My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

सोमवार, 7 सितंबर 2015

great Indian bustard in great trouble

सोन चिरैया के जंगल में ‘सफेद हाथी’

                                                                                                                   
JAGRAN 7-9-15
                                                                                                                   पंकज चतुर्वेदी
कभी भारत सोने की चिड़िया था, जिसे विदेशियों ने उजाड़ दिया। इस देश मे एक सोन चिरैया है, उसे अब देश के लोग लुप्त करने पर आमदा है। सन 2011 की गणना में इसकी संख्या 250 बताई गई थी पक्षी विशेषज्ञो की आश्ंाका है इस समय यह बामुश्किल 150 बची होगी। दुर्लभ पक्षी सोन चिरैया के अस्तित्व की रक्षा के लिए सरकार ने एक संरक्षित अभ्यारण बनाया।  उसमें सरकारी कर्मचारियां-अफसरों का लंबा-चैड़ा अमला बहाल किया गया। कुछ साल बाद देखा तो वहां केवल सरकारी सफेद हाथी बचे, सोन चिरैया बीते हुए कल की बात बन गए। जब नौकरी पर संकट आया तो कागजी शेर बनाए गए, लेकिन दुर्भाग्य सोन चिरैया नहीं बचीं। यह तथा-कथा है मध्यप्रदेश के ग्वालियर के घाटीगांव और करैरा(शिवपुरी) की। यह भी विडंबना है कि ‘चिड़िया उड़ने’ के बाद इलाके के गांवों को उजाड़ कर चिड़िया को बसाने का शिगूफा छोड़ा जा रहा है।
हिंदुस्‍तान 19 सितंबर 15
‘ओटीडीटी’ कुल का पक्षी सोन चिरैया ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या हुकना या तुकदार भी कहलाता है। डीलडौल में गिद्ध के समान, सिर तक ऊंचाई कोई तीन फीट, वजन कोई 13 किलोग्राम - कुछ-कुछ शुतुर्मुग की तरह दिखने वाले इस पक्षी का शरीर बगैर बालों वाली टांगों के समकोण पर टिका होता है।इसे देश का सबसे विशाल पक्षी भी माना गया है।  यह इसकी खास विशेषता भी है। इसे ऊपरी पंख गहरे पीले और उन पर काली धारियों होती हैं।निचला भाग सफेद व छाती के पास नीचे लंबी काली पट्टी होती हैं। सफेद गर्दन, कली खोपड़ी, चैड़े पंखों की नोक के पास सफेद-सा धब्बा और सिर पर कलगी- ये कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जिनके कारण सोन चिरैया कुछ अलग ही दिखती है। मध्यप्रदेश में घाटीगांव व करैरा के अलावा राजस्थन के कंडनपुर, सोनखल्या और डेजर्ट नेशनल पार्क, महाराष्ट्र में नानाज, आंध्रप्रदेश में रोल्लापाडू और कनार्टक के रानी बन्नार अभ्यारण में इस दुर्लभ पक्षी की आबादी बामुश्किल 150शेष है। कुछ जगह तो बस नाम के अभ्यारण है वहां पक्षी है ही नहीं।
सोन चिरैया बहुत ही शर्मीला व चैकस परिंदा है, दुर्भाग्य की बात है कि यह पक्षी कभी इंसान की नियत पर संदेह नहीं करता है। यही कारण है कि पिछले कुछ दशकों में इसका इतना शिकार हुआ कि आज यह प्रजाति खतम होने के कगार पर खड़ी है। हालांकि इसका मांस रबर की तरह लचीला और खुरदुरा होता है, इसे आसानी से चबाया नहीं जा सकता है। इसके बावजूद इसकी दीवानगी के पीछे यह भ्रांति है कि इसकी तासीर गरम होती है और इससे पौरुष-शक्ति बढ़ती है।  फिर इसे पंख खूबसूरत होने के कारण सजावट के काम आते हैं। वैसे यह पक्षी काफी कुछ अपनी आदतों के कारण मारा जाता है। अक्सर देखा गया है कि सोन चिरैया गाय, भैंस या बकरियों के झुंड के साथ पैदल चलने लगती है। ऐसे में ग्वाले या शिकारी इसको धर पकड़ते हैं। यहां तक कि लोमड़ी और कुत्ते भी इसको पकड़ लेते हैं, क्योंकि यह अचानक उड़ नहीं पाता है। साथ ही यह पक्षी साल में केवल एक बार और केवल एक ही अंडा देता है। अंडे को सहेजने के लिए अपेक्षित संवेदनशीलता का अभाव भी इसके लुप्त होने का बड़ा कारण है।
सन 1982 में मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले के घाटीगांव का 512 वर्गकिमी और शिवपुरी के करैरा में 202 वर्गकिमी इलाके के जंगल को सौन चिरैया के लिए संरक्षित अभ्यारण घोषित किया गया था। इस क्षेत्र की सिफारिश मशहूर पक्षी वैज्ञानिक डा. सालिम अली ने की थी। बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के वेज्ञानिक डा. रफीक रहमानी लगातार इन जंगलों में आते रहे। उन्होंने इस अनूठे परिंदे के प्राकृतिक आवास, प्रजनन, आदतों आदि पर गहन शोध किए। डा. रहमानी ने इस पक्षी का अस्त्त्वि बचाने के लिए कई सुझावों के साथ एक रिपोर्ट मध्यप्रदेश शासन को भ्ेाजी थी। डा. रहमानी की रिपोर्ट सरकारी फाईलों के जंगलों में कहीं खो गई और सरकारी कागजों में जंगल संवारने के नाम पर करोड़ो रूपए खर्च किए गए।  बीते पांच सालों में यहां पखी संरक्षण के लिए एक करोड़ 35 लाख रूपए खर्च किए गए। इसके लिए कोई 18 अफसर व कर्मचारी तैनात हैं। चिड़ियों को चुगाने के लिए चने व अन्य दानों की खरीदी और वितरण बाकायदा कागजो पर दर्ज होता है। जबकि अफसर कहते हैं कि केवल आठ सोन चिरैया शेष रह गई हैं। सरकारी रिकार्ड की ही बानगी है कि 1986 में यहां 35, 1987 में 40, 1991 में 12, 1992 में 18 और 1993 में पांच पक्षी देखे गए। उसके बाद कई साल संख्या शून्य रही, लेकिन सरकारी खर्च होता रहा। हालांकि आज भी पक्षी की संख्या तो शून्य ही है, लेकिन अपनी नौकरी और ऊपर की कमाई बचाने के लिए इसकी संख्या आठ बताई जा रही है। यही हालात अन्य कई अभयरणों के भी हैं।
इन जंगलों से सोन चिरैया के लुप्त होने के लिए शिकार के साथ-साथ वहां के प्राकृतिक वृक्षों की संख्या कम होना भी जिम्मेदार है। खेती-योग्य सरकारी जमीन पर नाजायज कब्जा करने की साजिश के तहत चिड़ियों को उजाड़ने की बात कुछ पर्यावरणविद बताते हैं। कतिपय वन अधिकारी और स्थानीय नेता इस साजिश में शािमल बताए जाते हैं। सनद रहे कि इस इलाके के बाशिंदों का जीवकोपार्जन मुख्य रूप से खेती से ही होता है और यहां खेती की जमीन के लिए हत्या व डकैत बनना आम बात है। जब कभी सोन चिरैया लुप्त होने का हल्ला होता है, जंगल महकमे वाले अभ्यारण के तहत आने वाले 32 गांवों को खाली करने की कवायद शुरू कर देते हैं। अपने पुश्तैनी घर-खेत को बचाने के लिए गांव वाले लामबंद होते हैं, सियासत होती है और एक बार फिर सब जस का तस हो जाता है।
यह बात तय है कि इलाके में अब सौन चिरैया को नामोनिशान नहीं बचा है। यह भी बात सत्य है कि प्रकृति की इस अनमोल विरासत को बचाना बेहद जरूरी है । यह भी स्वीकार करना होगा कि चिड़िया को बसाने के लिए हजारों लोगों की बस्ती उजाड़ना एक अव्यावहारिक कदम है। पारिस्थितिकी संतुलन के लिए वन और वन्य प्राणियों का अस्तित्व बेहद जरूरी है, लेकिन सदियों से जंगल और मानव एकदूसरे के पालक रहे हैं। बढ़ती आबादी की जरूरतों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाए तो दुर्लभ पक्षी का पर्यावास बचाया जा सकता है। आज सोन चिरैया को सहेजने का कार्य ए-बी-सी-डी से शुरू करने की नौबत आ गई है। चिड़िया के अंडे लाना, उससे बच्चे पैदा करने लायक परिस्थितियां बनाना, बच्चों को बड़ा करना और फिर उनकी संख्या बढ़ाना। लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी होगा, स्थानीय लेागों में इस चिड़िया के संरक्षण के प्रति जागरूकता का भाव विकसित करना।
इसके संरक्षण के लिए बहाल लोगों को इस पक्षी के प्राकृतिक पर्यावास की जानकारी होना भी जरूरी है। यह पक्षी झाड़ी या घास के बीच सूखे मैदानों में रहना पसंद करता है। इसे घने जंगल पसंद नहीं है, लेकिन
घनी फसल वाले खेतों में यह अपना अड्डा जरूर बना लेते हैं। इनका भोजन खेतों- घास में मिलने वाले कीड़े-मकोड़े, टिड्डे, गुबरीले आदि होता है। जाहिर है कि यह पक्षी ऐसी जगह पर रहना पसंद करता है जो इंसान की आबादी के करीब हो। सनद रहे कि जंगल महकमे के लोग इसके संरक्षण के नाम पर गांव-बस्तियां उजाड़ने पर आमदा हैं।
पंकज चतुर्वेदी
गाजियाबाद 201005


शनिवार, 5 सितंबर 2015

How can Hindu become minority in India ?

क्या भारत में मुस्लिम आबादी वास्तव में बहुसंख्यक हो जाएगी ?

MP JANSANDESH SATNA 6-9-15
                                                                     पंकज चतुर्वेदी
बीते दिनों सरकार ने जनगणना के ताजा आंकड़े जारी कर उन लोगों को हल्ला-गुल्ल करने का एक अवसर दे दिया है जो दावा करते रहे हैं कि मुसलमानों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और जल्दी ही वे हिंदुओं से अधिक हो जाएगी इसलिए हर हिंदु पांच-पांच बच्चे पैदा करे।’’ एक सांसद महोदय तो बगैर किसी सिर पैर के यह तक कह दिया कि आने वाले 80 साल में हिंदू समाप्त हो जाएगे। कुछ एक ने चार से ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को पारितोशिक देने की घोशणा कर डाली। यह एक ऐसा मिथक है जिसका भय कई-पढ़े लिखे शहरियों को भी है। यह एक बेहद प्रचारित जुमला है कि मुसलमान जानबूझ कर कई-कई शादी करते हैं और साजिशन देश की आबादी बढ़ाते हैं। यदि पिछली कुछ जनगणनाओं के अंाकड़ों पर नजर डालें तो हकीकत सामने आ जाती है। यही नहीं यदि इस्लाम के मूल सिद्धांतों को ठीक से समझा-पढ़ा जाए तो स्पश्ष्ट हो जाता है कि बच्चों की अनियंत्रित संख्या इसकी की मूल भावना के विपरीत है। यह विडंबना है कि समाज को तोड़ने वाले लोग, जो दोनों फिरकों में हैं, ऐसे मिथकों को हवा देते हैं, जबकि कतिपय लोग इस्लाम के नाम  पर ऐसी भ्रांतियों को हवा देते हैं। इसमें कुछ मुल्ला-मौलवी का अधकचरा ज्ञान भी कम दोशी नहीं है।
2011 की जनगणना के मुताबिक देश की आबादी में  मुसलमानों का हिस्सा बढ. गया है। 2001 में कुल आबादी में मुसलमान 13.4 प्रतिशत थे, जो 2011 में बढ. कर 14.2 प्रतिशत हो गए! असम, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, केरल, उत्तराखंड, हरियाणा और यहां तक कि दिल्ली की आबादी में भी मुसलमानों का हिस्सा पिछले दस सालों में काफी बढ़ा है। असम में 2001 में करीब 31 प्रतिशत मुसलमान थे, जो 2011 में बढ. कर 34 प्रतिशत के पार हो गए, पश्चिम बंगाल में 25.2 प्रतिशत से बढ. कर 27, केरल में 24.7 प्रतिशत से बढ. कर 26.6, उत्तराखंड में 11.9 प्रतिशत से बढ. कर 13.9, जम्मू-कश्मीर में 67 प्रतिशत से बढ. कर 68.3, हरियाणा में 5.8 प्रतिशत से बढ. कर 7 और दिल्ली की आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 11.7 प्रतिशत से बढ. कर 12.9 प्रतिशत हो गया। सन 1961 से 2011 तक की जनगणना के आकड़े आंकड़े बोलते हैं कि गत 50 वर्षों के दौरान भारत में हिंदुओं की आबादी कुछ कम हुई है, जबकि मुसलमानों की कुछ बढ़ी है। यह भीे तथ्य है कि बीते दस सालों के दौरान मुस्लिम और हिंदू आबादी का प्रतिशत स्थिर है। अगर जनसंख्या वृद्धि की यही रफ्तार रही तो मुसलमानों की आबादी को हिंदुओं के बराबर होने में 3626 साल लग जाएंगे। वैसे भी समाजविज्ञानी यह बता चुके हैं कि सन् 2050 तक भारत की आबादी स्थिर हो जाएगी और उसमें मुसलमानों का प्रतिशत 13-14 से अधिक नहीं बनेगा। इन आंकड़ों मे ंयह भी कहा गया है कि जहां हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट 3.16 प्रतिषत है तो मुसलमानेंा में इस दर की गिरावट 4.90 प्रतिषत है। साफ है कि मुसलमानेां की आबादी बढ़ने से रही।
एक हल्ला यह भी रहता है कि मुसलमान औरते 10-10 बच्चे पैदा करती हैं। सन 2005 में किया गया एक षोध बानगी है कि ( आर. बी. भगत और पुरुजित प्रहराज) इस बवाल में कितनी हकीकत है और कितना फसाना। उस समय मुसलमानों में जनन दर (एक महिला अपने जीवनकाल में जितने बच्चे पैदा करती है) 3.6 और हिंदुओं में 2.8 बच्चा प्रति महिला थी। यानी औसतन एक मुस्लिम महिला एक हिंदू महिला के मुकाबले अधिक से अधिक एक बच्चे को और जन्म देती है। यानि दस बच्चो ंवाला गणित कहीं भी तथ्य के सामने टिकता नहीं है।
    भारत सरकार की जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि 1971 से 81 के बीच हिंदुओं की जन्मदर में वृद्धि का प्रतिशत 0.45 था, लेकिन मुसलमानों की जन्मदर में 0.64 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। गत् 20 वर्षों के दौरान मुसलमानों में परिवार नियोजन के लिए नसबंदी का प्रचलन लगभग 11.5 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि हिंदुओं में यह 10 प्रतिशत के आसपास रहा है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि जनसंख्या वृद्धि की दर को सामाजिक-आर्थिक परिस्थितयां सीधे-सीधे प्रभावित करती हैं। शिक्षित व संपन्न समाज में नियोजित परिवार की बानगी हमारे देश में ईसाई जनसंख्या के आंकड़े हैं । सन् 1950 से 60 के बीच भारत में ईसाईयों की जनसंख्या अपेक्षाकृत तेज रफ्तार से बढ़ी थी। भले ही कतिपय लोग इसे धर्माान्तरण के कारण कहें, लेकिन हकीकत यह है कि उस दशक में स्वास्थ्य और शिक्षाओं में सुधार होने के कारण ईसाईयों की मृत्यु दर कम हो गई थी। परंतु जन्म दर उतनी ही थी। 70 के दशक में ईसाईयों की जनसंख्या में बढ़ोतरी का आंकड़ा लगभग स्थिर हो गया, क्योंकि उस समाज को परिवार नियोजन का महत्व समझ में आ गया था। यह प्रक्रिया हिंदुओं में, ईसाईयों की तुलना में थोड़ी देर से शुरू हुई। मुसलमानों में इसे और भी देर से शुरू होना ही था, क्योंकि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मुसलमान समाज बेहद पिछड़ा हुआ है।

PRABAHT 6-9-15
एक बात और गौर करने लायक है कि बांग्लादेश  की सीमा से लगे पश्चिम बंगाल के छह, बिहार के चार और असम के 10 जिलों की आबादी के आंकड़ों पर निगाह डालें तो पाएंगे कि गत 30 वर्षों में यहां मुसलमानों की आबादी बहुत तेजी से बढऱ्ी -इतनी तेजी से कि वहां के बहुसंख्यक हिंदू, अब अल्पसंख्यक हो गए। असम और बंगाल के कुछ जिलों में तो मुस्लिम आबादी का उफान 100 फीसदी से अधिक हे। असल में ये अवैध विदेशी घुसपैठिये हैं। जाहिर है कि ये आबादी भी देश की जनगणना में जुड़ी है और यह बात सरकार में बैठे सभी लोग जानते हैं कि इस बढ़ोतरी का कारण गैरकानूनी रूप से हमारे यहां घुस आए बांग्लादेशी हैं। महज वोट की राजनीति और सस्ते श्रम (मजदूरी) के लिए इस घुसपैठ पर रोक नहीं लग पा रही है, और इस बढ़ती आबादी के लिए इस देश के मुसलमानों को कोसा जा रहा है। इस जंनसंख्या में भी स्पश्ट है कि देष में मुस्लिम आबादी की बढ़ोतरी के सबसे ज्यदा जिम्म्ेदार राज्य बंगाल और असम हैं।
एक यह भी खूब हल्ला होता है कि मुसलमान परिवार नियोजन का विरोध करता है - ‘बच्चे तो अल्लाह की नियामत हैं। उन्हें पैदा होने से रोकना अल्लाह की हुक्म उदूली होता है। यह बात इस्लाम  कहता है और तभी मुसलमान खूब-खूब बच्चे पैदा करते हैं।’ इस तरह की धारणा या यकीन देश में बहुत से लोगों को है और वे तथ्यों के बनिस्पत भावनात्मक नारों पर ज्यादा यकीन करने लगते हैं। वैसे तो जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण साक्षी है कि मुसलमानों की आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि या उनकी जन्म दर अधिक होने की बात तथ्यों से परे है। साथ ही मुसलमान केवल भारत में तो रहते नहीं है या भारत के मुसलमानों की ‘शरीयत’ या ‘हदीस’ अलग से नहीं है। इंडोनेशिया, इराक, टर्की, पूर्वी यूरोप आदि के मुसलमान नसबंदी और परिवार नियोजन के सभी तरीके अपनाते हैं। भारत में अगर कुछ लोग  इसके खिलाफ है तो इसका कारण धार्मिक नहीं बल्कि अज्ञानता और अशिक्षा है। गांवों में ऐसे हिंदुओं की बड़ी संख्या है जो परिवार नियोजन के पक्ष में नहीं हैं।
यदि धार्मिक आधार पर देखें तो इस्लके का परिवार नियोजन विरोधी होने की बात महज तथ्यों के साथ हेराफेरी है।  फातिमा इमाम गजाली की मशहूर पुस्तक ‘इहया अल उलूम’ में पैगंबर के उस कथन की व्याख्या की है, जिसमें वे छोटे परिवार का संदेश देते हैं। हजरत मुहम्मद की नसीहत र्है -‘छोटा परिवार सुगमता है। उसके बड़े हो जाने का नतीजा र्है -गरीबी।’ दसवीं सदी में रज़ी की किताब ‘हवी’ में गर्भ रोकने के 176 तरीकों का जिक्र है। ये सभी तरीके कोई जादू-टोना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक हैं। भारत में सूफियों के चारों इमार्म -हनफी, शाफी, मालिकी और हमबाली समय-समय पर छोटे परिवार की हिमायत पर तकरीर करते रहे हैं।
वैसे तो आज मुसलमानों का बड़ा तबका इस हकीकत को समझने लगा है, लेकिन  दुनियाभर में ‘‘इस्लामिक आतंकवाद’’ के नाम पर खड़े किए गए हौवे ने अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना और उसके कारण संगठत होने को मजबूर किया है। इसका फायदा कट्टरपंथी जमातें उठा रही हैं और इस्लाम की गलत तरीके से व्याख्या कर सीमित परिवार की सामाजिक व धार्मिक व्याख्या के विपरीत तरीके से कर रही हैं। यह तय है कि सीमित परिवर, स्वस्थ्य परिवार और षिक्षित परिवार की नीति को अपनाए बगैर भारत में मुसलमानों की व्यापक हालत में सुधार होने से रहा। लेकिन यह भी तय है कि ना तो मुसलमान कभी बहुसंख्यक हो पाएगा और ना ही इस्लाम सीमित परिवार का विरोध करता है।

पंकज चतुर्वेदी
यू जी-1, 3/186 राजेन्द्र नगर, सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005


शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

Expansion of flood derailing economy of India

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

Now they never come back !

आखिर कब लौटेंगे हमारे लापता फौजी!


1देश की नई पीढ़ी को तो शायद यह भी याद नहीं होगा कि 1971 के पाकिस्तान युद्ध में देश का इतिहास व विश्व का भूगोल बदलने वाले कई रणबांकुरे अभी भी पाकिस्तान की जेलों में नारकीय जीवन बिता रहे है्ं। उन जवानों के परिवारजन अपने लोगों के जिंदा होने के सबूत देते हैं, लेकिन भारत सरकार महज औपचारिकता निभाने से अधिक कुछ नहीं करती है। इस बीच ऐसे फौजियों की जिंदगी पर बालीवुड में कई फिल्में बन गई हैं और उन्हें दर्शकों ने सराहा भी। लेकिन वे नाम अभी भी गुमनामी के अंधेरे में हैं जिन्हें ना तो शहीद माना जा सकता है और ना ही गुमशुदा । भारत-पाक रिश्तों के लिए भारत हर समय ‘शिमला समझौत’ के अनुरूप बगैर किसी मध्यस्थ के बातचीत की दुहाई देता रहा है। यह बिडंबना भी है और शर्मनाक भी कि जिन फौजियों के खून से शिमला समझौते की इबारत लिखी गई थी, उन्हें सरकार और समाज दोनों भुला बैठे हैं। जब कभी भी पाकिस्तान से हमारे मधुर संबंधों की बात आती है, तब सीमा पर घुसपैठ और आतंकवाद या फिर व्यापार बढ़ाने पर जोरशोर से चर्चा होती है,
Peoples Samachar 3-9-15
लेकिन हमारी सरकार उन 70 रणबाकुरों को पूरी तरह बिसरा चुकी है, जिन्होंने 1965 और 1971 में इस देश की एकता-अखंडता का जिम्मा उठाया था व आज तक उनका कोई अता-पता नहीं है। हर साल संसद में यह स्वीकार किया जाता रहा है कि पाकिस्तान की जेलों में हमारे 70 सैनिक लापता हैं। जिनमें से 54 जवान 1971 के युद्ध बंदी हैं । उम्मीद के हर कतरे की आस में तिल-दर-तिल घुलते इन जवानों के परिवारजनए अब लिखा-पढ़ी करके थक गए हैं। 1971 के युद्ध के दौरान जिन 54 फौजियों के पाकिस्तानी गुनाहखानों में होने के दावे हमारे देशवासी करते रहे हैं, उनमें से 40 का पुख्ता विवरण उपलब्ध हैं । इनमें 6-मेजर, 1-कमाडंर, 2 लाइंग आफिसर, 5 कैप्टन, 15 μलाईट लेμिटनेंट, 1 सेकंड ला.लेट, 3 स्क्वाड्रन लीडर, 1 नेवी पालयट कमांडर, 3 लांसनायक, और 3 सिपाही हैं। एक लापता फौजी मेजर अशोक कुमार सूरी के पिता डॉ आरएलएस सूरी के पास तो कई पक्के प्रमाण हैं, जो उनके बेटे के पाकिस्तानी जेल में होने की कहानी कहते हैं। डॉ सूरी को 1974 व 1975 में उनके बेटे के दो पत्र मिले, जिसमें उसने 20 अन्य भारतीय फौजी अफसरों के साथ, पाकिस्तान जेल में होने की बात लिखी थी। 1979 में डॉ सूरी को किसी अंजान ने फोन करके बताया कि उनके पुत्र को पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश की किसी भूमिगत जेल में भेज दिया गया है। पाकिस्तान जेल में कई महीनों तक रहने के बाद लौटे एक भारतीय जासूस मोहन लाल भास्कर ने, लापता विंग कमांडर एचएस गिल को एक पाक जेल में देखने का दावा किया था। लापता μलाईट लैμिटनेंट वीवी तांबे को पाकिस्तानी फौज द्वारा जिंदा पकड़ने की खबर, ‘संडे पाकिस्तान आबजर्वर’ के पांच दिसंबर 1971 के अंक में छपी थी। वीर तांबे का विवाह बेडमिंटन की राष्टÑीय चैंपियन रहीं दमयंती से हुआ था । सेकंड लेμिटनेंट सुधीर मोहन सब्बरवाल जब लड़ाई के लिए घर से निकले थे, तब मात्र 23 वर्ष के थे । कैप्टन रवीन्द्र कौरा को अदभ्य शौर्य प्रदर्शन के लिए सरकार ने ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया था, लेकिन वे अब किस हाल में और कहां हैं, इसका जवाब देने में सरकार असफल रही है । पाकिस्तान के मरहूम प्रधानमंत्री जुल्फकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के तथ्यों पर छपी एक किताब भारतीय युद्धवीरों के पाक जेल में होने का पुख्ता सबूत मानी जा सकती है। बीबीसी संवाददाता विक्टोरिया शोफील्ड की किताब ‘भुट्टो: ट्रायल एंड एक्सीक्यूशन’ के पेज 59 पर भुट्टो को फांसी पर लटकाने से पहले कोट लखपतराय जेल लाहौर में रखे जाने का जिक्र है। किताब में लिखा है कि भुट्टो को पास की बैरक से हृदयविदारक चीख पुकार सुनने को मिलती थीं । भुट्टो के एक वकील ने पता किया था कि वहां 1971 के भारतीय युद्ध बंदी है। जो लगातार उत्पीड़न के कारण मानसिक विक्षिप्त हो गए थे। संयुक्त राष्ट के विएना समझौते में साफ जिक्र है कि युद्ध के पश्चात, रेडक्रॉस की देखरेख में तत्काल सैनिक अपने-अपने देश भेज दिए जाएंगे । दोनों देश आपसी सहमति से किसी तीसरे देश को इस निगरानी के लिए नियुक्त कर सकते हैं। इस समझौते में सैनिक बंदियों पर क्रूरता बरतने पर कड़ी पाबंदी है। लेकिन भारत-पाक के मसले में यह कायदा-कानून कहीं दूरदूर तक नहीं दिखा । 1972 में अंतरराष्टÑीय रेडक्रास ने भारतीय युद्ध बंदियों की तीन लिस्ट जारी करने की बात कही थी । लेकिन सिर्फ दो सूची ही जारी की गई । गुमशुदा μलाइंग आफिसर सुधीर त्यागी के पिता आरएस त्यागी का दावा है कि उन्हें खबर मिली थी कि तीसरी सूची में उनके बेटे का नाम था। लेकिन वो सूची अचानक नदारद हो गई । विएना समझौता के तहत सैनिकों के मारे जाने बाबत जो प्रमाण होने चाहिए,पाकिस्तान सरकार उनमें से एक भी प्रमाण इन 54 जवानों के लिए दे नहीं पाई है। अलबत्ता उनके पाकिस्तान सरकार ने लापता फौजियों को जेल में पहचानने के लिए एक भारतीय प्रतिनिधि मंडल को आने का न्यौता दिया था । पाकिस्तान के मानवाधिकर कार्यकतार्ओं को भी जेल दिखाने के नाटक किए जाते रहे। लेकिन अपनी एक गलती छुपाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने भारतीय अभिभावकों के सामने 160 साधारण भारतीय बंदी शिनाख्त के लिए पेश किए गए। इनमें से एक भी फौजी नहीं था। जेल अधिकारियों ने ही दबी जुबान में कह दिया कि उन्हें गलत जगह भेजा गया है। भारत की सरकार लापता फौजियों के परिवारजनों को सिर्फ आस दिए हैं कि उनके बेटे-भाई जीवित हैं । लेकिन कहां है किस हाल में हैं ? कब व कैसे वापस आएंगे? इसकी चिंता ना तो हमारे राजनेताओं को है और ना ही आला फौजी अफसरों को। काश 1971 की लड़ाई जीतने के बाद भारत ने पाकिस्तान के 93,000 बंदियों को रिहा करने से पहले अपने एक-एक आदमी को वापस लिया होता। पूरे पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंहराव भी भूल चुके थे कि उन्होंने जून 90 में बतौर विदेश मंत्री एक वादा किया था कि सरकार अपने बहादुर सैनिक अधिकारियों को वापिस लाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं । लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के दौरान अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर कीमत चुकाने की व्यस्तता में उन्हें उन 70 सैनिक परिवारों के आंसुओं की नमी का एहसास नहीं हुआ । भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि हमारी फौज के कई जवान पाक जेलों में नारकीय जीवन भोग रहे हैं। करनाल के करीम बख्श और पंजाब के जागीर सिंह का पाक जेलों में लंबी बीमारी व पागलपन के कारण निधन हो गया। 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान द्वारा युद्ध बंदी बनाया गया सिपाही धर्मवीर 1981 में जब वापस आया तो पता लगा कि यातनाओं के कारण उसका मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है। सरकार का दावा है कि कुछ युद्ध बंदी कोट लखपतराय लाहौर, फैसलाबाद, मुलतान, मियांवाली और बहावलपुर जेल में है । 39 साल के लंबे अंतराल में हमारा लंबा चौड़ा प्रशासनिक व गुप्तचर-तंत्र, उन वीरों की वापसी तो दूर की बात है, वो प्रमाण भी सरकारी तौर पर मुहैया नहीं करवा पाया है, जिसके बूते पर हमारे जवानों के सलामत पाकिस्तानी जेल में होने का दावा अंतरराष्टय स्तर पर किया जा सके। ऊपर से हर साल संसद में उनके जीवित होने का दावा करके यादों में खोए उनके परिवारजनों को पुन: छटपटाने को मजबूर किया जाता रहा है । या तो सरकार उन जवानों के वीरगति को प्राप्त होने की घोषणा कर दें, ताकि उनके परिवारजन रो- धोकर संतोष कर लें। अपने लाड़लों की आत्मा की शांति हेतु धार्मिक कर्मकांडों से निवृत हो जाएं। या फिर उनको वापिस लाने का कोई समयबद्ध कार्यक्रम तय किया जाए। सरकार को जान लेना चाहिए कि फौजी जवानों को राजनैतिक दांवपेंच का मोहरा बनाना आने वाले दिनों में देश की एकतां अखंडता के लिए घातक हो सकता है। आज जब अमेरिका के दवाब में भारत- पाक संबंधों की मधुरता के लिए मुददे नए सिरे से तय हो रहे हैं, तब हरेक राष्टवादी राजनेता का यह पहला कर्तव्य है कि उन मुददों में हमारे रणबांकुरों की सकुशल वापसी की शर्त को प्राथमिकता से शामिल किया जाए ।

रविवार, 30 अगस्त 2015

PANI WALE MASTER JI . (Teacher on the work of water awareness )

पानी वाले मास्टरजी



Author: 
 पंकज चतुर्वेदी

शिक्षक दिवस पर विशेष


.‘‘अरे जल्दी से टोटी बन्द कर ले, मास्टरजी आ रहे हैं।’’ ऐसी पुकार गाज़ियाबाद के आसपास के गाँवों में अक्सर सुनाई दे जाती है। त्रिलोक सिंह जी, गाज़ियाबाद से सटे गाँव गढ़ी के हैं। गाज़ियाबाद के सरस्वती विद्या मन्दिर में अंग्रेजी के अध्यापक हैं, लेकिन क्या स्कूल और क्या समाज, उनकी पहचान ही ‘पानी वाले मास्टरजी’ की हो गई है।

बीते दस सालों में मास्टरजी भी सौ से ज्यादा गाँवों में पहुँच चुके हैं, पाँच हजार से ज्यादा ग्रामीणों और दस हजार से ज्यादा बच्चों के दिल-दिमाग में यह बात बैठ चुके हैं कि पानी किसी कारखाने में बन नहीं सकता और इसकी फिजूलखर्ची भगवान का अपमान है। उनकी इस मुहिम में उनकी पत्नी श्रीमती शोभा सिंह भी महिलाओं को समझाने के लिये प्रयास करती हैं।

त्रिलोक सिंह जी अपने विद्यालय में बेहद कर्मठता से बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं और उसके बाद बचे समय के हर पल को अपने आसपास इस बात का सन्देश फैलाने में व्यतीत करते हैं कि जल नहीं बचाया तो जीवन नहीं बचेगा। मास्टर त्रिलोक सिंह जी ना तो किसी संस्था से जुड़े हैं और ना ही कोई संगठन बनाया है.... बस लोग जुड़ते गए कारवाँ बनता गया.... की तर्ज पर उनके साथ सैंकड़ों लोग जुड़े गए हैं।

घर से आर्थिक रूप से सम्पन्न श्री त्रिलोक सिंह जी ने अंग्रेजी में एमए और फिर बीएड करने के बाद सन् 1998 में एक शिक्षक के रूप में समाज की सेवा करने का संकल्प लिया। उन्होंने अपना गाँव गढ़ी नहीं छोड़ा व वहीं से गाज़ियाबाद आना-जाना जारी रखा। बात सन् 2006 की गर्मियों की थी, गढ़ी गाँव में हर घर में सबमर्सिबल पम्प लग रहे थे। लेकिन बिजली का संकट तो रहता ही था। जैसे ही बिजली आती, सारा गाँव अपने-अपने पम्प खोल लेता, कोई कार धोता तो कोई भैंसे नहलाता।

गाँव की पुरानी जोहड़ों पर अवैध कब्जे हो चुके थे, सो बहते पानी को जाने का कोई रास्ता नहीं होता था। सारा पानी ऐसे ही गलियों में जमा हो जाता। बिजली जाती तो पूरे गाँव में पानी का संकट हो जाता, बस तभी मास्टरजी के दिमाग में यह बात आई कि हम जिस पानी को निर्ममता से फैला रहे हैं वह बड़ी मुश्किल से धरती की छाती चीर कर उपजाया जा रहा है और इसकी भी एक सीमा है।

श्री सिंह ने सबसे पहले इस बात को अपनी पत्नी को समझाया। मास्टरजी के अनुसार,‘‘पत्नी को समझाना बेहद कठिन होता है, सो सबसे पहले मैंने अपनी पत्नी को ही बताया कि जरूरत से ज्यादा पानी बहाना अच्छी बात नहीं है। जब वह समझ गई तो पास-पड़ोस को बताया फिर मुहल्ले को और उसके बाद पूरे गाँव को यह समझाने में दिक्कत नहीं हुई।’’

श्री सिंह बताते हैं कि पहले जब हैण्डपम्प थे तो लोग बस अपनी जरूरत का पानी निकालते थे, लेकिन बिजली की मोटर के कारण एक बाल्टी पानी की जरूरत पर दो बाल्टी फैलाने लगे हैं। मास्टर त्रिलोक सिंह ने अपने गाँव गढ़ी के बाद उस गाँव को चुना जहाँ से उन्होंने प्राइमरी स्कूल किया था, यानी सिकरोड। फिर तो यह सिलसिला चल निकला। रजापुर ब्लाक के 32 गाँव, मुरादनगर के 36 और भोजपुर के दस गाँवों में मास्टरजी की चौपाल हो चुकी है।

वहाँ पानी व्यर्थ ना बहाने, पारम्परिक जोहड़ व तालाबों के संरक्षण और भूजल के बचाने की बात जीवन का मूलमंत्र बन चुकी है। कई गाँवों के प्रधानों ने अपने तालाब-जोहड़ से अतिक्रमण हटवाए, उन पर बाउंड्री वाल बनवाई। श्री सिंह के प्रयासों से जल संरक्षण के कई मामले राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) भी गए। स्वयं उनके गाँव गढ़ी में तालाब की ज़मीन पर पानी की टंकी बनाने के मामले में एनजीटी सरकरी टंकी को हटाने के आदेश दे चुकी है।

श्री सिंह इन दिनों पारम्परिक बम्बे यानि नालों में अविरल जल बहाव के लिये संघर्ष कर रहे हैं। सुल्तानपुर, असालतपुर, सिकरोड, हरसावा से गुजरने वाले पारम्परिक बम्बे के बन्द होने से बारिश के पानी के प्रवाह में दिक्कत हो रही है। मास्टरजी अब उन गाँवों में जाकर श्रमदान के जरिए नाले को खोलने पर काम कर रहे हैं।

मास्टरजी अपने स्कूल के बच्चों को छोटी-छोटी आदतें डलवाते हैं-जैसे स्कूल से घर लौटने पर यदि पानी की बोतल में पानी शेष हो तो उसे नाली में बहाने की जगह गमलों में डालना, अपने घर में वाहन धोने के लिये पाइप के स्थान पर बाल्टी का इस्तेमाल, गिलास में उतना ही पानी लेना जितनी प्यास हो।

दिसम्बर-2014 में त्रिलोक सिंह जी ने गाज़ियाबाद शहर में हजारों बच्चों की एक जागरुकता रैली निकाली, जिसके समापन पर कलेक्टर को ज्ञापन देकर भूजल के व्यावसायिक देाहन कर रहे टैंकर माफ़िया पर कड़ाई से रोक की माँग की गई और उसका असर भी हुआ।

‘‘आप स्कूल में शिक्षण के बाद इतना समय कैसे निकाल लेते हैं?’’ इस प्रश्न के जवाब में श्री सिंह कहते है, ‘‘मैं बच्चों को कभी ट्यूशन नहीं पढ़ाता। स्कूल के बाद जो भी समय बचता है या घर से स्कूल आने-जाने के रास्ते में जब कभी, जहाँ कहीं भी अवसर मिलता है, मैं लोगों को जल संरक्षण का सन्देश देने में अपना समय लगाता हूँ। यही मेरा शौक है और संकल्प भी।’’

मास्टर त्रिलोक सिंह बानगी हैं कि विद्यालय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की बात करने के लिये किसी पाठ्यक्रम या पुस्तकों से ज्यादा जरूरत है एक दृढ़ इच्छा शक्ति व स्वयं अनुकरणीय उदाहरण बनने की।

शनिवार, 29 अगस्त 2015

Billionaires God of hungry worshipers

Prabhat, Meerut, 30-8-15

भूखे भक्तों ंके ‘कुबेर’ देवता

mp Jansandesh , Satna 29-8-15
                                                                      पंकज चतुर्वेदी

भारत आज भी सोने की चिडि़या है, लेकिन उसका सोना व धन भगवान के पास बंधेज रखा है। असलियत में यदि भारत के ‘‘भगवान’’ अपना खजाना खोल दे ंतो चुटकी बजाते ही भुखमरी, कर्ज, बेरोजगारी, अषिक्षा जैसी समयाएं दूर हो जाएंगी। संसाधन जुटने लगेंगे।  याद करें महाराश्ट्र का मेलघाट इलाका बीते कई सालों से कुपेाशण के कारण षिषुओं की मौत की त्रासदी से जूझ रहा है। देष की 43 फीसदी आबदी के कुपोशणग्रस्त होना वास्तव में राश्ट्रीय षर्म की  बात है। भरपेट भोजन के लिए तरस रहे मेलघाट से कुछ ही किलोमीटर दूर है साईंबाबा का स्थान षिरडी जिसकी सालाना आय 210 करोड़ रूपए है। मंदिर के पास 32 करोड़ के तो सोना-चांदी के वो आभूशण हैं जो भक्तों ने वहां चढ़ाए हैं। प्रदेष के सबसे अमीर मंदिर की कुल संपत्ति 450 करोड़ से अधिक है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि जिस साईंबाबा को भक्त सोने-हीरे के मुकुठ व चांदी की पालकी में बैठाने पर तुले हैं, उन्होंने अपाना पूरा जीवन एक जीर्ण-षीर्ण इमारत में टाट के टुकड़े के साथ व्यतीत किया था। इसी प्रदेष की राजधानी मुंबई का सिद्धीविनायक मंदिर भी वीआईपी धार्मिकस्थल है, जिसकी सालाना आय 46 करोड़ के पार है। मंदिर के पास 125 करोड़ के तो फिक्स डिपोजिट ही हैं। ये तो वे मंदिर हैं जो बीते दो दषकों के दौरान ज्यादा चर्चा में आए और इन्हें मध्यवर्ग के पसंदीदा तीर्थ कहा जाता है। देष के यदि प्राचान मंदिरों की ओर देखें तो इतनी दौलत वहां अटी पड़ी है कि वह देष की दो पंचवर्शीय योजना में भी खर्च नहीं की जा सकती है। सुनने में आया है कि केंद्र सरकार अब स्वयंभु भगवानों की अकूत दौलत पर जांच करवाने जा रही है। कम से कम एक बार मंदिरों की कुल संपत्त् िका आकलन तो होना चाहिए ताकि यह धन भारत की समृद्धि का अंतरराश्ट्रीय मापदंड बन सके।
दक्षिण भारत के प्रसिद्ध तिरूमला मंदिर की कुल संपति, मुल्क के सबसे अमीर मुकेष अंबउानी के पूरे व्यापारकि साम्राज्य से भी ज्यादा है। भारत में 10 लाख से ज्यादा मंदिर हैं, तिस पर कतिपय लोग यह कहते नहीं अघाते हैं कि विदेषी-मुसलमान हमलावरों ने भारत के मंदिरों को खूब लूटा व नश्ट किया। देष के सौ मंदिर ऐसे हैं जिनके सालाना चढ़ावे में इताना धन आता है कि वह भारत सरकार के सालाना बजट की कुल योजना व्यय के बराबर होता है। देष के दस मंदिरों की कुल संपत्ति देष के सबसे अधिक धनवान 500 लोगों की कुल संपदा के बराबर हैै।  मंदिरों का अभी तक उपलब्ध रिकार्ड के अनुसार कुल सात अरब डालर का सोना यहां धर्म के नाम पर जुड़ा हुआ है। केरल के पद्मनाभ मंदिर के केवल एक तहखाने से पांच लाख करोड़ के हीरे, जवाहरात, आभूशण मिले हैं। त्रावनकोर रियासत के इस मंदिर की सुरक्षा में अब ब्लेक कैट कमांडो तैनात हैं, मामला अदालतों में चल रहा है। कहा जा रहा है कि यदि सभी तहखाने खोल दिए जाएं तो उसमें इतनी दौलत है कि षायद रिजर्व बैंक के पास भी इतनी मुद्रा-क्षमता नहीं होगी। उड़ीसा के बड़ा हिस्सा लगातार भुखमरी और अकाल का षिकार रहता है। कालाहांडी से बामुष्किल 250 किलोमीटर दूर पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भी कई ऐसे कमरे हैं जिनमें छिपी संपदा अकूत है। पिछले साल वहां के एक कमरे को अनजाने में खोला गया तो उसमें कई टन चांदी की सिल्लियां निकली थीं। फिर आस्थाओं का वास्ता दे कर वहां के खजाने को उजागर होने से रोक दिया गया। केरल के त्रिषूर जिले के सबरीमाला पहाडि़यों के बीच स्थित कृश्ण भगवान के गुरूवायूर मंदिर की सालाना आय कई करोड़ हे। मंदिर के नाम से बैंक में 125 करोड़ के फिक्स डिपोजिट हैं। आंध्रप्रदेष के तिरूपति बालाजी को विष्व का सबसे अमीर मंदिर माना जाता है। इसके खजाने में आठ टन जेवर हैं। इसकी सालाना आय 650 करोड़ हे। बैंकों में मंदिर की ओर से 3000 किलो सोना और 1000 करोड़ के फिक्स जमा किए गए हैं। यहां औसतन हर रोज साठ हजार से एक लोख लोग आते हैं। अकेले पैसों की गनती के लिए वहां 20 लोग काम करते हैं। यहां क संपत्ति भारत के कुल बजट का पचासवां हिस्सा है। यानी जितना पैसा देष के एक सौ बीस करोड़ लोगों के लिए मयस्सर है  उसके पचासवे हिस्से पर केवल एक किलोमीटर में फैले तिरूपति मंदिर का हक है। यहां यह बता दें कि कर्नाटक में येदुरप्पा की कुर्सी खाने वाले अवैध खनिज कांड के खलनायक रेड्डी बंधुओं ने पिछले ही साल यहां  16 किलो वजन का सोने का मुकुट चढ़या था, जिसकी कीमत उस समय पैंतालीस करोड़ आंकी गई थी। यह बानगी है कि इन मंदिरों का खजाना किस तरह की कमाई से भरा जाता है। 
प्रत्येक देष अपने पास सोने का एक आरक्षित भंडार रखता है जो उसके रसूख व आपात स्थिति में सहारा देता है। भारत के पास ऐसा रिजर्व गोल्ड 557.7 टन है, जबकि अमेरिका के पास यह रिजर्व स्टाक 8133.5 टन है। जान कर आंखे खुली रहा जाएंगी कि भारत के कुछ मंदिरों में जाहिरा तौर पर 22 हजार टन सोना है। यानि अमेरिका के रिजर्व स्टाक से ढाई गुणा व भारत के स्टाक से 4000 गुणा ज्यादा। अनुमान है कि इस सोने की कीमत पचास हजार करोड होगी। यदि इसे देष के हर इंसान में बांटा जाए तो प्रत्येक को 40 हजार मिलेंगे।वहीं इससे भारत का पूरा विदेषी कर्जा उतर सकता है।
तिरूपति के बाद सबसे अमीर मंदिरों में जम्मू के कटरा से उपर पहाड़ों पर स्थित वैश्णो देवी मंदिर का नाम आता है। यहां आने वाले श्रद्धांलुओं की संख्या तिरूपति के आसपास ही है।  यह मंदिर अपेक्षाकृत नया है, लेकिन इसकी आय सालाना पाचं सौ करोड़ को पार कर चुकी है।  ऐसा नहीं कि मंदिरों के धनवान होने में उनके पुरातन होने का केाई योगदान होता हे। दिल्ली के अक्षरधाम मदिर को ही लें, इसकी आय देखते ही देखते कई करोड़ सालाना हो गई हे। उज्जैन के महाकालेष्वर, गुजरात का द्वारिकाधीष व सोमनाथ मंदिर, मथुरा के द्वारिकाधीष व जन्मभूमि मंदिरों, बनारस के बाबा विष्वनाथ, गोहाटी की कामाख्या देवी जैसे कई ऐसे मंदिर हैं जहां की आय-व्यय पर सरकार का दखल बहुत कम है। ये धार्मिक स्थल घनघोर अव्यवस्थओं और नागरिक-सुविधाओं के नाम पर बेहद दीन-हीन हैं, लेकिन उनकी हर दिन की चढ़ौअत कई-कई गांवों के हजारों घरों का चूल्हा जलाने के बराबर है।
लोगों द्वारा आस्था से चढ़ाए गए चंदे के इस्तेमाल की हकीकत  उनके आॅडिट द्वारा सामने आती है।, हालांकि मंदिर कभी भी अपना आय-व्यय सार्वजनिक नहीं करते और समय-समय पर वहां के धन का राजनीतिक कार्यों में दुरूप्योग की खबरें भी आती हैं।  देष के चुनिंदा कुछ मंदिरों का आर्थिक लेखा-जोखा बताता है कि करोड़ों करोड़ की कमाई का बामुष्किल 1.40 प्रतिषत पैसा मंदिर के रखरखाव पर व्यय होता है।  भक्तों की भगवान को समर्पित निधि में से 28 टका तो वहां काम कर रहे कर्मचारियों के वेतन पर जाता है, जबकि दान या सार्वजनिक काम पर कोई सात फीसदी व्यय होता है। सबसे ज्यादा व्यय 33 प्रतिषत ‘‘अन्य’’ मद में होता है जो सबसे ज्यदा संदेह पैदा करता है।
धन जुटाने में ‘‘जिंदा भगवान’’ भी पीछे नहीं हैं।  पिछले सालों पुट्टापर्थी के सत्य साईं बाबा के निधन के बाद खुलासा हुआ था कि अकेले उनके कमरे से ही 40 करोड़ नगद और 77 लाख के जेवरात मिले थे। सत्य साइं्र बाबा की विरासत कई हजार करोड़ की है। विदेषों से काला धन लाने के नाम पर आंदोलनरत बाबा रामदेव के पास कई हजार एकड़ जमीन है और उन्हांेने महज दस सालों में 1100 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर लिया है। राधा स्वामी, व्यास की पूरे देष में सत्संग के नाम पर इतनी जमीन है कि उसकी कुल कीमत कई हजार करोड़ होगी। हाल ही में चर्चा में रहे हरियाणा के रामपाल की व्यापारिक साम्राज्य चैंकाने वाला है। महर्शि महेष योगी का वित्तीय-साम्राज्य की तो गणना ही नहीं हो सकी। राधे मां का  धन-संसार एक हजार करोड़ का है तो आषुमल यानि आषाराम के पास अरबों की तो केवल जमीने ही है।।
ऐसा नहीं है कि केवल हिंदु मत के भगवान ही संपत्ति जोड़ने मे ंयकीन रखते हैं, सिखों के गुरूद्वारे , विषेश रूप से अमृतसर का हरिमिंदर साहेब या स्वर्ण मंदिर, दिल्ली का बंगला सोहब व षीषगंज भी भक्तों की चढ़ौत से मालामाल रहते हैं। बोधगया के मंदिर में भी अकूत दौलत है। जैनियो ंके मंदिर तो वैभव का भंडार होते हैं।  देष की मस्जिदों की बीते साल में  अचानक सूरत बदलना भी गौरतलब है। वैसे अजमेर षरीफ, मुंबई की हाजी मलंग  व दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह पर अच्छी-खासी चढ़ौत आती है।
क्या कभी कोई यह कहने की हिम्मत जुटा पाएगा कि देष के सामने भगवान के कारण खडे हुए इतने बड़े संकट से जूझने के लिए मंदिरों में बंद अकूत खजानों के इस्तेमाल का रास्ता खोले ? क्या कभी र्काइे इन अरबपति मंदिरों को उनके सामाजिक सरोकारों का ध्यान दिलवा कर वहां आ रह कमाई को षिक्षा, स्वास्थय, भ्ूाख जैसे  कार्यों पर खर्च करने के लिए प्रेरित करेगा? यह सही है कि कुछ धार्मिक संस्थाएंव बाबा-बैरागी इस दिषा में कुछ ऐसे काम करते हैं, लेकिन उनका योगदान उनकी कमाई की तुलना में राई बराबर ही होता है। और क्या कभी कोई यह कर पाएगा कि मंदिरों व अन्य धार्मिक स्थलों पर चढ़ौत चढ़ाने वाले से यह सुनिष्चित करने को कहा जाएगा कि उसके द्वारा चढ़ाई गई रकम दो-नंबरे की आय का हिस्सा नहीं है?ें
पंकज चतुर्वेदी
यू जी -1 ए 3/186, राजेन्द्र नगर सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
संपर्क: 9891928376, 011- 26707758(आफिस),

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

Fishermen of Pakistan and India: In enemy waters

सीमा विवाद में नरक भोगते मछुआरे

                                                                     पंकज चतुर्वेदी


RAJ EXPRESS M.PM. 29-8-15
‘‘इब्राहीम हैदरी(कराची)का हनीफ जब पकड़ा गया था तो महज 16 साल का था, आज जब वह 23 साल बाद घर लौटा तो पीढि़यां बदल गईं, उसकी भी उमर ढल गई। इसी गांव का हैदर अपने घर तो लौट आया, लेकिन वह अपने पिंड की जुबान ‘‘सिंधी’’ लगभग भूल चुका है, उसकी जगह वह हिंदी या गुजराती बोलता है। उसके अपने साथ के कई लोगों का इंतकाल हो गया और उसके आसपास अब नाती-पोते घूम रहे हैं जो पूछते हैं कि यह इंसान कौन है।’’ उफा में हुई भारत-पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच की वार्ता के बाद दोनों देषों की जेलों में बंद मछुआरों की हो रही रिहाई के साथ ही ऐसी कई कहानियां सामने आ रही हैं। दोनों तरफ लगभग एक से किस्से हैं, दर्द हैं- गलती से नाव उस तरफ चली गई, उन्हें घुसपैठिया या जासूस बता दिया गया, सजा पूरी होने के बाद भी रिहाई नहीं, जेल का नारकीय जीवन, साथ के कैदियों द्वारा षक से देखना, अधूरा पेट भोजन, मछली पकड़ने से तौबा....। एक दूसरे देष के मछुआरों को पकड़ कर वाहवाही लूटने का यह सिलसिला ना जाने कैसे सन 1987 में षुरू हुआ और तब से तुमने मेरे इतने पकड़े तो मैं भी तुम्हारे उससे ज्यादा पकडूंगा की तर्ज पर समुद्र में इंसानों का षिकार होने लगा।
न्‍यू ब्राईट टाईम्‍स गुडगावं 30 अगस्‍त 15
भारत और पाकिस्तान में साझा अरब सागर के किनारे रहने वाले कोई 70 लाख परिवार सदियों से समु्रद से निकलने वाली मछलियों से अपना पेट पालते आए हैं। जैसे कि मछली को पता नहीं कि वह किस मुल्क की सीमा में घुस रही है, वैसे ही भारत और पाकिस्तान की सरकारें भी तय नहीं कर पा रही हैं कि आखिर समु्रद के असीम जल पर कैसे सीमा खींची जाए।  कच्छ के रन के पास सर क्रकी विवाद सुलझने का नाम नहीं ले रहा है। असल में वहां पानी से हुए कटाव की जमीन को नापना लगभग असंभव है क्योंकि पानी से आए रोज जमीन कट रही है और वहां का भूगोल बदल रहा है।  देानेां मुल्कों के बीच की कथित सीमा कोई 60 मील यानि लगभग 100 किलोमीटर में विस्तारित है। कई बार तूफान आ जाते हैं तो कई बार मछुआरों को अंदाज नहीं रहता कि वे किस दिषा में जा रहे हैं, परिणामस्वरूप वे एक दूसरे के सीमाई बलों द्वारा पकड़े जाते हैं। कई बार तो इनकी मौत भी हो जाती है व घर तक उसकी खबर नहीं पहुंचती।
जब से षहरी बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही बढ़ी है तब से गोदी के कई-कई किलोमीटर तक तेल रिसने ,षहरी सीवर डालने व अन्य प्रदूशणों के कारण समु्रदी जीवों का जीवन खतरे में पड़ गया है। अब मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए बस्तियों, आबादियों और बंदरगाहों से काफी दूर निकलना पड़ता है। जो खुले समु्रद में आए तो वहां सीमाओं को तलाषना लगभग असंभव होता है और वहीं देानेां देषों के बीच के कटु संबंध, षक और साजिषों की संभावनाओं के षिकार मछुआरे हो जाते है।। जब उन्हें पकड़ा जाता है तो सबसे पहले सीमा की पहरेदारी करने वाला तटरक्षक बल अपने तरीके से पूछताछ व जामा तलाषी करता है। चूंकि इस तरह पकड़ लिए  गए लोगों को वापिस भेजना सरल नहीं है, सो इन्हें स्थानीय पुलिस को सौंप दिया जाता है। इन गरीब मछुआरों के पास पैसा-कौडी तो होता नहीं, सो ये ‘‘गुड वर्क’’ के निवाले बन जाते हैं। घुसपैठिये, जासूस, खबरी जैसे मुकदमें उन पर होते है।। वे दूसरे तरफ की बोली-भाशा भी नहीं जानते, सयो अदालत में क्या हो रहा है, उससे बेखबर होते है।। कई बार इसी का फायदा उठा कर प्रोसिक्यूषन उनसे जज के सामने हां कहलवा देता है और वे अनजाने में ही देषद्रोह जैसे अरोप में पदोश बन जाते हैं। कई-कई सालों बाद उनके खत  अपनों के पास पहुंचते है।। फिर लिखा-पढ़ी का दौर चलता है। सालों-दषकों बीत जाते हैं और जब दोनों देषेां की सरकारें एक-दूसरे के प्रति कुछ सदेच्छा दिखाना चाहती हैं तो कुछ मछुआरों को रिही कर दिया जाता है। पदो महीने पहले रिहा हुए पाकिस्तान के मछुआरों के एक समूह में एक आठ साल का बच्चा अपने बाप के साथ रिहा नहीं हो पाया क्योंकि उसके कागज पूरे नहीं थे। वह बच्चा आज भी जामनगर की बच्चा जेल में है। ऐसे ही हाल ही में पाकिस्तान द्वारा रिहा किए गए 163 भारतीय मछुआरों के दल में एक दस साल का बच्चा भी है जिसने सौंगध खा ली कि वह भूखा मर जाएगा, लेकिन मछली पकड़ने को अपना व्यवसाय नहीं बनाएगा।
यहां जानना जरूरी है कि दोनेां देषों के बीच सर क्रीक वाला सीमा विवाद भले ही ना सुलझे, लेकिन मछुआरों को इस जिल्ल्त से छुटकारा दिलाना कठिन नहीं है। एमआरडीसी यानि मेरीटाईम रिस्क रिडक्षन सेंटर की स्थापना कर इस प्रक्रिया को सरल किया जा सकता है। यदि दूसरे देष का कोई व्यक्ति किसी आपत्तिजनक वस्तुओं जैसे- हथियार, संचार उपकरण या अन्य खुफिया यंत्रों के बगैर मिलता है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। पकड़े गए लोगों की सूचना 24 घंटे में ही दूसरे देष को देना, दोनों तरफ माकूल कानूनी सहायत मुहैया करवा कर इस तनाव को दूर किया जा सकता है। वैसे संयुक्त राश्ट्र के समु्रदी सीमाई विवाद के कानूनों यूएनसीएलओ में वे सभी प्रावधान मौजूद हैं जिनसे मछुआरों के जीवन को नारकीय होने से बचाया जा सकता है। जरूरत तो बस उनके दिल से पालन करने की है।


The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

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