My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

poors least understand complex legal system




                         कानून के बारे में ज्यादा नहीं जानते गरीब


RAAJ EXPRESS 10-7-15
भारत की जेलों में जो लोग बंद हैं, विचाराधीन कैदी के रूप में, उनमें ज्यादा तादाद दलितों, मुसलमानों व आदिवासियों की है। इनमें से कई बंदी तो ऐसे हैं, जो लंबे समय से बंद हैं। इस समस्या का समाधान यही है कि गरीबों को कानून के प्रति जागरूक किया जाए।हाल ही में भारतीय जेलों से छूटकर 88 मछुआरे पाकिस्तान पहुंचे। इनमें से ज्यादातर तीन साल या उससे अधिक से जेलों में बंद थे। इनमें से लगभग सभी की शिकायत जेल में अत्याचार, मारपीट, पैसे छुड़ा लेने की रही है। इन लोगों के साथ यह सब इसलिए हो रहा था, क्योंकि उनकी पैरवी करने वाला कोई नहीं था या फिर उनके पास रिहाई के लिए पैसा नहीं था। हालांकि, समुद्र के असीम जल-भंडार में दो देशों की सीमा तलाशना लगभग मुश्किल है और इसी वजह से उनसे एक ऐसा अपराध हो जाता है, जो वे कभी करना नहीं चाहते थे। यानी, यह अपराध उनसे अनजाने में हो जाता है, जिसकी वे सजा भुगतते हैं। कई लोग तो अपनी सजा पूरी होने या जमानत मंजूर हो जाने के बाद भी जेल में हैं, क्योंकि या तो उन्हें औपचारिकताओं की जानकारी नहीं है या फिर उनके पास पैसों की कमी है।
भारत की जेलों में बंद कैदियों के बारे में सरकारी रिकार्ड में दर्ज आंकड़े चौंकाने वाले हैं। अनुमान है कि इस समय कोई चार लाख से ज्यादा लोग देशभर की जेलों में बंद हैं, जिनमें से करीब एक लाख तीस हजार सजायाफ्ता और करीब दो लाख 80 हजार विचाराधीन बंदी हैं। देश में दलित, आदिवासी व मुसलमानों की कुल आबादी 40 फीसदी के आसपास है, जबकि जेलों में उनकी संख्या 67 प्रतिशत है। हमारी दलित आबादी 17 फीसदी है, वहीं जेल में बंद लोगों में 22 प्रतिशत दलितों का है। कुल आदिवासी आबादी नौ प्रतिशत है, पर जेल में बंद आदिवासियों का प्रतिशत 11 है। मुस्लिम आबादी भी 14 प्रतिशत है, मगर जेल में उनकी मौजूदगी 20 प्रतिशत से ज्यादा है। एक आंकड़ा यह भी चौंकाने वाला है कि प्रतिबंधात्मक कार्रवाई या ऐसे ही अन्य कानूनों के तहत बंदी बनाए गए लोगों में से आधे मुस्लिम होते हैं। इस तरह के मामले दर्ज करने के लिए पुलिस को वाहवाही मिलती है कि उसने अपराध होने से पहले ही कार्रवाई कर दी। हमारे आंचलिक इलाकों में ऐसे मामले न्यायालय में नहीं जाते हैं। इनकी सुनवाई नायब तहसीलदार से लेकर एसडीएम तक करता है और उनकी जमानत सुनवाई कर रहे अफसरों की इच्छा पर निर्भर है।
अब पिछले साल बस्तर अंचल की चार जेलों में बंद बंदियों के बारे में सूचना के अधिकार के तहत सामने आई जानकारी पर नजर डालें। दंतेवाड़ा जेल की क्षमता 150 बंदियों की है, लेकिन यहां माओवादी आतंकी होने के आरोपों में 377 लोग बंद हैं, जो सभी आदिवासी ही हैं। कुल 429 क्षमता वाली जगदलपुर जेल में नक्सली होने के आरोप में 546 लोग बंद हैं। इनमें से 512 आदिवासी हैं। इनमें 53 महिलाएं हैं और नौ लोग पांच साल से ज्यादा से बंद हैं तथा आठ लोगों की बीते एक साल में कोई भी अदालत में पेशी नहीं हुई। कांकेर में 144 लोग आतंकवादी होने के आरोप में विचाराधीन बंदी हैं। इनमें से 134 आदिवासी और छह औरतें हैं, जबकि इस जेल की बंदी क्षमता मात्र 85 है। दुर्ग जेल की क्षमता 396 बंदियों की है। यहां चार औरतों सहित 57 नक्सली बंदी हैं। इनमें से 51 आदिवासी हैं। इससे स्पष्ट है कि सिर्फ चार जेलों में एक हजार से ज्यादा आदिवासी बंद हैं। यदि पूरे राज्य की गणना करें, तो यह संख्या पांच हजार के आसपास पहुंचेगी। इन आंकड़ों के विश्लेषण का मतलब यह कतई नहीं है कि अपराध या अपराधियों को जाति या समाज में बांटा जाए, पर यह तो विचारणीय है कि हमारी न्याय व्यवस्था, जेल पुलिस उन लोगों के लिए ही अनुदार क्यों है, जो लोग आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक तौर पर पिछड़े होते हैं और जिनका शोषण और उत्पीड़न सरल होता है। यह बात आए रोज सुनने को मिलती है कि फलां व्यक्ति आतंकवाद के आरोप में 10 या उससे अधिक साल तक जेल में रहा और अब उसे अदालत ने बाइज्‍जत छोड़ दिया।
मगर, यह विचार करने वाला कोई नहीं होता कि 10 साल में उसने जो बदनामी एवं शोषण सहा है, उसकी भरपाई अदालत के फैसलों से नहीं हो सकती। जेल से निकलने वाले को समाज भी उपेक्षित नजर से देखता है व ऐसे लोग आमतौर पर न चाहते हुए भी उन लोगों की तरफ चले जाते हैं, जो आदत से अपराधी होते हैं। इस बीच जब लक्ष्मणपुर बाथे या फिर हाशिमपुरा में सामूहिक हत्याकांड के दोषियों के अदालत से बरी हाने की खबरें आती हैं, तो भले ही उनसे सियासती हित साधने वालों को कुछ लाभ हो, लेकिन समाज में इसका संदेश गलत ही जाता है। मुसलमानों के लिए तो कई धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक संगठन आवाज भी उठाते रहते हैं, पर आदिवासियों या दलितों के लिए कभी संगठित प्रयास नहीं होते। आदिवासियों के मसले में तो अब एक नया ट्रैंड चल पड़ा है कि उनके हित में बात करना यानी नक्सलवाद को बढ़ावा देना। हालांकि, इसका निदान पहले शिक्षा या जागरूकता और उसके बाद आर्थिक स्वावलंबन ही है। जरूरी है कि इसके लिए कुछ प्रयास सरकार के स्तर पर व अधिक प्रयास समाज के स्तर पर हों। यह भी बेहद जरूरी है कि आम लोगों को पुलिस की कार्यप्रणाली, अदालतों की प्रक्रिया, मुफ्त कानूनी सहायता जैसे विषयों की जानकारी दी जाए। वरना, लोग जेलों में सड़ते रहेंगे।

शनिवार, 4 जुलाई 2015

Loud your voice against loudspeakers

आफत बनते भोंपू

                                                                  पंकज चतुर्वेदी

PRABHAT, MEERUT, 5-7-15
बीते दो सप्ताह के दौरान अकेले उत्तर प्रदेष में कम से कम पांच जगहों पर महज इस बात के लिए तनाव हुआ कि दो अलग-अलग धर्मों के मानने वाले अपने  धार्मिक स्थल पर लगे भौंपू की आवाज कम करने को राजी नहीं थे।  त्योहार पर्व का मौसम षुरू हो गया है। श्रीवाण और रमजान के बाद की ईद लगभग एक साथ होने को है। एक तरफ असुरक्षा की भावना को ले कर आक्रामकता है तो दूसरी और बहुसंख्यक हाने के दर्प में डूबा अधिनायकवार्द। नाम दिया जाता है धर्म व आस्था का और जोर आजामाईष का जरिया बनते हैं लाऊड स्पीकर। हालांकि कागजोें पर कानून में इन्हें बजाना , इस पर षोर करना गैरकानूनी है, लेकिन धर्म के नाम पर इसमें दखल देने से प्रषासन व सियासतदां दोनों ही परहेज करते है। नतीजा सामने हैं कि अजान व आरति के नाम पर टकराव व दंगों से मुल्क का सामाजिक ताना-बाना जर्जर हो रहा है।
PEOPLES SAMACHAR MP 9-7-15
हाल ही में जबलपुर हाईकोर्ट ने जीवन में शोर के दखल पर गंभीर फैसला सुनाया है, जिसके तहत अब त्योहारों में सार्वजनिक मार्ग पर लाउडस्पीकरों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। यही नहीं कोर्ट ने अब ट्रैफिक बाधित करने वाले पंडालों पर भी अंकुश लगाने के आदेश दिए हैं। इस आदेश के बाद प्रशासन भी लाउडस्पीकर और पंडालों की अनुमति नहीं दे सकेगा। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अजय माणिकराव खानविलकर व जस्टिस शांतनु केमकर की डिवीजन बेंच ने समाजसेवी राजेंद्र कुमार वर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिए। इसमें साफ किया गया कि त्योहार या सामाजिक कार्यक्रम के नाम पर अत्याधिक शोर मचाकर आम जनजीवन को प्रभावित करना अनुचित है। हाईकोर्ट मध्यप्रदेश कोलाहल निवारण अधिनियम-1985 की धारा-13 को असंवैधानिक करार दिया है। अभी इस धारा के प्रावधानों का दुरुपयोग करते हुए लोग डीजे आदि बजाने की अनुमति ले लेते हैं। हाईकोर्ट ने आने आदेष में कहा कि .किसी के मकान या सड़क किनारे लाउडस्पीकर-डीजे आदि के शोर से न केवल मौलिक मानव अधिकार की क्षति होती है बल्कि आसपास रहने वालों को बेहद परेशानी होती है। लिहाजा, अधिनियम की जिस धारा में दिए गए प्रावधान का दुरुपयोग करते हुए लाउड स्पीकर आदि बजाए जाने की अनुमति हासिल कर ली जाती थी, उसे असंवैधानिक करार दिया जाता है।
हाईकोर्ट के इस आदेश के साथ ही साल भर चलने वाले त्योहारों और धार्मिक व सामाजिक समारोहों के दौरान उपयोग किए जाने वाले ध्वनि विस्तारकों व दूसरे उपकरणों से फैसले वाले शोर से मुक्त जीवन जीने का आम जनता का सपना साकार हो गया है। दुर्भाग्य है कि भले ही कानून कुछ भी कहता हो, अदालतें कड़े आदेष देती हों, लेकिन धर्म के कंघे पर सवार हो कर षोर मचाने वाले लाउडस्पीकर हैं कि मानते ही नहीं हैं। गत दो सालों के दौरान अकेले उत्तर प्रदेष में हुए 20 से ज्यादा दुर्भाग्यषाली दंगों का मुख्य अभियुक्त यही लाउडस्पीकर ही रहा हे। ये ना केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बने हैं, बल्कि आम लोगों की सेहत और पर्यावरण के भी दुष्मन बने हुए है। सभी लोग इनसे तंग है, लेकिन चुनौती यही है कि इन पर कानून सम्मत कार्यवाही कौन व कैसे करे।
अभी इसी मंगलवार को अमरोहा के  डिडौली कोतवाली के गांव खैया शेखूपुरा में मंगलवार रात तरावीह के दौरान दूसरे पक्ष द्वारा धार्मिक स्थल पर लाउडस्पीकर बजाने पर विवाद हो गया। विरोध जताने गए पक्ष के चार लोगों को दूसरे वर्ग ने पकड़कर उनकी पिटाई कर दी। जिस पर दोनों ओर पथराव हो गया। हालात बिगड़ते देख जनपद से आसपास का फोर्स गांव में बुलाना पड़ा। मंगलवार रात करीब साढ़े दस बजे तरावीह के दौरान ही गांव के पश्चिम में स्थित शिव मंदिर में कीर्तन के लिए लाउडस्पीकर बजने लगा। ग्रामीणों के मुताबिक दूसरे पक्ष ने इस पर एतराज जताया और चार-पांच युवक मंदिर पर पहुंचकर लाउडस्पीकर बंद करने के लिए कहने लगे। बताते हैं कि इस पर यह पक्ष राजी नहीं हुआ और तनातनी शुरू हो गई। गाली-गलौज के बीच मारपीट शुरू हो गई। उ.प्र में ही सन 2014 के जून-जुलाई में मुरादाबाद के कांठ कस्बे में एक मंंिदर पर लाउड स्पीकर लगाने का बवाल इतना बढा था कि वहां कई दिन कफ्र्यू लगाना पड़ा था। उस मामले में इलाहबाद हाई कोर्ट ने साफ कर दिया था कि मंदिर पर भोंपू नहीं लगेगा, इसके बावजूद वहां हंगामा हुआ। मेरठ के मुंडाली क्षेत्र के नंगलामल गांव में रोजा इफ्तार के दौरान करीबी मंदिर पर भोंपू बजाने के कारण हुए झगउ़े में दो लोग मारे गए थे। बरेली में तो लाउड स्पीकर बजाने को ले कर दो बार दंगे हो चुके हैं। दिल्ली में त्रिलांेकपुरी में दीवाली के पहले जागरण के लिए लाउड स्पीकर बजाने पर हुआ बवाल 15 दिनों तक चला था। धार्मिक जुलूस निकालने के दौरान कतिपय धार्मिक स्थल के सामने से लाउड स्पीकर या डीजे बजाने को लकर गत तीन सालों के दौरान देषभर में 100 से ज्यादा जगह आग लग चुकी है। ये लाउडस्पीकर केवल दंगों के कारक ही नहीं बनते हैं, ये उस आग में घी का काम भी करते हैं। छोटे से विवाद पर अपने समाज के लेागों को एकत्र करने, अफवाहें फैलाने, लोगों को उकसाने में भी इन भोंपू की खलनायकी भूमिका होती है।

यह त्रासदी है कि जहां अभी कुछ दषक पहले तक सुबह आंखे खुलने पर पक्षियों का कलरव हमारे कानों में मधु घोलता था, आज देष की बड़ी आबादी अनमने मन से धार्मिक स्थलों के बेतरतीब षोर के साथ अपना दिन षुरू करता है। यह षोर पक्षियों, प्रकृति प्रेमी कीट-पतंगों, पालतु जीवों के लिए भी खतरा बना है। बुजुर्गों, बीमार लोगों और बच्चों के लिए यह असहनीय षोर बड़ा संकट बन कर उभरा है। सारी रात तकरीर, जागरण या फिर षादी, जन्मदिन के लिए डीजे की तेज आवाज  कई लोगों के लिए जानलेवा बन चुकी है। दुखद तो यह है कि अब यह बेकाबू रोग पूरी तरह निरंकुष हो चुका हे। सनद रहे कि देषभर में 21 लाख से ज्यादा गैरकानूनी धार्मिक स्थलों का आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया गया है और ये सभी पूजा स्थलों के लिए जमीन कब्जा करने और लोगों को बरगलाने में लाउडस्पीकर बड़ा अस्त्र हैं।
ऐसा नहीं है कि इस बवाली भोंपू पर कानून नहीं है, लेकिन कमी है कि उन कानूनों-आदेषों का पालन कौन करवाए। अस्सी डेसीमल से जयादा आवाज ना करने, रात दस बजे से सुबह छह बजे तक ध्वनि विस्तारक यंत्र का इस्तेमाल किसी भी हालत में ना करने, धार्मिक सथ्लों पर आइ फुट से ज्यादा ऊंचाई पर भोंपू ना लगाने, अस्पताल-षैक्षिक संस्थाओं, अदालत व पूजा स्थल के 100 मीटर के आसपास दिन हो या रात, लाउडस्पीकर का इस्तेमाल ना करने, बगैर पूर्वानुमति के पीए सिस्टम का इस्तेमाल ना करने जैसे ढेर सारे नियम, उच्च अदालतों के आदेष सरकारी किताबों में दर्ज हैं, लेकिन गली-मुहल्ले के धार्मिक स्थलों में आए रोज आरति, तकरीर, प्रवचन, नमाज के नाम पर पूरी रात आम लोगों को तंग करने पर कोई रोक-टोक नहीं है। तेज ध्वनि के कारण झगड़े होना महज धार्मिक प्रयोजन तक ही सीमित नहीं हैं, आए दिन षादी-विवाह में डीजे बजाने, उस पर पसंदीदा गाना चलाने, उसकी आवाज कम या ज्यादा करने को लेकर पारिवारिक आयोजन खूनी संघर्श में बदल जाते हैं। समाज में संकट का बीज बोने वाले डीजे पर कहने को तो पूरी तरह रोक लगी है, लेकिन इसकी परवाह किसी को भी नहीं है। अब तो धार्मिक जुलूसों में छोटे ट्रकों पर डीजे की गूंजती आवाज दूसरों को भड़काने, चिढ़ाने का काम करती दिखती है।
यह बात सभी स्वीकारते हैं कि दंगे, झगड़े देष व समाज के  विकास के दुष्मन है। यह भी सभी मानते हैं कि हल्ला-गुल्ला, या तेज आवाज में पूजा-अर्चना करने से भगवान ना तो खुष होता है और ना ही इससे धार्मिकता या परंपरा का कुछ लेना-देना है। यह भी सर्वसम्मत है कि यह सब गैरकानूनी व अवैध है। फिर इसे कड़ाई से रोकने में समस्या क्या है? इसके लिए सभी धार्मिक नेताओं, जन प्रतिनिधियों और कार्यपालिका को एकजुट हो कर त्वरित कदम उठाने चाहिए।

Insufficient rain is sufficient for India


संकट अल्पवर्षा नहीं कुछ और है

                                                                                                                                             पंकज चतुर्वेदी

भारत में औसतन 110 सेंटीमीटर बारिश होती है, जो कि दुनिया के अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है। हम बारिश के कुल पानी का महज 15 प्रतिशत ही संचित कर पाते हैं।

 
amar ujala 5-7-15
जो आशंका इस साल अप्रैल में जताई जा रही थी, उसके विपरीत जून में तो जमकर बरसे बादल। सामान्य से 14 फीसदी ज्यादा बारिश दर्ज की गई है। यही नहीं, भारत के खेती-प्रधान इलाकों में अधिकांश जगह ताल-तलैया, नदी-नाले क्षमता से ज्यादा भर गए हैं। बहुत से इलाकों में बाढ़ के हालात हैं। अब कहा जा रहा है कि अाषाढ़ में जो बरस गया वह ठीक है, सावन-भादो रीते जाएंगे। सवाल उठता है कि क्या अब कम बादल बरसे तो देश के सामने सूखे या पानी के संकट का खतरा खड़ा होगा?
यह सवाल हमारे देश में लगभग हर तीसरे साल खड़ा हो जाता है कि ′औसत से कम′ पानी बरसा तब क्या होगा? देश के 13 राज्यों के 135 जिलों की कोई दो करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि प्रत्येक दस साल में चार बार पानी के लिए त्राहि-त्राहि करती है। इस साल भी मौसम विभाग ने चेता दिया है कि बारिश कम हो सकती है। जो किसान अभी ज्यादा और असमय बारिश की मार से उबर नहीं पाया था, उसके लिए एक नई चिंता! उधर अभी अच्छी बारिश हुई है, लेकिन दाल, सब्जी, व अन्य उत्पादों के दाम बाजार में आसमानी हो गए। केंद्र से लेकर राज्य और जिले से लेकर पंचायत तक इस बात का हिसाब-किताब बनाने में लग गए हैं कि यदि कम बारिश हुई, तो राहत कार्य के लिए कितना बजट चाहिए और यह कहां से मिलेगा। असल में इस बात को सब नजरअंदाज कर रहे हैं कि यदि सामान्य से कुछ कम बारिश भी हो और प्रबंधन ठीक हो, तो समाज पर इसके असर को गौण किया जा सकता है।
जरा मौसम महकमे की घोषणा के बाद उपजे आतंक की हकीकत जानने के लिए देश की जल-कुंडली भी बांच ली जाए। भारत में दुनिया की कुल जमीन या धरातल का 2.45 फीसदी क्षेत्रफल है। दुनिया के कुल संसाधनों में से चार फीसदी हमारे पास हैं व जनसंख्या की भागीदारी 16 प्रतिशत है। हमें हर साल बारिश से कुल 4000 घन किलोमीटर पानी प्राप्त होता है, जबकि धरातल या उपयोग लायक भूजल 1869 घन किलोमीटर है। इसमें से महज 1122 घन मीटर पानी ही काम आता है। जाहिर है कि बारिश का जितना हल्ला होता है, उतना उसका असर पड़ना चाहिए नहीं। हां, एक बात सही है कि कम बारिश में भी उग आने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी आदि की खेती व इस्तेमाल सालों-साल कम हुआ है, वहीं ज्यादा पानी मांगने वाले सोयाबीन व अन्य नकदी फसलों ने खेतों में अपना स्थान बढ़ाया है। इसके चलते बारिश पर निर्भर खेती बढ़ी है। तभी थोड़ा भी कम पानी बरसने पर किसान मायूस दिखता है। देश के उत्तरी हिस्से में नदियों में पानी का अस्सी फीसदी जून से सितंबर के बीच रहता है, दक्षिणी राज्यों में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत का है। जाहिर है कि शेष आठ महीनों में पानी का जुगाड़ न तो बारिश से होता है और न ही नदियों से।
कहने को तो सूखा एक प्राकृतिक संकट है, लेकिन आज विकास के नाम पर इंसान ने भी बहुत कुछ ऐसा किया है जो कम बारिश के लिए जिम्मेदार है। राजस्थान के रेगिस्तान और कच्छ के रण गवाह हैं कि पानी की कमी इंसान के जीवन के रंगों को मुरझा नहीं सकती है। वहां सदियों से, पीढ़ियों से बेहद कम बारिश होती है। इसके बावजूद वहां लोगों की बस्तियां हैं, उन लोगों का बहुरंगी लोक-रंग है। वे कम पानी में जीवन जीना और पानी की हर बूंद को सहेजना जानते हैं।
पानी की हर बूंद को स्थानीय स्तर पर सहेजने, नदियों के प्राकृतिक मार्ग में बांध, रेत निकालने, मलबा डालने, कूड़ा मिलाने जैसी गतिविधियों से बचकर, पारंपरिक जलस्रोतों-तालाब, कुएं, बावड़ी आदि के हालात सुधार कर, एक महीने की बारिश के साथ साल भर के पानी की कमी से जूझना कतई कठिन नहीं है। सूखे के कारण जमीन के कड़े होने, या बंजर होने, खेती में सिंचाई की कमी, रोजगार घटने व पलायन, मवेशियों के लिए चारे या पानी की कमी जैसे संकट उभरते हैं। यहां जानना जरूरी है कि भारत में औसतन 110 सेंटीमीटर बारिश होती है, जो कि दुनिया के अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है। यह बात दीगर है कि हम हमारे यहां बरसने वाले कुल पानी का महज 15 प्रतिशत ही संचित कर पाते हैं। कम पानी के साथ बेहतर समाज का विकास कतई कठिन नहीं है, बस एक तो हर साल, हर महीने इस बात के लिए तैयारी करनी होगी कि पानी की कमी है। दूसरा ग्रामीण अंचलों की अल्प वर्षा से जुड़ी परेशानियों के निराकरण के लिए सूखे का इंतजार करने के बनिस्पत इसे नियमित कार्य मानना होगा।

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गुरुवार, 2 जुलाई 2015

Stop wastage of food

rashtriy sahara 3-7-15
कैसे रुके अन्न की बर्बादी
पंकज चतुव्रेदी
युक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 19.4 करोड़ लोग भूखे सोते हैं। हालांकि सरकार के प्रयासों से पहले से ऐसे लोगों की संख्या कम हुई है। भूख, गरीबी, कुपोषण व उससे उपजने वाली स्वास्य, शिक्षा, मानव संसाधन प्रबंधन की दिक्क्तें देश के विकास में सबसे बड़ी बाधक हैं। हमारे यहां न अन्न की कमी है और न रोजगार के लिए श्रम की। कागजों पर योजनाएं भी हैं। नहीं हैं तो योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार स्थानीय स्तर मशीनरी में जिम्मेदारी व संवेदना की। जिस देश में अनाज भंडारण के लिए गोदामों में जगह न हो, जहां सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ाघर का पेट भरता हो, वहां कई लोग भोजन के अभाव में दम तोड़ देते हैं। पिछले महीने छत्तीसगढ़ में एक बच्चा भूख से मर गया। बंगाल के बंद हो गए चाय बागानों में मजूदरों के भूख के कारण दम तोड़ने की बात हो या महाराष्ट्र में शिरडी मंदिर के पास मेलघाट में बच्चों की कुपोषण से मौत की खबर या राजस्थान के बारां जिले में सहरिया आदिवासियों की बस्ती में पैदा बच्चों में से अस्सी फीसद का उचित खुराक न मिलने के कारण बचपन में ही दम तोड़ना। इस देश में यह हर रोज हो रहा है लेकिन भ्रष्ट शासन-व्यवस्था और खाये अघाये वर्ग का इससे लेना-देना नहीं।जहां खाद्य और पोषण सुरक्षा की कई योजनाएं अरबों रपए की सब्सिडी पर चल रही हैं, जहां मध्याह्न भोजन योजना के तहत 12 करोड़ बच्चों को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा हो, जहां हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन करोड़ों का सरकारी फंड खर्च होता हो, वहां भूख से मौत दर्शाता है कि योजनाओं व हितग्राहियों के बीच अब भी पर्याप्त दूरी है। भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के दस लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र ने जारी किए हैं। ऐसे में नवरात्र पर गुजरात के गांधीनगर जिले के एक गांव में माता की पूजा के नाम पर 16 करोड़ रपए दाम के साढ़े पांच लाख किलो शुद्ध घी को सड़क पर बहाने, मध्यप्रदेश में एक राजनीतिक दल के महासम्मेलन के बाद नगर निगम के सात ट्रकों में भर पूड़ी व सब्जी कूड़ेदान में फेंकने की घटनाएं दुभाग्यपूर्ण व शर्मनाक हैं।
Daily News Jaipur 9-7-15
हर दिन लाखों लोगों के भूखे पेट सोने के गैर सरकारी आंकड़ो वाले भारत के ये आंकड़े भी विचारणीय हैं। देश में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट गेहूं की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को सालभर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारा 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इस लिए बेकाम हो जाता है, क्योंकि उसे रखने के लिए उचित भंडारण की सुविधा नहीं है। देश के कुल उत्पादित सब्जी व फल का 40 फीसद प्रशीतक व समय पर मंडी तक न पहुंच पाने के कारण सड़-गल जाता है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है। जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं, उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी सड़ने से बचा सके। एक साल में जितना सरकारी खरीद का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण मिट्टी हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पांच हजार वेयर हाउस बन सकते हैं। यदि पंचायत स्तर पर ही एक कुंतल अनाज का आकस्मिक भंडारण व जरूरतमंदों को देने की नीति का पालन हो तो कम से भूखा कोई नहीं मरेगा। बुंदेलखंड के पिछड़े जिले महोबा के कुछ लेगों ने ‘‘रोटी बैंक’ बनाया है। बैंक से जुड़े लेग भोजन के समय घरों से ताजी रोटियां एकत्र कर उन्हें अच्छे तरीके से पैक कर भूखों तक पहुंचाते हैं। बगैर सरकारी सहायता के चल रहे इस प्रयास से हर दिन चार सौ लोगों को भोजन मिल रहा है। इच्छाशक्ति हो तो छोटे से प्रयास भी भूख पर भारी पड़ सकते हैं। विकास, विज्ञान, संचार व तकनीक में हर दिन कामयाबी की नई ऊंचाइयां छूने वाले मुल्क में इस तरह बेरोजगारी व खाना न मिलने से होने वाली मौतें मानवता व हमारे ज्ञान के लिए भी कलंक हैं। हर जरूरतमंद को अन्न पहुंचे, इसके लिए सरकार को तो चुस्त-दुरुस्त होना ही होगा, समाज भी संवेदनशील बने। हम इसके लिए पाकिस्तान से कुछ सीख लें जहां शादी व सार्वजनिक समारोह में पकवान व मेहमानों की संख्या तथा खाने की बर्बादी पर सीधे गिरफ्तारी का कानून है। जबकि हमारे यहां शादी-समारोह में आमतौर पर 30 प्रतिशत खाना बेकार जाता है। गांव स्तर पर अन्न बैंक, प्रत्येक गरीब व बेरोजगार के आंकड़े रखना जैसे कार्य में सरकार से ज्यादा समाज को अग्रणी भूमिका निभानी होगी। 

बुधवार, 1 जुलाई 2015

Please do not promote slow poison :tobacco



धुएं में उड़ गया कानून
पंकज चतुर्वेदी



Raj Express 2-7-15
अभी राजस्थान में तंबाकू व उसके उत्पादों के व्यापार पर टैक्स बहुत कम कर दिया गया। कहा तो यह गया कि पडोसी राज्यों के बराबर कराधान के इरादे से ऐसा किया गया, लेकिन इसमें किसी ताकतवर तंबाकू लाॅबी को फायदा पुहंचाने की भी चर्चा है। भले ही वह चर्चा सच ना हो, लेकिन यह सच है कि टैक्स कम कर दाम करने से तंबाकू के इस्तेमाल को प्रोत्साहन ही मिलेगा। गौर करने वाली बात है कि खुद राज्य सरकार का एक सर्वे कहता है कि राज्य में हर दिन 250 नए लोग तंबाकू के सेवन की ओर आकर्शित हो रहे हैं । याद करें कोई चार साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने जानलेवा गुटके के पाउच बेचने पर सख्त पाबंदी लगा दी थी। कुछ दिनों उसका असर दिखा भी, लेकिन आज हर जगह इसकी बिक्री चल रही है । डेढ दशक पहले राजधानी दिल्ली को देश  का पहला ‘‘धूम्रपान मुक्त’’ राज्य बनाने के नाम पर खूब वाह-वाही लूटी गई । बैनर, होर्डिंग्स और अखबारी विज्ञापनों ने बिगडै़ंल निरंकुष बीड़ी-पियक्कड़ों को बरबस आतंकित भी  कर दिया । लेकिन ना तो आला अफसरों के हाथों से सफेद डंडी छूटी और ना ही कानून के रखवालों के होठ बीडि़यों से जुदा हुए । बस में ड्राइवर-कंडक्टर हों या अस्पताल में डाक्टर, सभी का धुआं उड़ना जारी रहा । सरकारी दफ्तरों में इस बात की पाबंदी के बोर्ड तो लग गए, लेकिन रोक के कोई माकूल इंतजाम नहीं हुए। लोगों का स्वास्थ्य तो इस जहरीले धुएं में घुट ही रहा था,कानूनी पुर्जा भी घुट-घुट कर मर गया ।
तंबाकू का मुख्य अंश  ‘‘निकोटिन’’ नामक खतरनाक विष  होता है । जो हेरोइन, कोकीन से भी अधिक जहरीला और आर्सेनिक व सायनाइड से कहीं घातक है । किसी स्वस्थ व्यक्ति को मात्र 400 मिलीग्राम निकोटिन का इंजेक्षन दे दिया जाये तो उसकी तत्काल मौत हो जायेगी । जान लें कि आधा किलो तंबाकू में 380 ग्राम निकोटीन मौजूद होता है ।
तंबाकू उत्पादन के मामले में भारत दुनिया भर में तीसरे नंबर पर आता है । यहां की सालाना पैदावार 51  करोड 90 लाख किलो है । इसमें से 41 करोड किलो देषवासी फूंक डालते हैं । अनुमान है कि कोई 11करोड महिलाओं सहित 33 करोड़ लोग तंबाकू का सेवन करती हैं । इनमें से 70 फीसदी लोग बीड़ी पीते हैं, षेश या तो इसे सीधे खाते हैं या फिर सिगरेट के जरिए । सरकारी आंकड़े हैं कि भारत में । सालाना 90 अरब बीडि़यों का धुआं उड़ता है । 55 करोड़ सिगरेट प्रतिदिन का गणित अलग है । बात अब और बिगड रही है क्योंकि औसतन साढ़े पांच हजार नए लोग हर रोज इस जहर के भक्षण में शामिल हो रहे हैं । वार्षिक  2.1 फीसदी की दर से खपत में बढ़ोतरी होना एक खतरे की घंटी है । दुष्परिणाम  सामने हैं-भारत में हर साल कोई 15 लाख लोग फैफडे के कैंसर से मर रहे हैं, क्योंकि ये सभी तंबाकूबाज होते हैं ।
खतरनाक तंबाकू के सेवन से हतोत्साहित करने के लिए 1992 में केन्दª सरकार ने एक विधेयक का मसौदा तैयार किया था, पर आम राय बनाने के नाम पर वह कहीं ठंडे बस्ते में बंधा पड़ा है । याद हो 1975 में भी एक विधेयक इस दषा में लाया गया था । जिसके तहत तंबाकू उत्पादों पर  वैधानिक चेतावनी लिखना जरूरी घोशित किया गया था । उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश  पर चेतावनी  के चित्र भी छपने लगी। लेकिन इस जहर का इस्तेमाल करने वालों के लिए वह चेतावनी ‘‘काला अक्षर भैंस बराबर’’ के मानिंद है। एक विध्ेायक भी लाया गया था, जिसमें देष भर में तंबाकू उम्पादों के  विझापनों से ले कर खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रायोजन में सिगरेट कंपनियों की भागीदारी पर पाबंदी लगाए जाने,सिगरेट की तंबाकू में निकोटिन और टार की मात्रा के लिए निष्चित मापदंड तय करने और उसकी जांच हेतु  राष्ट्रीय  प्रयोग शा ला खोलने का भी प्रावधान था । उस विधेयक में टीवी और अन्य सरकारी प्रचार माध्यमों पर तंबाकू सेवन के दुश्परिणामों के अधिक कार्यक्रम देने ; ऐसे कार्यक्रमों के प्रसारण पर रोक लगाने, जिनमें अदाकार तंबाकू सेवन या धूम्रपान कर रहा हो, आदि का जिक्र था । षैक्षिक संस्थाओं की 100 मीटर परिधि में सिगरेट-तंबाकू की बिक्री को गैर कानूनी घोशित करने को भी उस विधेयक में रखा गया था ।  ये सभी बाते कागजो से आगे बढ़ नहीं पाईं क्योंकि धूम्रपान या तंबाकू दोनों के मामले में सरकार की नीतियों, मंषाओं और घोशणाओं में जमीन आसमान का अंतर रहा है । बिल्कुल ‘‘गुड़ खा कर गुलगुले से परहेज करने’’ की तरह ।
वैसे तो 25 साल पहले सन 1990 में कई राज्य सरकारों ने अफ्ने दफतरों में धुम्रपान पर रोक के आदेष जारी किए थे । पर आज भी कालेज के प्राचार्य से लेकर सरकारी अस्पताल के डाक्टर तक और कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्रियों तक के हाथों से ‘‘धीमा जहर’’ छूटा नहीं है । साथ ही सभी दफतरों में ऐष ट्रे और तंबाकू खाने वालों के लिए थूकने के लिए पीकदान यथावत मौजूद हैं । परिवहन मंत्रालय का कहना है कि राज्य परिवहन निगम की बसों में धूम्रपान कानूनन जुर्म है । यदि कोई यात्री बीडी -सिगरेट पीता है तो उसे जुर्माना हो सकता है पर इस कानून को लागू कराने वाले बस के ड्राईवर-कंडक्टर स्वयं जब धुआं उड़ाते हैं तो यात्रियों को कौन रोकेगा । परिवहन निगमों में ड्राइवर-कंडक्टर की भर्ती में धूम्रपान ना करने वाले को प्राथमिकता देना षायद इस कानून के पालन में सहयोगी हो सकता है । ‘‘खेल और कला तंबाकू रहित’’ का नारा केन्दªीय स्वास्थय मंत्रालय ने 1996 में दिया था । उल्लेखनीय है कि लगभग सभी चर्चित क्रिकेट, फुटबाल, टेनिस या राफिटंग टूर्नामेंटों में सिगरेट कंपनियां प्रायोजक हैं और उनका लेबल लगाकर खेलने में स्टार खिलाड़ी फक्र महसूस करते हैं । इसका प्रसारण मय विज्ञापनों के सरकारी दूरदर्ष़न पर षान से होता है ।
तंबाकू प्रयोग नियंत्रण में सरकार के प्रयास जिस तरह से चल रहे हैं उससे स्पश्ट है कि षासन में बैठे लोग किसी दवाबवष इस जहर व्यापार पर रोक नहीं लगा पा रहे हैं । षायद सरकार को उस 2500 करोड रूपये के घाटे की चिंता है, जो उसे हर साल तंबाकू उत्पाद बिक्री पर लगे एक्साइज टैक्स से प्राप्त होता है । खुद सरकार ने सिगरेट बनाने वाली कंपनियों में 28.42 करोड रूपयों का निवेष कर रखा है । सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने तंबाकू पैदा करने वाले किसानों को पांच सौ करोड रूपये के कर्जे दे रखे हैं । बीड़ी-सिगरेट के कारखानों के मालिकों को होने वाले मुनाफे से विभिन्न राजनैतिक पार्टियों को कोशपूर्ति भी इसमें एक बड़ा बाधक है ।
उत्तर प्रदेष के उरई कस्बे में आधा सैंकडा से अधिक गुटखा कारखाने हैं । यहां तंबाकू में कत्था, चूना, सुपारी, पिपरमेंट आदि मिलाकर गुटखे तैयार किए जाते हैं । इस किस्म के तैयार तंबाकू के पाउच सारे देष में करोड़ो की तादाद में यहां से सप्लाई हो रहे हैं । पिछले साल बुंदेलखंड के कुछ जागरूक डाक्टरों ने इस पर षोध किया तो पाया गया कि इन गुटखों को खाने वालों का 30 प्रतिषत मुंह के कैंसर के षिकार हो गए हैं । इसके सेवन से आंतों में अल्सर होना तय होता है । इन गुटखों को आधिक नषीला और अधिक बिक्री योग्य बनाने के लिए उनमें अन्य अवांछित पदार्थ मिलाना भी पाया गया । जब ये रपट अखबारों में छपी तो तुरत-फुरत पुलिस ने इन गुटखा कारखानों पर छापे पड़ेे, उन्हें सील किया गया । पर चर्चित ब्रांड के गुटकों की बाजार में सप्लाई यथावत बनी रही । बाद में ये जांच-पड़ताल भी राजनैतिक दावपेंचों में उलझ कर खत्म हो गई । आज इस जहर की बिक्री जोषोखरोस से जारी है । कहने को मध्यप्रदेष देष का पहला और केरल दूसरा ऐसा राज्य बन गया है, जहां गुटके की बिक्री पर पूरी तरह पाबंदी है, लेकिन इसके ये सभी प्रयास नारों के तौर पर तो बहुत लुभावने हैं, लेकिन व्यावहारिकता के लिए आम लोगों का इससे सहमत होना जरूरी है।
तंबाकू सेवन पर नियंत्रण न सिर्फ देषवासियों की स्वास्थय सुरक्षा का सवाल है बल्कि कार्यरत लोगों की कार्यक्षमता बढ़ाने का भी जरिया है । हमारे देष में तंबाकू सेवन से उपजे रोगों के इलाज में 248 करोड रूपये सालाना खर्च होते हैं। फिर इन बीमार लोगों के काम ना करने से उद्योग धंधो को प्रतिवर्श 300 करोड़ का घाटा होता है सो अलग । तंबाकू सेवन पर जहां सरकार को कड़ाई से कदम उठाने होंगे वहीं प्रषिक्षित और अभिजात्य समाज को इस विशय में अपना  नजरिया बदलना होगा ।
सिगरेट पीने की शुरूआत शान दिखाने के रूप में होती है, फिर यह षौक और आगे चल कर आदत बन जाती है । चूंकि तंबाकू सैंकड़ों किसानों की रोजी-रोटी है, करोड़ों परिवार इससे बीड़ी बना कर अपना पेट भरते हैं । ऐसे में इन लोगों के लिए रोजगार के अन्य अवसर दिए बिना उन पर रोक लगाना भी अमानवीय ही होगा । इस प्रकार तंबाकू पाबंदी की कोषिषें सामाजिक, आर्थिक, और कानूनी तीनों समीकरणों में माकूल बदलाव के बाद ही सफल हो पाएंगी ।

पंकज चतुर्वेदी
यू जी-1, 3/186 राजेन्द्र नगर सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद-201े005
संपर्क 9891928376

Flood : The men made disaster

आखिर क्यों उफन जाती हैं नदियां
 पंकज चतुर्वेदी
पंकज चतुर्वेदी
शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन ऐसे प्रमुख कारण हैं, जो बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे हैं। मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों की त्रासदी है। अतएव बाढ़ के बढ़ते सुरसा-मुख पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र कुछ करना होगा। कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया...

अभी आषाढ़ शुरू ही हुआ था कि दो दिनों की बारिश ने उत्तरांचल व हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों पर कयामत ढहा दी, असम व पूर्वोत्तर राज्यों में हजारों लोग बाढ़ के कारण घर-बार छोड़ रहे हैं। बंगाल के कई जिलों में भी जल-विप्लव के यही हालात हैं। अभी तो बारिश के असली महीने सावन की शुरूआत हुई है और लगभग आधा बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश का बड़ा हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पानी-पानी होने की संभावना से भयभीत है। मानसून की पहली फुहार में ही आधे गुजरात की हालत बाढ़ के कारण खराब हो गई है। बीते कई सालों से यह तो हर बार की त्रासदी है कि भले ही कागजों पर सूखा हो, लेकिन ज्यों-ज्यों मानसून अपना रंग दिखाता है, वैसे ही देश के बड़े भाग में नदियां उफन कर तबाही मचाने लगती हैं। हालांकि सरकारी महकमे बाढ़ से निबटने के नाम पर लाखों रूपए की खरीद-फरोख्त कर पानी के आतंक को रोकने के लिए कागजों की बाढ़ लगाते हैं, पर शायद उनका असली उद्देश्य बाढ़ से हुई तबाही के बाद पुनर्वास के नाम पर अधिक बजट प्राप्त करना मात्र होता है। पिछले कुछ सालों के आंकड़े देखें तो पाएंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाकों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनाने लगी हैं और मौसम बीतते ही, उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है।सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 में बाढ़ग्रस्त भूमि की माप एक करोड़ हेक्टेयर थी। 1960 में यह बढ़ कर ढाई करोड़ हेक्टेयर हो गई। 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी और 1980 में यह आंकड़ा चार करोड़ पर पहुंच गया। अभी यह तबाही कोई सात करोड़ हेक्टेयर होने की आशंका है। पिछले साल आई बाढ़ से साढ़े नौ सौ से अधिक लोगों के मरने, तीन लाख मकान ढहने और चार लाख हेक्टेयर में खड़ी फसल बह जाने की जानकारी सरकारी सूत्र देते हैं। यह जानकर आश्चर्य होगा कि सूखे और मरुस्थल के लिए कुख्यात राजस्थान भी नदियों के गुस्से से अछूता नहीं है। देश में बाढ़ की पहली दस्तक असम में होती है। असम का जीवन कही जाने वाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मई-जून के मध्य में ही विनाश फैलाने लगती हैं। हर साल लाखों बाढ़ पीड़ित शरणार्थी इधर-उधर भागते हैं। सरकार उनके प्रति सहानुभूति प्रकट कर उन्हें सहायता का ढोंग करती है, लेकिन वहां की बाढ़ प्रभावित बस्तियों को सुरक्षित स्थान पर बसाहट के लिए कभी नहीं सोचा गया। बाढ़ से उजड़े लोगों को पुनर्वास के नाम पर एक बार फिर वहीं बसा दिया जाता है, जहां छह महीने बाद जल प्लावन होना तय ही होता है। यहां के पहाड़ों की बेतरतीब खुदाई कर हुआ अनियोजित शहरीकरण और सड़कों का निर्माण भी इस राज्य में बाढ़ की बढ़ती तबाही के लिए काफी हद तक दोषी है। सनद रहे वृक्षहीन धरती पर बारिश का पानी सीधा गिरता है और भूमि पर मिट्टी की उपरी परत, गहराई तक छेदता है। यह मिट्टी बहकर नदी-नालों को उथला बना देती है और थोड़ी ही बारिश में ये उफन जाते हैं।देश के कुल बाढ़ प्रभवित क्षेत्र का 16 फीसदी बिहार में है। यहां कोशी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बाधमती, कमला, महानंदा, गंगा आदि नदियां तबाही लाती हैं। इन नदियों पर तटबंध बनाने का काम केंद्र सरकार से पर्याप्त सहायता नहीं मिलने के कारण अधूरा है। यहां बाढ़ का मुख्य कारण नेपाल में हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं। ‘बिहार का शोक’ कही जाने वाली कोशी के उपरी भाग पर कोई 70 किलोमीटर लंबाई का तटबंध नेपाल में है। लेकिन इसके रखरखाव और सुरक्षा पर सालाना खर्च होने वाला कोई 20 करोड़ रुपया बिहार सरकार को झेलना पड़ता है। हालांकि तटबंध भी बाढ़ से निबटने में सफल नहीं रहे हैं। कोशी के तटबंधों के कारण उसके तट पर बसे 400 गांव डूब में आ गए हैं। कोशी की सहयोगी कमला-बलान नदी के तटबंध का तल सील्ट यानी गाद के भराव से उंचा हो जाने के कारण बाढ़ की तबाही अब पहले से भी अधिक होती हैं। फरक्का बैराज की दोषपूर्ण संरचना के कारण भागलपुर, नौगछिया, कटिहार, मंुगेर, पूर्णिया, सहरसा आदि में बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है। विदित हो आजादी से पहले अंग्रेज सरकार द्वारा बाढ़ नियंत्रण में बड़े बांध या तटबंधों को तकनीकी दृष्टि से उचित नहीं माना था। तत्कालीन गवर्नर हेल्ट की अध्यक्षता में पटना में हुए एक सम्मेलन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद सहित कई विद्वानों ने बाढ़ के विकल्प के रूप में तटबंधों की उपयोगिता को नकारा था। इसके बावजूद आजादी के बाद हर छोटी-बड़ी नदी को बांधने का काम अनवरत जारी है। बगैर सोचे समझे नदी-नालों पर बंधान बनाने के कुप्रभावों का ताजातरीन उदाहरण मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बहने वाली छोटी नदी केन है। बुंदेलखंड सदैव से बाढ़ सुरक्षित माना जाता रहा है। गत डेढ़ दशक से केन अप्रत्याशित ढंग से उफन रही है और पन्ना, छतरपुर और बांदा जिले में जबरदस्त नुकसान कर रही है। केन के अचानक रौद्र हो जाने के कारणों को खोजा तो पता चला कि यह सब तो छोटे-बड़े बांधों की कारस्तानी है। सनद रहे केन नदी बांदा जिले में चिल्ला घाट के पास यमुना में मिलती है। जब अधिक बारिश होती है या किन्हीं कारणों से यमुना में जल आवक बढ़ती है, तब इसके बांधों के कारण इसका जल स्तर कुछ अधिक ही बढ़ जाता है। उधर केन और उसके सहायक नालों पर हर साल सैकड़ों स्टाप-डेम बनाए जा रहे हैं, जो इतने घटिया हैं कि थोड़ा ही जल संग्रहण होने पर टूट जाते हैं। केन में बारिश का पानी बढ़ता है, फिर स्टाप-डेमों का जल-दबाव बढ़ता है। साथ ही केन की राह पर स्थित पुराने ओवर-एज हो गए बांधों में भी टूट-फूट होती है। यानी केन क्षमता से अधिक पानी ले कर यमुना की और लपलपाती है। वहां का जल स्तर इतना उंचा होता है कि केन के प्राकृतिक मिलन स्थल का स्तर नीचे रह जाता है। रौद्र यमुना, केन की जलनिधि को पीछे ढकेलती है। इसी कशमकश में नदियों की सीमाएं बढ़ कर गांवों-सड़कों-खेतों तक पहुंच जाती हैं।वैसे शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन ऐसे प्रमुख कारण हैं, जो बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे हैं। जब प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कर कंक्रीट का जंगल सजाया जाता है तो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही है, साथ ही सतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है। फिर शहरीकरण के कूड़े ने समस्या को बढ़ाया है। यह कूड़ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है। फलस्वरूप नदी की जल ग्रहण क्षमता कम होती है ।पंजाब और हरियाणा में बाढ़ का कारण जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में हो रहा जमीन का अनियंत्रित शहरीकरण ही है। इससे वहां भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और इसका मलबा भी नदियों में ही जाता है। पहाड़ों पर खनन से दोहरा नुकसान है। इससे वहां की हरियाली उजड़ती है और फिर खदानों से निकली धूल और मलबा नदी नालों में अवरोध पैदा करता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों के मामले में तो मामला और भी गंभीर हो जाता है। सनद रहे हिमालय, पृथ्वी का सबसे कम उम्र का पहाड़ है। इसकी विकास प्रक्रिया सतत जारी है, तभी इसे जीवित-पहाड़ भी कहा जाता है। इसकी नवोदित हालत के कारण यहां का बड़ा भाग कठोर चट्टानें न हो कर, कोमल मिट्टी है। बारिश या बर्फ के पिघलने पर, जब पानी नीचे की ओर बहता है तो साथ में पर्वतीय मिट्टी भी बहा कर लाता है। पर्वतीय नदियों में आई बाढ़ के कारण यह मिट्टी नदी के तटों पर फैल जाती है। इन नदियों का पानी जिस तेजी से चढ़ता है, उसी तेजी से उतर जाता है। इस मिट्टी के कारण नदियों के तट बेहद उपजाऊ हुआ करते हैं। लेकिन अब इन नदियों को जगह-जगह बांधा जा रहा है, सो बेशकीमती मिट्टी अब बांधों में ही रुक जाती है और नदियों को उथला बनाती रहती है। साथ ही पहाड़ी नदियों में पानी चढ़ तो जल्दी जाता है, पर उतरता धीरे-धीरे है। पहली बारिश में ही आधे गुजरात के दरिया बन जाने का असली कारण वहां की छोटी नदियों का उथला होना ही है। मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों की त्रासदी है। अतएव बाढ़ के बढ़ते सुरसा-मुख पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र कुछ करना होगा। कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा कर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी, नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जोकि बाढ़ सरीखी भीषण विभीषिका का मुंहतोड़ जवाब हो सकते हैं।
श्चष्७००१०१०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व
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The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...