती कांपती है।

एनसीएस के मुताबिक दिल्ली- एनसीआर में आने वाले भूकंप अरावली पर्वतमाला के नीचे बने छोटे-मोटे फाल्टों के कारण आते हैं, जो कभी-कभी ही सक्रिय होते हैं। यहां प्लेट टेक्टोनिक्स की प्रक्रिया भी बहुत धीमी है। शुरुआत में भूकम्प झटके बहुत सामान्य थे जिनकी तीव्रता 1.1 से 5.1 तक थी लेकिन जैसे जैसे इस समग्र महानगर में जल निधियां सूखना  शुरू हुई , सन  2000 के बाद भूकंप  की तीव्रता में तेजी आ रही है . खासकर यमुना के सूखने और उसकी कचार की जमीन पर निर्माण ने भूकम्प से नुकसान की सम्भावना को प्रबल आकर दिया है .  यमुना कई लाख साल पुराणी नदी है और धरती की भीतर भी  पैलियों चैनल अर्थात भीतरी जल मार्ग हैं और इन जल मार्गों के सूखने और नष्ट होने से धरती के धंसने और हिलने की सम्भावना में इजाफा हुआ हैं .

 विदित हो भारत आस्ट्रेलियन प्लेट पर टिका है और हमारे यहां अधिकतर भूकंप इस प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने के कारण उपजते हैं।  भूकंप के झटकों का कारण भूगर्भ से तनाव-उर्जा उत्सर्जन होता है। यह उर्जा अब भारतीय प्लेट के उत्तर दिशा में बढ़ने और फॉल्ट या कमजोर जोनों के जरिये यूरेशियन प्लेट के साथ इसके टकराने के चलते एकत्र हुई है। जानना जरूरी है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है और इसी से प्लेट बाउंड्री पर तनाव ऊर्जा संग्रहित हो जाती है जिससे क्रस्टल छोटा हो जाता है और चट्टानों का विरुपण होता है। ये ऊर्जा भूकंपों के रूप में कमजोर जोनों एवं फाल्टों के जरिए सामने आती है ।

हालांकि कोई भूकंप कब, कहां और कितनी अधिक ऊर्जा (मैग्निीट्यूट) के साथ आ सकता है, इसकी अभी कोई सटीक तकनीकी विकसित हो नहीं पाई है , केवल किसी क्षेत्र की अति संवेदनशीलता को उसकी पूर्व भूकंपनीयता, तनाव बजट की गणना, सक्रिय फाल्टों की मैपिंग आदि से समझा जा सकता है। आज जरूरी है कि जिन इलकों में बार बार धरती डोल रही है वहां भू वैज्ञानिक अध्ययनों का पूरी तरह उपयोग करते हुए उपसतही संरचनाओं, ज्यामिति तथा फाल्टों एवं रिजों के विन्यास की जांच की जानी है। चूंकि नरम मृदाएं संरचना के बुनियादों को सहारा नहीं दे पातीं, भूकंप प्रवण क्षेत्रों में बेडरौक या सख्त मृदा की सहारा वाली संरचनाओं में कम नुकसान होता है। इस प्रकार, नरम मृदाओं की मोटाई के बारे में जानने के लिए  मृदा द्रवीकरण अध्ययन किए जाने की भी आवश्यकता है। सक्रिय फाल्टों को निरुपित किया जाना है और जीवनरेखा संरचनाओं या अन्य अवसंरचनाओं को नजदीक के सक्रिय फाल्टों से बचा कर रखे जाने और उन्हें भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के मार्गदर्शी सिद्धांतों के अनुरूप निर्माण किए जाने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की सवा तीन करोड़ लोगों की बसावट का चालीस फीसदी इलाका अनाधिकृत है तो 20 फीसदी के आसपास बहुत पुराने निर्माण। बाकी रिहाइशों  में से बमुश्किल पांच फ़ीसदी का निर्माण या उसके बाद यह सत्यापित किया जा सका कि यह भूकंपरोधी है। शेष  भारत  में भी आवासीय परिसरों के हालात कोई अलग नहीं है। एक तो लोग इस चेतावनी को गंभीरता से ले नहीं रहे कि उनका इलका भूकंप के आलोक में कितना संवेदनषील है, दूसरा उनका लोभ उनके घरों को संभावित मौत घर बना रहा है। बहुमंजिला मकान, छोटे से जमीन के टुकड़े पर एक के उपर एक डिब्बे जैसी संरचना, बगैर किसी इंजीनियर की सलाह के बने परिसर, छोटे से घर में ही संकरे स्थान पर रखे ढेर सारे उपकरण व फर्नीचर--- भूकंप के खतरे से बचने कीे चेतावनियों को नजरअंदाज करने की मजबूरी भी हैं और कोताही भी। वल्नेरेबिलिटी काउंसिल ऑफ इंडिया की बिल्डिंग मैटीरियल एंड टेक्नोलॉजी प्रमोशन काउंसिल द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दिल्ली के 91.7 प्रतिशत मकानों की दीवारें पक्की ईंटों से जबकि कच्ची ईंटों से 3.7 प्रतिशत मकानों की दीवारें बनी हैं। एक्सपर्ट के अनुसार, कच्ची या पक्की ईंटों से बनी इमारतों में भूकंप के दौरान सबसे ज्यादा तबाही होती है।

राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआइ) , हैदराबाद के एक शोध से स्पष्ट हुआ है कि भूकंप का एक बड़ा कारण धरती की कोख से जल का अंधाधुंध दोहन करना भी है। भू-विज्ञानी के अनुसार भूजल को धरती के भीतर लोड यानि की एक भार के तौर पर उपस्थित होता है। इसी लोड के चलते फाल्ट लाइनों में भी संतुलन बना रहता है।

समझना जरूरी है कि देश के जिन भी इलाकों में यदा-कदा धरती काँपती रहती हैं , उन सभी शहर, जिलों  में पारेम्परिक जल-निधियों- जैसे तालाब, झील, बावड़ी, छोटी नदियों को पानीदार बनाए रखना जरूरी है । साथ ही आज जरूरत है कि शहरों  में आबादी का घनत्व कम किया जाए, जमीन पर मिट्टी की ताकत मापे बगैर कई मंजिला भवन खड़े करने और बेसमेंट बनाने  पर रोक लगाई जाए। भूजल के दोहन पर सख्ती हो, इसके साथ ही देष के भूकंप संभावित इलकों के सभी मकानों में  भूकंप रोधी रेट्रोफिटिंग करवाई जाए . सबसे बड़ी बात अपने पारम्परिक जल निधियों को सूखने से जरुर बचाया जाये .

 

शनिवार, 14 अक्टूबर 2023

One Ram hundreds stage show RAMLILA

 रामलीला भारत की अस्मिता की पहचान है

एक राम कई लीलाएं

पंकज चतुर्वेदी 



यह केवल बुराई पर अच्छाई की सीख मात्र नहीं है, यह केवल महाबलिशाली रावण के पतन या राजा रामचंद्र द्वारा सीता मैया को ‘असुर बंधन’ से मुक्त करवाने की षौय गार्था तक सीमित नहीं है, इसे देखने वाले इसकी कहानी को, संवादों को पात्रों को संगीत को सालें से देखते आ रहे हैं, लेकिन ना तो एक और बार देखने-सुनने की प्यास समाप्त होती है और ना ही तड़क-भड़क वाले मल्टीमीडिया के युग में समाज से लुप्त हो रही लोक षैलियों में गायन या नृत्य का रसास्वदन करने की लालसा। भले ही कोविड के चलते बीते दो सालो ंसे रामलील मैदान सूने है। लेकिन आज भी भारत के लोक-मन में राम कथा को फिर से देखने की उत्कंठा जीवंत है। अंधेरा छाते ही राजधानी दिल्ली का लालकिला हो या बंबई में गिरगांव चैपाटी के पास का मैदान या फिर बुंदलखंड का छोटा सा गांव या दरभंगा बिहार, हर जगह अपनी जगह सुरिक्षित करने के लिए टाट-बोरे बिछाना, सही जगह पाने के लिए गाली-गलौज करना, षहर का बाजार जल्दी बंद हो कर रामलीला मैदान पर जुट जाना, समूचे देश में हजारो-हजार जगह यथावत है, निरापद है। कुछ जगह अभिनय, सजावट, पटकथा को समय की हवा भी लगी तो कई जगह आज भी सदियों पुरानी रामकथा वैसे ही बांची-अभिनित की जा रही है। कई व्यावसायिक नाट्य समूह बड़े-बड़े हाल ले कर वहां षो कर रहे हैं व पर्याप्त दर्शक उन्हें मिल रहे हैं वहीं घर-घर  में बसे दूरदर्शन पर रामानंद सागर के अलावा कई अन्य निर्माताओं द्वारा तैयार रामकथा, रामचरित जैसे कार्यक्रम प्रसारित होते रहते है।, लेकिन खुले मैदानों पर जाने वाले लेगा कम नहीं हो रहे है। शायद लोक- संवाद का यही सुख है, अपनों के साथ सामूहिक रूप से  रीति-नीति-ज्ञान-संगीत-नाट्य-लास्य का आनंद लेना । और इसी के चलते युग बदले, मान्यताएं बदली, समाज व सुविधाएं बदलीं लेकिन नहीं बदली तो रामलीला ।

दिल्ली का ही हिस्सा हो गए टीएचए यानि ट्रांस हिंडन की अधिकांश कालेनियां अभी 40 साल पहले बसीं, अधिकांश वाशिंदे देश के अलग-अलग हिस्सों से रोजी रोटी की तलाश में दिल्ली आए मध्य आय वर्ग के लोग हैं। इंदिरापुरम कई फिल्मों की षुटिंग का पसंसीदा स्थल, शिप्रा मॉल से घिरी हुई गगनचुंबी अट्टालिकाओं की कालोनी है और यहां धरोहर समाज द्वारा मंचित की जाती रामलीला के संवाद गढवाली में होते हैं। हिमलय की गोद से उजड़ कर दिल्ली की देहरी पर आ गए इन उत्तरांचलियां की रामलीला के सभी कलाकार वहीं रहते हैं, दिन में नौकरी करते हैं फिर घर आ कर दो घंटे रिहर्सल और उसके बाद मंचन। उधर सूर्यनगर की रामलीला का आज भी संस्कृत में होना और इस देवभाषा  को अधिकांश लोगों द्वारा  ना समझ में आने के बावजूद हजारों लोगों को वहां श्रद्धापूर्ण बैठे रहना बानगी है कि राम की गाथा देश की संस्कृति के कण-कण में किस तरह सची-बसी है। कहीं पर यह रामलीला अपनी बिछुड़ी परंपरा को बचाने का प्रयास है तो कई जगह आज जहरीले बनाए जा रहे दौर में गंगा-जमुनी मेलजोल की मिसाल। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिले के बढ़नी विकास खंड के अंतर्गत औदही कलां गांव एक छोटा सा गांव है लेकिन यहां की रामलीला कम से कम दो सौ साल पुरानी है और प्रारंभ  से ही साझा संस्कृति की  मिसाल है। रामलीला में हिंदूओ के साथ ही मुस्लिम समुदाय के लोग भी कंधे से कंधा मिलाकर मंचन और प्रबंधन करते हैं।

पश्चिमी उप्र की सबसे पुरानी रामलीलाओं में से एक सुल्लामल रामलीला,गाजियाबाद का प्रारंभ सन 1900 में हुआ था। इसके लिए स्वयं सुल्लामल ने एक पदबंध रामकथा लिखी थी और प्रारंभ में वे अपने आठ शिशरें के साथ उसी पुस्तिका से रामलीला खेलते थे। उस रामायण की पूजा की जाती थी। फिर उस पुस्तक की प्रति पता नहीं कैसे नश्ट हो गई, उसके बाद से तुलसीदासकृत रामचरितमानस के आधार पर मंचन होने लगा। सुल्लामल के परपोते विनोद गर्ग आज भी रामलीला से सक्रियता से जुड़े है।। यहां हर दिन 20 हजार लोग आते हैं। फिरोजाबाद जिले के खैरिया गांव की रामलीला में राम का अभिनय करने वाले षमसाद अली  मंच पर जाने से पहले इस्लामिक रीति अनुसार ‘वजु’ करते हैं। राजस्थान के सूरतगढ़ में बुधवार रात अनूठी रामलीला का मंचन हुआ. संस्कृत श्लोकों और हिंदी के दोहों के स्थान पर यहां ठेठ मारवाड़ी में संवाद हुए. राजा दशरथ से लेकर श्रवण कुमार तक सभी किरदार पूरी तरह से मायड़ भाषा में रचे-बसे नजर आए. दरअसल, राजस्थानी भाषा में रामलीला का मंचन कर सूरतगढ़ के श्रीबालाजी रामलीला संस्थान की ओर से यह प्रयास राजस्थानी को फिर से नई ऊर्जा देने का था. उल्लेखनीय है कि दशकों के संघर्ष के बावजूद राजस्थानी भाषा को अब तक मान्यता नहीं मिल पाई है. लेकिन मारवाड़ी भाषाप्रेमी नए-नए प्रयोग करके भाषा आंदोलन को मजबूती देने का प्रयास कर रहे हैं। जोधपुर के मां्रगरियाओं की रामलीला में जाति-धर्म का भेद दिखता ही नहीं है। असल में लोक-परंपराओं को किसी कानून में बांधना या किसी दायरम में समेटना असंभव है। लोक के गीत-संगीत-कला, समय के साथ स्वयं अपना रास्ता बनाते हैं। अब राजस्थान के बारां जिले पाटुडा गाव को ही लें, वहां पूरे देश की तरह षारदये नवरात्रि यानि यही सितंबर-अक्तूबर वाली में रामलीला होती थी। अचानक इलाके के बड़े-बुर्जुगों को खयाल आया कि इस समय रामलीला करना तो रावण की मौत का जश्न मनाना है जबकि रामजी का जन्म तो चैत्र नवरात्रि के बाद आता है। तब से वहां रामलीला चैत्र में होने लगी। यह गांव काली सिंध नदी के किनारे, कोटा से कोई 70 किलोमीटर दूर है। यहां की रामलीला पूरी तरह संगीतमय है जिसमें सिंध, गुजराती, षेखावटी और ब्रज के लोकसंगीत का रंग होता है। 

बनारस के रामनगर की रामलीला को देश ही नहीं दुनिया में अपने तरह का विलक्षण नाट्य मंचन कहा जाता है। वाराणसी के कोई 20 किमी दूर रामनगर में साल 1783 में रामलीला की शुरुआत काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने की थी । यहां रामलीला का मंचन 31 दिन तक चलता है। यहां पर बनाये गये स्टेज देखने योग्य होते हैं। रामनगर की रामलीला की खास बात यह है कि इसके प्रधान पात्र एक ही परिवार के होते हैं। उनके परिवार के सदस्य पीढ़ी दर पीढ़ी रामलीला अपनी भूमिका आदा करते आ रहे हैं। यहां आज भी ना तो चमचमाती रोशनी वाले लट्टू होते हैं ना ही ध्वनिविस्तारक यंत्र ,कोई सजा-धजा मंच या दमक वाली पोशाक भी नहीं ं। केवल पेट्रोमेक्स या मशला की रोशनी, खुला मंच और दूर-दूर तक फैले ण्क दर्जन कच्चे-पक्के मंच व झोपड़े । इनमें से कोई अयोध्या तो कोई लंका ता कोई अशेक वाटिका हो जाता है। परंपरा के अनुसार हर दिन काशी नरेश गजराज पर सवार हो कर आते हैं और उसी के बाद रामलीला प्रारंभ होती है। इस मंचन का आधार रामचरित मानस है, सो सभी दर्शक भी अपने साथ पाटी पर रख कर रामचरितमानस लाते हैं व साथ-साथ पाठ करते हैं। 

प्रयाग यानि इलाहबाद में तो कई-कई रामलीलाएं एक साथ होती है, सभी का अपना इतिहास है। लेकिन वहां की रामलीला मंचन पर टेलीविजन की रामलीलाओं का प्रभाव सर्वाधिक हुआ और अब वे चुटिले संवाद, चमकीले सेट और चटकीले अस्त्र-शस्त्र का दिखावा बढ़ गया है। इलाहाबाद में रामलीला षुरू होने से एक दिन पहले कर्ण -अश्व  की आकर्षक शोभायात्रा निकाली जाती है । इसमें पचास से ज्यादा बैंड पार्टियां , डांस करते कालाकार और  बिजली से सज्ज्ति झांकियां लोगों को रामलीला षुरू होने की सूचना देती हैं। भगवान राम का दूत कहे जाने वाले कर्णघोड़े की लोग रास्ते भर आरती और पूर्जा अर्चना करते हैं। यह परंपरा इलाहाबाद में बहुत पुरानी रही है। ऐसा भी माना जाता है कि कर्ण घोड़े के कारण ही भगवान राम की लीला लोगों तक पहुंची और उसी के स्वरूप आज दुनिया भर में रामलीला का मंचन किया जाता है। सरकारी रिकार्ड के मुताबिक 19वीं सदी की षुरूआत में प्रयोग में चार स्थानों पर रामलीला मंचन होता था। एक अंग्रेज अफसर फैनी पार्क्स ने अपने संस्मरण में सन 1829 में फौजियों द्वारा चेथम लाइन्स में संचालित व अभिनीति रामलीला का उल्लेख किया है। मुगल बादशाह अकबर ने भगवत गोसाईं को कमोरिन नाथ महादेव के पास की भूमि रामलीला के लिए दान में दी थी जिस पर वर्षों रामलीला होती रहीं थी । पथरचट्टी यानि बेनीराम की रामलीला की षुरूआत सन 1799 में कही जाती है जिसे अंग्रेज षासक खुल कर मदद करते थे।  इन दिनों इलाहबाद व उसके आसपास 100 से यादा स्थनों पर रामलीला हो रही है , कहीं रावण इलेक्ट्रानिक चैहरे से आवाज निकालता, आंखे दिखाता है तो कहीं हनुमान को लिफ्ट से ऊपर उठा कर हवा में उड़ाया जात है। करोड़ों का बजट, फिर भी भीड़ जुटाने को नर्तकियों का सहारा। 

राजाराम की जन्म स्थली अयोध्या  की रामलीला बेहद विशिश्ठ है, इसमें कत्थक नृत्य में पारंगत कलाकार एकल व सामूहिक नृत्य व पारंपरिक ताल, ध्ुन, टप्पों के आधार पर संपूर्ण रामलीला को एक विशाल मंच पर प्रस्तुत करते हैं। रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास से जुड़े एक अन्य स्थान चित्रकूट में रामलीला का मंचन फरवरी के अंतिम सप्ताह में सिर्फ पांच दिनों के लिए ही होता है। यहां गीत-संगीत- अभिनय को और सशक्त बनाने के लिए समय के साथ आए तकनीकी उपकरणों का खुल कर इस्तेमाल हेता है। हर पांचवे साल में वहां किसी नई षैली व प्रस्तुति का मंचन दिखने लगता है। 

जब देश-दुनिया की रामलीलाओं का विमर्श हो तो गढ़वाल व कुमायूं की रामभक्ति के रंग को याद करना अनिवार्य है। अभी कुछ दशक पहले तक वहां सड़कें थी नहीं, बिजली व संचार के साधन भी नहीं, ऐसे में लोगों के आपस में मेल-जोल, मनोरंजन और अपनी कला-प्रतिभा के प्रदर्शन का सबसे प्रामाणिक मंच रामलीलाएं ही थी। यहां की रामलीला की खासियत है, संवादों में छंद और रागनियों का प्रयांग। इनमें चौपाई , दोहा, गजल, राधेश्याम, लावणी, सोरठा, बहरेतबील जैसी विधाओं के वैविध्य का प्रयोग होता है। कुमायूं में पहली रामलीला 1860 में अल्मोड़ा नगर के बद्रेश्वर मन्दिर में हुई। जिसका श्रेय तत्कालीन डिप्टी कलैक्टर स्व. देवीदत्त जोशी को जाता है। बाद में नैनीताल, बागेश्वर व पिथौरागढ़ में क्रमशः 1880, 1890 व 1902 में रामलीला नाटक का मंचन प्रारम्भ हुआ। मध्यप्रदेश में होशंगाबाद, जबलपुर, इंदौर, छतरपुर में रामलीलाओं का इतिहास सौ साल से ज्यादा पुराना है। इन सभी में स्थानीय बोलियों - बुंदेली, मालवी आदि का पुट स्पश्ट दिखता है। गढवाल और बुंदेलखंड की रामलीलओं में पारसी थियेटर ाक प्रभाव काफी देखा जाता है। 




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सात समंदर पार भी जय सिया-राम 

वैसे तो भारतीय समुदाय जहां-जहां भी रोजगार-व्यापार के लिए गया, रामचरित मानस को अपने साथ ले गया, लेकिन एशिया के कई देशों, जैसे - मलेशिया, इंडोनेशिया, नेपाल, थाईलैंड आदि में उनकी अपनी परंपराओं के अनुसार सदियों से रामलीला मंचन होता रहा है। फिजी, मारीशस सूरीनम कनाड़ा, दक्षिण अफ्रीका और अब अमेरिका में भी रमलीला मंचन हो रहे हैं। इंडोनेशिया और मलेशिया में मुखौटा रामलीला का प्रचलन है।

दक्षिण-पूर्व एशिया के इतिहास में कुछ ऐसे प्रमाण मिलते है जिससे ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही रामलीला का प्रचलन था। जावा के सम्राट वलितुंग के एक शिलालेख में एक समारोह का विवरण है जिसके अनुसार सिजालुक ने उपर्युक्त अवसर पर नृत्य और गीत के साथ रामायण का मनोरंजक प्रदर्शन किया बर्मा के राजभवन में थाई कलाकारों द्वारा रामलीला का प्रदर्शन होने का उल्लेख लगा। माइकेल साइमंस ने सन 1795 में किया है। 

कंपूचिया में रामलीला का अभिनय ल्खोनखोल के माध्यम के होता है। ‘ल्खोन’ यानि इंडोनेशाई भाशा में नाटक और कंपूचिया की भाषा खमेर में खोल का अर्थ बंदर होता है। कंपूचिया के राजभवन में रामायण के प्रमुख प्रसंगों का अभिनय होता था।

विविधता और अनुठेपन के कारण षेडो ड्रामा के जरिये जावा तथा मलेशिया के वेयांग और थाईलैंड के नंग का विशिष्ट स्थान है। जापानी भाषा में वेयांग का अर्थ छाया है। इसके अंतर्गत सफ़ेद पर्दे पर रोशनी डाली जाती है और बीच में चमड़े की विशाल पुतलियों को कौशलता साथ नचाते हुए उसकी छाया से राम कथा को देखा जाता है। 



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अनुमान है कि सबसे पुरानी रामकथा महर्शि वाल्मिकी ने लिखी थी और उसका काल ईसा से  नौ से सात हजार साल पूर्व का है। फिलहाल जितनी रामलीलाएं उपलब्ध हैं उनमें से अधिकांश का उपलब्ध इतिहासस अधिक से अधिक पांच सौ साल का है। यह बात सही है कि गोस्वामी तुलसीदास ने आम लेगों की बोली-भाशा में चौपाई के माध्यम से रामायण का जो स्वरूप दिया उससे रामकथा घर-घर तक पहुंची और उसी के चलते अधिकांश रामलीलाओं का मूलभूत दस्तावेज रामचरितमानस ही है। 

वर्तमान भारती की भौगोलिक सीमाओं से परे जावा के सम्राट ‘वलितुंग’ के 907 ई के एक शिलालेख में रामकथा के  मंचन का उल्लेख है । थाईलैंड के राजा ‘ब्रह्मत्रयी’ के राजभवन की नियमावली में रामलीला का उल्लेख है जिसकी तिथि 1458 ई है। पुरातन भारतीय के कुछ विद्वान भरत मुनि के नाटय षास्त्र के साथ ही रामकथा मंचन का इतिहास होने का दावा करते हैं। ‘नाट्यशास्त्र’ के  छह हजार श्लोकों में ‘अवस्थानुकृति’ नाट्यम की चर्चा की है। इस शास्त्र का आरंभ समुद्र मंथन की लीला से होता है। समुद्र मंथन का संबंध भगवान विष्णु से है। विष्णु को सृष्टि का पालन करने वाला देव माना जाता है। श्रीराम और श्रीकृष्ण भी विष्णु के ही अवतार माने जाते हैं। इसलिए जब भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हो गया तो कुल गुरु वसिष्ठ जी ने कहा कि भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार श्रीराम आपकी लीलाओं के मंचन और दर्शन से समाज में आशावादिता जगेगी और बुराई का अंत होगा। इस प्रकार रामलीला प्रारंभ हुई।

बरेली में 25 नवंबर 1890  को जन्मे पं.राधेश्याम रामायणी ने ‘राधेश्याम रामायण’ की रचना कर रामलीलाओं को नया जीवन दे दिया था। कम पढ़े-लिखे, रिहर्सल के लिए कम समय निकाल पाने वाले कलाकारों के लिए रोधश्यामी बहुत उपयोगी रही। आज की रामलीलाओं में लगभग 60 प्रतिशत संवाद उसी रामायण से आते हैं।

कुछ रामकथा विशेषज्ञ कहते हैं मेघा भगत नामक एक संत तुलसीदास से बहुत पहले वाल्मिकी रामयण आधरित रामलीला का मंचन करते थे। देश के दक्षिण व पूर्वोत्तर में कथाएं भी बदल जाती है, संवाद, मेकअप भी लेकिन नहीं बदलती है तो दर्शकों की संख्या। 


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दिल्ली की रामलीला यनि राजनीति का मैदान 

दिल्ली में रामलीलाएं बेहद भव्य, तड़क-भड़क वाली, व्यापारिक गतिविधियों का क्षेत्र और उससे भी अध्कि अपने सियासती रसूख का मुजाहिरा करने का जरिया होती है। आज दिल्ली में कोई 1100 जगहों पर रामलीला होती हैं और उनमें से राम की असली आराधना केवल उन्ही कालोनियों की छोटी-मझोली रामलीलाओं में षेश है जिनका संचालन स्थानीय समाज अपनी हैसियत से करता है । दिल्ली में रामलीला के प्रारंभ को ले कर बड़ी रोचक कथा है। । कहा जाता है कि उन दिनों गोस्वामी तुलसीदास लालकिले के पीछे कलकतिया गेट के पास गुड़ वालों की धर्मशाला में रहा करते थे। किसी ने बादशाह के कान भर दिए कि एक दुबला-पतला जनेऊधारी ब्राहण प्रत्येक सुबह यमुना के तट पर कोई तांत्रिक क्रिया करता है। अकबर ने गोस्वामी जी को सिपाहियों से पकड़वा लिया। कुछ ही देर में लाल किले में बंदर ही बंद छा गए । पूरी सेना लगा दी लेकिन बंदर किला छोड़ने को राजी नहीं। जैसे ही तुलसीदास जी को रिहा किया गया, वानर गायब हो गए। तभी से उसी धर्मशाला में तुलसीदासजी ने रामलीला षुरू की। बीच में रामलीला बंद हुई और बहादुर षाह जफर ने उसे फिर षुरू करवाया । तभी से 180 साल से ज्यादा बीत गए रामलीला अनवरत जारी है। वही रामलीला आज भी रामलीला मैदान में होती है और उसमें हर दल के नेता अपने सबसे बड़े नेता को बुलाने की खींच-तान किया करते है।। यहां की रामलीला शाम छह बजे से शुरू होती है जो रात 10-11 बजे तक चलती है।

पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी में गत 15 साल से आधुनिक तकनीक के जरिये मात्र तीन घंटे में पूरी रामकथा दर्शाने का प्रयोग बेहद सफल रहा है। इन दिनों दिल्ली में श्रीरामलीला समिति, श्री धार्मिक रामलीला समिति, नवश्री धार्मिक रामलीला समिति, लव-कुश रामलीला समिति, श्री सनातन धर्म लीला समिति, दंगल मैदान आदि समितियों की बड़ी चर्चा होती है। इनमें से कई रामलीलओं में भीड़ जुटाने के लिए फिल्मी सितारे बुलाए जाते हैं और जितना बड़ा सितारा आता है, परिसर में लगे स्टॉल का किराया उतना ही बढ़ जाता है। 

दिल्ली के लालकिला के प्रांगण में होने वाली लवकुश  रामलीला भी एक बड़ी राजनीतिक लीला का स्थल है। यह सबसे चर्चित रामलीला है। लव कुश रामलीला कमेटी का गठन 1979 में किया गया था। यहां फिल्मी सितारे सबसे ज्यादा अते है। यह रोज शाम सात बजे से शुरू होती है। दिल्ली की तीसरी सबसे चर्चित और ऐतिहासिक रामलीला लालकिला के पास सुभाष मैदान में आयोजित की जाती है। 1923 से शुरू हुई इस रामलीला में बड़े बडे़ नेताओं को बुलाने के लिए चर्चित है। यहां पर प्रधानमंत्री जैसे बड़े नेता भी आते रहते हैं। यहां की रामलीला मंचन के लिहाज से भी खास होती है। यहां उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद और बरेली से मशहूर कलाकार बुलाए जाते हैं। यहां पर आपको चांदनी चौक के बने स्वादिष्ट व्यंजनों का भी लुत्फ उठाया जा सकता है। शाम सात बजे से शुरू होने वाली यहां की रामलीला भी 10- 11 बजे तक चलती है। यहां पर दशहरा को विशाल रावण का दहन किया जाता है।

इंडिया गेट के पास कॉपरनिकस मार्ग पर स्थित श्रीराम भारतीय कलाकेंद्र में सन 1957 से हर साल यहां पर भव्य रामलीला के दर्शक सभ्रांत, कलाप्रेमी, विदेशी मेहमान होते है। चूंकि यहां प्रतिदिन का टिकट 100 से पांच सौ तक होता है सो यहां आम आदमी आता नहीं है, लेकिन यहां के कलाकार लोक व शास्त्रीय नृत्य में पारंगत अंतरराष्ट्रीय स्तर के कलाकार होते हैं। यह आयोजन दीपावली से पहले धनतेरस तक कोई महीने चलता है और हर दिन शो  खचाखच  होता है। 


बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

Smart city turn in river during mansoon

 डूबती स्मार्ट सिटी 

पंकज चतुर्वेदी 





जून -2015 में केंद्र सरकार के लोकलुभावने प्रोजेक्ट देश में 100 “स्मार्ट सिटी “ विकसित करने की समय सीमा अब जून – 24 तक बढ़ा दी गई है लेकिन 74 हज़ार करोड़ खर्च के बाद भी परियोजना की अंतिम  बरसात ने बता दिया कि इन शहरों को थोड़ी ही बरसात से डूबने से बचने की कोई संभावना नहीं है . इस बार दिल्ली डूबी, समुद्र के किनारे बसा पणजी भी बरसात में दरिया बन गया. लखनऊ के पोश इलाकों में नाव चलने की नौबत आ गई . शिमला जैसे शहर  भूस्खलन और बरसात में बिखर गये . भोपाल तो कई बार तालाब बना . रांची के भी हालत खराब रहे . हालंकि स्मार्ट सिटी परियोजना में दर्ज था कि वहां के नदी-तालाब को पुनर्जीवित किया जायेगा लेकिन कहीं भी ऐसा होता दिखा नहीं . हाल ही में महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी नागपुर में जो तबाही आई, उसने बता दिया अपनी ही जल निधियों को सहेज न पाने के कारण यहाँ हाहाकार मचा . सड़कों पर नाव चल रही थीं. चार लोगन की मौत हो गई . कोई दस हज़ार घरों को पानी ने जबर्दस्त नुकसान पहुँचाया . हालात बिगड़े तो सेना की दो टुकड़ियों को उतारना पड़ा .  

विदा होती बरसात ने नागपुर की समरत सिटी की जो पोल खोली, असल में यह एक बानगी है , बस शहर का नाम और वहां की जल निधियों के नाम बदलते जाएँ- कोताही, बर्बादी की से मिलेगी . पता नहीं बल खा कर  चलने वाली नदियों को देख कर सर्प को नाग कहने लगे या सर्प की गति के कारण जल निधि को नाग कहा गया . हिमाचल से ले कर देश के लगभग सभी हिस्सों में पहाड़ से तेज गति से  आने वाली पतली जल धाराओं को नाग कहा  जाता है . नागपुर शहर की नींव वर्ष 1703 में देवगढ़ के गोंड राजा "बख्त बुलंद शाह" ने  रखी थी। बख्त बुलंद शाह के उत्तराधिकारी चंद सुल्तान ने नाग नदी के किनारे अपने शहर के चारों ओर तीन मील लंबी दीवार का निर्माण कराया था.  1743 में, यह राघोजी राव भोंसले साम्राज्य की राजधानी बन गया. वैसे कहते  हैं कि नागपुर का पुराना नाम फनीपुर था और यह भी नाम नाग या सर्प का ही है . यहाँ के शासक जानते थे कि यह छोटी सी नदी है , इस लिए नाग नदी के जल तन्त्र में कई तालाब बनाये गए ताकि बरसात की हर बूँद सारे साल के लिए जोड़ कर रखी जा सके . यहाँ की सघन जल निधियों  के कारण यहाँ का मौसम सुहाना  होता था , तभी इसे राज्य की शीतकालीन राजधानी बनाया गया . बीते तीन दशकों में यहाँ ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन बढ़ा, औद्योगीकरण भी हुआ  और इसका खामियाजा भुगता नाग नदी के जल तन्त्र ने . जम कर अतिक्रमण हुए  और तालाबों को मैदान बना दिया गया . नाग नदी और उसकी सहयोगी पीली नदी, चमार नाले आदि को कूड़ा धोने का मार्ग बना दिया गया . 

अभी एक साल पहले  नाग नदी के पुनर्जीवन  की परियोजना का उदघाटन स्वयम प्रधानमन्त्री जी की उपस्थिति में हुआ . प्रदूषण मुक्ति और अतिक्रमण के जाल को हटाकर नाग नदी को पुनर्जीवित करने के लिए साल 2021  में परियोजना को मंजूरी दी गई थी। भाजपा शासित नागपुर मनपा ने इस परियोजना पर 2117 करोड़ रुपए खर्च किए। शहर में जलप्लावन के बाद नागपुर के लोग अब पूछ रहे हैं कि आखिर यह पैसा कहां गया?यही नहीं जून -14 में नागपुर को  स्मार्ट सिटी बनाने का जो काम शुरू हुआ और जिस  पर अभी तक कोई एक हज़ार करोड़  रूपये खर्च हो चुके हैं , दरिया बना शहर सवाल कर रहा है है कि क्या ऐसा ही होता है स्मार्ट सिटी में बरसात का मौसम ? यह तो किसी से छुपा नहीं हैं कि जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से सारा देश ग्रसित है इस तरह की अचानक और तीव्र बरसात के लिए हर कसबे-शशर को तैयार रहना होगा . फिर नागपुर में शहर और नदी के विकास में इस संभावना पर क्यों ध्यान नहीं दिया गया ? 

नागपुर के डूबने को समझने के लिए नाग नदी के स्वरुप और उसके जल-तन्त्र को समझना होगा . भोंसले शासन काल में नाग नदी नागपुर शहर की दक्षिणी सीमा निर्धारित करती थी . पूर्वी सीमा में नवाबपुरा और जुनी मंगलवारी और उत्तरी दिशा में हंसापुरी, लेंडी तालाब . शहर का विस्तार नाइक तालाब तक था. सक्करदरा तालाब शहर की विशाल जल निधि था जिससे लोगों की प्यास बुझती थी.  अमरावती मार्ग पर वादी क्षेत्र में लावा पहाड़ियों से  नाग नदी का उदगम हुआ . इसके मार्ग में इससे पीली और पौरा  नदी मिलती और बिछडती रहती हैं . इन नदियों की हर बूंद का कोई दस तालाबों से पानी का आदान-प्रदान होते रहता था . ये तालाब थे – गोरेवाड़ा झील , फुटाला झील , अम्बाझरी , सोनेगाँव , गांधीसागर तालाब , पुलिस लाइन्स तालाब , लेंडी तालाब , नायक तालाब , मंगलवारी तालाब , पांढराबोडी तालाब, सक्करदरा तालाब , बाराद्वारी झील आदि . नाग नदी की यात्रा पीली नाद से मिलन के स्थान पवान्गांव तक कोई 16 .8  किमी की है . इस प्रकार नागपुर शहर के जल-तंत्र में तीन नदियाँ और 14 झील हुआ करते थे . इसके अलावा  854  सार्वजानिक कुएं भी यहाँ के जल तन्त्र का हिस्सा थे . 

यदि नागपुर की जल कुंडली बांचें तो न तो यहाँ कभी जल संकट होना चाहिए  था और न ही जल भराव . यह जिला प्रशासन ने एक आर टी आई में स्वीकार किया है कि 15 साल में शहर में दो तालाबों - संजय नगर व डोब तालाब का अस्तित्व समाप्त हो गया है। अब शहर में केवल 11 तालाब बचे हैं। इसमें भोसलेकालीन के 4 तालाब भी शामिल हैं। नाइक और लेंडी तालाब अब छोटी सी पोखर रह गये हैं और पांढराबोडी तालाब अब नाम का रह गया है . चूँकि ये सभी तालाब नदियों से जुड़े थे और अतिक्रमण और बेपरवाह विकास ने इस पारम्परिक ज्ञान को ध्यान नहीं रखा . तभी  नागपुर डूबने का साल कारण अम्बाझरी और गोरेवाडा तालाब से पानी बाहर आना तथा नाग व् पीली नदी का उफान जाना कहा  जा रहा है . जरा बारीकी से देखें , आप जिस शहर में रहते हैं, वहां की भी खानी ठीक यही है . 

इस बार की बाढ़ अकेले नागपुर ही नहीं देश के सभी स्मार्ट –सिटी के लिए गंभीर चेतावनी है , अभी भी  समय है कि नागपुर की नाग - पीली – पोहरा नदी की तरह अन्य शहरों की  छोटी नदियों या फिर उनके नैसर्गिक मार्गों और उनके साथ झीलों के आगम-मिलन  के  पूरा-तकनीक को पहचाने , वहां से अतिक्रमण और स्थाई निर्माण हटायें और जल प्रवाह अविरल बहने दें , साथ ही शहर के बीच स्थित जल निधियों में कूड़ा-गंदगी डालने पर पूरी तरह रोक लगायें वर्ना स्मार्ट सिटी की सड़कें या सजावट कोई काम नहीं आएगी और वहां के अस्तित्व पर बड़ा संकट सामने खड़ा होगा  . 


बुधवार, 27 सितंबर 2023

Hurdles in water distribution of Teesta River between India and Bangladesh

 आखिर क्यों नहीं साकार हो रही  है तीस्ता जल वितरण योजना

पंकज चतुर्वेदी



हाल ही में संपन्न जी- 20 की नई दिल्ली में संपन्न बैठक में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को उम्मीद थी कि  तीस्ता नदी से उनके देश को पानी मिलने का रास्ता शायद साफ़ हो जाए . हालाँकि हमारी विदेश मंत्रालय के संसदीय स्थाई समिति ने भी यह सिफारिश कर दी है कि लम्बे समय से लटके तीस्ता जल विवाद का समाधान कर हमें  बांग्लादेश से द्विपक्षीय सम्बन्ध प्रगाढ़ करना चाहिए . वैसे तो भारत और बांग्लादेश  की सीमायें  कोई 54 नदियों का जल साझा करती हैं और पिछले साल अक्तूबर में बांग्लादेश की प्रधान मंत्री के भारत आगमन पर कुशियारा नदी से पानी की निकासी पर भारत सरकार और बांग्ला देश के बीच समझोता  भी हुआ था , जिसका लाभ दक्षिणी असम  और बांग्लादेश के सिलहट के किसानो को मिलना है , लेकिन तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे  का मसला हर बार  विमर्श में तो आता है लेकिन उस पर सहमती नहीं बन पाती,  तीस्ता नदी  हमारे लिए केवल जलापूर्ति के लिए ही नहीं ,बल्कि बाढ़ प्रबंधन के लिए भी   महत्वपूर्ण है.


 

तीस्ता नदी सिक्किम राज्य के हिमालयी क्षेत्र के पाहुनरी ग्लेशियर से निकलती है। फिर पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है और बाद में बांग्लादेश में रंगपुर से बहती हुई फुलचोरी  में ब्रह्मपुत्र नदी में समाहित हो जाती है। तीस्ता नदी की लम्बाई 413 किलोमीटर है। यह नदी सिक्किम में 150 किलोमीटर , पश्चिम बंगाल के 142 किलोमीटर और फिर बांग्लादेश में 120 किलोमीटर बहती है। तिस्ता नदी का 83 फीसदी हिस्सा भारत में और 17 फीसदी हिस्सा बांग्लादेश में है। सिक्किम और  उत्तरी बंगाल के छः  जिलों के कोई करीब एक करोङ बाशिंदे खेती, सिंचाई और पेय जल के लिए इस पर निर्भर हैं . ठीक यही हाल बांग्लादेश का भी है  चूँकि  1947 बंटवारे के समय नदी का जलग्रहण क्षेत्र भारत के हिस्से में आया था , सो इसके पानी  का वितरण  ब्बीते 75 साल से अनसुलझा है. सन 1972 में पाकिस्तान से अलग हो कर बांग्लादेश के बना और उसी साल दोनों देशों ने साझा नदियों के जल वितरण पर सहमती के लिए ’संयुक्त जल आयोग’ का गठन किया . 


आयोग की पहली रिपोर्ट 1983 में आई , जिसके मुताबिक सन 1983 में भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी को लेकर एक समझौता हुआ. इसके तहत 39 प्रतिशत जल भारत को और  बांग्लादेश को 36 प्रतिशत जल मिलना तय हुआ .  25 प्रतिशत जल को यूँ ही रहने दिया और बाद में भारत इसका इस्तेमाल करने लगा. इस पर बांग्लादेश को आपत्ति रही लेकिन उसने भी  सन 1998 अपने यहाँ तीस्ता नदी पर एक बांध बना लिया  और भारत से अधिक पानी की मांग करने लगा . ठीक उसी समय भारत ने जलपाईगुड़ी जिले के मालबाजार उपखंड में नीलफामारी में तीस्ता नदी ग़ज़लडोबा बांध बना लिया . इससे तीस्ता नदी का नियंत्रण भारत के हाथ में चला गया। बांध में 54 गेट हैं जो तीस्ता की मुख्य धारा से पानी को विभिन्न क्षेत्रों में मोड़ने के लिए हैं। बांध मुख्य रूप से तीस्ता के पानी को तीस्ता-महानंदा नहर में मोड़ने के लिए बनाया गया था।



सितंबर 2011 में, भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जब ढाका गए तो तीस्ता जल बंटवारा समझौता होना तय हुआ था . मसौदे के मुताबिक़ अंतरिम समझौते की अवधि 15 वर्ष थी और तीस्ता के 42.5 फीसदी पानी पर भारत का और 37.5 फीसदी पर बांग्लादेश का हक होना था. उस समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विरोध किया और  समझोता हो नहीं पाया . फिर 2014 में, प्रधान मंत्री शेख हसीना भारत का दौरे पर आई तो एक बार समझोते की उम्मीद बढ़ी. उस बार  सुश्री शेख हसीना ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात भी की लेकिन ममता बनर्जी  असहमत रहीं . उनका कहना था कि  इस समझोते से उत्तर बंगाल के लोगों का पानी छीन कर बांग्लादेश दिया जा रहा है . सन 2015 में ममता बनर्जी, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ढाका  दौरे पर गई , उन्होंने समझोते के प्रति  सकारात्मक बयान भी दिए थे लेकिन बात फिर कहीं अटक गई . जान लें जब हम इस समय 62 .5 फ़ीसदी पानी का इस्तेमाल हम कर ही रहे हैं तो  42.5 पर आना तो घाटे का सौदा ही लगेगा .

 विदित हो 5 जनवरी, 2021 को भारत-बांग्लादेश संयुक्त नदी आयोग की तकनीकी समिति की संपन्न बैठक में बहुत सी नदियों के जल वितरण के समझोते के मसौदे को अंतिम रूप दिया गया . त्रिपुरा के सबरूम शहर में पानी के संकट को दूर करने के लिए फेनी नदी से 1.82 क्यूसेक पानी निकालने पर बांग्लादेश ने मानवीय आधार प् सहमती भी दी लेकिन तीस्ता जल के वितरण का मुद्दा अनसुलझा ही रहा .

यह तय है कि तीस्ता भी जलवायु परिवर्तन और ढेर सारे बांधों के कारण संकट में है .ग़ज़लडोबा बांध से पहले जहां तीस्ता बेसिन में 2500 क्यूसेक पानी उपलब्ध था, आज यह बहाव 400 क्यूसेक से भी कम है. 1997 में बांग्लादेश में शुष्क मौसम के दौरान, तीस्ता में पानी का प्रवाह लगभग 6,500 क्यूसेक था, जो 2006 में घटकर 1,348 क्यूसेक हो गया और 2014 में यह केवल 800 क्यूसेक रह गया. नदी में जल कम होने का खामियाजा  डॉन तरफ के किसानों को उठाना पद रहा है . दुर्भाग्य है की यह सदानीरा नदी गर्मी में बिलकुल सूख जाती है और लोग पैदल ही नदी पार करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि सलीके से वितरण, बाढ़ प्रबंधन  और बेसिन क्षेत्र में कम बरसात के चलते तीस्ता एक मृत नदी में बदल गई है.  अगर ऐसा ही चलता रहा तो न सिर्फ जनजीवन बल्कि जैव विविधता को भी खतरा होगा। तीस्ता जल बंटवारा समझौता अब समय की मांग है। लेकिन तीस्ता जल-साझाकरण समझौते पर भारत की शिथिलता स्थानीय राजनीती के जंजाल में फंसी हुई है .

दोनों पडोसी देशों के बीच समझोता न हो पाने का लाभ चीन उठा रहा है.  पेइचिंग ने बांग्ला देश को 937. 8 मिलियन डॉलर की मदद दे कर तीस्ता मेगा परियोजना शुरू करवा दी है . इसके तहत  एक बड़े जलाशय का निर्माण ,  नदी के गहरीकरण के लिए खुदाई , लभग 173 किलोमीटर पर नदी तटबंध निर्माण की योजना है . इसके पूर्ण होने से  बाढ़ के समय  तीस्ता का जल  तेज प्रवाह से बांग्लादेश की तरफ जाएगा और भंडारण भी होगा, इसका सीधा असर भारत पर पडेगा

तीस्ता नदी में अपार संभावनाएं हैं। यदि तीस्ता जल-साझाकरण समझौते या तीस्ता परियोजना का उचित कार्यान्वयन संभव हो जाता है तो न केवल तीस्ता तट या उत्तर बंगाल के लोग बल्कि पूरे बांग्लादेश को इसका लाभ मिलेगा। उत्तर बंगाल की जनता के सार्वजनिक जीवन में बदलाव आएगा। पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ नियंत्रण होने से अर्थव्यवस्था समृद्ध होगी. 

मंगलवार, 26 सितंबर 2023

Mosquitos going strong in climate change

               जलवायु परिवर्तन से मजबूत हो रहे हैं मच्छर

पंकज चतुर्वेदी



इस साल भादो की बरसात शुरू हुई और उत्तर प्रदेश और बिहार के कई जिलों में बच्चों के बुखार और उसके बाद असामयिक मौत की खबर आने लगी, अकेले फिरोजाबाद जिले में  ही कोई पचास बच्चे मरे | यह  साफ़ हो चुका है कि बच्चों के बड़े स्तर पर बीमार होने का साल कारण मच्छर जनित रोग हैं . दुखद है कि हमारे देश में कई दशक से मलेरिया उन्मूलन चल रहा हैं लेकिन दूरगामी योजना के अभाव में न मच्छर कम हो रहे न ही मलेरिया, उलटे मच्छर  अधिक ताकतवर बन कर अलग-अलग किस्म के रोग के संचारक बन रहे हैं और मलेरिया डेंगू , जापानी बुखार और चिकनगुनिया जैसे नए-नए संहारक शस्त्रों से लैस हो कर जनता पर टूट रहा है|


 

यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि हमारे यहां मलेरिया निवारण के लिए इस्तेमाल हो रही दवाएं  असल में मच्छरों को ही ताकतवर बना रही हैं। विशेषरूप से राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों(जहां हाल के वर्षों में अप्रत्याशित रूप से घनघोर पानी बरसा है), बिहार के सदानीरा बाढ़ग्रस्त जिलों मध्यप्रदेश ,पूर्वोंत्तर राज्यें व नगरीय-स्लम में बदल रहे दिल्ली कोलकाता जैसे महानगरों में जिस तरह मलेरिया का आतंक बढ़ा है, वह आधुनिक चिकित्या विज्ञान के लिए चुनौती है । आज के मच्छर  मलेरिया की प्रचलित दवाओं को आसानी से हजम कर जाते हैं । दूसरी ओर घर-घर में इस्तेमाल हो रही मच्छर -मार दवाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण मच्छर अब और जहरीला हो गया है । देश के पहाड़ी इलाकों में अभी कुछ साल पहले तक मच्छर देखने को नहीं मिलता था, अब वहां रात में खुले में सोने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है ।


एक वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि डेंगू का संक्रमण रोकने में हमारी दवाएं निष्प्रभावी हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ बंगाल, दार्जीलिंग ने बंगाल के मलेरिया ग्रस्त इलाकों में इससें निबटने के लिए इस्तेमाल हो रही दवाओं -डीडीटी, मैलाथिओन परमेथ्रिन और प्रोपोक्सर को ले कर प्रयाग किए और पाया कि मच्छरों में प्रतिरोध पैदा करने वाली जैव-रासायनिक प्रक्रिया के तहत मच्छरों में मौजूद एंजाइम काबरेक्सीलेस्टेरेसेस, ग्लूटाथिओन एस-ट्रांसफेरेसेस और साइटोक्रोम पी450 या संयुक्त रूप से काम करने वाले ऑक्सीडेसेस के माध्यम से उत्पन्न डिटॉक्सीफिकेशन द्वारा प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हुई है। इस अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. धीरज साहा ने बताया, ‘कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण मच्छरों ने अपने शरीर में कीटनाशकों के नियोजित कार्यों का प्रतिरोध करने के लिए रणनीतियों का विकास कर किया है। इसी प्रक्रिया को कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता के विकास रूप में जाना जाता है।’गौरतलब है कि एडीस एजिप्टि और एडीस अल्बोपिक्टस डेंगू के रोगवाहक मच्छरों की प्रजातियां हैं, जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैली हैं।



 

शुरूआती दिनों में शहरों को मलेरिया के मामले में निरापद माना जाता था और तभी शहरों में मलेरिया उन्मूलन पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया । 90 के दशक में भारत में औद्योगिकीकरण के विकास के साथ नए कारखाने लगाने के लिए ऐसे इलाकों के जंगल काटे गए, जिन्हें मलेरिया-प्रभावित वन कहा जाता था । ऐसे जंगलों पर बसे शहरों में मच्छरों को बना-बनाया घर मिल गया । जर्जर जल निकास व्यवस्था, बारिश के पानी के जमा होने के आधिक्य और कम क्षेत्रफल में अधिक जनसंख्या के कारण नगरों में मलेरिया के जीवाणु तेजी से फल-फूल रहे हैं । भारत में मलेरिया से बचाव के लिए सन् 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था । गांव-गांव में डी.डी.टी. का छिड़काव और क्लोरोक्वीन की गोलियां बांटने के ढर्रे में सरकारी महकमे भूल गए कि समय के साथ कार्यक्रम में भी बदलाव जरूरी है । धीरे-धीरे इन दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता मच्छरों में आ गई । तभी यह छोटा सा जीव अब ताकतवर हो कर निरंकुश बन गया है ।


पिछले कुछ सालों से देश में कोहराम मचाने वाला मलेरिया सबटर्मियम या पर्निसियम मलेरिया कहलाता है । इसमें तेज बुखार के साथ-साथ लकवा, या बेहोशी छा जाती है । हैजा नुमा दस्त, पैचिस की तरह शौच में खून आने लगता है । रक्त-प्रवाह रुक जाने से शरीर ठंडा पड़ जाता है । गांवों में फैले नीम-हकीम ही नहीं , बड़े-बड़े डिगरी से लैसे डाक्टर भी भ्रमित हो जाते हैं कि दवा किस मर्ज की दी जाए।  डाक्टर लेबोरेट्री- जांच व दवाएं बदलने में तल्लीन रहते हैं और मरीज की तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है ।




हालांकि ब्रिटिश गवर्नमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस(पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट में बीस साल पहले ही चेता दिया गया था कि दुनिया के गर्म होने के कारण मलेरिया प्रचंड रूप ले सकता है । गर्मी और उमस में हो रहा इजाफा खतरनाक बीमारियों को फैलाने वाले कीटाण्ुाओं व विषाणुओं के लिए संवाहक के माकूल हालात बना रहा है । रिपोर्ट में कहा गया था कि एशिया में तापमान की अधिकता और ठहरे हुए पानी के कारण मलेरिया के परजीवियों को फलने-फूलने का अनुकूल अवसर मिल रहा है । कहा तो यह भी जाता है कि घरों के भीतर अंधाधुंध शौचालयों के निर्माण व शैाचालयों के लिए घर के नीचे ही टेंक खोदने के कारण मच्छरों की आबादी उन इलाकों में भी ताबड़तोड़ हो गई है, जहां अभी एक दशक पहले तक मच्छर होते ही नहीं थे । सनद रहे कि हमारे यहां स्वच्छता अभियान के नाम पर गांवों में जम कर शौचालय  बनाए जा रहे हैं, जिनमें ना तो पानी है, ना ही वहां से निकलने वाले गंदे पानी की निकासी की मुकम्मल व्यवस्था।
अधिक फासला के लोभ में सिंचाई के साधन बढ़ाने और फसल को कीटों से निरापद रखने के लिए कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल ने भी मलेरिया को पाला-पोसा है । बड़ी संख्या में बने बांध और नहरों के करीब विकसित हुए दलदलों ने मच्छरों की संख्या बढ़ाई है । रही बची कसर फसलों में डीडीटी ऐसे ही कीटनाशकों के बेतहाशा दुरूपयोग ने पूरी कर दी । खाने के पदार्थों में डीडीटी का मात्रा जहर के स्तर तक बढ़ने लगी, वहीं दूसरी ओर मच्छर ने डीडीटी को डकार लेने की क्षमता विकसित कर ली । बढ़ती आबादी के लिए मकान, खेत और कारखाने मुहैया करवाने के नाम पर गत् पांच दशकों के दौरान देश के जंगलों की निर्ममता से कटाई की जाती रही है । कहीं अयस्कों की खुदाई तो जलावन या फर्नीचर के लिए भी पेड़ों को साफ किया गया ।  हालांकि घने जंगल मच्छर व मलेरिया के माकूल आवास होते हैं और जंगलों में रहने वाले  आदिवासी मलेरिया के बड़े शिकार होते रहे हैं । जंगलों के कटने से इंसान के पर्यावास में आए बदलाव और मच्छरों के बदलते ठिकाने ने शहरी क्षेत्रों में मलेरिया को आक्रामक बना दिया ।
विडंबना है कि हमारे देश में मलेरिया से निबटने की नीति ही गलत है - पहले मरीज बनो, फिर इलाज होगा । जबकि होना यह चाहिए कि मलेरिया फैल ना सके, इसकी कोशिश हों । मलेरिया प्रभावित राज्यों में पेयजल या सिंचाई की योजनाएं बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ठहरा हुआ पानी कहीं ‘‘ मच्छर-प्रजनन केंद्र’’ तो नहीं बन रहा है । धरती का गरम होता मिजाज जहां मलेंरिया के माकूल है, पहीं एंटीबायोटिक दवाओं के मनमाने इस्तेमाल से लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट रही है । नीम व ऐसी ही वनोषधियों से मलेरिया व मच्छर उन्मूलन की दवाओं को तैयार करना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए ।

गुरुवार, 21 सितंबर 2023

Libya's inundation is a tragedy of mixed climate change and human negligence

        मौसम की मार  और इंसानी कोताही की मिलीजुली त्रासदी है लीबिया का जलप्लावन
पंकज चतुर्वेदी
 


कभी लीबिया के सांस्कृतिक राजधानी कहलाने समुद्र के किनारे बसे दरना में इस समय मौत नाच रही है , कोई नब्बे हज़ार आबादी के शहर में 21 हज़ार लोग या तो मारे गए हैं या  लापता हैं . शहर का आधा हिस्सा सुनामी  की तरह आय सैलाब में पूरी तरह बह गया . जलवायु परिवर्तन, बड़े बाँध, कम रखरखाव वाले बाँध किस तरह मानवीय इतिहास की भीषणतम त्रासदी ला सकते हैं, यह दुनिया को चेतावनी है. अभी दस सितम्बर को भूमध्यसागरीय चक्रवाती  तूफ़ान के साथ साथ , पहाड़ों से घिरे दरना शहर में भूस्खलन हुआ , मूसलाधार बारिश और भयंकर हवाएँ चलीं . उसके बाद इस शहर को बाढ़ से बचाने के लिए बनाए गये दो विशाल बाँध  मिटटी के ढेर से बिखर गए और पानी ने तबाही मचा दी ..

यह सभी जानते थे कि दरना शहर  बाढ़ त्रासदी को ले कर संवेदनशील रहा है . सन 1942 से अभी तक कम से कम पांच  बार यहाँ भयानक बाढ़ आई है  . शहर को बाढ़ से बचाने के लिए सत्तर के दशक में वादी- देरना जल धारा  पर यहाँ दो बाँध बनाए गये . इनमें से एक अल- बिलाद तो शहर से बमुश्किल एक किलोमीटर दूर था . कोई 45 मीटर उंचाई के इस बाँध की जलग्रहण क्षमता  1.5  मिलियन क्यूबिक मीटर थी . जबकि दूसरा बाँध अबू मंसूर शहर से कोई 13 किमी दूर था, जिसकी ऊंचाई 75 मीटर और जल क्षमता 22.5 मिलियन क्यूबिक मीटर थी . विदित हो लीबिया में कर्नल गद्दाफी की सरकार के पतन के बाद देश  विभिन्न  सशस्त्र  गिरोहों की हिंसा का शिकार है . देश के दो हिस्सों में अलग-अलग लोगों का नियन्त्रण है . ऐसे में बांधों के रखरखाव की किसी को परवाह थी नहीं . दोनों बाँध इस तरह बने थे कि एक के भरने पर दूसरा भरता था . त्रासदी के समय इनमें एक साथ इतना पानी आ गया कि पहले अल बिलाद बांध भर गया और उसके जल भराव ने पानी को पीछे की तरफ धकेला . उधर अबू मंसूर में पहले से ही पानी भरा था . वह इस रिवर्स प्रेशर से  बिखर गया और इस तरह दोनों कमजोर बाँध एक आपदा में बदल गए .

सीबा यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित पुरे एंड एप्लाइड साइंस जर्नल, वॉल्यूम 21, वर्ष 2022 में एक साल पहले ए आर आशूर , ओमर अल –मुख़्तार यूनिवर्सिटी , अलबीदा, लीबिया का एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ था जिसमें बरसात के बढ़ते मिजाज और  बांधों की जर्जर हालत के चलते किसी बड़े खतरे की चेतावनी दी गई  थी . हालंकि यह शोध सारी दुनिया  में पढ़ा गया  लेकिन न तो लीबिया सरकार और न ही विश्व के अन्य देश या संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं ने इसकी कोई परवाह की . परिणाम मने ऐसे तबाही है जिसका खामियाजा अभी सालों भोगना है . अभी लोग वहां साफ़ पानी ना मिलने से मर रहे हैं , लाशों के शहर में फ़ैल रही बदबू ने बीमारी, मौत के नए अध्याय लिख दिए हैं, वहां न तो अस्पताल हैं , न ही डोक्टर या दवा. हर तरफ इन्सान और जानवरों के शव सड़ रहे हैं .

वैसे इस तबाही  को केवल  जर्जर बाँध के सर नहीं मढ़ा जा सकता . भले ही अभी इस बात को स्वीकारने में हिचकिचाहट हो, लेकिन 24 घंटे में 16 इंच अर्थात कोई 411 मिलीमीटर बरसात , जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव की तरफ भी इशारा है . सनद रहे जिन नदियों पर बाँध हैं वे आमतौर पर सूखी ही रहती हैं . मुसलाधार बरसात ने   शहर को घेरे हुए पहाड़ों से ताकतवर जलधाराओं का तेजी से नीचे गिरना और उसके साथ जबर्दस्त भूमि कटाव का काम किया . उल्लेखनीय है कि दरना ,  जेबेल अख़दर के पूर्वी छोर पर स्थित है.  लीबिया में वैसे ही बहुत कम जंगल हैं लेकिन यह इलाका हरा हरा है . शुष्क जलवायु के कारण, लीबिया जंगल केवल 0.1% है। दरना को  पूर्वी लीबिया का उपजाऊ इलाका माना जाता है. यह देश का सर्वाधिक पानीदार क्षेत्र है, जहाँ सालाना लगभग 600 मिलीमीटर (24 इंच) वर्षा होती है. दुर्भाग्य से दस सितम्बर को एक ही दिन में इतना पानी गिर गया .  

 

इस शहर की स्थापना 15वीं शताब्दी में एक प्राचीन यूनानी उपनिवेश डार्निस द्वारा की गई थी. यहा अमेरिकी भी आये और फ़्रांसिसी भी और इटालियन भी, ब्रितानी उपनिवेश भी रहा . तभी सफेद रंग से एक से पुते घर , ढेर सारे झरने, ताड़ के घने  बाग़  के सताह-साथ यहा सब्जी- फल के बड़े बागन हुआ करते थे . यह एक कपड़ा मिल भी थी . इलाके का सुंदर पर्यटन स्थल अब कीचड, दलदल और रेत से पट गया है .

दुनियाभर  में यह बात अब  सभी जान गए हैं कि  जलवायु परिवर्तन के कारण, बेमौसम, अचानक और तीव्र मौसम हो रहा है. इस तरह की बारिश  से भारत और दक्षिणी एशिया अछूता नहीं हैं . डेढ़ दशक पहले विश्व बाँध आयोग चेतावनी दे चुका था कि  बड़े बाँध (जो 45 मीटर से अधिक ऊँचे है ) मानवीय जीवन के लिए बड़ी त्रासदी बन्ने जा रहे हैं . भारत में भी ऐसे कोई 28बाँध  ऐसे है जिनकी निर्धारित उम्र बीत चुकी है और अभी भी उनका इस्तेमाल हो रहा है . हमारे यहाँ हर साल दसियों जगह बाढ़ से  नुक्सान का साल कारण बांधो का क्षमता तक भर जाना और उसके बाद उनके दरवाजे खोल देना हैं . यह सटीक समय है कि हम अपने बड़े बांधों को जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर आंके, उनका प्रबंधन करें और भविष्य में सिंचाई और जल संचयन के लिए छोटी – सठिय और पारम्परिक जल परियोजनाओं पर अधिक ध्यान दें . 

मंगलवार, 19 सितंबर 2023

Ban on mobile in school: Is it a hindrance in the new education policy?

 


         स्कूल में मोबाइल पर पाबन्दी : नई शिक्षा नीति में बाधक तो नहीं ?

पंकज चतुर्वेदी



पिछले दिनों  दिल्ली में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यूनेस्को के सहयोग से तैयार एक कार्टून किताब  के विमोचन के अवसर पर बच्चों से पूछ लिया कि वे कितना समय  मोबाइल-कम्प्यूटर पर देते हैं . उन्होंने बच्चों से पूछा कि उनका स्क्रीम टाइम क्या है। इस सवाल पर वहां मौजूद बच्चे दाएं-बाएं देखने लगे। हालांकि कुछ बच्चों ने सकुचाते हुए तीन से चार घंटे बताया। इस पर श्री प्रधान ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए ज्यादा स्क्रीन टाइम नुकसानदायक है।  इससे तीन दिन पहले ही आंध्र प्रदेश सरकार ने स्कूलों में फोन पर पाबन्दी लगा दी ,  सरकार ने यह कदम यूनेस्को  की उस रिपोर्ट के बाद उठाया जिसमें मोबाइल के अधिक इस्तेमाल से बच्चों के मानसिक विकास पर विपरीत असर पड़ने की बात कही थी .राज्य में अब शिक्षक भी कक्षा में फोन नहीं ले जा सकते . हालाँकि कोविड से पहले दुनिया में फ़्रांस जैसे देश ने भी शिक्षा में सेल फोन पर पूरी तरह पाबन्दी लगाई थी . कोलंबिया, अमेरिका . इटली , सिंगापूर, बंगलादेश जैसे देशों में कक्षा में मोबाइल पर रोक है .  भारत में फ़िलहाल यह अटपटा लग रहा है क्योंकि अभी डेढ़ साल पहले हमारा सारा स्कूली शिक्षा तन्त्र ही सेल फोन से संचालित था. यही नहीं  नई शिक्षा नीति -2020, जो कि देश में शिक्षा के क्षेत्र में क्रन्तिकारी बदलाव का दस्तावेज है, में  मोबाइल और डिजिटल डिवाइस के सलीके से प्रयोग को प्रोत्साहित किया गया है .



वैसे भारत  में सस्ता इंटरनेट और साथ में कम दाम का स्मार्ट फोन अपराध का बड़ा कारण बना हुआ है,- खासकर किशोरों में यौन अपराध हों या मारापीटी या फिर शेखी बघारने को किये जा रहे दुह्साह्स . मोबाईल के कमरे व् वीडियो और उसे इन्टरनेट के जरिये पलक झपकते ही दुनिया तक पहुंचा कर अम्र-अजर होने की आकांक्षा युवाओं को कई गलत रास्ते की और मोड़ रही है, दिल्ली से सटे नोयडा में स्कूल के बच्चों ने अपनी ही टीचर का गन्दा वीडियो बना कर सोशल मिडिया पर डाल दिया . क्षणिक आवेश में किसी के प्रति आकर्षित हो गयी स्कूली लड़कियों के अश्लील  वीडियो क्लिप से इन्टरनेट संसार पटा  पडा हैं . इसके विपरीत कई बच्चों के लिए अनजाना रास्ता तलाशना हो या, किसी गूढ़ विष का हल या फिर देश दुनिया के जानकारी या फिर अपने विरुध्ध हुए अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना ; इन सभी में हाथ की मुट्ठी में सिमटी दुनिया के प्रतिक मोबाईल ने नयी ताक़त और राह डी है, खासकर युवा लड़कियों को मोबाईल ने बेहद सहारा दिया है .


हालांकि यह भी सच है की भारत में मोबाइल –धारक बच्चों का आंकडा बहुत कम है . खासकर सरकारी स्कूल में जाने वाले बच्चों में आधे से अधिक बच्चे अभी अपने माता पिता का फोन मांग कर ही कम चलते हैं  लेकिन यह बात सच है कि यदि बच्चे क्लास में फोन ले कर बैठते हैं  वह बोर्ड और पुस्तकों के स्थान पर मोबाईल पर ज्यादा ध्यान देते हैं. वे एक दुसरे को मेसेज भेज कर चुहल करते है या फेसबुक, इन्स्ताग्राम  जैसे सोशल मीडिया  पर लगे रहते हैं . इससे उनके सीखने और याद रखने की गति तो प्रभावित हो ही रही है, बच्चों के स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर हो रहा है . अब वे खेल के मैदान में पसीना बहाने के बनिस्पत आभासी दुनिया में व्यस्त रहते है, इससे उनमें मोटापा, आलस आ रहा है, आँखें कमजोर होना , याददाश्त कमजोर होना भी इसके प्रभाव दिखे, पहले बच्चे जिस गिनती, पहाड़े, स्पेलिंग या तथ्य को अपनी स्मृति में रखते थे, अब वे सर्च इंजन  की चाहत में उसे याद नहीं रखते , यहाँ तक की कई बच्चों को अपने घर का फोन नम्बर तक याद नहीं था. सबसे बड़ी बात सेल फोन के साथ बच्चा  भीड़ के बीच भी अकेला रहता है और धीरे धीरे सामुदायिकता या सहस्तित्व की भावना से वह दूर हो जाता है . अधिक गुस्सा आना या हिंसक होना इसी प्रवृति के दुष्परिणाम हैं .



यह कटु सत्य है कि स्कूल में फोन कई किस्म की बुराइयों को जन्म दे रहा है  आज फ़ो में खेल, संगीत, वीडियों,  जैसे कई ऐसे  एप उपलब्ध है जिसमें बच्चे का मन लगना ही है और इससे उसकी शिक्षा पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं इसके साथ ही इम्तेहान में धोखाधड़ी और नक़ल का एक बड़ा औजार यह बन गया हैं  यही नहीं इसके कारण अपराध भी हो रहे हैं. निरंकुश  अश्लीलता स्मार्ट फोन पर किशोर बच्चों के लिए सबसे बड़ा जहर है , चूँकि ये फोन महंगे भी होते हैं इस लिए अक्सर बेहतर फोन खरीदने या ज्यादा इन्टरनेट  पेक खरीदने के लिए बच्चे चोरी जैसे काम भी करने लगते हैं  विद्यालयों में फोन ले कर जा रहे बच्चों में से बड़ी संख्या धमकियों को भी झेलती है , कई एक शोषण का शिकार भी होते हैं .



मोबाइल , विद्यालय और शिक्षा का एक दूसरा पहलु भी है . जिस देश में मोबाईल कनेक्शन की संख्या देश की कुल आबादी के लगभग करीब पहुंच रही हो, जहां किशोर ही नहीं 12 साल के बच्चे के लिए मोबाईल स्कूली-बस्ते की तरह अनिवार्य बनता जा रहा है, वहां बच्चों को डिजिटल साक्षरता, जिज्ञासा, सृजनशीलता, पहल और सामाजिक कौशलों की ज़रूरत । हम पुस्तकों में पढ़ाते हैं कि गाय रंभाती है या शेर दहाड़ता है। कोई भी शिक्षक यह सब अब मोबाईल पर सहजता से बच्चों को दिखा कर  अपने पाठ को कम शब्दों में सहजता से समझा सकता है। मोबाईल पर सर्च इंजन का इस्तेमाल, वेबसाईट पर उपलब्ध सामग्री में यह चीन्हना कि कोन सी पुष्ट-तथ्य वाली नहीं है,  अपने पाठ में पढ़ाए जा रहे स्थान, ध्वनि, रंग , आकृति को तलाशना व बूझना प्राथमिक शिक्षा में शमिल होना चाहिए। किसी दृश्य को  चित्र या वीडिया के रूप में सुरक्षित रखना एक कला के साथ-साथ सतर्कता का भी पाठ है। मैंने अपने रास्ते में कठफोडवा देखा, यह जंगल महकमे के लिए सूचना हो सकती है कि हमारे यहां यह पक्षी भी आ गया है। साथ ही आवाजों को रिकार्ड करना, भी महत्वूपर्ण कार्य है। मोबाईल का सही तरीके से इस्तेमाल खुद को शिक्षक कहने वालों के लिए एक खतरा सरीखा है। हमारे यहां बच्चों को मोबाईल के सटीक इस्तेमाल का कोई पाठ किताबों  में हैं ही नहीं।


भारत में शिक्षा का अधिकार व कई अन्य कानूनों के जरिये बच्चों के स्कूल में पंजीयन का आंकड़ा और साक्षरता दर में वृद्धि निश्चित ही उत्साहवर्धक है लेकिन जब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात आती है तो यह आंकड़ा हमें शर्माने को मजबूर करता है कि हमारे यहां आज भी 10 लाख शिक्षकों की कमी है। इस खाई को पाटने में डिजिटल माध्यम की सफल भूमिका कोरोना काल में देखि जा चुकी है .

वैसे बगैर किसी दंड के अंदर प्रदेश का कानून कितना कारगर होगा यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन डिजिटल दुनिया पर आधुनिक हो रहे विद्यालयों में इस कदम से एक बहस जरुर शुरू हो गयी है, खासतौर पर भारत जैसे देश में जहां अशिक्षा , असमानता , बेरोजगारी और गरीबी से कुंठित युवाओं की संख्या बढती जा रही है , जहां कक्षा आठ के बाद स्कूल से ड्राप आउट डॉ बहुत ज्यादा है , लेकिन कई राज्यों में स्कूल के मास्टर को स्मार्ट फोन पर सेल्फी के साथ हाजिरी लगाना अनिवार्य है, ऐसे देश में विद्यालय में बच्चे ही नहीं शिक्षक के भी सेल फोन के इस्तेमाल की सीमाएं, पाबंदियां अवश्य लागु होना चाहिए, खेद है की भारत का सुप्रीम कोर्ट गत छह साल से सरकार से अश्लील वेबसाईट पर पाबंदी के आदेश दे रहा है और सरकार उस पर अधूरे मन से कार्यवाही अक्रती है और अगले ही दिन वे नंगी साईट फिर खुल जाती हैं , देश के झारखण्ड राज्य के जामताड़ा जिले के आंचलिक क्षेत्रों में अनपढ़ युवा मोबाईल से बेंक फ्रौड का अंतर्राष्ट्रीय गिरोह चलाते हैं लेकिन  सरकार असहाय रहती हैं . ऐसे में हमारे यहाँ मोबाइल पर कक्षा में पूर्ण पाबंदी  और अनिवार्यता के बीच सामंजस्य जैसे मसले पर सभी पक्षकारों के बीच बहस अवश्य होना चाहिए .

 

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