My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

रविवार, 2 अगस्त 2015

Do not burn leafs

Rashtroy Sahara 3-8-15
 

सूखी पत्तियों के सदुपयोग की जरूरत

                                                 पंकज चतुर्वेदी 
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने तो बड़े सख्त लहजे में कहा है कि पेड़ों से गिरने वाली पत्तियों को जलाना दंडनीय अपराध है व प्रशासनिक अमला यह सुनिश्चित करे कि आगे से ऐसा न हो। हालांकि इस बारे में समय-समय पर कई अदालतें व महकमे आदेश देते रहे हैं, लेकिन कानून के पालन को सुनिश्चित करने वाली संस्थाओं के पास इतने लोग व संसाधन हैं ही नहीं कि इसका शत-प्रतिशत पालन करवाया जा सके। बीते दिनों लुटियन दिल्ली में एक सांसद की सरकारी कोठी में ही पत्ती जलाने पर मुकदमा कायम हुआ है। कई जगह तो नगर को साफ रखने का जिम्मा निभाने वाले स्थानीय निकाय खुद ही कूड़े के रूप में पेड़ से गिरी पत्तियों को जला देते हैं। असल में पत्तियों को जलाने से उत्पन्न प्रदूषण तो खतरनाक है ही, सूखी पत्तियां कई मायने में बेशकीमती हैं व प्रकृति के विभिन्न तत्वों का संतुलन बनाए रखने में उनकी महती भूमिका है। बस्तर का कोंडागांव केवल नक्सली प्रभाव वाले क्षेत्र के तौर पर ही सुर्खियों में रहता है, लेकिन यहां डॉ. राजाराम त्रिपाठी के जड़ी-बूटियों के जंगल इस बात की बानगी हैं कि सूखी पत्तियां कितने कमाल की हैं। डॉ. त्रिपाठी काली मिर्च से लेकर सफेद मूसली तक का उत्पादन करते हैं व पूरी प्रक्रिया में में किसी भी किस्म की रासायनिक खाद, दवा या अन्य तत्व इस्तेमाल नहीं करते हैं। गर्मियों के दिनों में उनके कई एकड़ में फैले जंगलों में साल व अन्य पेड़ों की पत्तियों पट जाती हैं। बीस दिन के भीतर ही वहां मिट्टी की परत होती है। असल में उनके जंगलों में दीमक को भी जीने का अवसर मिला है और ये दीमक इन पत्तियों को उस ‘‘टाप सॉइल’ में बदल देते हैं जिसे उपजाने में प्रकृति को सदी लग जाती है। वहीं यदि पत्तियों को जलाया जाए तो वे जहर उगलने लगती हैं।दिल्ली हाईकोर्ट दिसम्बर 1997 में ही आदेश पारित कर चुका था कि चूंकि पत्तियों को जलाने से गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा हो रहा है अत: इस पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जाए। अदालती आदेश कहीं ठंडे बस्ते में गुम हो गया और पिछले दिनों यह बात सामने आई कि दिल्ली एनसीआर की आबोहवा इतनी दूषित हो चुकी है कि पांच साल के बच्चे तो इसमें जी ही नहीं सकते हैं। दस लाख से अधिक बच्चे हर साल सांस की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। प्रदूषण कम करने के विभिन्न कदमों में हरित न्यायाधिकरण ने पाया कि महानगर में बढ़ रहे पीएम यानी पार्टीकुलेट मैटर का 29.4 फीसद कूड़ा व उसके साथ पत्तियों को जलाने से उत्पन्न हो रहा है। पेड़ की हरी पत्तियों में मौजूद क्लोरोफिल यानी हरा पदार्थ, वातावरण में मौजूद जल-कणों या आद्र्रता को हाइड्रोजन व आक्सीजन में विभाजित कर देता है। हाइड्रोजन वातावरण में मौजूद जहरीली गैस कार्बनडाय आक्साइड के साथ मिलकर पत्तियों के लिए शर्करायुक्त भोजन उपजाता है। जबकि आक्सीजन तो प्राण वायु है ही। जब पत्तियों का क्लोरोफिल चुक जाता है तो उनका हरापन समाप्त हो जाता है और वे पीली या भूरी पड़ जाती हैं। हालांकि यह पत्ती पेड़ के लिए भोजन बनाने के लायक नहीं रह जाती है लेकिन उसमें नाइट्रोजन, प्रोटीन, विटामिन, स्टार्च व शर्करा आदि का खजाना होता है। ऐसी पत्तियों को जब जलाया जाता है तो कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन व कई बार सल्फर से बने रसायन उत्सर्जित होते हैं। इसके कारण वायुमंडल की नमी और आक्सीजन तो नष्ट होती ही है, दम घोटने वाली गैस वातावरण को जहरीला बना देती हैं। यदि केवल एनसीआर की हरियाली से गिरे पत्तों को धरती पर यूं ही पड़ा रहने दें तो जमीन की गर्मी कम होगी, मिट्टी की नमी घनघोर गर्मी में भी बरकरार रहेगी। यदि इन पत्तियों को महज खेतों में दबा कर कंपोस्ट खाद में बदल लें तो लगभग 100 टन रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम किया जा सकता है। इस बात का इंतजार करना बेमानी है कि पत्ती जलाने वालों को कानून पकड़े व सजा दे। इससे बेहतर होगा कि समाज तक यह संदेश भलीभांति पहुंचाया जाए कि सूखी पत्तियां पर्यावरण-मित्र हैं और उनके महत्व को समझना, संरक्षित करना सामाजिक जिम्मेदारी है। 

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

Beware of Burning Punjab

सावधान पंजाब सुलग रहा हैा 


पीपुल्‍स समाचार 28 जुलाई 15
पूरे 11 घंटे चली मुठभेड़, पुलिस ने अपनी ‘‘सफलता ’’ का दावा भी कर दिया, लेकिन ऐसी सफलता मिलने में शायद बहुत देर हुई, एक पुलिस अधीक्षक सहित चार जवान और आठ नागरिक मारे जा चुके थे।  आपरेशन समाप्त करते ही घोषणा भी कर दी गई कि मारे गए लोग लश्‍कर के आतंकवादी थे, हालांकि ना तो वे इस तरह का कोई पहचान पत्र लिए थे औक्र ना ही उनकी इस तरह की कोई विशिष्‍ठ पहचान होती है। राज्य के मुख्यमंत्री ने अपना पल्ला झाड़ लिया कि आतंकवाद केंद्र का विशय है, इसका राज्य से कोई लेना-देना नहीं हैं और सरकार ने भी उन आषंकाओं पर विराम लगा दिया कि इस सनसनीखेज वारदात में पंजाब के खालिस्तान समर्थकों की कोई भूमिका है। हो सकता है कि यह अवधारणा सही भी हो, लेकिन सोशल मीडिया पर इस हमले को खालिस्तान समर्थक अपने शौर्य के तौर पर ही पेश कर रहे हैं। ऐसी आशंका निराधार भी नहीं है, आखिर पंजाब में बीते कुछ सालों से जो कुछ चल रहा है, वह इषारा तो यही कर रहा है कि वहां राख के नीचे कहीं ना कहीं उष्‍मा बरकरार है व पाकिस्तान की शैतान एजेंसी आईएसआई उसमें फूंक मारने से बाज नहीं आ रही है।
Ptrabhat , Meerut, 2-8-15

बीच में रावी नदी है। इस तरफ है गुरदासपुर का गुरूद्वारा डेरा बाबा नानक और नदी के दूसरे तट पर है पाकिस्तान के नारोवाल जिले का गुरूद्वारा करतारपुर। यहां बाबा नानक के अंतिम सांस ली थी। भले ही ये दो अलग मुल्क दिखते हैं, लेकिन रावी पार कर इधर से उधर जाना कोई कठिन नहीं है। देानों देष के सिख सुबह-सुबह अपने गुरूद्वारे से दूसरे को सीस नवांते हैं। यहीं सक्रिय है चार संगठन - खलिस्तान जिंदाबाद फोर्स (रणजीत ंिसह), खलिस्तान टाईगर फोर्स(जगतार सिंह तारा), बब्बर खालसा इंटरनेशनल(वधवा सिंह) और खालिस्तान लिबरेशन फोर्स(हरमिंदर सिंह मिंटू)। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत द्वारा वांछित सूची के कई आतंकवादी यदि उस पार सुकून की जिंदगी बिता रहे हैं तो यह उस सरकार की रजामंदी के बगैर हो नहीं सकता।  बीते एक दशक के दौरान पंजाब में युवाओं का खेती से मोह भंग हुआ, कनाड़ा व दीगर देशों में जाने का लालच बढ़ा और अचानक ही सीमापार से अफीम व अन्य मादक पदार्थों की आवक बढ़ी। अफगानिस्तान हो या पूर्वी अफ्रीका या फिर पंजाब, हर जगह आतंकवाद हर समय नशाखोरी पर सवार हो कर ही आया है। पंजाब में नशे की तिजारत को ले कर खूब सियासत भी हुई, कई बड़े-बड़े नामों तक इसकी आंच भी गई। गौर करें किसन 1993 में पंजाब से लगी पाकिस्तान की 466 किलोमीटर की सीमा पर कंटीली बाढ़बंदी व फ्लड लाईटें लगाने का काम पूरा हो गया था, और उसके बाद वहां कीाी भी घुसपैठ की कोई शिकायत आई नहीं। बेअंत सिंह की हत्या के बाद राज्य में यही बड़ी आतंकवादी घटना हुई है, वह भी लगभग 20 साल बाद।
हम यह मान लेते हैं कि गुरदासपुर की घटना का पंजाब में आतंकवाद से कोई ताल्लुक नहीं है, लेकिन मन यह कैसे मान लेगा कि आपरेशन ब्लू स्टार की 31 बरसी के मौके पर अभी दो महीने पहले ही स्वर्णमंदिर में जम कर खालिस्तान के पक्ष में नारे लगे थे और ऐसे 22 युवाओं को केंद्रीय खुफिया एजेंसी ने चिन्हा भी है। ये सभी युवा बेकार थे व शान की जिंदगी जी रहे हैं। इनके खातों में कनाड़ा व कुछ अन्य देशों से पैसा आता है। ‘‘खालिस्तान. नेट’’ और ‘सर्च सिखिस्म.काॅम’’ जैसे दर्जनभर वेबसाईट, फॅेसबुक पर ऐसे आाधा सैंकडा पेज खुलेआम चुगली करते हैं कि पंजाब में सबकुछ इतना भी सामान्य नहीं है। अब गुरूदासपुर की घटना को ही लें, सुरक्षा बलों ने तीन को मार कर ‘‘जयकारा’’ लगा दिया, लेकिन एक सामान्य बुद्धि इंसान भी भांप जाएगा कि इस पूरी साजिश में कहीं ज्यादा लोग थे।
यदि ये तीन गुरदासपुर के रषश्ट्रीय राजमार्ग पर दो घंटे कोहराम मचा कर थाने में घुस गए थे तो रेल की पटरियों पर बाकायदा बिजली के तारों के साथ डिटोनेटर बांधने का काम कब व किसने किया था। यह भूल जाएं कि आतंकवाद का कोई धर्म होता है, लेकिन यह कटु सत्य है कि आतंकवादी धर्म की घुट्टी पीकर ही  अराजक व पिषाच बन जाते हैं।  ए वरिश्ठ खुफिया अधिकारी की तात्कालिक टिप्पणी है कि पूरी योजना में सीमा पार करवाने से ले कर जीपीआरएस सिस्टम मुहैया करवाने, रैकी करने आदि में कम से कम 15 लोग का काम है यह और इसमें से कई स्थानीय ही हैं। षायद पाठक भूले नहीं होंगे कि ब्लू स्टार की बरसी के ठीक पहले जम्मू में उस अवसर पर जलसे की तैयारी कई दिनों पहले से की गई। पंजाब में कुछ सालों से किस तरह सरहद पार बैठे लोग खलिस्तान को कब्र से निकाल कर जिलाना चाहते हैं, यह भी दबा-छुपा नहीं है, इसके बावजूद कहीं ना कहीं कुछ चूक तो हो ही गई कि सीमावर्ती जम्मू के रानीगंज व नवांषहर में पांच दिन तक हिंसा चलती रही। एक युवक मारा गया, एक सुरक्षा अधिकारी की एके-47 राईफल छीन ली गई। कष्मीर में अलग राज्य की मांग करने वाले वाले पंजाब में अलग खालिस्तान की मांग व षहीदी समागम के नाम पर भिंडरावाले , षुबेग सिंह सहित कई आतंकवादियों का महिमामंडन करने में हमारी सरकारों का भेदभाव कहीं हालात को और ना बिगाड़ दे।
जरा कुछ महीनों पीछे ही जाएं, सितंबर- 2014 में बब्बर खालसा का सन 2013 तक अध्यक्ष रहा व बीते कई दषकों से पाकिस्तान में अपना घर बनाएं रतनदीप सिंह की गिरफ्तारी पंजाब पुलिस ने की। उसके बाद  जनवंबर- 14 में ही दिल्ली हवाई अड्डे से खलिस्तान लिबरेषन फोर्स के प्रमुख हरमिंदर सिंह उर्फ मिंटू को एक साथी के साथ गिरफ्तार किया गया। ये लेाग थाईलैंड से आ रहे थे। पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में सजायाफ्ता व  सन 2004 में अतिसुरक्षित कहे जाने वाली चंडीगढ की बुढैल जेल से सुरंग बना कर फरार हुए जगतार सिंह तारा को जनवरी-2015 में थाईलैंड से पकड़ा गया। एक साथ विदेषों में रह कर खालिस्तानी आंदोलन को जिंदा रखने वाले षीर्श आतंकवादियों के भारत आने व गिरफ्तार होने पर भले ही सुरक्षा एजेंसिंयां अपनी पीठ ठोक रही हों, हकीकत तो यह है कि यह उन लोगों का भारत में आ कर अपने नेटवर्क विस्तार देने की येाजना का अंग था। भारत में जेल अपराधियों के लिए सुरक्षित अरामगाह व साजिषों के लिए निरापद स्थल रही है। रही बची कसर जनवरी-15 में ही राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाष सिंह बादल ने 13 कुख्यात सजा पाए आतंकवादियों को समय से पहले रिहा करने की मांग कर दी थी जिसमें जगतार सिंह तारा भी एक था। कुल मिला कर देखे तो जहां एक तरफ राज्य सरकार पंथक एजेंडे की ओर लौटती दिख रही है तो इलाके में मादक पदार्थों की तस्करी की जड़ तक जाने के प्रयास नहीं हो रहे हैं।
अभी तीन दिन पहले ही पटियाला विष्वविद्यालय में मुख्यमंत्री श्री बादल की मौजूदगी में ुकछ लोगों ने अलग खालिस्तान के पक्ष में जम कर नारेबाजी की थी। दीनानगर को अपनी कार्यवाही के लिए चुनने का कारण महज यह नहीं है कि यह सीमा के करीब है। असल में यह कस्बा कभी महाराज रणजीत सिंह की राजधानी रहा है। इसके आसपास गुरू नानकदेव व अन्य सिख गुरूओं से जुड़ी कई यादें हैं व सीमा से सटे पाकिसतान के गांवों में खासी सिख आबादी भी है। यह भी संभव है कि इस घटना में खालिस्तानियों का हाथ ना हो लेकिन इसने उनके लिए उत्प्रेरक का काम तो किया ही है। पंजाब में सत्ताधारी दल  जिस तरह से भुल्लर की आवभगत कर रहा है, राज्य से चार सांसद लोने वाले आम आदमी पार्टी के कुछ नेता सरेआम खालिस्तान के पक्ष में नारेबाजी करते रहे हैं, इससे साफा जाहिर है कि राज्य में कुछ अपराधियों, कुछ विघ्नसंतोशियों व कुछ देषद्रोहियों को एकजुट कर जहर घाोलना कतई कठिन नहीं है। अभी समय है और साधन भी वरना पंजाब जैसे तरक्कीपसंद, जीवट वाले राज्य को फिर से आतंकवादियों का अड्डा बनने से रोका जाना आसान भी है और जरूरी भी।


शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

flood due to interuption in river ecology

निरंतर छेड़छाड़ से बिफर रही हैं नदियां

                                                      पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार 
hindustan 25-7-15
अभी तो आषाढ़ ही चल रहा है, वह भी तब, जब मौसम विभाग कुछ कम बारिश का पूर्वानुमान व्यक्त कर चुका था; देश का बड़ा हिस्सा पानी से लबालब है। उज्जैन में जिस शिप्रा में पाइप के जरिये नर्मदा का पानी लाया जा रहा था, वह नदी  शहर की गलियों में घुस गई। असम, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश तो हर साल बारिश में हलकान रहते हैं, लेकिन इस बार तो राजस्थान के शेखावटी के रेतीले इलाके भी जलमग्न हैं।

पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े को देखें, तो पाएंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके के दायरे में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफन रही हैं और मौसम बीतते ही उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है। यह छोटी नदियों के लुप्त होने, बड़ी नदियों पर बांध बनाने और मध्यम श्रेणी की नदियों के उथले होने का दुष्परिणाम है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 में बाढ़ग्रस्त भूमि का दायरा एक करोड़ हेक्टेयर था। 1960 में यह बढ़कर ढाई करोड़ हेक्टेयर हो गया। 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन की माप 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी और 1980 में यह आंकड़ा चार करोड़ पर पहुंच गया। अभी इस तबाही के कोई सात करोड़ हेक्टेयर में होने की आशंका है। अब तो सूखे व मरुस्थल के लिए कुख्यात राजस्थान भी नदियों के गुस्से से अछूता नहीं रह पाता है।

Raj express 1-8-15
देश में बाढ़ की पहली दस्तक असम में होती है। असम की जीवन-रेखा कही जाने वाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मई-जून के मध्य में ही विनाश फैलाने लगती हैं। हर साल लाखों बाढ़ पीडि़त शरणार्थी इधर-उधर भागते हैं। बाढ़ से उजड़े लोगों को पुनर्वास के नाम पर एक बार फिर वहीं बसा दिया जाता है, जहां छह महीने बाद जल प्लावन होना तय होता है। यहां के पहाड़ों की बेतरतीब खुदाई, अनियोजित शहरीकरण और सड़कों के निर्माण भी इस राज्य में बाढ़ से बढ़ती तबाही के लिए काफी हद तक दोषी हैं। सनद रहे वृक्षहीन धरती पर बारिश का पानी सीधा गिरता है और भूमि पर मिट्टी की ऊपरी परत, गहराई तक छेदता है। यह मिट्टी बहकर नदी-नालों को उथला बना देती है, और थोड़ी ही बारिश में ये उफन जाते हैं। लेकिन नदियों के उथला होने का कारण सिर्फ यह मिट्टी नहीं है। हाल ही में दिल्ली में एनजीटी ने मेट्रो कॉरपोरेशन को आगाह किया है कि वह यमुना के किनारे जमा किए गए हजारों ट्रक मलबे को हटवाए।

यह पूरे देश में हो रहा है कि विकास कार्यों के दौरान निकली मिट्टी और मलबे को स्थानीय नदी-नालों में चुपके से डाल दिया जा रहा है। इसीलिए बाद में थोड़ी-सी अधिक बारिश होने पर भी इन जल निधियों का प्रवाह कम हो जाता है और उनका पानी बस्ती, खेत, जगलों में घुसने लगता है। बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं है, बल्कि इसी तरह के मानव जन्य हस्तक्षेप की त्रासदी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Kawadiya : terror on the road

आस्था पर भारी पड़ती अराजकता

                                                               पंकज चतुर्वेदी
देहरादून से ले कर दिल्ली और फरीदाबाद से करनाल तक और राजस्थान तक के पांच राज्यों के कोई 70 जिले आगामी एक अगस्त से 12 अगस्त तक कांवड़ यात्रा को ले कर भयभीत और आशंकित हैं। याद करें पिछले साल अकेले गाजियाबाद जिले में कांवडि़यों द्वारा रास्ता बंद करने, मारापीटी करने, वाहनों को तोड़ने की पचास से ज्यादा घटनाएं हुई थीं। हरिद्वार में तो कुछ विदेषी महिलाओं ने बाकायदा पुलिस में रपट की थी कि कांवडि़यों ने उनसे छेड़छाड़ की है। बीते एक दशक के दौरान देखा गया है कि कांवड़ यात्रा के दस दिनों में दिल्ली से ले कर हरियाणा-राजस्थान व उधर हरिद्वार को जाने वाली सड़कों पर अराजक बेसबाल, व अन्य शस्त्रधारी युवकों का अराजक कब्जा हो जाता है। इस बार मामला बेहद संवेदनशील है- कांवड़ यात्रा के प्रमुख मार्गों में पड़ने वाला पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश, फरीदाबाद के आसपास के इलाके व राजस्थान के कुछ कस्बे बीते सालों में भयावह दंगों के दर्द से संवेदनशील हो गए है।
Prabhat 26-7-15
जैसा कि बीते पांच सालों से घोशणा की जाती है, इस बार भी डाक कांवड पर पाबंदी, डीजे बजाने पर रोक जैसे जुमले उछाले जा रहे हैं, लेकिन यह तय है कि इनका पालन होना मुष्किल ही होता है और यही अराजकता आम लोगों के लिए संकट के दस दिन बन कर आती है। बडे -बड़े वाहनों पर पूरी सड़क घेर कर, उद॰ंडों की तरह डंडा-लाठी-बेसबाल लहराते हुए, श्रद्धा से ज्यादा आतंक पैदा कर रहे कांवडि़ए सड़कों पर आ जाते हैं ।
याद करें पिछले साल का श्रावण का महीना और दिल्ली से हरिद्वार जाने वाला राजमार्ग - एक हत्या, डेढ़ सौ दुकानों में आगजनी व तोड़फोड़, कई बसों को नुकसान, सैंकडों लोगों की पिटाई, स्कूल-दफ्तर बंद, लाखेंा बच्चों की पढ़ाई का नुकसान, जनजीवन अस्त व्यस्त । वह भी तब जब दस हजार पुलिस वालों की दिन-रात ड्यूटी लगी हुई थी । यह कहानी किसी दंगे - फसाद की नहीं बल्कि ऐसी श्रद्धा की है जो कि  अराजकता का रूप लेती जा रही है । पिछले साल और इससे भी कई पिछले सालों के दौरान श्रावण की शिवरात्रि से पहलेे लगातार दस दिनों तक देश की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास 200 किलोमीटर के दायरे में इस तरह का आतंक धर्म के कंधों पर सवार हो कर निर्बाध चलता है। इसमें कितना धर्म या श्रद्धा थी , इसका आकलन कोई नहीं कर पाया।
साल-दर-साल बढ़ रहे जुनून से स्पश्ट है कि आने वाले सालों में केसरिया कपड़े पहन कर सड़कों पर आतंक फैलाने वालों की बढ़ती संख्या समाज के लिए चिंता का विशय है। दिल्ली से हरिद्वार के व्यस्ततम राश्ट्रीय राजमार्ग को आगामी पांच अगस्त तक बंद किया जा रहा है । दिल्ली में यूपी बार्डर से ले कर आईएसबीटी और वहां से रोहतक व गुड़गांव और वहां से जयपुर  की ओर जाने वाले राष्‍ट्रीय राजमार्ग को जगह-जगह निर्ममता से खोद कर बड़े-बड़े पंडाल लगाए जा रहे हैं । राजधानी में भले ही बिजली की कमी हो, लेकिन बिजली को चुरा कर सडकों को कई-कई किलोमीटर तक जगमगाने की तैयारियां अपने अंतिम दौर में है । हरिद्वार से ले कर दिल्ली तक के करोड़ों लोगों की जान सांसत में है कि इस बार ये क्या गुल खिलाएंगे । इस बार भी ये शिव भक्त 10 दिनों तक लाखों बच्चों की पढ़ाई और कई षहरों के जनजीवन को अस्त व्यस्त रखने की अपनी परंपरा को दोहराएंगे। अनुमान है कि इस बार कांवड़ यात्रा पहले से अधिक भव्य होी, इसके कुछ राजनीतिक कारण भी हैं।
अपने मन की मुराद पूरी होने या देष-समाज की सुख-समृद्धि की मनोकामना के लिए श्रावण के महीने में हरिद्वार, देवघर(झारंखंड), काषी जैसे प्रसिद्ध षिवालयों से पैदल कांवड़ में जल ले कर अपने गांवों को शिवालयों तक आने की परंपरा सैंकड़ों साल पुरानी है । अभी कुछ साल पहले तक ये सात्विक कांवडिये अनुशासन व श्रद्धा में इस तरह डूबे रहते थे कि राह चलते लोग स्वयं ही उनको रास्ते दे दिया करते थे । बावरी मस्जिद विध्वंस के बाद देष में धर्म की राजनीति व हिंदु धर्म के तालीबानीकरण का जो दौर शुरू हुआ, उसका असर कांवड़ यात्रा पर साल-दर-साल दिखने लगा ।  पहले संख्या में बढ़ौतरी हुई, फिर उनकी सेवा के नाम पर लगने वाले टेंटों-शिविरों की संख्या बढ़ी । गौरतलब है कि इस तरह के शिविर व कांवड़ ले कर आ रहे ‘‘भोलों’’ की ‘‘सेवा’’ के सर्वाधिक शिविर दिल्ली में लगते हैं , जबकि कांवडि़यों में दिल्ली वालों की संख्या बामुष्किल 10 फीसदी होती है ।
अब कांवडियों का आतंक है । किसी का जल छलक गया, किसी को सड़क के बीच में चलने के दौरान माूमली टक्कर लग गई , तो खैर नहीं है । हाकी, बेसबाल के बल्ले, भाले, त्रिषूल और ऐसे ही हथियारों से लैस ये ‘भोले’ तत्काल ‘‘भाले’’ बन जाते हैं और कानून-व्यवस्था, मानवता और आस्था सभी को छेद देते हैं ।
इन कांवडियों के कारण राश्ट्रीय राजमार्ग पर एक सप्ताह तक पूरी तरह चक्का जाम रहना देश के लिए अरबों रुपए का नुकसान करता है । इस रास्ते में पड़ने वाले 74 कस्बों, शहरों का जनजीवन भी थम जाता है । बच्चों के स्कूलों की छुट्टी करनी पड़ती है और सरकारी दफ्तरों में काम-काज लगभग ना के बराबर होता है । गाजियाबाद महानगर में तो लोगों का घर से निकलना दुष्वार हो जाता है । षहर में फल, सब्जी, दूध की आपूर्ति  बुरी तरह प्रभावित होती है ।
दिल्ली की एक तिहाई आबादी यमुना-पार रहती है । राजधानी की विभिन्न संस्थाओं में काम करने वाले कोई सात लाख लोग जी.टी.रोड के दोनो तरफ बसी गाजियाबाद जिले की विभिन्न कालोनियों में रहते हैं । इन सभी लोगों के लिए कांवडियों के दिनों में कार्यालय जाना त्रासदी से कम नहीं होता । इस बार दिल्ली एनसीआर में कावंड़ यात्रा के दौरान जबरदस्त अराजकता होगी, क्योंकि गाजियाबाद में नये बस अड्डे से दिलषाद गार्डन तक मेट्रो के काम के चलते जीटी रोड बेहद संकरी व गहरे गढडों वाली हो गई है।। जाहिर है कि इस पर कांवड़ वालों का ही रोज होगा व इसके दोनेा तरफ बसी कालोनियों के लाखों लेाग ‘‘हाउस अरेस्ट’ होंगे। गाजियाबाद-दिल्ली सीमा पर अप्सरा बार्डर पूरी तरह कांवडियों की मनमानी की गिरफ्त में रहता है, जबकि इस रास्ते से गुरूतेग बहादुर अस्पताल जाने वाले गंभीर रोगियों की संख्या प्रति दिन हजारों में होती है । ये लोग सड़क पर तड़पते हुए देखे जाते हैंे । चूंकि मामला धर्म से जुडा होता है, सो कोई विरोध की सोच भी नहीं सकता । फिर कांवड़ सेवा केंद्रों की देखरेख में लगे स्वंयसेवकों के हाथों में चमकते त्रिषूल, हाकियां, बेसबाल के बल्ले व लाठियां किसी की भी जुबान खुलने ही नहीं देती है ।
धर्म, आस्था, पर्व, संकल्प, व्रत, ये सभी भारतीय संस्कृति व लोकजीवन के अभिन्न अंग हैं, लेकिन जब यह लोकजीवन के लिए ही अहितकर और धर्म के लिए अरुचिकर हो जाए तो इसकी प्रक्रिया पर विचार करना , इसकी मूल मंषा को अक्षुण्ण रखने के लिए अत्यावष्यक है । धर्म दूसरों के प्रति संवेदनषील हो, धर्म का पालन करने वाला स्वयं को तकलीफ दे कर जन कल्याण की सोचे; यह हिंदु धर्म की मूल भावना है । कांवडि़यों की यात्रा में यह सभी तत्व नदारद हैं ।
फिल्मी पेरोडियों की धुन पर नाचना, जगह-जगह रास्ता जाम करना, आम जन जीवन को अस्त-व्यस्त कर देना, सड़कों पर हंगामा करना और जबरिया वसूले गए चंदों से चल रहे षिविरों में आहार लेना; किसी भी तरह धार्मिक नहीं कहा जा सकता है । जिस तरह कांवडियों की संख्या बढ़ रही है, उसको देखते हुए सरकार व समाज दोनों को ही इस पावन पर्व को दूशित होने से बचाने की जिम्मेदारी है । कांवडियों का पंजीयन, उनके मार्ग पर पैदल चलने लायक पतली पगडंडी बनाना, महानगरों में कार्यालय व स्कूल के समय में कांवडियों के आवागमन पर रोक, कांवड लाने की मूल धार्मिक प्रक्रिया का प्रचार-प्रसार, सड़क घेर कर षिविर लगाने पर पाबंदी जैसे कदम लागू करने के लिए अभी से कार्यवाही प्रारंभ करना जरूरी है । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस धार्मिक अनुश्ठान में सांप्रदायिक संगठनों की घुसपैठ को रोका नहीं गया तो देष को जो नुकसान होगा, उससे बड़ा नुकसान हिंदु धर्म को ही होगा ।
आस्था के नाम पर अराजकता पर अंकुष आखिर कौन लगाएगा ? स्वयं समाज या सरकार ? कावंडियों के नाम पर दुकानदारी कर रहे लोग क्या कभी सड़क, सफाई, षिक्षा, भ्रश्टाचार जैसे मूलभूत मसलों पर अपने घर- गांव छोड़ कर डंडे ले कर सड़क पर आने की हिम्मत करते हैं ? कभी नहीं । जाहिर है कि इस भगवा बटालियन को तैयार करने में कतिपय लोगों के व्यावसायिक हित हैं तो कुछ के राजनैतिक । जरूरत इस बात की है कि धर्म के नाम पर लेागों को भ्रमित करने के इन कुत्सित प्रयासों का खुल कर विरोध हो और चैहरे बेनकाब किए जाएं । यह जानने का प्रयास कतई नहीं होता है कि इन कावंडियों के कारण कितने लेाग अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे हैं और कितनों के नौकरी के इंटरव्यू छूट गए । कितनों को मजबूरी में महंगी सब्जी व दूध खरीदना पड़ रहा है और कितनी कालोनियां इनकी बिजली चोरी के कारण अंधेरे में हैं ।  आज जब कांवड मार्ग पर सांप्रदायिक तनाव और आतंकवाद दोनो का खतरा है, ऐसे में यह कानून-व्यवस्था से कहीं ज्यादा सामाजिक जिम्मेदारी है कि धर्म के नाम पर ऐसी अराजकताओं से परहेज किया जाए।
पंकज चतुर्वेदी
यू जी -1 ए 3/186, राजेन्द्र नगर सेक्टर-2 साहिबाबाद, गाजियाबाद 201005



गुरुवार, 23 जुलाई 2015

Book review why trees are necessary


पुस्तक विमर्श : हर एक पेड़ जरूरी होता है

 
                                                                                                                       पंकज चतुर्वेदी


‘‘यह वनस्थली खड़ी है 
विविध पुष्पचिन्हों से सज्ज्ति
 हरित साड़ी पहनकर
 अपने कोमल शरीर पर, अकारण अंकुरित पुलक से सिहरी
 पक्षियों के कलरव में 
बारम्बार कहलास करती हुई’’ 
(मलयालम के महान कवि जी.शंकर कुरूप के काव्य संग्रह ‘औटक्कुशल’ (बाँसुरी) की एक रचना)

.महात्मा गाँधी हों या फिर महात्मा बुद्ध, दोनों ने ही अपने आहार को पेड़ों से मिलने वाले उत्पादों या फलों तक सीमित किया था। इन दोनों महान आत्माओं वन-उत्पाद को अपना आहार बनाने का उद्देश्य महज अपनी उदरपूर्ति या स्वास्थ्य नहीं आँका था। वे अपने अनुयायियों को संदेश देना चाहते थे कि अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएँ। पेड़ पहाड़ पर भी लग सकता है और पथरीली जमीन पर भी। वह जहाँ भी अपनी जड़े फैलाएगा, समृद्धि, शांति व सुख लेकर आता है। मानव विकास की कहानी के साथ स्थापत्य के प्रतिमान स्थापित होते रहे, कई मंदिर, महल बने, किले, भवन बने और मानव निर्मित ये संरचनाएँ काल के गाल में समाती रहीं। लेकिन प्रकृति द्वारा निर्मित ‘इमारत’ यानि पेड़ अक्षुण्ण रहे, अकाल में भी, प्राकृतिक आपदाओं में भी और युग के नष्ट होने में भी। आज भारत में कई स्थानों पर सैंकड़ों साल पुराने वृक्ष देखे जा सकते हैं। ये पेड़, अनगिनत पशु-पक्षी, जीव-जन्तु के आवास और भोजन का माध्यम होते हैं। ‘वृक्ष खेती’ शीर्षक की पुस्तक अपील करती है कि पहले से खड़े बड़े-छोटे पेड़ों को उनकी पूरी उम्र तक जीने का अवसर दें। इनके पत्ते, फूल-फल, टहनी, रंग-रूप पीढ़ियों तक प्राकृतिक शोभा बढ़ाते है। यह पुस्तक भूख, जलवायु परिवर्तन और ऐसी ही अन्य भूमंडलीय समस्याओं का समाधान वृक्षों से खोजने की मागदर्शिका है।

पुस्तक का पहला अध्याय है - ‘वृक्षों से आहार’। इसमें बताया गया है कि दुनिया के सूखे या बारानी इलाके, जहाँ मौत नाचती है, वहाँ भी पेड़ किस तरह लोगों की भूख मिटाते हैं। फिर वर्षा वन का पानी से घिरा इलाका हो या फिर गर्म देश की नम भूमियाँ, ऊँचे पहाड़ हों या फफूंदी के जंगल, सुमद्र या अन्य कोई इलाका, हर जगह पर्यावास, सहजीवन और जीव-जीवन का आधार पेड़ ही होते हैं। पेड़ अकेले इंसान या जीव-जीवन की उदर-पूर्ति का ही माध्यम नहीं हैं- गर्माती धरती का बढ़ता पारा रोकने में भी उनकी अहम भूमिका है। कार्बन डायआक्साईड, मीथेन और अन्य ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा सीमा से ज्यादा बढ़ने के कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है। ताप के साथ ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं व उसके कारण समुद्रों का जल स्तर भी बढ़ रहा है। यदि पानी का स्तर ऐसे ही बढ़ता रहा तो आने वाले 500 सालों में समुद्र का जल स्तर 13 मीटर बढ़ सकता है और इसके चलते 100 लाख वर्ग किलोमीटर ऐसी धरती खारे समुद्र में बह जाएगी, जहाँ आज खेत हैं। अब पूरी पृथ्वी पर जो संकट मंडरा रहा है, तो इसका निदान भी मात्र अधिक से अधिक पेड़ लगाना ही है जो कार्बन डायआक्साईड को सोखने की क्षमता रखते हैं। पुस्तक के दूसरे अध्याय में पेड़ की इसी महिमा के साथ कृषि वानिकी से ग्रामीण जीविका में बढ़ोत्तरी, पेड़ों से इमारती व जलावन पर भी विमर्श करता है।

पुस्तक के तीसरे अध्याय में बताया गया है कि किस तरह बड़े पेड़ों का आधिक्य खेतों में फसल उत्पाद को बढ़ाता है। इस अध्याय में खेती और वृक्ष प्रजनन के इतिहास, फलदार पेड़ों की पारम्परिक और आधुनिक बागवानी पर भी प्रकाश डाला गया है। सबसे बड़ी बात की हर शब्द बेहद सहज व सरल शब्दों में है और पाठक को उसे समझने व क्रियान्वयन में कोई दिक्कत नहीं होगी।

पुस्तक के आखिरी अध्याय में पचास से अधिक प्रजाति के वृक्षों, उनके गुणों, उनको उगाने के तरीकों, उनसे प्रकृति व जीव-जगत को लाभ पर प्रकाश डाला गया है। इसमें ताड़, नारियल, इमली, अंजीर, कटहल, बरगद, चिनार, टीक, केला रतालू, पपीता, नागफनी जैसे ऐसे पेड़ों की चर्चा है जिनका बाकायदा जंगल सजाया जा सकता है। इन पेड़ों का इतिहास, विकास यात्रा, परम्पराओं में महत्त्व, इन्हें उगाने के सलीके व तरीके आदि को भी इसमें समझाया गया है। इसमें कई कहानियाँ भी दी गई हैं। अंत में तीन कविताएँ और सन्दर्भ सूची भी बेहद महत्त्वपूर्ण है।

इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक की लेखिका भारत सरकार में मन्त्री व पर्यावरण प्रेमी श्रीमती मेनका गाँधी और फिनलैंड की अग्रणी पर्यावरण कार्यकर्ता, चिंतक व लेखक रिस्तो इसोमाकी हैं। श्री रिस्तो मानते हैं कि धरती और मनुष्य सहित तमाम सभ्यताएँ अहिंसा पर आधारित व मुक्त विचारों से ओत-प्रोत होना चाहिए। इसका हिन्दी रुपांतरण डॉ. रमेशचंद्र शर्मा ने किया है। पुस्तक अमूल्य है और शायद इसीलिए इसकी कोई कीमत नहीं रखी गई है। पुस्तक में उल्लेख है कि इस पुस्तक की सामग्री का कोई भी कहीं भी इस्तेमाल कर सकता है।

वृक्ष खेती, रिस्तो इसोमाकी, मेनका गाँधी, हिन्दी अनुवाद - डॉ. रमेश चंद्र शर्मा, पृ. 268, कीमत - अमूल्य, वसुधैव कुटुम्बकम, क्षरा लोकायत, 13 अलीपुर रोड, दिल्ली-110054

Higher education should be of International level

कौन  नहीं चाहता है उच्च  शिक्षा  का उन्न्यन

                                                                                                                   पंकज चतुर्वेदी

RAJ EXPRESS 24-7-15
भारत के उच्च शिक्षा  जगत को अभी उस खतरे की परवाह नहीं है, जोकि उस पर मंडरा रहा हैै । डब्लूटीओ करार के मुताबिक अप्रेल -2005 से हमारे देश  के महाविद्यालयों और विश्वविधालयों  को  अंतरराश्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप अपना स्तर बनाना था । भारत के सभी विष्वविद्यालयों को अंतरराश्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने के लिए कुछ क्यूए यानि क्वालिटी एष्योरेंस का पालन जरूरी है। ऐेसे में षिक्षण सुविधाओं, छात्रों के नतीजे और पाठ्यक्रमों में सतत सुधार के आाधार पर षैक्षिक संस्थाओं का स्तर तय होता है। चूंकि भारत डब्लूटीओ की षर्तों से बंधा हुआ है, अतः उच्च षिक्षा के मानदंडों का पालन करना उसकी मजबूरी है। इससे बेखबर हमारे राजनेता निजी स्वार्थों के चलते पाठ्यक्रम और संस्थानों को स्तरीय बनाने में अडंग्े डाल रहे हैं, उस पर तुरर्रा है कि यह सब पढ़ाई को महंगा होने से रोकने के लिए है। लेकिन यदि हमारी पढ़ाई की बाजार में कीमत ही नहीं है तो फिर डिगरीधारियों की फौज खड़ी करने का क्या फायदा है ?
वैसे तो विष्वविद्यालय अनुदान आयोग ने सन 2003 में  इस बाबत एक कमेटी का गठन किया था । इसकी किसी को भी खबर नहीं है कि उक्त कमेटी किस नतीजे पर पहुंची, लेकिन इस अवधि में कालेज ही नहीं यूनिवर्सिटी खोलने के नाम पर षिक्षा जगत के साथ खुल कर खिलवाड़ किया गया । छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में महज सत्रह सौ रूपए की पूंजी के साथ विष्वविद्यालय खोल दिए गए । दो कमरे अपने नहीं हैं और वहां विज्ञान संकाय के साथ डिगरी कलेज चल रहे हैं, यह विडंबना मध्यप्रदेष से बिहार तक कहीं भी देखी जा सकती है । एक तरफ तो सरकार उच्च षिक्षा के निजीकरण के मसले पर षिक्षा षुल्क बढ़ने का भय दिखाती है ,दूसरी तरफ महज कागजी डिगरी बांटने वाले झोलाछाप षैक्षिक संस्थानों को सियासती लोग ही चला रहे हैं । बहरहाल उच्च षिक्षा को डब्लूटीअेा की षर्तों के अनुरूप बनाने की क्रियान्वयन रिपोर्ट सियासती खींचतान में फंस गई है, लेकिन आंख बंद करने से खतरा तो टलने से रहा । फायदे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमाों को निजी हाथों में सौंपने और अंतरराश्ट्रीय मानदंड वाले वाले संस्थान आईआईएम में फीस कम या ज्यादा करने की आड़ मे घुसपैठ करने को आमदा सरकार उच्च षिक्षाा के मामले में ना जाने क्यों आंखें फेर रही है ।
विकसित देषों में बच्चों की प्रारंभिक षिक्षा को उतना ही महत्व दिया जाता है जितना कि उच्च षिक्षाा को । भारत में स्कूली षिक्षा का तेजी से निजीकरण हुआ । सुदूर गांवों तक भी सरकारी स्कूल के बनिस्पत निजी स्कूलों के षैक्षिक स्तर को बेहतर माना जा रहा है । चाहे राजनेता हों या फिर षिक्षा के नीति निर्धारक, समाज के प्रत्येक वर्ग के बच्चे नामी-गिरामी निजी स्कूलों में दाखिला ले कर गर्व महसूस करते हैं । अब तो सरकारी स्कूल भी ‘हायर एंड फायर’ की तर्ज पर ष्यिाक्षकों को रखने लगे हैं । षिक्षा गारंटी योजना, गुरूजी, पेरा टीचर जैसे नामों से स्कूली षिक्षक को पांच सौ या हजार रूप्ए में रखने पर अब किसी की संवेदनाएं नहीं जाग्रत हो रही हैं । इसके ठीक विपरित कालेजों के षिक्षकों पर कार्यभार कम है, जवाबदेही ना के बराबर है और वेतन व सुविधाएं आसमान छूती हुईं । हकीकत तो यह है कि इस तरह मौज काट रही एक लाबी उच्च षिक्षा के निजीकरण की भ्रामक तस्वीर पेष कर उसका विरोध कर रही है ।
हमारे देष में सरकारी नौकरियों की उपलब्धता घटती जा रही है । ‘पैसा’, ‘पहचान’ और ‘आरक्षण’ ; इन तीन मानदंडों पर सरकारी नौकरियां बंट रही हैं । महत्वाकांक्षी षिक्षित युवा आज निजी क्षेत्र में नौकरियों को प्राथमिकता दे रहा है, जाहां जवाबदेही के साथ-साथ पैसा भी है । उच्च षिक्षा को सरकारी तंत्र से मुक्त करने पर पाठ्यक्रम में सुधार, षिक्षण प्रक्रिया में नवाचार और बेहतर परिणामों की संभावनाएं अधिक होंगी ।
कुछ आईआईटी और आईआईएम को छोड़ दिया जाए हमारे देष के अधिकांष उच्च षिक्षा संस्थाओं का पाठ्यक्रम ना तो अंतरराश्ट्रीय स्तर का है और ना ही उसमें समय के साथ संषोधन किए गए हैं । कई विष्व विद्यालयों में एमए अंग्रेजी में वह सब पढ़ाया जा रहा है जो कि इंग्लैंड में 60 साल पहले पढ़ाया जाना बंद हो चुका है । गौर करना जरूरी है कि समसामयिक अंग्रेजी साहित्य में भारत का महत्वपूर्ण योगदान है।  इंजीनियरिंग व पोलिटेकनक कालेजों में सिविल कंस्ट्रक्षन की वे विधियां पढ़ाई जा रही हैं , जोकि अब कहीं इस्तेमाल में ही नहीं हैं । चिकित्सा, वास्तु, कानून के चैहरे बिलकुल बदल चुके हैं, लेकिन बदला नहीं है तो हमारा पाठ्यक्रम । षायद तभी युवा वर्ग जो कुछ पढ़ रहा है, उसका अपने व्यावहारिक जीवन में कही उपयेाग नहीं कर पाने की खीज से ग्रस्त है ।
हमारी उच्च् षिक्षा के स्तर का ही दोश है कि पांच साल तक बीटेक की पढ़ाई, कई लाख खर्च करने वाले युवा इंजीनियर को बीस हजार की नौकरी नहीं मिल रही है। उप्र जैसे राज्यों में तो इंजीनियरिंग कालेज बंद हो रहे है, क्योंकि वहां छात्र नहीं  आ रहे है।। ठीक यही हालात अब एमबीए के हैं, आईआईएम या कुछ संस्थानों को छोड़ दिया जाए तो कुकुतमुत्तों की तरह छितरे हजारों एमबीए संस्थानों से निकले बच्चों की हालत सामान्य स्नातक से भी बदतर है। बीएड पढ़ाई के हालात इतने बदतर हैं कि वहां से निकले षिक्षक कई बार पूरी वर्णमाला नहीं लिख पाते हैं। कुछ ऐसे ही हालात दांत की डाक्टरी के होते जा रहे हैं । दूसरी तरफ एमबीबीएस के लिए मची मारामारी की बानगी मध्यप्रदेष का व्यापम कांड है।
उच्च षिक्षा क्षेत्र आज भी सभी राजनैतिक दलों का चारागाह बना हुआ है । कहा तो जाता है कि निजीकरण  के बाद उच्च षिक्षा महंगी हो जाएगी, लेकिन स्कूली षिक्षा के बारे में यह क्यों नहीं सोचा गया ? सनद रहे कि स्कूली षिक्षा के छात्रों की संख्या, उच्च षिक्षा से तीन गुणा से भी अधिक होती है । उच्च षिक्षा की गुणवत्ता के बनिस्पत कालेजों को अपनी पार्टियों के लिए कार्यकर्ता तैयार करने का कारखाना समझने वाले नेता मौजूदा षिक्षा से भविश्य को जोड़ने की बात करने पर बगलें झांकते मिलते हैं । वास्तव में इन राजनैतिक दलांे को ना तो युवा षक्ति के सकारात्मक इस्तेमाल से सरोकार है और ना ही उनके भविश्य से । मंडल विरोधी आंदोलन में उभरे युवा नेता राजीव गोस्वामी का उदाहरण सामने है, उसके भुने हुए षरीर पर राजनीति करने में कोई दल पीछे नहीं था । उसके बाद बीमार राजीव को जीवकोपार्जन के लिए गोली-बिस्कुट की दुकान तक खोलनी पड़ी । उसके नाम से एकत्र किए गए चंदे से कई नेताओं ने ऐष किए और वह दवाई के लिए तरसता रहा । उच्च षिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तनों को भी दिवंगत राजीव गोस्वामी के परिपेक्ष्य में देखा जा सकता है । तात्कालिक उत्तेजना, त्वरित प्रतिक्रियाओं व क्षणिक फायदों से देष के भविश्य यानि युवा पीढ़ी को संवारा नहीं जा सकता है । छात्र संघ के चुनाव हों या षिक्षक संघ के ,सभी राजनैतिक दल इसमें परोक्ष रूप से जुड़े होते हैं । ऐसे कालेजी षिक्षकों की संख्या सैंकड़ों में है , जो कि महज नेतागिरी करने के ऐवज में मोटा वेतन वसूलते हैं, उनका क्लास रूम से कोई वास्ता नहीं है । ऐसे छात्र नेताओं की संख्या भी हजारों में है, जो कि अपने सियासती रसूख के बदौलत बगैर पढ़ाई किए ही डिगरियां पा लेते हैं । यदि ये लोग षिक्षा के निजीकरण के सच्चे विरोधी हैं तो अपने बच्चों को मोटी फीस दे कर भी पब्लिक स्कूल में भर्ती करवाने के लिए व्याकुल क्यों रहते हैं ? यही नहीं सरकारी काालेजों में प्रवेष के लिए सरकारी स्कूल से आए बच्चों को प्राथमिकता देने के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में दबाने वाले क्या यही लोग नहीं हैं ?
देष में कई मेडिकल, इंजीनियरिंग व मेनेजमेंट कालेज निजी प्रबंधन में हैं, लेकिन उन्हें विष्वविद्यालय अनुदान आयोग और आल इंडिया काउंसिल फार टेक्निकल एजुकेषन के कायदे-कानूनों के तहत चलना पड़ता है । इन सभी कालेजों का मालिकाना हक बड़े नेताओं के पास है । यदि विदेषी विष्वविद्यालयों से संबद्ध पाठ्यक्रमों को धीरे-धीरे हमारे यहां मान्यता देना षुरू कर दिया जाए तो हमारे संस्थान डब्लूटीओ के स्तर के स्वतः ही होने लगेंगे । अभी इस पर विचार करने का ठीक समय है, वरना अचानक ही कई संस्थाओं को बंद करने या आानन-फानन में पाठ्यक्रम में बदलाव करने पर अफरा-तफरी मचेगी ।
पंकज चतुर्वेदी

Book Review HAMARA PARYAWARAN

हमारे पर्यावरण का भविष्यवक्ता

                                                        पंकज चतुर्वेदी
. ‘‘यदि हमारे गाँव ऐसे स्थान पर हैं जहाँ पर्यावरण व इंसान एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं तो शहर ऐसा स्थान है, जहाँ इंसान एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। शहर के साझा स्थानों को इस्तेमाल तो सभी करना चाहते हैं, उस पर अपना अधिक से अधिक अधिकार का दावा भी सभी करते हैं, लेकिन उस स्थान के रख-रखाव की ज़िम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं होता।’’ यह बात आज की नहीं है, सन 1988 की है, जब वैश्विकरण का हल्ला नहीं था, शहरों की रफ्तार इतनी बेकाबू नहीं थी, लेकिन लेखिका लाईक फतेहअली ने शायद भविष्य को भाँप लिया था। ‘हमारा पर्यावरण’ पुस्तक आज से 28 साल पहले मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई थी और बाद में प्रख्यात पत्रकार अमन नम्र ने इसका हिन्दी में अनुवाद किया था। इस पुस्तक को आज भी पढ़ना इस बात की बागी है कि प्रकृति को प्रेम करने वाले कितने चुपचाप आने वाले पर्यावरणीय खतरों को महसूस कर रहे थे, समाज को चेता भी रहे थे, लेकिन हमने हालात बेकाबू होने तक अपनी कुम्भकरणीय नींद नहीं खोली।

पुस्तक बगैर किसी लाग लपेट, औपचारिकता या भूमिका के शुरू हो जाती है और इसमें पर्यावरण को भारत के परिवेश में आँका जाता है। पर्वत, जंगल, नदियाँ, समुद्र, गाँव और शहर के अध्यायों में विभाजित इस पुस्तक में प्रत्येक विषय पर दो भाग हैं। एक में समस्या का उल्लेख है तो दूसरे में समझाईश दी गई हैं। पर्वत वाले अध्याय में पहले तो भारत की पर्वत सम्पदा को विस्तार से बताया गया है, फिर दूसरे अध्याय में पहाड़ों के सामने खड़ी पहाड़ सी चुनौतियों व उसके दुष्परिणामों का उल्लेख है। बताया गया है कि एक स्वस्थ और अस्वस्थ पर्वत किसे कहते हैं। पहाड़ों पर पेड़ों की बेरहम कटाई के चलते किस तरह से नुकसान हो रहे हैं। कहा गया है कि ‘‘जिस तरह से बीमार इंसान कई बार थोड़े वक्त के लिए अपनी बीमारी को छिपा लेता है व स्वस्थ दिखता है, ठीक उसी तरह पर्वत भी कई बार सामने से भरे-पूरे दिखते हैं लेकिन असल में वे बीमार होते हैं।” यह अध्याय दो साल पहले की उत्तरांचल त्रासदी की चेतावनी इतने पहले देता दिखता है।

पुस्तक का दूसरा विषय ‘जंगल’ हैं। इसमें महज हरियाली या पेड़ का ही विमर्श नहीं है। यह बताता है कि जंगल का अर्थ है वैविध्यपूर्ण जन्तु जगत और जब तक जंगल में जीव-जन्तु रहते हैं, वहाँ हरियाली, नमी, वनोपज सभी कुछ उपलब्ध रहता है। जंगल के सिकुड़ने के कारण आदिवासियों के शहरी बनने के दबाव पर भी इसमें विस्तार से चर्चा की गई है। लेखिका कहती हैं कि हर जंगल एक स्वतन्त्र दुनिया होता है और प्रत्येक बाहरी दखल उसकी नैसर्गिकता पर हमला होता है। हर जंगल एक जैविक भंडार गृह होता है। जिस आबादी के पड़ोस में नदी होती है, वह वास्तव में सौभाग्यशाली होता है। यह महज संयोग नहीं है कि दुनिया के सबसे पुराने व सफल शहर नदी के तट पर ही हैं - लंदन, पेरिस, कायरो, दिल्ली, रोम..... और भी कई। नदी वाले अध्याय में नदी को केवल एक जल-निधि नहीं माना गया है, इसमें नदी की जरूरत व उसकी पवित्रता की अनिवार्यता को भी उकेरा गया है। नदियों को दूषित करने के नुकसान, बाँध, नहर, नदी जल का रख-रखाव आदि पर इसमें बेहद गैरतकीनीकी व संप्रेषणीय भाषा में चर्चा की गई है। धरती की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तालाबों की चर्चा नदी वाले अध्याय में ही लगभग तीन पृष्ठों में की गई है।

अगले अध्याय ‘समुद्र’ में चेताया गया है कि ये महज खारे या बेकार पानी का जमावड़ा नहीं है जिसके किनारे पर्यटक जाकर खुश होते हैं या दुनिया की खोज करने वाले पानी जहाज़ों के परिवहन मार्ग हैं। समुद्र धरती के तापमान को सन्तुलित रखने, बारिश के बादलों को सक्रिय करने, पेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधनों के भंडार और मछलियों व अन्य जल-जीवों की विशाल संख्या के शरण स्थली भी हैं। समुद्र में सतत बढ़ रहा प्रदूषण असल में धरती की सेहत के साथ गम्भीर छेड़-छाड़ है। गाँव और शहरों पर कुल चार अध्याय, बताते हैं कि पर्यावास किस तरह प्रकृति प्रेमी व दुश्मन हो सकता है। इन अध्यायों में मानवीय स्वभाव, लालच, गलत आदतों के कारण उपज रही ऐसी समस्याओं का उल्लेख किया गया है जिसका आखिरकार शिकार वही इंसान होता है जो उनके प्रति कोताही बरतता गाँव के अस्तित्व को बनाए रखना, गाँव को आत्मनिर्भर, शुद्ध और समर्थ बनाने के कई उपाय इसमें बताए गए हैं। पुस्तक साक्षी है कि बढ़ता शहरीकरण और घटते गाँव किस तरह मानव सभ्यता के लिए नुकसानदेह हैं। शहरों में सभी को साफ पानी, मल-जल निकासी जैसे विषयों को भी इसमें समेटा गया है। इस अध्याय में कूड़े को फेंकने, स्वच्छता को कड़े कानून के जरिये लागू करवाने की वकालत भी की गई है।

लेखिका लाईक फतेहअली सन 1956 से 1976 तक ‘क्वेस्ट’ पत्रिका की सम्पादक रही हैं और सलीम अली के साथ पक्षियों पर पुस्तकें लिखी हैं। अनुवादक अमन नम्र ‘पानी घणों अनमोल’ और ‘पानीदार समाज’ जैसी पुस्तकों के लेखक हैं और उनके अनुवाद को पढ़कर महसूस नहीं होता है कि अनूदित सामग्री पढ़ी जा रही है।

हमारा पर्यावरण, लाईक फतेहअली, अनुवाद: अमन नम्र, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, वसंत कुँज, पृ. 134, रू. 70.00, नई दिल्ली-110070

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...