My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

WHY TRIBES OF BASTAR HAVE NO FAITH IN KHAKI UNIFORM



अविश्‍वास पर टिके पुलिस-तंत्र के बस का नहीं है नक्सलवाद से निबटना।

                                                                                    पंकज चतुर्वेदी
पिछले एक साल में यह आठवां हमला है सुरक्षा बलों पर। एक राज्य के एक छोटे से हिस्से में(हालांकि यह हिस्सा केरल राज्य के क्षेत्रफल के बराबर है ) स्थानीय पुलिस, एसटीएफ, सीआरपीएफ और बीएसएफ की कई टुकडि़यां मय हेलीकाॅप्टर के तैनात हैं और हर बार लगभग पिछले ही तरीके से सुरक्षा बलों पर हमला होता है। नक्सली खबर रखते हैं कि सुरक्षा बलों की पेट्रोलिंग पार्टी कब अपने मुकाम से निकली व उन्हें किस तरफ जाना है।, वे खेत की मेंढ तथा ऊंची पहाड़ी वाले इलाके की घेराबंदी करते हैं और जैसे ही सुरक्षा बल उनके घेरे के बीच पहुंचते है।, अंधाधुंध फायरिंग करते हैं। इस बार यह हमला पिठमेल के पास हुआ है जिसमें एक कंपनी कमांडर सहित सात जवान शहीद हुए। विडंबना यह है कि पिछले सात सालों में ठीक इसी तरह नक्सली छुप कर सुरक्षा बलों को फंसाते रहे हैं और वे खुद को सुरक्षित स्थानों पर ऊंचाई में अपनी जगह बना कर सुरक्षा बलों पर हमला करते रहे हैं। हर बार पिछली घटनाओं से सबक लेने की बात आती है, लेकिन कुछ ही हफ्ते में सुरक्षाबल पुराने हमलों को भूल जाते हैं व फिर से नक्सलियों के फंदे में फंस जाते हैं।
बदले, प्रतिहिंसा और प्रतिषोध की भावना केे चलते ही देश के एक तिहाई इलाके में ‘लाल सलाम‘ की आम लोगों पर पकड़ सुरक्षा बलों से ज्यादा  है। बदला लेने के लिए गठित सलवा जुडुम पर सुपी्रम कोर्ट की टिप्पणी भी याद करें। बस्तर केे जिस इलाके में सुरक्षा बलों का खून बहा है, वहां स्थानीय समाज दो पाटों के बीच पिस रहा है और उनके इस घुटनभरे पलायन की  ही परिणति है कि वहां की कई लोक बोलियां लुप्त हो रही हैं। धुरबी बोलने वाले हल्बी वालों के इलाकों में बस गए हैं तो उनके संस्कार, लोक-रंग, बोली सबकुछ उनके अनुरूप हो रही है। इंसान की जिंदगी के साथ-साथ जो कुछ भी अकल्पनीय नुकसान हो रहे हैं, इसके लिए स्थानीय प्रषासन की कोताही ही जिम्मेदार है। नक्सलियों का अपना खुफिया तंत्र सटीक है जबकि प्रषासन खबर पा कर भी कार्यवाही नहीं करता। खीजे-हताश सुरक्षा बल जो कार्यवाही करते हैं, उनमें स्थानीय निरीह आदिवासी ही षिकार बनते हैं और यही नक्सलियों के लिए मजबूती का आधार होता है।
PRAJATANTRA LIVE 19-4-14
बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से सुकमा की ओर जाने वाले खूबसूरत रास्ते का विस्तार आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा तक है। इस पूरे रास्ते में बीच का कोई साठ किलोमीटर का रास्ता है ही नहीं और यहां चलने वाली बसें इस रास्ते को पार करने में कई घंटे ले लेती हैं। सड़क से सट कर उडिसा का मलकानगिरी जिला पड़ता है जहां बेहद घने जंगल हैं। कांगेर घाटी और उससे आगे झीरम घाटी की सड़कों पर कई-कई सौ मीटर गहराई की घाटियों हैं, जहां पारंपरिक षीशम, साल के पेड़ों की घनी छाया है। अभी नवंबर के तीसरे सप्ताह में कई स्थानीय अखबारों व समाचार चैनलों ने खबर दिखाई थी कि सुकमा में चिंतागुफा  के बीच नक्सलियों की गतिविधियां दिख रही हैं। उधर राज्य की पुलिस पिछले कुछ महीनों से कथित आत्मसमर्पण करवा कर यह माहौल बनाने में लगी थी कि अब नक्सलियों की ताकत खतम हो गई है। इसके बावजूद पुलिस का खुफिया तंत्र उनकी ठीक स्थिति जानने में असफल रहा।यही नहीं केंद्र सरकार के गृृह विभाग ने भी चेतावनी भेजी थी कि नक्सली कुछ हिंसा कर सकते हैं। इसमें सुरक्षा बलों पर हमला, जेल पर हमला आदि की संभावना जताई गई थी। फिर भी चेतावनियों से बेपरवाह सुरक्षा बल लापरवाही से जंगल में घुस तो गए, लेकिन वापिस आते समय गहरे चक्रव्यू में फंस गए।
इस बार के हमले में  कुछ कम नुकसान होने का सबसे बड़ा कारण एसटीएफ की पचास जवानों की टुकड़ीे में अधिकांश स्थानीय होना तथा उनका नक्सलियों द्वारा दंडामी गोंडी में की जा रही बातचीत को समझ लेना भी था। यदि उनकी जगह कोई कें्रदीय बल होता जो गोंडी नहीं समझता है तो नुकसान ज्यादा होता। सुरक्षा बल का यह दल षुक्रवार की षाम को पोलमपल्ली व चिंतागुफा थाने से निकला था।  शनिवार की सुबह यह दल जब वापिसी के लिए पोलमपल्ली से निकला और पिठमेल के जंगल में सुबह सोढ़े दस बजे इनकी मुठभेड़ लगभग चार सौ नक्सलियों के गिरोह से हो गई। नक्सली अपने लिए सुरक्षित ठिकाना बनाए बैठे थे। उनकी अगली ंक्ति में कम उम्र के बच्चे व औरतें भी थीं जो अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे। इस बार हमलावर दल मेढ के नीचे ज्यादा था तभी अधिकांश जवानों के पैर व कमर से नीचे गोलियां ज्यादा लगी हैं। उसके बाद तीस घंटे तक मृतक जवानों के शव खुले आसमान के नीचे पड़े रहे और प्रषासन उन्हें उठाने की हिम्म्त नहीं जुटा पाया। राज्य सरकार मीटिंग व बयान में व्यस्त रही व चार दिनों तक सुकमा से किरंदूल तक नक्सली कोहराम काटते रहे।
यदि अरण्य में नक्सली समस्या को समझना है तो बस्तर अंचल की चार जेलों में निरूद्ध बंदियों के बारे में ‘सूचना के अधिकार’ के तरह मांगी गई जानकारी पर भी गौर करना जरूरी होगा। दंतेवाड़ा जेल की क्षमता 150 बंदियों की है और यहां माओवादी आतंकी होने के आरोपों के साथ 377 बंदी है जो सभी आदिवासी हैं। कुल 629 क्षमता की जगदलपुर जेल में नक्सली होने के आरोप में 546 लोग बंद हैं , इनमें से 512 आदिवासी हैं। इनमें महिलाएं 53 हैं, नौ लोग पांच साल से ज्यादा से बंदी हैं और आठ लोगों को बीते एक साल में कोई भी अदालत में पेषी नहीं हुई। कांकेर में 144 लोग आतंकवादी होने के आरोप में विचाराधीन बंदी हैं इनमें से 134 आदिवासी व छह औरते हैं इसकी कुल बंदी क्षमता 85 है। दुर्ग जेल में 396 बंदी रखे जा सकते हैं और यहां चार औरतों सहित 57 ‘‘नक्सली’’ बंदी हैं, इनमें से 51 आदिवासी हैं।सामने है कि केवल चार जेलों में हजार से ज्यादा आदिवासियों को बंद किया गया है। यदि पूरे राज्य में यह गणना करें तो पांच हजार से पार पहुंचेगी। इसके साथ ही एक और चैंकाने वाला आंकडा गौरतलब है कि ताजा जनगणना बताती है कि बस्तर अंचल में आदिवासियों की जनसंख्या ना केवल कम हो रही है, बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता भी कम हो रही है। सनद 2001 की जनगणना में यहां आबादी वृद्धि की दर 19.30 प्रतिशत थी। सन 2011 में यह घट कर 8.76 रह गई है। चूंकि जनजाति समुदाय में कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियां हैं ही नहीं, सो बस्तर, दंतेवाडा, कांकेर आदि में षेश देश के विपरीत महिला-पुरूष  का अनुपात बेहतर है। यह भी कहा जाता है कि आबादी में कमी का कारण हिंसा से ग्रस्त इलाकों से लोगों का बड़ी संख्या में पलायन है। ये आंकडे चीख-चीख कर कह रहे हैं कि आदिवासियांे के नाम पर बने राज्य में आदिवासी की सामाजिक हालत क्या है। यदि सरकार की सभी चार्जशीटों को सही भी मान लिया जाए तो यह हमारे सिस्टम के लिए शो चनीय नहीं है कि आदिवासियों का हमारी व्यवस्था पर भरोसा नहीं है और वे हथियार के बल पर अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए मजबूर हैं। इतने दमन पर सभी दल मौन हैं और यही नक्सलवाद के लिए खाद-पानी है।
पुलिस पर आदिवासियों को भरोसा क्यों नही है, उसकी बानगी एक निजी स्कूल की स्कूल टीचर सोनी सोरी है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी थी। उस पर आरोप लगया गया कि वह नक्सलियों के लिए एस्सार कंपनी से वसूली कर रही थी  फिर उसके साथ पुलिस वालों ने बलात्कार किया, पूछताछ के नाम पर उसके गुप्तांगों में पत्थर भर दिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दिल्ली के एम्स में इस पाशविकता का खुलासा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट को लिखे पत्र में सोनी ने कहा था, ‘‘ मुझे नंगा कर के जमीन पर बिठाया जाता है। भूखा रखा जा रहा है। मेरे अंगों को छूकर तलाशी ली जाती है। मैं भी एक भारतीय आदिवासी महिला हूं, मुझे में भी शर्म है, मुझे शर्म लगती है। मैं अपनी लज्जा को बचा नहीं पा रही हूं। शर्मनाक शब्द कह कर मेरी लज्जा पर आरोप लगाते हैं। जज साहब मुझ पर अत्याचार, जुल्म में आज भी कमी नहीं है।’’
अभी 12 अप्रेल को ही एक जांच में सामने आया कि किस तरह नक्सली मारे जाते हैं। सन 2011 में कथित मुठभेड़ में मारी गई मीना खलखो की जांच के लिए गठित अनिता झा आयोग की रिपोर्ट के बाद बलरामपुर जिले के चांदो थाना के तत्कालीन प्रभारी सहित 25 पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया है। इससे स्पष्ट हो रहा है कि 4 साल पहले हुई यह मुठभेड़ फर्जी थी और भेड़-बकरी चराने वाली 17 वर्षीय आदिवासी किशोरी मीना को माओवादी बताकर पुलिस ने मार गिराया था। 6  जुलाई-2011 को जब बलरामपुर के लोंगरटोला में घटना हुई थी, तब पुलिस ने यह दावा किया था कि झारखंड से आए माओवादियों के साथ दो घंटे तक चली मुठभेड़ के दौरान मीना खलखो भी गोलियां चला रही थी, लेकिन पुलिस ने उसे मार गिराया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि मीना को बेहद नजदीक से गोली मारी गई थी। यही नहीं उसके साथ दुष्कर्म भी किया गया था। मुठभेड़ स्थल लोंगराटोला और मीना के गांव करंचा के ग्रामीणों का कहना था कि उस रात उन्होंने केवल तीन गोलियों की आवाज सुनी थी। मीना के परिजनों, राजनीतिक दलों और गैर सरकारी संगठनों ने आरोप लगाया था कि पुलिसकर्मियों ने मीना का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म किया और बाद में उसे मौत के घाट उतार दिया। पहले इस मामले की जांच सीआईडी को ही सौंपी गई थी, तब कथित मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों के डीएनए टेस्ट की मांग भी उठी थी। सीआईडी इसके लिए तैयार भी हो गई थी, लेकिन न्यायिक आयोग के गठन के बाद सीआईडी ने यह कहते हुए अपने हाथ पीछे खींच लिए थे कि अब जो करेगा आयोग करेगा। आरोपियों में चांदो थाने के तत्कालीन प्रभारी उपनिरीक्षक एन खेस, प्रधान आरक्षक ललित भगत, महेश राम, विजेंद्र पैकरा, इंद्रजीत पैकरा, पंचराम ध्रुव, श्रवणकुमार, भदेश्वर राम, मोहर कुजुर, संजय टोप्पो, मनोज कुमार सहित उनके साथ रहे छत्तीसगढ़ सशस्त्र पुलिस की १२वीं और १४वीं बटॉलियन के सिपाही शामिल हैं। शुरुआती जांच के बाद राज्य सरकार ने आरोपी पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया था। बाद में उन्हें फिर से थानों में बहाल कर दिया गया।
सन 2012 एक मामला सुकमा जिले के जगरगुंडा थाने में दर्ज एक ममाला भी गौर करने लायक है जिसमें पुलिस ने 19 लोगों को आरोपी बनाया था। इस मामले में बताया गया कि सभी आरोपी खतरनाक नक्सली हैं आक्र उनके पास से जब्ती में धनुश बाण, , खाना बनाने का बर्तन  दर्षाया गया। इन सभी आदिवासियों को हत्या की कोशिश करने , आर्म्स एक्ट , विस्फोटक एक्ट , घातक अस्त्र शस्त्र से लैस होकर दंगा फैलाने और राज्य के अन्य कानून की धाराएं लगाईं गईं।
अभी 28 मार्च को जेल से सात साल बाद छूटी हिडमें का मामला सुन कर तो रौंगटे खउ़े हो जाते हैं। सुकमा के एक छोटे से गांव की यह आदिवासी लड़की उस समय महज 16 साल की थी। माता पिता बीमारी से चल बसे सो हिडमें मौसी के घर में रहती थी । मौसी के छोटे से खेत पर वे खेती करते, जंगल से महुआ बीनते  और संतोश की जिंदगी काटते।  जनवरी सन 2008 में  हिडमें के गाँव के पास के गाँव रामराम में मेला लगा था । हिडमें भी अपनी मौसी और मौसेरी बहनों के साथ रामराम के मेले में गई। वहीं से पुलिस वाले उसे उठा कर ले गए।  कई दिनों तक उसे अलग -अलग थानों में भेजा जाता व हर जगह पूरा थाना उसके साथ दुश्कर्म करता। भयानक यातनाओं से हिडमें की हालत मरने जैसी हो गई थी , सो पुलिस वालों ने नक्सली बता कर उसे जेल भेजने की व्यवस्था कर ली। कहा गया कि 23 सीआरपीएफ जवानों की हत्या में वह षामिल थी। उसे जगदलपुर जेल में डाल दिया गया । थाने में जो हिडमें के साथ हुआ था वो हैवानियत की इन्तेहा थी . जेल पहुँचने पर हिडमें का गर्भाशय बाहर निकल आया ।  हिडमें जेल में किससे कहती ? उसे बस गोंडी भाषा आती थी । हिडमें तो हिन्दी भी नहीं बोल सकती थी । हिडमें ने अपने शरीर से बाहर निकले हुए उस मांस के लोथड़े को दांत भींच कर फिर से शरीर के भीतर धकेल दिया । उसके शरीर से लगातार खून बहता रहता। मांस का लोथड़ा बाहर आ जाता। एक दिन उसने ब्लेड के टुकड़े से अपने गर्भाशय को काट कर फैंकने को तैयार हो गई। तब जा कर उसे अस्पताल भेजा गया। वहां उसका आपरेशन हुआ, उसे नौं टांके आए।
पुलिस ने हिडमें के खिलाफ़ दो औरतों और दो पुलिस वालों को गवाह बताया था  लेकिन वे दोनों औरतें कभी अदालत के सामने नहीं पेश करी गयीं . दोनों पुलिस वालों ने हिडमें का किसी मामले में हाथ होने की जानकारी से इनकार कर दिया । इस तरह सात साल जेल रह गकर वह बाहर आई। जरा सोचें कि उनके समाज का कौन व्यक्ति पुलिस पर भरोसा करेगा।
अब भारत सरकार के गृहमंत्रालय की सात साल पुरानी एक रपट की धूल हम ही झाड़ देते हैं - सन 2006 की ‘‘आंतरिक सुरक्षा की स्थिति’’ विशय पर रिपोर्ट में स्पष्ट बताया गया था कि देश का कोई भी हिस्सा नक्सल गतिविधियों से अछूता नहीं है। क्योंकि यह एक जटिल प्रक्रिया है - राजनीतिक गतिविधियां, आम लोगों को प्रेरित करना, शस्त्रों का प्रशिक्षण और कार्यवाहियां। सरकार ने उस रिपोर्ट में स्वीकारा था कि देश के दो-तिहाई हिस्से पर नक्सलियों की पकड़ है। गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में भी कुछ गतिविधियां दिखाई दी हैं। दो प्रमुख औद्योगिक बेल्टों - ‘भिलाई-रांची, धनबाद-कोलकाता’ और ‘मुंबई-पुणे-सूरत-अहमदाबाद’ में इन दिनों नक्सली लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाए हुए हैं। इस रपट पर कार्यवाही, खुफिया सूचना, दूरगामी कार्ययाोजना का कहीं अता पता नहीं है। बस जब कोई हादसा होता है तो सशस्त्र बलों को खूनखराबे के लिए जंगल में उतार दिया जाता है, लेकिन इस बात पर कोई जिम्मेदारी नहीं तय की जाती है कि तीन सौ नक्सली हथियार ले कर तीन घंटों तक गोलियां चलाते हैं, सड़कों पर लैंड माईन्स लगाई जाती है और मुख्य मार्ग पर हुई इतनी बड़ी योजना की खबर किसी को नहीं लगती है।
एक तरफ सरकारी लूट व जंगल में घुस कर उस पर कब्जा करने की बेताबी है तो दूसरी ओर आदिवासी क्षेत्रों के संरक्षण का भरम पाले खून बहाने पर बेताब ‘दादा’ लोग। बीच में फंसी है सभ्यता, संस्कृति, लोकतंत्र की साख। नक्सल आंदोलन के जवाब में ‘सलवा जुड़ुम’ का स्वरूप कितना बदरंग हुआ था और उसकी परिणति दरभा घाटी में किस नृषंसता से हुई ; सबके सामने है। बंदूकों को अपनों पर ही दाग कर खून तो बहाया जा सकता है, नफरत तो उगाई जा सकती है, लेकिन देश नहीं बनाया जा सकता। तनिक बंदूकों को नीचे करें, बातचीत के रास्तें निकालें, समस्या की जड़ में जा कर उसके निरापद हल की कोषिश करें- वरना सुकमा की दरभा घाटी या बीजापुर के आर्सपेटा में खून के दरिया ऐसे ही बहते रहेंगे। लेकिन साथ ही उन खुफिया अफसरों, वरिश्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाए जिनकी लापरवाही के चलते सात सुरक्षाकर्मी के गाल में बेवहज समा गया। सनद रहे उस इलाके में खुफिया तंत्र विकसित करने के लिए पुलिस को बगैर हिसाब-किताब के अफरात पैसा खर्च करने की छूट है और इसी के जरिये कई बार बेकार हो गए या फर्जी लोगों का आत्मसमर्पण दिखा कर पुलिस वाहवाही लूटती हैं। एक बात और, अभी तक बस्तर ुपलिस कहती रही कि नक्सली स्थानीय नहीं हैं और वे सीमायी तेलंगाना के हैं, लेकिन इस बार उनकी गोंडी सुन कर साफ हो जाता है कि विद्रोह की यह नरभक्षाी ज्वाला बस्तर के अंचलों से ही हैं।  गौरतलब है कि चार सौ से ज्यादा नक्सली मय हथियार के जमा होते रहे व खुफिया तंत्र बेखबर रहा, जबकि उस इलाके में फोर्स के पास मानवरहित विमान द्रोण तक की सुविधा है।
भारत सरकार मिजोरम और नगालैंड जैसे छोटे राज्यों में षांति के लिए हाथ में क्लाशनेव रायफल ले कर सरेआम बैठे उग्रवादियों से ना केवल बातचीत करती है, बल्कि लिखित में युद्ध विराम जैसे समझौते करती है। कष्मीर का उग्रवाद सरेआम अलगाववाद का है और तो भी सरकार गाहे-बगाहे हुरीयत व कई बार पाकिस्तान में बैठे आतंकी आकाओं से षांतिपूर्ण हल की गुफ्तगु करती रहती है, फिर नक्सलियों मे ऐसी कौन सी दिक्कत है कि उनसे टेबल पर बैठ कर बात नहीं की जा सकती- वे ना तो मुल्क से अलग होने की बात करते हैं और ना ही वे किसी दूसरे देश से आए हुए है। कभी विचार करें कि सरकार व प्रषासन में बैठे वे कौन लोग है जो हर हाल में जंगल में माओवादियों को सक्रिय रखना चाहते हैं, जब नेपाल में वार्ता के जरिये उनके हथियार रखवाए जा सकते थे तो हमारे यहां इसकी कोषिषें क्यों नहीं की गईं।  याद करें 01 जुलाई 2010 की रात को आंध््राप्रदेश के आदिलाबाद जिले के जंगलों में महाराश्ट्र की सीमा के पास सीपीआई माओवादी की केंद्रीय कमेटी के सदस्य चेरूकुरी राजकुमार उर्फ आजाद और देहरादून के एक पत्रकार हेमचंद्र पांडे को पुलिस ने गोलियों से भून दिया था। पुलिस का दावा था किक यह मौतें मुठभेड में हुई जबकि तथ्य चीख-चीख कर कह रहे थे कि इन दोनों को 30 जून को नागपुर से पुलिस ने उठाया था। उस मामले में सीबीआई जांच के जरिए भले ही मुठभेड़ को असली करार दे दिया गया हो, लेकिन यह बात बड़ी साजिश के साथ छुपा दी गई कि असल में वे दोनों लोग स्वामी अग्निवेश का एक खत ले कर जा रहे थे, जिसके तहत षीर्श नक्सली नेताओं को केंद्र सरकार से षांति वार्ता करना था। याद करें उन दिनों तत्कालीन गृह मंत्री चिदंबरम ने अपना फैक्स नंबर दे कर खुली अपील की थी कि माओवादी हमसे बात कर सकते हैं। उस धोखें के बाद  नक्सली अब किसी भी स्तर पर बातचीत से डरने लगे हैं। इस पर निहायत चुप्पी बड़ी साजिश की ओर इशारा करती है कि वे कौन लोग हैं जो नक्सलियों से शांति वार्ता में अपना घाटा देखते हैं। यदि आंकड़ों को देखें तो सामने आता है कि जिन इलाकों  में लाल-आतंक ज्यादा है, वहां वही राजनीतिक दल जीतता है जो वैचारिक रूप से माओ-लेनिन का सबसे मुखर विरोधी है।
यह हमला उन कारणों को आंकने का सही अवसर हो सकता है जिनके चलते आम लोगों का सरकार या पुलिस से ज्यादा नक्सलियों पर विष्वास है, यह नर संहार अपनी सुरक्षा व्यवस्था व लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आए झोल को ठीक करने की चेतावनी दे रहा है, दंडकारण्य में फैलती बारूद की गंध नीतिनिर्धारकों के लिए विचारने का अवसर है कि नक्सलवाद को जड से उखाडने के लिए बंदूक का जवाब बंदूक से देना ही एकमात्र विकल्प है या फिर संवाद का रास्ता खोजना होगा या फिर एक तरफ से बल प्रयोग व दूसरे तरफ से संवाद की संभावनाएं खोजना समय की मांग है। आदिवासी इलाकांे की कई करोड अरब की प्राकृतिक संपदा पर अपना कब्जा जताने के लिए पूंजीवादी घरानों को समर्थन करने वाली सरकार सन 1996 में संसद द्वारा पारित आदिवासी इलाकों के लिए विषेश पंचायत कानून(पेसा अधिनियम) को लागू करना तो दूर उसे भूल ही चुकी है। इसके तहत ग्राम पंचायत को अपने क्षेत्र की जमीन के प्रबंधन और रक्षा करने का पूरा अधिकार था। इसी तरह परंपरागत आदिवासी अधिनियम 2006 को संसद से तो पारित करवा दिया लेकिन उसका लाभ दंडकारण्य तक नहीं गया, कारण वह बड़े धरानों के हितों के विपरीत है। असल में यह समय है उन कानूनों -अधिनियमों के क्रियान्वयन पर विचार करने का, लेकिन हम बात कर रहे हैं कि जनजातिय इलाकों में सरकारी बजट कम किया जाए, क्यांेकि उसका बड़ा हिस्सा नक्सली लेव्ही के रूप में वसूल रहे हैं।



शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

Pulses will make hole in your pocket

खतरा बनता खाली दाल का कटोरा

डेली न्‍यूज, जयपुर 18 अप्रेल 15
                                                             पंकज चतुर्वेदी
बेमौसम बारिष ने देषभर में  खेती-किसानी का जो नुकसान किया है, उसका असर जल्द ही बाजार में दिखने लगेगा । वैसे भी हमारे यहां मांग की तुलना में दाल की उत्पादन कम होता है और इस बार की प्राकृतिक आपदा की चपेट में दाल की फसल को जबरदस्त नुकसान हुआ है। अनुमान है कि लगभग पंद्रह प्रतिषत फसल नश्ट हो गई है, जबकि गुणत्ता कम होने की भी काफी संभावना है। एक तरफ सब्जी-फल के दाम आसमान दू रहे हैं तो आम आदमी के भोजन से दाल तो नदारत है, कारण है - मांग की तुलना में कम उत्पादन, डालर के मुकाबले रूपए के कमजोर होने से घटता आयात और उसके आसमान छूते दाम। वह दिन अब हवा हो गए हैं जब आम मेहनतकष लोगों के लिए प्रेाटीन का मुख्य स्त्रोत दालें हुआ करती थीं। देष की आबादी बढ़ी, लोगों की पोश्टिक आहार की मांग भी बढ़ी, बढ़ा नहीं तो दाल बुवाई का रकवा। परिणाम सामने हैं- मांग की तुलाना में आपूर्ति कम है और बाजार भाव मनमाने हो रहे हैं। सबसे ज्यादा लोकप्रिय तुअर(अरहर)दाल में गत एक साल के दौरा प्रति किलो 23 रूप्ए का उछाल आया है।
भारत में दालों की खपत 220 से 230 लाख टन की सालाना, जबकि कृशि मंत्रालय कह चुका है कि इस बार दाल का उत्पादन 184.3 लाख टन रह सकता है जो पिछले साल के उत्पादन 197.8 लाख टन से बेहद कम है। दाल की कमी होने से इसके दाम भी बढेंगें, नजीतन आम आदमी प्रोटीन की जरूरतों की पूर्ति के लिए दीगर अनाजों पर निर्भर होगा । इस तरह दूसरे अनाजों की भी कमी और दाम में बढ़ौतरी होगी।सनद रहे कि गत् 25सालों से हम हर साल दालों का आयात तो कर रहे हैं, लेकिन दाल में आत्मनिर्भर बनने के लिए इसका उत्पादन और रकबा बढ़ाने की किसी ठोस योजना नहीं बन पा रही है ।
यहां जानना जरूरी है कि भारत दुनियाभर में दाल का सबसे बड़ा खपतकर्ता, पैदा करने वाला और आयात करने वाला देष है। दुनिया में दाल के कुल खेतों का 33 प्रतिषत हमारे यहां है जबकि खपत 22 फीसदी है। इसके बावजूद अब वे दिन सपने हो गए है जब आम-आदमी को ‘‘दाल-रोटी खाओ, प्रभ्ुा के गुण गाओ’’  कह कर कम में ही गुजारा करने की सीख दे दी जाती थी । आज दाल अलबत्ता तो बाजार में मांग की तुलना में बेहद कम उपलब्ध है, और जो उपलब्ध भी है तो उसकी कीमत चुकाना आम-आदमी के बस के बाहर हो गया है ।
वर्ष 1965-66 में देश का दलहन उत्पादन 99.4 लाख टन था, जो 2006-07 आते-आते 145.2 लाख टन ही पहुंच पाया । सन 2008-09 में मुल्क के 220.9 लाख हैक्टर खेतों में 145.7 लाख टन दाल ही पैदा हो सकी। सनद रहे कि इस अवधि में देश की जनसंख्या में कई-कई गुणा बढ़ौतरी हुई है, जाहिर है कि आबदी के साथ दाल की मांग भी बढ़ी । इसी अवधि के दौरान गेंहू की फसल 104 लाख  टन से बढ़ कर 725 लाख टन तथा चावल की पैदावार 305.9 लाख टन से बढ़ कर 901.3 लाख टन हो गई । हरित क्रांति के दौर में दालों की उत्पादकता दर, अन्य फसलों की तुलना में बेहद कम रही है ।
दलहन फसलों की बुवाई के रकवे में बढ़ौतरी ना होना भी चिंता की बात है । सन 1965-66 में देश के 227.2 लख हेक्टेयर खेतों पर दाल बोई जाती थी, सन 2005-06 आते-आते यह घट कर 223.1 लाख हेक्टेयर रह गया वर्ष 1985-86 में विश्व में दलहन के कुल उत्पादन में भारत का योगदान 26.01 प्रतिशत था, 1986-87 में यह आंकड़ा 19.97 पर पहुंच गया । सन 2000 आते-आते इसमें कुछ बढ़ौतरी हुई और यह 22.64 फीसदी हो गया ।  लेकिन ये आंकड़े हकीकत में मांग से बहुत दूर रहे । हम गत् 25 वर्षो से लगातार विदेशों(म्यांमार, कनाड़ा, आस्ट्रेलिया और टर्की) से दालें मंगवा रहे हैं ।  पिछले साल देश के बाजारों में दालों के रेट बहुत बढ़े थे, तब आम आदमी तो चिल्लाया था, लेकिन आलू-प्याज के लिए कोहराम काटने वाले राजनैतिक दल चुप्पी साधे रहे थे । पिछले साल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एमएमटीसी ने नवंबर तक 18,000टन अरहर और मसूर की दाल आयात करने के लिए वैश्विक टेंडर को मंजूरी दी थी । माल आया भी, उधर हमारे खेतों ने भी बेहतरीन फसल उगली। एक तरफ आयातीत दाल बाजार मंे थी, सो किसानों को अपनी अपेक्षित रेट नहीं मिला ।  ऐसे में किसान के हाथ फिर निराशा लगी और अगली फसल में उसने दालों से एक बार फिर मंुह मोड़ लिया । इस बार तो संकट सामने दिख रहा है, बेहतर होगा कि सरकार अभी से दाल आयात करना षुरू कर दे। एक तो इस समय मासल खरीदने पर कम दोम में मिलेगा, दूसरा बाजार में बाहर का माल आने से देष में इसकी आपूर्ति सामान्य रहेगी व इसके चलते इसके भाव भी नियंत्रण में रहेंगे।
दाल के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के इरादे से केंद्र सरकार ने सन 2004 में इंटीग्रेटेड स्कीम फार आईल सीड, पल्सेज, आईल पाम एंड मेज़(आईएसओपीओएम) नामक योजना शुरू की थी । इसके तहत दाल बोने वाले किसानों को सबसिडी के साथ-साथ कई सुविधाएं देने की बात कही गई थी । वास्तव में यह योजना नारों से ऊपर नहीं आ पाई । इससे पहले चैथीं पंचवर्षीय योजना में ‘‘ इंटेंसिव पल्सेस डिस्ट्रीक्ट प्रोग्राम’’ के माध्यम से दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने का संकल्प लाल बस्तों से उबर नहीं पाया । सन 1991 में शुरू हुई राष्ट्रीय दलहन विकास परियोजना भी आधे-अधूरे मन से शुरू योजना थी, उसके भी कोई परिणाम नहीं निकले । जहां सन 1950-51 में हमारे देष में दाल की खपत प्रति व्यक्ति/प्रति दिन 61 ग्राम थी, वह 2009-10 आते-आते 36 ग्राम से भी कम हो गई। क
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर) की मानें तो हमारे देश में दलहनों के प्रामाणिक बीजों हर साल  मांग 13 लाख कुंटल है, जबकि उपलब्धता महज 6.6 लाख कुंटल । यह तथ्य बानगी है कि सरकार दाल की पैदावार बढ़ाने के लिए कितनी गंभीर है । यह दुख की बात है कि भारत , जिसकी अर्थ-व्यवस्था का आधार कृषि है, वहां दाल जैसी मूलभूत फसलों की कमी को पूरा करने की कोई ठोस कृषि-नीति नहीं है । कमी हो तो बाहर से मंगवा लो, यह तदर्थवाद देश की परिपक्व कृषि-नीति का परिचायक कतई नहीं है ।
नेशनल सैंपल सर्वे के एक सर्वेक्षण के मुताबिक आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर दिखने लगा है । इसके बावजूद दाल की कमी कोई राजनैतिक मुद्दा नहीं बन पा रहा है । शायद सभी सियासती पार्टियों की रूचि देश के स्वास्थ्य से कहीं अधिक दालें बाहर से मंगवाने में हैं । तभी तो इतने षोर-षराबे के बावजूद दाल के वायदा कारोबार पर रोक नहीं लगाई जा रही है। इससे भले ही बाजार भाव बढ़े, सटौरियों को बगैर दाल के ही मुनाफा हो रहा है।

पंकज चतुर्वेदी, साहिबाबाद, गाजियाबाद 201005



fake encounters are worst than murder

हत्या से बदतर अपराध है फर्जी मुठभेड़



विकारुद्दीन कोई शरीफ इंसान नहीं था, उस पर पुलिस बल पर हमला करने जैसे कई मामले विचाराधीन थे। अक्टूबर, 2010 में उसे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री व आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश के अपराध में शामिल पाया गया था। उस पर आरोप तो हैदराबाद की मक्का मस्जिद में बम धमाका करने का भी था, जिसे देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी एनआईए फर्जी साबित कर चुकी थी व उस आरोप में स्वामी असीमानंद आदि पर मुकदमा चल रहा है। मक्का मस्जिद मामले में तो बेकसूरों को जेल में डालने पर उसे मुआवजा भी मिलना था। हालांकि जो फोटो सामने आए, उसमें पांचों तथाकथित आतंकवादी हथकड़ियों से बंधे थे व उनकी हथकड़ी का दूसरा सिरा पुलिस की बस की सीट पर बंधा था, जो चीख-चीखकर कह रहा था कि पुलिस की कहानी में झोल ही झोल हैं। यह घटना है 7 अप्रैल, 2015 मंगलवार सुबह साढ़े दस बजे की। वारंगल जिले की सीमा से सटे नालगोंडा जिले की अल्यार के पास कंडीगड्डा के जंगलों की। यह एक हाईवे है। तीन वाहनों में सवार 17 सदस्यों के पुलिस बल के पास एसएलआर जैसे हथियार थे और वे विकारूद्दीन व उसके चार साथियों को वारंगल जेल से हैदराबाद की नामेपल्ली अदालत ले कर जा रहे थे। रास्ते में विकारुद्दीन ने पेशाब करने के बहाने पुलिस के वाहन को रुकवाया व पुलिस के हथियार छीनकर भागने का प्रयास किया। यही हरकत उसके अन्य चार साथियों ने भी की और जवाब में पुलिस की गोलीबारी में पांचों मारे गए। इस झगड़े में किसी भी पुलिस वाले को खरोंच भी नहीं आई। जबकि पुलिस द्वारा जारी किए गए फोटो में कथित आतंकवादियों के हथकड़ी से जकड़े हाथों में पुलिस की एसएलआर भी है। सनद रहे कि मारा गया हनीफ नाम का व्यक्ति यूनानी डाक्टर का काम करता था व उसका कभी कोई आपराधिक रिकार्ड भी नहीं था। पुलिस के अनुसार, विकारुद्दीन की गिरफ्तारी हनीफ के घर से हुई थी, वैसे वह मूलरूप से गुजरात का रहने वाला था। हनीफ ने हैदराबाद की लड़की से शादी की थी व वह हैदराबाद के मुशिराबाद में क्लीनिक चलाता था। डॉ. हनीफ की पत्नी की मानें तो उसके पति विकारुद्दीन को केवल एक ग्राहक के तौर पर जानते थे, जो बीमार होने पर अक्सर दवा लेने आता था। जरा गौर करें कि जिस इंसान ने कभी बंदूक को हाथ न लगाया हो, वह क्या कभी अत्याधुनिक हथियार चलाने की कोशिश करेगा? मारा गया एक अन्य युवक इजहार लखनऊ के एक कालेज से ग्रेजुएट था व कॉलेज छात्र संघ का उपाध्यक्ष रहा चुका था। गिरफ्तारी से पहले उस पर कोई भी आपराधिक आरोप नहीं थे। वह लॉ कालेज में एडमिशन लेना चाहता था कि पुलिस ने विकारुद्दीन को हथियार सप्लाई करने के आरोप में उठाया व चार केस ठोक दिए, दो गुजरात में व दो हैदराबाद में। इजहार के तीन भाई सऊदी अरब में नौकरी करते हैं, उसके पिता का इंतकाल काफी पहले हो गया था। उसे सन 2010 में यूपी पुलिस ने पकड़ कर आंध्र प्रदेश पुलिस को सौंप दिया था।
PRABHAT, MEERUT, 19-4=15
विकारुद्दीन व उसके साथियों पर आरोप था कि उन्होंने सन् 2007 के मक्का मस्जिद धमाके में निर्दोष लोगों को फंसाए जाने से उपजे असंतोष को आतंकवाद में बदलने के लिए तहरीक गल्बा ए इस्लाम नामक संगठन बनाया था और वे कई बार पुलिस पर हमले कर चुके थे। विकारुद्दीन को हैदराबाद पुलिस ने 14 जुलाई, 2010 को पकड़ा था, बाद में उसे गुजरात पुलिस को दे दिया गया, क्योंकि उसके गिरोह पर नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश का भी आरोप था। इन पांचों लोगों को लंबे समय से एहसास था कि उनको फर्जी मुठभेड़ में मारा जा सकता है। इसी भय के चलते उनकी ओर से अदालत में अर्जी दी गई थी कि चूंकि उनके सभी मुकदमे हैदराबाद में ही हैं, सो उन्हें हैदराबाद की चेरलापल्ली या चंचलगुडा जेल में रखा जाए। वारंगल से अदालत की दूरी डेढ़ सौ किलोमीटर से ज्यादा है। यह अदालत की जानकारी में है कि कुछ महीने पहले भी इन पांचों को अदालत लाते समय एकांत में वाहन खड़े कर उन्हें भागने को कहा गया था। यही नहीं, जिस दिन उन पांचों की हत्या हुई, उसी दिन को ढाई बजे अदालत को उनकी जेल को हैदराबाद करने पर फैसला सुनाना था। यह बात भी सामने आ गई है कि उस सुबह नौ बजे वारंगल जेल से निकलते ही विकारुद्दीन और पुलिस वालों का झगड़ा भी हुआ था। एक सिपाही ने ऑफ द रिकार्ड यह भी कहा कि उस सुबह गुस्से में आ कर विकारुद्दीन ने सब इंस्पेक्टर उदय भास्कर के मुंह पर थूक दिया था और उसी समय उन पांचों के जीवन की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी। यह भी रिकार्ड में हैं कि बीते पांच सालों से जेल में बंद इन पांचों के खिलाफ पुलिस के पास कोई ठोस सबूत भी नहीं थे और अदालत में पुलिस मुकदमों को गवाह न आने के नाम पर लटका रही थी। जो लोग पांच साल से जेल में हों, जिनके हाथ बंधे हुए हों, जिन पर सत्रह सशस्त्र पुलिस वालों का पहरा हो, जिन्हें पता हो कि उनके सभी मुकदमों में बरी होना तय है, ऐसे में कौन भागने की सोचेगा? कहने को राज्य सरकार ने मजिस्ट्रियल जांच की बात कही है, लेकिन यह एक बड़ा धोखा ही है। कोई भी संदिग्ध मृत्यु हो, उसकी मजिस्ट्रयल जांच होती ही है और कई बार उसे नायब तहसीलदार स्तर का अधिकारी ही कर देता है, यह हमारा विधायी सिस्टम कहता है न कि मामले की जांच की यह कोई अलग से व्यवस्था है। इस बात के लिए भी समाज व पुलिस को सतर्क रहना होगा कि इस तरह की बेरहम हत्याएं अपराध भले ही कम कर दें, लेकिन एक पूरी कौम के मन में अविश्वास, नफरत का भाव भी पैदा करती हैं और इस तरह के अन्याय का हवाला दे कर मासूम युवाओं को रास्ते से भटकाना आसान होता है। कई संगठनों ने इस हत्याकांड की जांच की मांग की तो राज्य सरकार ने एक विशेष जांच बल के गठन की घोषणा की है, लेकिन हाल के हाशिमपुरा कांड के अदालती फैसले के बाद लोगों को यह भरोसा कतई नहीं है कि पुलिस द्वारा पुलिस के खिलाफ की गई कोई जांच कभी अंजाम तक पहुंचेगी। इस बीच विकारुद्दीन के पिता द्वारा हैदराबाद हाई कोर्ट में दी गई याचिका स्वीकार कर ली गई है, जिसमें पांच लोगों की हत्या की जांच सीबीआई से करवाने तथा पुलिस वालों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की गई है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को 23 अप्रैल तक अपना पक्ष रखने के आदेश दिए हैं। इस बीच पुलिस की धरपकड़ जारी है, एक युवक को लखनऊ से फिर उठाया गया है, जबकि मारे गए लोगों के परिवार के सभी युवा गायब हो गए हैं। आतंकवादियों पर कार्रवाई की आड़ में हो रहे अनैतिक कार्यों पर लोग मौन रहने पर मजबूर हैं।


सोमवार, 13 अप्रैल 2015

bastar Naxalism : failiur of Inteligence system

खुफिया तत्र की विफलता है सुकमा का हमला

                                                              पंकज चतुर्वेदी
पिछले एक साल में यह आठवां हमला है सुरक्षा बलों पर। एक राज्य के एक छोटे से हिस्से में(हालांकि यह हिस्सा केरल राज्य के क्षेत्रफल के बराबर है ) स्थानीय पुलिस, एसटीएफ, सीआरपीएफ और बीएसएफ की कई टुकडि़यां मय हेलीकाॅप्टर के तैनात हैं और हर बार लगभग पिछले ही तरीके
बदले, प्रतिहिंसा और प्रतिषोध की भावना केे चलते ही देष के एक तिहाई इलाके में ‘लाल सलाम‘ की आम लोगों पर पकड़ सुरक्षा बलों से ज्यादा  है। बदला लेने के लिए गठित सलवा जुडुम पर सुपी्रम कोर्ट की टिप्पणी भी याद करें। बस्तर केे जिस इलाके में सुरक्षा बलों का खून बहा है, वहां स्थानीय समाज दो पाटों के बीच पिस रहा है और उनके इस घुटनभरे पलायन की  ही परिणति है कि वहां की कई लोक बोलियां लुप्त हो रही हैं। धुरबी बोलने वाले हल्बी वालों के इलाकों में बस गए हैं तो उनके संस्कार, लोक-रंग, बोली सबकुछ उनके अनुरूप हो रही है। इंसान की जिंदगी के साथ-साथ जो कुछ भी अकल्पनीय नुकसान हो रहे हैं, इसके लिए स्थानीय प्रषासन की कोताही ही जिम्मेदार है। नक्सलियों का अपना खुफिया तंत्र सटीक है जबकि प्रषासन खबर पा कर भी कार्यवाही नहीं करता। खीजे-हताष सुरक्षा बल जो कार्यवाही करते हैं, उनमें स्थानीय निरीह आदिवासी ही षिकार बनते हैं और यही नक्सलियों के लिए मजबूती का आधार होता है।
बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से सुकमा की ओर जाने वाले खूबसूरत रास्ते का विस्तार आंध्र प्रदेष के विजयवाड़ा तक है। इस पूरे रास्ते में बीच का कोई साठ किलोमीटर का रास्ता है ही नहीं और यहां चलने वाली बसें इस रास्ते को पार करने में कई घंटे ले लेती हैं। सड़क से सट कर उडिसा का मलकानगिरी जिला पड़ता है जहां बेहद घने जंगल हैं। कांगेर घाटी और उससे आगे झीरम घाटी की सड़कों पर कई-कई सौ मीटर गहराई की घाटियों हैं, जहां पारंपरिक षीषम, साल के पेड़ों की घनी छाया है। अभी नवंबर के तीसरे सप्ताह में कई स्थानीय अखबारों व समाचार चैनलों ने खबर दिखाई थी कि सुकमा में चिंतागुफा  के बीच नक्सलियों की गतिविधियां दिख रही हैं। उधर राज्य की पुलिस पिछले कुछ महीनों से कथित आत्मसमर्पण करवा कर यह माहौल बनाने में लगी थी कि अब नक्सलियों की ताकत खतम हो गई है। इसके बावजूद पुलिस का खुफिया तंत्र उनकी ठीक स्थिति जानने में असफल रहा।यही नहीं केंद्र सरकार के गृृह विभाग ने भी चेतावनी भेजी थी कि नक्सली कुछ हिंसा कर सकते हैं। इसमें सुरक्षा बलों पर हमला, जेल पर हमला आदि की संभावना जताई गई थी। फिर भी चेतावनियों से बेपरवाह सुरक्षा बल लापरवाही से जंगल में घुस तो गए, लेकिन वापिस आते समय गहरे चक्रव्यू में फंस गए।
इस बार के हमले में  कुछ कम नुकसान होने का सबसे बड़ा कारण एसटीएफ की पचास जवानों की टुकड़ीे में अधिकांष स्थानीय होना तथा उनका नक्सलियों द्वारा दंडामी गोंडी में की जा रही बातचीत को समझ लेना भी था। यदि उनकी जगह कोई कें्रदीय बल होता जो गोंडी नहीं समझता है तो नुकसान ज्यादा होता। सुरक्षा बल का यह दल षुक्रवार की षाम को पोलमपल्ली व चिंतागुफा थाने से निकला था।  षनिवार की सुबह यह दल जब वापिसी के लिए पोलमपल्ली से निकला और पिठमेल के जंगल में सुबह सोढ़े दस बजे इनकी मुठभेड़ लगभग चार सौ नक्सलियों के गिरोह से हो गई। नक्सली अपने लिए सुरक्षित ठिकाना बनाए बैठे थे। उनकी अगली ंक्ति में कम उम्र के बच्चे व औरतें भी थीं जो अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे। इस बार हमलावर दल मेढ के नीचे ज्यादा था तभी अधिकांष जवानों के पैर व कमर से नीचे गोलियां ज्यादा लगी हैं।
अब भारत सरकार के गृहमंत्रालय की सात साल पुरानी एक रपट की धूल हम ही झाड़ देते हैं - सन 2006 की ‘‘आंतरिक सुरक्षा की स्थिति’’ विषय पर रिपोर्ट में स्पष्ट बताया गया था कि देश का कोई भी हिस्सा नक्सल गतिविधियों से अछूता नहीं है। क्योंकि यह एक जटिल प्रक्रिया है - राजनीतिक गतिविधियां, आम लोगों को प्रेरित करना, शस्त्रों का प्रशिक्षण और कार्यवाहियां। सरकार ने उस रिपोर्ट में स्वीकारा था कि देश के दो-तिहाई हिस्से पर नक्सलियों की पकड़ है। गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में भी कुछ गतिविधियां दिखाई दी हैं। दो प्रमुख औद्योगिक बेल्टों - ‘भिलाई-रांची, धनबाद-कोलकाता’ और ‘मुंबई-पुणे-सूरत-अहमदाबाद’ में इन दिनों नक्सली लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाए हुए हैं। इस रपट पर कार्यवाही, खुफिया सूचना, दूरगामी कार्ययाोजना का कहीं अता पता नहीं है। बस जब कोई हादसा होता है तो सषस्त्र बलों को खूनखराबे के लिए जंगल में उतार दिया जाता है, लेकिन इस बात पर कोई जिम्मेदारी नहीं तय की जाती है कि तीन सौ नक्सली हथियार ले कर तीन घंटों तक गोलियां चलाते हैं, सड़कों पर लैंड माईन्स लगाई जाती है और मुख्य मार्ग पर हुई इतनी बड़ी योजना की खबर किसी को नहीं लगती है।
एक तरफ सरकारी लूट व जंगल में घुस कर उस पर कब्जा करने की बेताबी है तो दूसरी ओर आदिवासी क्षेत्रों के संरक्षण का भरम पाले खून बहाने पर बेताब ‘दादा’ लोग। बीच में फंसी है सभ्यता, संस्कृति, लोकतंत्र की साख। नक्सल आंदोलन के जवाब में ‘सलवा जुड़ुम’ का स्वरूप कितना बदरंग हुआ था और उसकी परिणति दरभा घाटी में किस नृषंसता से हुई ; सबके सामने है। बंदूकों को अपनों पर ही दाग कर खून तो बहाया जा सकता है, नफरत तो उगाई जा सकती है, लेकिन देष नहीं बनाया जा सकता। तनिक बंदूकों को नीचे करें, बातचीत के रास्तें निकालें, समस्या की जड़ में जा कर उसके निरापद हल की कोषिष करें- वरना सुकमा की दरभा घाटी या बीजापुर के आर्सपेटा में खून के दरिया ऐसे ही बहते रहेंगे। लेकिन साथ ही उन खुफिया अफसरों, वरिश्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाए जिनकी लापरवाही के चलते सात सुरक्षाकर्मी के गाल में बेवहज समा गया। सनद रहे उस इलाके में खुफिया तंत्र विकसित करने के लिए पुलिस को बगैर हिसाब-किताब के अफरात पैसा खर्च करने की छूट है और इसी के जरिये कई बार बेकार हो गए या फर्जी लोगों का आत्मसमर्पण दिखा कर पुलिस वाहवाही लूटती हैं। एक बात और, अभी तक बस्तर ुपलिस कहती रही कि नक्सली स्थानीय नहीं हैं और वे सीमायी तेलंगाना के हैं, लेकिन इस बार उनकी गोंडी सुन कर साफ हो जाता है कि विद्रोह की यह नरभक्षाी ज्वाला बस्तर के अंचलों से ही हैं।  गौरतलब है कि चार सौ से ज्यादा नक्सली मय हथियार के जमा होते रहे व खुफिया तंत्र बेखबर रहा, जबकि उस इलाके में फोर्स के पास मानवरहित विमान द्रोण तक की सुविधा है।
यह हमला उन कारणों को आंकने का सही अवसर हो सकता है जिनके चलते आम लोगों का सरकार या पुलिस से ज्यादा नक्सलियों पर विष्वास है, यह नर संहार अपनी सुरक्षा व्यवस्था व लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आए झोल को ठीक करने की चेतावनी दे रहा है, दंडकारण्य में फैलती बारूद की गंध नीतिनिर्धारकों के लिए विचारने का अवसर है कि नक्सलवाद को जड से उखाडने के लिए बंदूक का जवाब बंदूक से देना ही एकमात्र विकल्प है या फिर संवाद का रास्ता खोजना होगा या फिर एक तरफ से बल प्रयोग व दूसरे तरफ से संवाद की संभावनाएं खोजना समय की मांग है। आदिवासी इलाकांे की कई करोड अरब की प्राकृतिक संपदा पर अपना कब्जा जताने के लिए पूंुजीवादी घरानों को समर्थन करने वाली सरकार सन 1996 में संसद द्वारा पारित आदिवासी इलाकों के लिए विषेश पंचायत कानून(पेसा अधिनियम) को लागू करना तो दूर उसे भूल ही चुकी है। इसके तहत ग्राम पंचायत को अपने क्षेत्र की जमीन के प्रबंधन और रक्षा करने का पूरा अधिकार था। इसी तरह परंपरागत आदिवासी अधिनियम 2006 को संसद से तो पारित करवा दिया लेकिन उसका लाभ दंडकारण्य तक नहीं गया, कारण वह बड़े धरानों के हितों के विपरीत है। असल में यह समय है उन कानूनों -अधिनियमों के क्रियान्वयन पर विचार करने का, लेकिन हम बात कर रहे हैं कि जनजातिय इलाकों में सरकारी बजट कम किया जाए, क्यांेकि उसका बड़ा हिस्सा नक्सली लेव्ही के रूप में वसूल रहे हैं।



दैनिक जागरण राष्‍ट्रीय संस्‍करण 14 अप्रेल 15
से सुरक्षा बलों पर हमला होता है। नक्सली खबर रखते हैं कि सुरक्षा बलों की पेट्रोलिंग पार्टी कब अपने मुकाम से निकली व उन्हें किस तरफ जाना है।, वे खेत की मेंढ तथा ऊंची पहाड़ी वाले इलाके की घेराबंदी करते हैं और जैसे ही सुरक्षा बल उनके घेरे के बीच पहुंचते है।, अंधाधुंध फायरिंग करते हैं। इस बार यह हमला पिठमेल के पास हुआ है जिसमें एक कंपनी कमांडर सहित सात जवान षहीद हुए। विडंबना यह है कि पिछले सात सालों में ठीक इसी तरह नक्सली छुप कर सुरक्षा बलों को फंसाते रहे हैं और वे खुद को सुरक्षित स्थानों पर ऊंचाई में अपनी जगह बना कर सुरक्षा बलों पर हमला करते रहे हैं। हर बार पिछली घटनाओं से सबक लेने की बात आती है, लेकिन कुछ ही हफ्ते में सुरक्षाबल पुराने हमलों को भूल जाते हैं व फिर से नक्सलियों के फंदे में फंस जाते हैं।

रविवार, 12 अप्रैल 2015

BOOKS CHANGE SOCIETY AND GEOGRAPHY TOO

पुस्तकें समाज भी बदलती हैं और भूगोल भी

                                                                                                                      पंकज चतुर्वेदी
JANSANDESH TIMES U.P. 13-4-15
तो क्या पुस्तकें केवल ज्ञान प्रदान करती हैं? इसके अलावा और क्या करती हैं?? यह सवाल अक्सर कुछ लोग पूछते रहते हैं। यदि दो पुस्तको का जिक्र कर दिया जाए तो समझ में आता है कि पुस्तकें केवल पठन सामग्री या विचार की खुराक मात्र नहीं है, ये समाज, सरकार को बदलने और यहां तक कि भूगोल बदलने का भी जज्बा रखती हैंै। जब गांधी षांति प्रतिश्ठान ने ‘‘आज भी खरे हैं तालाब’’ को छापा था तो यह एक षोधपरक पुस्तक मात्र थी और आज 20 साल बाद यह एक आंदोलन, पे्ररणा पूुंज और बदलाव का माध्यम बन चुकी हैं। इसकी कई लाख प्रतियां अलग-अलग संस्थाओं, प्रकाषकों ने छाप लीं, अपने मन से कई भाशाओं में अनुवाद भी कर दिए, कई सरकारी संस्थाओं ने इसे वितरित करवाया, स्वयंसेवी संस्थाएं सतत इसे लोगों तक पहुंचा रही हैं। परिणाम सामने हैं जो समाज व सरकार अपने आंखों के सामने सिमटते तालाबों के प्रति बेखबर थे, अब उसे बचाने, सहेजने और समृद्ध करने के लिए आगे आ रहे हैं।
‘राजस्थान’ देष का सबसे बड़ा दूसरा राज्य है परंतु जल के फल में इसका स्थान अंतिम है। यहा औसत वर्शा 60 सेंटीमीटर है जबकि देष के लिए यह आंकड़ा 110 सेमी है। लेकिन इन आंकड़ों से राज्य की जल कुडली नहीं बाची जा सकती। राज्य के एक छोर से दूसरे तक बारिष असमान रहती है, कहीं 100सेमी तो कहीं 25 सेमी तो कहीं 10 सेमी तक भी। यदि कुछ सालों की अतिवृश्टि को छोड़ दें तो चुरू, बीकानेर, जैलमेर, बाडमेर, श्रीगंगानगर, जोधपुर आदि में साल में 10 सेमी से भी कम पानी बरसता है। दिल्ली में 150 सेमी से ज्यादा पानी गिरता है, यहां यमुना बहती है, सत्ता का केंद्र है और यहां सारे साल पानी की मारा मारी रहती है, वहीं रेतीले राजस्थान में पानी की जगह सूरज की तपन बरसती है। दुनिभ्याभर के अन्य रेगिस्तानों की तुलना में राजस्थान के मरू क्षेत्र की बसावट बहुत ज्यादा है और वहां के वाषिंदों में लोक, रंग, स्वाद, संस्कृति, कला की सुगंध भी है।
पानी की कमी पर वहां के लोग आमतौर पर लोटा बाल्टी ले कर प्रदषन नहीं करते, इसकी जगह एक एक बूंद को बचाने और उसे भविश्य के लिए सहेजने के गुर पीढी दर पीढी सिखाते जाते हैं।  रेगिसतानी इलाकों में जहां अंग्रेजी के वाय ल् आकार की लकड़ी का टुकड़ा दिखे तो मान लो कि वहां कुईया होगी।  कुईया यानि छोटा कुआ जो सारे साल पानी देता है। सनद रहे कि रेगिस्तान में यदि जमीन की छाती खोद कर पानी निकालने का प्रयास हागा तो वह आमतौर पर खारा पानी होता है। गांव वालों के पास किसी विष्वविद्यालय की डिगरी या प्रषिक्षण नहीं होता, लेकिन उनका लोक ज्ञान उन्हें इस बात को जानने के लिए पारंगत बनाता है कि अमुक स्थान पर कितनी कुईयों बन सकती हैं।  ये कुईयां भूगर्भ जल की ठाह पर नहीं होती, बल्कि इन्हें अभेद चट्टानों के आधार पर उकेरा जाता है।
कुईया तो खुद गई लेकिन इसमें पानी कहां से आएगा? क्योंकि इन्हें भूजल आने से पहले ही खोदना बंद किया जाता है। इस तिलस्म को तोड़ा है गांधी षांति प्रतिश्ठान, नई दिल्ली  के मषहूर पर्यावरणविद तथा अभी तक हिंदी की सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक ‘‘आज भी खरे हैं तालाब’’ के लेखक अनुपम मिश्र ने।  उन्होंने रेगिस्तान के बूंद-बूंद पानी को जोड़ कर लाखों कंठ की प्यास बुझाने की अद्भूत संस्कृति को अपनी पुस्तक -‘राजस्थान की रजत बूंदें’’ में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक  काफी पहले आई थी, लेकिन तालाब वाली पुस्तक की लोकप्रियता की आंधी में इस पर कम विमर्ष हुआ। हालांकि इस पुस्तक की ्रपस्तुति, उत्पादन, भाशा, तथ्य, कहीं भी तालाब वाली पुस्तक से उन्नीस नहीं हैं।  बारिष का मीठा पानी यदि भूजल के खारे पानी में मिल जाए तो बेकार हो जाएगा। मानव की अदभुत प्रवीणता की प्रमाण ये कुईयां रेत की नमी की जल बूंदों को कठोर चट्टानों की गोद में सहेज कर रखती हैं।
ऐसी कुईयां राजस्थान के षेखावटी इलाके में मिलती हैं। इनका केवल थार वाले इलाके में मिलने का कारण महज वहां का रेगिस्तान ही नहीं है। तथ्य यह है कि वहां के लोग जानते हैं कि  मिट्टी के तले कठोर चट्टानों की संरचना केवल यहीं मिलती हैं। हालांकि इन छोटे कुओं में पानी की तल घटता-बढता है, परंतु वाय आकार के लकडी के लट्ठों वाली इन कुइयों से सारे साल हर दिन  तीन-चार बाल्टी पानी  मिल ही जाता है।  जिन इलाकांे में सरकारी जल योजनाएं फ्लाप है वहां ये कुइयां बगैर थके पानी देती रहती हैं।
ये कुइयां कहां खुद सकती है? इसका जानकार तो एक व्यक्ति होता है, लेकिन इसकी खुदाई करना एक अकेले के बस का नहीं होता। सालों साल राजस्थान की संस्कृति में हो रहे बदलाव के चलते अब कई समूह व समुदाय इस काम में माहिर हो गए हैं। खुदाई करने वालों की गांव वाले पूजा करते हैं, उनके खाने-पीने, ठहरने का इंताम गांव वाले करते हैं और काम पूरा हो जाने पर षिल्पकारों को उपहारों से लाद दिया जाता हैं।  यह रिष्ता केवल यहीं समाप्त नहीं हो जाता, प्रत्येक वार -त्योहार पर उन्हें भेंट भेजी जाती हैं। आखिर वे इस सम्मान के हकदार होते भी हैं। रेतीली जमीन पर महज डेढ मीटर व्यास का कुआं खोदना कोई आसान काम नहीं हैं। रेत में दो फुट खोदो तो उसके ढहने की संभावना होती हैं। यहीं नहीं गहरे जाने पर सांस लेना दूभर होता हैं।
कुईयां खोदने वाला एक सदस्य छोटे से औजार से गहरा खोदता हैं, उसके सिर पर एक कामचलाउ हेलमेट होता हैं। यह कारीगर खुदाई के साथ-साथ  दीवार पर कुंडली के आकार की रस्सी से बनी परत चढ़ाता हैं।  सौ मीटर गहरे कुंए के लिए चार हजार मीटर लंगी रस्सी की जरूरत होती है। यह रस्साी स्थानीय स्तर पर मिलने वाले जंगली पौधे ‘‘सीतु’’ से बनाई जाती हैं।  टीम के षेश सदस्य, खुदाई की मिट्टी बाल्टी से बाहर निकालने, सीतु से रस्सी बनाने, कुडली तैयार करने जैसे काम करते रहते है।  एक बात और जो लोग बाहर खड़े होते हैं वे कुछ समय अंतराल में भीतर मिट्टी रेत आदि फैकते रहते हैं, असल में ये कण अपने साथ बाहर की ताजी हवा लेकर जाते हैं जो भीतर गहराई में काम कर रहे षिल्पकार कांे सांस लेने में मदद करते हैं। ये कुईयां डेढ सौ फुट तक गहरी होती हैं।  कई गांवों में 200 साल पुरानी कुइयां भी हैं जिससे आज भी पानी मिल रहा है।
‘रेगिस्तान की रजत बूंदे’ पुस्तक द्वारा समाज व भूगोल बदलने की घटना तो सात समुंदर पार दुनिया के सबसे विकट रेगिस्तान में बसे देष से सामने आई है। याद होगा कि भारत के रेगिस्तानी इलाकों में पीढियों से जीवंत, लोक-रंग से सराबोर समाज ने पानी जुटाने की अपनी तकनीकों का सहारा लिया है। बेहद कम बारिष, जानलेवा धूप और दूर-दूर तक फैली रेत के बीच जीवन इतना सजीव व रंगीन कैसे है, इस तिलस्म को तोड़ा है गांधी षांति प्रतिश्ठान, नई दिल्ली  के मषहूर पर्यावरणविद तथा अभी तक हिंदी की सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक ‘‘आज भी खरे हैं तालाब’’ के लेखक अनुपम मिश्र ने।  उन्होंने रेगिस्तान के बूंद-बूंद पानी को जोड़ कर लाखों कठ की प्यास बुझाने की अद्भूत संस्कृति को अपनी पुस्तक -‘राजस्थान की रजत बूंदें’’ में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक  काफी पहले आई थी, लेकिन तालाब वाली पुस्तक की लोकप्रियता की आंधी में इस पर कम विमर्ष हुआ। हालांकि इस पुस्तक की प्रस्तुति, उत्पादन, भाशा, तथ्य, कहीं भी तालाब वाली पुस्तक से उन्नीस नहीं हैं।  बारिष का मीठा पानी यदि भूजल के खारे पानी में मिल जाए तो बेकार हो जाएगा। मानव की अदभुत प्रवीणता की प्रमाण रेगिस्तान की कुईयां रेत की नमी की जल बूंदों को कठोर चट्टानों की गोद में सहेज कर रखती हैं।
हुआ यूं कि गांधी षांति प्रतिश्ठान में आने वाली एक षुभचिंतक एनी मोनटाॅट ने ‘रेगिस्तान की रजत बूंदें’ पुस्तक को देखा और इसका फ्रेंच अनुवाद कर डाला। जब उनसे पूछा कि फ्रेंच अनुवाद कहां काम आएगा तो जवाब था कि सहारा रेगिस्तान के इलाके के उत्तरी अफ्रीका के कई देषों में फ्रांसिसी प्रभाव रहा है और वहां अरबी, स्थानीय बर्बर बोली के अलावा ज्ञान की भाशा फा्रंसिसी ही है। कुछ दिनों बाद यह फ्रेंच अनूदित पुस्तक मोरक्को पहुंची । वहां के प्रधान मंत्री इससे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने गांधी षांति प्रतिश्ठान के एक साथी को वहां बुलवा भेजा। उन्हें हेलीकाॅप्टर से रेगिस्तान दिखाया गया और भारत के रेगिस्तान की जल संरक्षण तकनीकी पर विस्तार से विमर्ष हुआ। उस 10 दिन के दौरे में यह बात स्पश्ट हो गई कि भारत की तकनीक वहां बेहद काम की है। इसके बाद इस पुस्तक की सैंकडों प्रतियां वहां के इंजीनियरों, अफसरों के बीच बंटवाई गईं। उन पर विमर्ष हुआ और आज उस देष में कोई एक हजार स्थानों पर राजस्थान के मरूस्थल में इस्तेमाल होने वाली हर बूंद को सहजने व उसके किफायती इस्तेमाल की षुद्ध देषी तकनीक के मुताबिक काम चल रहा हे। यह सब बगैर किसी राजनयिक वार्ता या समाझौतों के , किसी तामझााम वाले समारोहों व सेमीनार के बगैर चल निकला। जिरया बनी एक पुस्तक। आज उस पुस्तक के बदौलत बनी कुईयों से बस्तियां बस रही हैं, लोगों का पलायन रूक रहा है। यहां याद दिलाना जरूरी है कि सहारा रेगिस्तान की भीशण गर्मी, रेत की आंधी, बहुत कम बारिष वाले मोरक्को में पानी की मांग बढ़ रही है क्योंकि वहां खेती व उद्योग बढ़ रहे हैं। जबकि बारिष की मात्रा कम हो रही है, साथ ही औसतन हर साल एक डिगरी की दर से तापमान भी बढ़ रही हे। यहां कई ओएसिस या नखलिस्तान हैं, लेकिन उनके ताबड़तोड़ इस्तेमाल से देष की जैव विविधता प्रभावित हो रही है। सन 1997 में पहले विष्व जल फोरम की बैठक भी मोरक्को में ही हुई थी। वहां की सरकार पानी की उपलब्धता बढाने को विकसित देषों की तकनीक पर बहुत व्यय करती रही, लेकिन उन्हें सफलता मिली एक पुस्तक से। पता चला है कि फरवरी -2015 के आखिरी दिनों में मोरक्को का एक बड़ा प्रतिनिधि मंडल  भारत आ रहा है जो अनुपम बाबू की पुस्तकों के प्रयोगों का खुद अवलोकन करेगी।
यह बानगी है कि पुस्तकें एक मौन क्रांति करती हैं जिससे हुआ बदलाव धीमा जरूर हो, लेकिन स्थाई व बगैर किसी दवाब के होता है।

DEVELOPMENT ON THE NAME OF DESTRYING TRADITIONAL WATER BODIES IN GHAZIABAD



पश्चिमी  उत्तर प्रदेश: तालाबों पर कब्जे से रूठा पानी

                                                                                पंकज चतुर्वेदी
PRABHAT, MEERUT, 12-2-2015
दिल्ली के पूर्वी हिस्से की सड़कों से सटा हुआ है उत्तरप्रदेश का गाजियाबाद जिला। कहने को देश-दुनिया का सबसे तेजी से विस्तार पाता जिला है। आखिर हों भी क्यों ना ,गाजियाबाद भले ही उ.प्र में हो लेकिन शहरीकरण व उससे संबद्ध त्रासदियों में वह दिल्ली के कदम-दर-कदम साथ है। यहां भी भयंकर जनसंख्या विस्फोट है, यहां भी अनियोजित शहरीकरण है, यहां भी जमीन की कीमतें बेशकीमती हैं और उसी तरह यहां भी जब जिसे मौका मिला तालाब को हड़प कर कंक्रीट के जंगल रोपे गए। कई-कई पूरी कोलोनियां, सरकारी भी, तालाबों को सुखा कर बसा दी गईं। गगनचुंबी इमारतों में रहने वाले सर पर छत के सपने के पूरा होने पर इतने मुग्ध थे कि उन्हें खबर ही नहीं रही कि जीने के लिए जल भी जरूरी है, जिसे सुखा कर उन्होंने अपना सपना पूरा किया है।
गाजियाबाद जिले में कुल 1288 हेक्टेयर भूभाग में 65 तालाब व झीलें हैं, जिनमें से 642 हेक्टेयर ग्राम समाज, 68.5 मछली पालन विभाग और 588 हेक्टेयर निजी लोगों के कब्जे में है। तकरीबन सौ तालाबों पर लोगों ने कब्जा कर मकान-दुकान बना लिए हैं। यहां पर दो पांच एकड़ क्षेत्रफल के 53 तालाब हैं, पांच से 10 हैक्टर वाले 03, 10 से 50 हैक्टर का एक तालाब कागजों पर दर्ज है। इनमें से कुल 88 तालाब पट्टे वाले और 13 निजी हैं। जिले की 19.2 हैक्टर में फैली मसूरी झील, इलाके सबसे बड़ी हसनपुर झील(37.2 हैक्टर), 4.8 हैक्टर वाली सौंदा झील और धौलाना का 7.9 हैक्टर में फैला तालाब अभी भी कुछ आस जगाते हैं।  गाजियाबद शहर यानी नगर निगम के तहत कुछ दशक पहले तक 138 तालाब हुआ करते थे, इनमें से 29 पर तो कुछ सरकारी महकमों ने ही कब्जा कर लिया। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने रहीसपुर, रजा पुर, दमकनपुर, सिहानी आदि 10 तालाबों पर तो अपनी कालोनियां ही बना डालीं।  आवास विकास परिशद ने 05, यूपीएसआईडीसी ने 12 और सीपीडब्लूडी व नगर निगम ने एक-एक तालाब पर अपना कब्जा ठोक दिया। शहर के 28 तालाब अभी भी अपने अस्तित्व की लड़ाई समाज से लड़ रहे हैं जबकि 78 तालाबों को रसॅूखदार लोग पी गए। जाहिर है कि जब बाड़ ही खेत चर रही है तो उसका बचना संभव ही नहीं है। अब एक और हास्यास्पद बात सुनने में आई है कि कुछ सरकारी महकमे हड़प किए गए तालाबों के बदले में और कहीं जमीन देने व तालाब खुदवाने की बात कर रहे हैं।
हाल ही में ग्राम ढरगल में जोहड़ को पाट कर जल निगम द्वारा पानी की टंकी खड़ी करने का मामला सामने आया हे। गांव के लोगों ने जब लड़ाई लड़ी तो पता चला कि जहां 300 वर्ग गज में जल-निधि थी, उस पर बगैर किसी मंजूरी के पानी की टंकी निर्मित कर दी गई। अब जांच हो रही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेषों के उल्लंघन कर पारंपरिक जल स्त्रोत को पाटने वाले निष्चिंत है कि उनके खिलाफ कोई कार्यवाही होगी। बिहारीपुरा में 15 दिनों से आदंोलन चल रहा है, क्योंकि वहां के पुराने तालाब को ट्रेक्टरों से मिट्टी डाल कर पाटा जा रहा है ताकि उस पर कब्जा किया जा सके। प्रषासन को खबर की गई, पूरा गांव जमा हो कर विरोध भी कर रहा है, लेकिन माफिया को अपनी ताकत व प्रषासन पर अपनी पहुंच का पूरा भरोसा है सो बिहारीपुर का तालबा किसी भी दिन अतीत बन जाएगा।  गाजियाबद नगर निगम ने वर्ष 2014-15 में अपने अधीन आने वाले तालाबों के संरक्षण हेतु दो करोड़ बे बजट का प्रावधान किया था, अब फरवरी बीत चुका है, लेकिन इस मद का एक भी टका खर्च नहीं हुआ। यही नहीं इस मद के डेढ करोड़ रूपए दीगर मद में स्थानांतरित भी कर दिए गए। असल में निगम भी नहीं चाहता कि तालाब बचें , यदि उसके संरक्षण पर व्यय किया तो उसका रिकार्ड बन जाएगा।
गाजियाबाद महानगर पुरानी बस्ती है, यहां थोड़ी भी बारिश हो जाए तो पूरा शहर जलमग्न हो जाता है। मुख्य सड़के एक घंटे की बारिश में घुटने-घुटने पानी से लबा-लब होती हैं, लेकिन शहर के रमतेराम रोड़ स्थित पुराने तालाब में एक बूंद पानी नहीं रहता है। सनद रहे कि इस तालाब के रखरखाव पर विकास प्राधिकरण ने पूरे पांच करोड़ खर्च किए है। असल में हुआ यह कि तालाब के चारों आरे जम कर कंक्रीट पोता गया, सीढि़यां पक्की कर दी गई, लेकिन बारिश का पानी जिन सात रास्तों से तालाब तक पहुंचता था, उन्हें भी कंक्रीट से बंद कर दिया गया। अब रमतेराम रोड़ पर पानी भरता है, लेकिन तालाब में नहीं, जबकि कभी यह तालाब पूरे शहर को पानी आपूर्ति करता था। कोई चार सौ साल पुराने इस तालाब का क्षेत्रफल अभी तीन दशक पहले तक 17 हजार वर्गमीटर दर्ज था। अब इसके नौहजार वर्गमीटर पर कब्जा हो चुका है और रही बची कसर इसके चारों आरे पक्की दीवार खड़ी कर पूरी हो गई है। अब यह एक सपाट मैदान है जहां बच्चे खेलते हैं या भैंसे चरती हैैं या फिर लोग कूड़ा डालते हैं। जाहिर है कि कुछ साल इसमें पानी आएगा नहीं और इसकी आड़ लेकर वहां कब्जा हो जाएगा। ठीक यही कहानी मकनपुर के तालाब की है, इसे पक्का बना दिया गया, यह विचारे बगैर कि तालाब की तली को तो कच्चा ही रखना पड़ता है।
शहर के मोहन नगर के करीब अर्थला तालाब कभी करीबी हिंडन के सहयोग से सदा-नीरा रहता था। राज्य के सरकारी महकमे ग्रामीण अभियंत्रण सेवा यानी आरईएस की ताजा रपट में बताया गया है कि वर्ष 2008 से 2010 के बीच इस झील की जमीन पर 536 मकान बनाए गए। इंजीनियरों ने मकान में लगगे मटेरियल की जांच कर उनकी उम्र निर्धारित की और उसकी रपट कमिष्नर को सौंप दी। अब कुछ अफसर अपनी नौकरी व मकान मालिक अपने घर बचाने के लिए सियाासती जुगत लगा रहे हैं।
कहने की जरूरत नहीं है कि प्रकृति के साथ हुए इस अमानवीय व्यवहार पर यहां की अदालतें भी कागजी षेर की तरह बस आदेश ही देती रहीं। गाजियाबाद में तालाबों के सम्ृद्ध दिन लौटाने के लिए संघर्श कर रहे एक वकील संजय कष्यप ने जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो बताया गया कि सन 2005 में बनाए गए मास्टर प्लान में जिन 123 तालाबों का वजूद स्वीकारा गया था, उनमें से 82 पर अवैध कब्जे हो गए है। पता नहीं इतनी बड़ी स्वीकरोक्ति में प्रषासन की मासूमियत थी या लाचारी । हालांकि राजस्व रिकार्ड गाजियाबद नगर निगम सीमा के भीतर 147 तालाबों की बात कहता है, जबकि नगर निगम का सर्वे 123 की। सरकारी अफसर कहते हैं कि इनमें से केवल 45 तालाब ही ऐसे हैं जिन्हे बचाया जा सकता है। शहर के मकनपुर, सिहानी, मोरटा, षाहपुर, बम्हेटा, सादिक नगर, काजीपुरा, नायफल, कोटगांव, भोपुरा, पसेांडा, सिकंदरपुर, रहीसपुर, महरौली, रजापुर, झंडापुर, साहिबाबाद गांव,महाराजपुर आदि इलाकों में रिकार्ड में तालाब है लेकिन हकीकत में वहां कालेानियां खड़ी है। यह पूरा घोटाला कई-कई अरब का है और इसमें हर दल-गुट- माफिया के लोग षामिल है। भूजल का स्तर बढ़ाने के नाम पर राज्य में कई साल से आदर्ष तालाब निर्माण योजना चल रही है और इसे आंकड़ों की कसौटी पर देखें तो पाएंगे कि तालबों में नोटों की खेप तो उतारी गई, लेकिन बदले में नतीजा षून्य ही रहा। अकेले गाजियाबाद जिले में बीते छह सालों के दौरान जिन 814 तालाबों पर कई करोड़ रूपए खर्च किए गए उनमें से 324 तो बारिश में भी रीते पड़े हैं। आंकडे कहते है। कि गाजियाबद जिले की कुल 405 ग्राम पंचायतों में 2431 छोटे-बड़े ताल-तलैया हैं, जिनमें से 93 को आदर्ष तालाब घोशित किया गया है। इन पर अभी तक कोई 15 करोड़ रूपए का सरकारी व्यय किया जा चुका है। सरकारी रिकार्ड यह भी स्वीकार करता है कि ग्रामीण इलाकों के 302 तालाबों पर कतिपय असरदार लोगों ने अवैध कब्जे कर रखे हैं। हालांकि इस बात को बड़ी चतुराई से छिपाया जाता है कि इन कब्जे वाले इलकों में अब षायद ही तालाब का कोई अस्तित्व बचा है।
जिस तेजी से गाजियाबाद जिले का शहरीकरण हुआ, वहां की समृद्ध तालाब परंपरा पर कागजों पर करोड़ो खर्च किए गए, जबकि असल में तालाबों की संख्या हजारों में है। इन तालाबों को पाट कर कालेानी, बारातघर, स्कूल आदि बने, जिनके अब बाकायदा पक्के रिकार्ड हैं। यहां हर घर-कालेनी में पानी का संकट खड़ा है। शहर का तीन-चैथई हिस्सा भूजल पर निर्भर है और जिस तेजी से तालाब समाप्त हुए, उसके चलते यहां का भूजल स्तर भी कई सौ फुट नीचे जा चुका है और इसे खतरनाक जल स्तर वाले क्षेत्र के तौर पर अधिसूचित किया गया है। बगैर पानी के बस रही कालोनियां मनवीय सभ्यता के विकास की सहयात्री तो हो नहीं पाएंगी, आखिर समस्या को हमने ही न्योता दिया है तो भुगतना भी हमें ही पड़ेगा।

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