My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

Loud the voice against loudspeakers

धर्म-सम्मत नहीं है ध्वनिविस्तारक

                                                                                                                                          पंकज चतुर्वेदी


अगले सप्ताह मुहर्रम और दशहरा एक साथ है और इस अवसर की नजाकत को समझते हुए उ.प्र. सरकार ने लाउड स्पीकर व डीजे के प्रयोग पर पाबंदी लगा दी है। वैसे कुछ धार्मिक अनुष्ठान  के लिए कुछ श र्तों के साथ केवल लाउडस्पीकर का इस्तेमाल हो सकेगा। हालांकि अभी दो महीने पहले ही कांवड़ यात्रा के दौरान कानफोडू डीजे बजाने पर पाबंदी पर यह सरकार  विचित्र तर्क दे चुकी थी। दशकों से देश  के अलग-अलग हिस्सों से धार्मिक स्थलों पर लाउड स्पीकर लगा कर पूजा करने से भड़के तनावों के दंगों में बदलने की खबरें आती रहती हैं। ऐसे विवाद जान-माल का नुकसान तो करते ही हैं, सबसे बड़ी बात पुश्तों  से साथ रहे लेागों के आपसी भरोसे में दरार आ गई। यह सब हुआ महज धार्मिक स्थलों पर लाउड स्पीकर बजाने के विवाद में ।

गत दो साल के दौरान अकेले उत्तर प्रदेश  में कम से कम 25 जगहों पर महज इस बात के लिए तनाव हुआ कि दो अलग-अलग धर्मों के मानने वाले अपने  धार्मिक स्थल पर लगे भौंपू की आवाज कम करने को राजी नहीं थे।  त्योहार पर्व का मौसम चल रहा है।पाम चं नाम दिया जाता है धर्म व आस्था का और जोर आजामाईश  का जरिया बनते हैं लाऊड स्पीकर। हालांकि कागजोें पर कानून में इन्हें बजाना , इस पर षोर करना गैरकानूनी है, लेकिन धर्म के नाम पर इसमें दखल देने से प्रशा सन व सियासतदां दोनों ही परहेज करते है। नतीजा सामने हैं कि अजान व आरति के नाम पर टकराव व दंगों से मुल्क का सामाजिक ताना-बाना जर्जर हो रहा है।
दो साल पहले ही जबलपुर हाईकोर्ट ने जीवन में शोर के दखल पर गंभीर फैसला सुनाया है, जिसके तहत अब त्योहारों में सार्वजनिक मार्ग पर लाउडस्पीकरों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। यही नहीं कोर्ट ने अब ट्रैफिक बाधित करने वाले पंडालों पर भी अंकुश लगाने के आदेश दिए हैं। इस आदेश के बाद प्रशासन भी लाउडस्पीकर और पंडालों की अनुमति नहीं दे सकेगा। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अजय माणिकराव खानविलकर व जस्टिस शांतनु केमकर की डिवीजन बेंच ने समाजसेवी राजेंद्र कुमार वर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिए।

इसमें साफ किया गया कि त्योहार या सामाजिक कार्यक्रम के नाम पर अत्याधिक शोर मचाकर आम जनजीवन को प्रभावित करना अनुचित है। हाईकोर्ट मध्यप्रदेश कोलाहल निवारण अधिनियम-1985 की धारा-13 को असंवैधानिक करार दिया है। अभी इस धारा के प्रावधानों का दुरुपयोग करते हुए लोग डीजे आदि बजाने की अनुमति ले लेते हैं। हाईकोर्ट ने आने आदेष में कहा कि .किसी के मकान या सड़क किनारे लाउडस्पीकर-डीजे आदि के शोर से न केवल मौलिक मानव अधिकार की क्षति होती है बल्कि आसपास रहने वालों को बेहद परेशानी होती है। लिहाजा, अधिनियम की जिस धारा में दिए गए प्रावधान का दुरुपयोग करते हुए लाउड स्पीकर आदि बजाए जाने की अनुमति हासिल कर ली जाती थी, उसे असंवैधानिक करार दिया जाता है।
हाईकोर्ट के इस आदेश के साथ ही साल भर चलने वाले त्योहारों और धार्मिक व सामाजिक समारोहों के दौरान उपयोग किए जाने वाले ध्वनि विस्तारकों व दूसरे उपकरणों से फैसले वाले शोर से मुक्त जीवन जीने का आम जनता का सपना साकार हो गया है। दुर्भाग्य है कि भले ही कानून कुछ भी कहता हो, अदालतें कड़े आदेष देती हों, लेकिन धर्म के कंघे पर सवार हो कर शो र मचाने वाले लाउडस्पीकर हैं कि मानते ही नहीं हैं। गत तीन सालों के दौरान अकेले उत्तर प्रदेष में हुए 25 से ज्यादा दुर्भाग्यषाली दंगों का मुख्य अभियुक्त यही लाउडस्पीकर ही रहा हे। ये ना केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बने हैं, बल्कि आम लोगों की सेहत और पर्यावरण के भी दुष्मन बने हुए है। सभी लोग इनसे तंग है, लेकिन चुनौती यही है कि इन पर कानून सम्मत कार्यवाही कौन व कैसे करे।

धार्मिक जुलूस निकालने के दौरान कतिपय धार्मिक स्थल के सामने से लाउड स्पीकर या डीजे बजाने को लकर गत तीन सालों के दौरान देश भर में 100 से ज्यादा जगह आग लग चुकी है। ये लाउडस्पीकर केवल दंगों के कारक ही नहीं बनते हैं, ये उस आग में घी का काम भी करते हैं। छोटे से विवाद पर अपने समाज के लेागों को एकत्र करने, अफवाहें फैलाने, लोगों को उकसाने में भी इन भोंपू की खलनायकी भूमिका होती है।
एक बात और कोई भी धर्म की दर्शन  कोलाहल या अपने संदेश  को जबरिया अवांछित लोगों तक पहुँचाने  के विरूद्ध है और इस तरह से धार्मिक अनुश्ठान में भारीभरकम ध्वनिविस्तारक यंत्र की अनिवार्यता की बात करना धर्म-संगत भी नहीं है। कुरान शरीफ में लिखा है - ‘‘लकुम दीनोकुम, वलीया दीन!’ यानि तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए और हमारा धर्म हमारे लिए। यानी यदि कोई शख्स दूसरे धर्म में यकीन करता है, तो उसे जबरन अपने धर्म के बारे में न बताएं। लेकिन जब हम लाउडस्पीकर पर अजान देते हैं या तरावी पढ़ते हैं तो क्या दूसरे धर्मावलंबियों को जबरन अपनी बातें नहीं सुनाते? इसी तरह गीता रहस्य के अठारहवें अध्याय के 67-68 वें श्लोक में कहा गया है- इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां याभ्यसूयति।। अर्थात गीता के रहस्य को ऐसे व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत नहीं करना चाहिए जिसके पास इसे सुनने का या तो धैर्य ना हो या जो किसी स्वार्थ-विषेश के चलते इसके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट कर रहा है या जो इसे सुनने को तैयार नहीं है। जाहिर है कि लाउड स्पीकर से हम ये स्वर उन तक भी बलात पहुंचाते है। जो इसके प्रति अनुराग नहीं रखते।

यह त्रासदी है कि जहां अभी कुछ दश क पहले तक सुबह आंखे खुलने पर पक्षियों का कलरव हमारे कानों में मधु घोलता था, आज देष की बड़ी आबादी अनमने मन से धार्मिक स्थलों के बेतरतीब षोर के साथ अपना दिन षुरू करता है। यह षोर पक्षियों, प्रकृति प्रेमी कीट-पतंगों, पालतु जीवों के लिए भी खतरा बना है। बुजुर्गों, बीमार लोगों और बच्चों के लिए यह असहनीय षोर बड़ा संकट बन कर उभरा है। सारी रात तकरीर, जागरण या फिर षादी, जन्मदिन के लिए डीजे की तेज आवाज  कई लोगों के लिए जानलेवा बन चुकी है। दुखद तो यह है कि अब यह बेकाबू रोग पूरी तरह निरंकुश  हो चुका हे। सनद रहे कि देश भर में 21 लाख से ज्यादा गैरकानूनी धार्मिक स्थलों का आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया गया है और ये सभी पूजा स्थलों के लिए जमीन कब्जा करने और लोगों को बरगलाने में लाउडस्पीकर बड़ा अस्त्र हैं।
ऐसा नहीं है कि इस बवाली भोंपू पर कानून नहीं है, लेकिन कमी है कि उन कानूनों-आदेषों का पालन कौन करवाए। अस्सी डेसीमल से जयादा आवाज ना करने, रात दस बजे से सुबह छह बजे तक ध्वनि विस्तारक यंत्र का इस्तेमाल किसी भी हालत में ना करने, धार्मिक सथ्लों पर आइ फुट से ज्यादा ऊंचाई पर भोंपू ना लगाने, अस्पताल-षैक्षिक संस्थाओं, अदालत व पूजा स्थल के 100 मीटर के आसपास दिन हो या रात, लाउडस्पीकर का इस्तेमाल ना करने, बगैर पूर्वानुमति के पीए सिस्टम का इस्तेमाल ना करने जैसे ढेर सारे नियम, उच्च अदालतों के आदेष सरकारी किताबों में दर्ज हैं, लेकिन गली-मुहल्ले के धार्मिक स्थलों में आए रोज आरति, तकरीर, प्रवचन, नमाज के नाम पर पूरी रात आम लोगों को तंग करने पर कोई रोक-टोक नहीं है। तेज ध्वनि के कारण झगड़े होना महज धार्मिक प्रयोजन तक ही सीमित नहीं हैं, आए दिन षादी-विवाह में डीजे बजाने, उस पर पसंदीदा गाना चलाने, उसकी आवाज कम या ज्यादा करने को लेकर पारिवारिक आयोजन खूनी संघर्श में बदल जाते हैं। समाज में संकट का बीज बोने वाले डीजे पर कहने को तो पूरी तरह रोक लगी है, लेकिन इसकी परवाह किसी को भी नहीं है। अब तो धार्मिक जुलूसों में छोटे ट्रकों पर डीजे की गूंजती आवाज दूसरों को भड़काने, चिढ़ाने का काम करती दिखती है।
यह बात सभी स्वीकारते हैं कि दंगे, झगड़े देष व समाज के  विकास के दुष्मन है। यह भी सभी मानते हैं कि हल्ला-गुल्ला, या तेज आवाज में पूजा-अर्चना करने से भगवान ना तो खुष होता है और ना ही इससे धार्मिकता या परंपरा का कुछ लेना-देना है। यह भी सर्वसम्मत है कि यह सब गैरकानूनी व अवैध है। फिर इसे कड़ाई से रोकने में समस्या क्या है? इसके लिए सभी धार्मिक नेताओं, जन प्रतिनिधियों और कार्यपालिका को एकजुट हो कर त्वरित कदम उठाने चाहिए।


गुरुवार, 21 सितंबर 2017

Dry lakes and thirsty Bastar

तालाब खत्म करने से प्यासा है बस्तर


चार दशक पूर्व तत्कालीन टाउन प्लानिंग के अनुसार जगदलपुर में करीब आधा दर्जन से अधिक तालाब हुआ करते थे। जिसका उपयोग यहां के लोग निस्तार के लिए किया करते थे। तब दलपत सागर व गंगामुंडा के अलावा नयामुुंडा तालाब, बाला तराई, केवरामुंडा, रानमुंडा तथा तत्कालीन अघनपुर तथा वर्तमान में गुरुगोविंद सिंह व छत्रपति शिवाजी वार्ड में दो तालाब थे। लेकिन यहां देखने के लिए महज दो ही तालाब रह गये हैं। हालांकि अभी कोई तीन तालाब शहरी क्षेत्र में मौजूद है जिनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। 
बस्तर अंचल में रोजगार के नए अवसर सृजित करने के लिए कल-कारखानों, खेती के नए तरीकों और पारम्परिक कला को बाजार देने की कई योजनाएं सरकार बना रही है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि जब तक इलाके में पीने को शुद्ध पानी नहीं मिलेगा, ऐसी किसी भी योजना का सफल होना संदिग्ध है। पारंपरिक जल संसाधनों की साज संभाल से ही पानी का प्रबंधन करना आसान होगा।  
हर समय तर रहने वाला बस्तर अब पूरे साल बूंद-बूंद पानी को तरस रहा है। खासतौर पर शहरी इलाकों का विस्तार जिन तालाबों को सुखा कर किया गया, अब कंठ सूख रहे हैं तो लोग उन्हीं को याद कर रहे हैं। दो दशक पहले तक बस्तर इलाके में 25,934 तालाब हुआ करते थे, हर गांव में कम से कम तीन-चार ताल या जलाशय। ये केवल पानी की जरूरत ही नहीं पूरा करते थे, आदिवासियों की रोजी रोटी व इलाके के मौसम को सुहाना बनाने में भी भूमिका अदा करते थे। वर्ष 1991 के एक सरकारी दस्तावेज के मुताबिक इलाके के 375 गांव-कस्बों की सार्वजनिक जल वितरण व्यवस्था पूरी तरह तालाबों पर निर्भर थी। आज हालात बेहद खराब हैं। सार्वजनिक जल प्रणाली का मूल आधार भूजल हो गया है और बस्तर के भूजल के अधिकांश स्रोत बेहद दूषित हैं। फिर तालाब न होने से भूजल के रिचार्ज का रास्ता भी बंद हो गया। इन दिनों वहां जम कर बारिश हो रही है और शहर-कस्बे लबालब है। सड़कों, घरों में पानी भर रहा है, लेकिन तालाब खाली हैं और बाशिंदों के कंठ भी रीते हैं। यहां के तालाब महज जल संसाधन ही नहीं हैं, बल्कि बड़ी आबादी के लिए मछली, कमल गट्टा आदि के  माध्यम से जीवकोपार्जन का साधन भी हैं। तालाबों के दूषित होने से हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट भी खड़ा है।
यह बात सरकारी दस्तावेज में दर्ज है कि जब बस्तर, केरल राज्य से भी बड़ा एक विशाल जिला हुआ करता था, तब उसके चप्पे-चप्पे पर तालाब थे। आज जिला मुख्यालय बन गए जगदलपुर विकासखंड में 230,कांकेर विकासखंड में 275, नारायणपुर में 523, कोंडागांव में 623, बीजापुर में 302 और दंतेवाड़ा में 175 तालाब हुआ करते थे। दुर्गकोंदल में 410, फरसगांव में 678 कोंटा में 440, कोयलीबेड़ा विकासखंड में 503 तालाब हुआ करते थे। सुकमा, दरभा, भोपालपट्नम जैसे दूभर इलाकों का जनजीवन तो तालाबों पर ही निर्भर था। सनद रहे कि इलाके में ग्रेनाईट, 'क्वार्टजाइट जैसी चटटनों का बोलबाला है और इसमें सरंध्रता बहुत कम होती है। इसके चलते बारिश का जल रिसता नहीं है व तालाब व छोटे पोखर वर्षा को अपने में समेट लेते थे। आज के तालाबों के हालात तो बेहद दुखद हैं। 
बस्तर संभाग का मुख्यालय जगदलपुर है। बस्तर तो एक गांव है, कोंडागांव से जगदलपुर आने वाले मार्ग पर। सन् 1872 में महाराज दलपत राय अपनी राजधानी बस्तर गंाव से उठा कर जगदलपुर लाये थे। इसी याद में विशाल दलपतसागर सरोवर बनवाया गया था। कहा जाता है कि उस समय यह झीलों की नगरी था और आज जगदलपुर शहर का जो भी विस्तार हुआ है, वह उन्हीं पुराने तालाबों को पाट कर हुआ है। दलपतसागर का रकबा अभी सन् 1990 तक साढ़े सात सौ एकड़ हुआ करता था जो अब बामुश्किल सवा सौ एकड़ बचा है। पानी की पूरी सतह जलकुंभियों से पटी है व सफ ाई के अभाव में तालाब बेहद उथला हो गया है। थोड़ा-सा पानी बरसने पर शहर की कई कालोनियां पानी में डूब जाती हैं और वहां के वाशिंदे हल्ला-गुल्ला करते हैं कि पानी उनके घर में घुस रहा है। जबकि हकीकत तो यह है कि ये पूरी रिहाईश ही पानी के घर में घुस कर बसाई गई हैं। जल निधियों से समृद्ध ऐसे शहर में अब दलपत सागर तथा गंगा मुंडा तालाब को छोड़ कर अन्य तालाबों का कोई अता-पता नहीं है। 
चार दशक पूर्व तत्कालीन टाउन प्लानिंग के अनुसार जगदलपुर में करीब आधा दर्जन से अधिक तालाब हुआ करते थे। जिसका उपयोग यहां के लोग निस्तार के लिए किया करते थे। तब दलपत सागर व गंगामुंडा के अलावा नयामुुंडा तालाब, बाला तराई, केवरामुंडा, रानमुंडा तथा तत्कालीन अघनपुर तथा वर्तमान में गुरुगोविंद सिंह व छत्रपति शिवाजी वार्ड में दो तालाब थे। लेकिन यहां देखने के लिए महज दो ही तालाब रह गये हैं। हालांकि अभी कोई तीन तालाब शहरी क्षेत्र में मौजूद हंै जिनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। 
दंतेवाड़ा में लाल आतंक व पुलिस अत्याचार के ही इतने किस्से होते हैं कि जनता भूल गई है कि वे पानी के लिए भी तरस रहे हैं। यहां भी पुराने तालाबों में हो रहे अतिक्रमण और पटते तालाबों के गहरीकरण को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। दक्षिण बस्तर जिले के कारली, मांझीपदर, चितालंका, पुरनतरई, टेकनार, कुम्हाररास, चितालूर, दंतेवाड़ा, तुमनार, समलूर, बिंजाम, नागफ नी आदि स्थानों में सदियों पुराने विशाल जलाशय हैं। बारसूर को तो तालाबों और मंदिरों की नगरी ही कहा जाता है, यहां के 147 तालाबों में सौ से ज्यादा तालाब खेतों में तब्दील हो चुके हैं। पुरनतरई, कुम्हाररास, टेकनार, चितालूर, बारसूर के तालाबों से लगे जिन किसानों की खेत हैं, वे अपने खेतों का रकबा तालाबों की सीमा के अंदर तक बढ़ा चुके हैं।

कांकेर शहर में पानी का संकट स्थायी तौर  पर डेरा डाले हुए है। उदयनगर, एमजी वार्ड जैसे घने मुहल्ले में नल बमुश्किल आधा घंटा टपकते हैं। वहीं जमीन पर देखें तो कांकेर के चप्पे-चप्पे पर प्राचीन जल निधियां हैं जो अब पानी नहीं, मच्छर व गंदगी बांटती हैं। शहर की शान कहे जाने वाले डंडिया तालाब को चौपाटी निर्माण योजना के चलते आधे से ज्यादा हिस्सा पाट दिया गया है। पालिका की चौपाटी की योजना तो चौपट हुई उसके चलते तालाब का हिस्सा भी चौपट हो गया। शहर के माहुरबंद पारा वार्ड के बीचों-बीच स्थित डबरी है तो अब लोगों को याद ही नहीं है क्योंकि उस तक पहुंचने का रास्ता ही भूमाफिया चट कर गए है। इसके साथ ही तालाब के बड़े हिस्से पर दुकानें बना दी गईं।
शीतलापारा के दीवान तालाब को कचरे से पाट दिया गया। शहर के बीचोंबीच स्थित गोसाई तालाब का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है, क्योंकि उसे बाकायदा सुखाकर हजारों मकान बना दिए गए। कांकेर नगरपालिका दफ्तर के ठीक सामने स्थित दुधावा तालाब को बिल्डर देखते ही देखते हड़प गए व सरकारी रिकार्ड में वहां कालोनी दर्ज हो गई। सुभाष वार्ड की डबरी हो या फि र मेला भाठा स्थित कंकालीन तालाब, सरकारी अफसरों, नेताओं व बिल्डरों की मिलीभगत से पाट दिए गए।
हालात अकेले शहरों के ही नहीं दूरस्थ अंचलों के भी भयावह हैं। बस्तर संभाग के 70 फीसदी सिंचाई तालाबों का पानी सूख चुका है अथवा बहुत थोड़ा पानी बचा है। जलाशयों का पानी सूखने से इतना तो तय हो गया है कि आने वाले दिनों में सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलेगा और जल निस्तारी समस्या से भी ग्रामीणों को जूझना पड़ेगा। जलाशयों में गर्मी के दिनों में पानी के जल्दी सूख जाने की समस्या आठ-दस साल से ज्यादा गहराने लगी है। मौसम में परिवर्तन तथा गर्मी में बढ़ोतरी को सिंचाई विभाग के अफ सर इसका प्रमुख कारण मान रहे हैं।
बस्तर संभाग में जल संस्थान विभाग की 292 लघु व मध्यम सिंचाई योजनाएं स्थापित हैं, इनमें से 195 सिंचाई जलाशय है, तीन बड़े जलाशयों कोसारटेडा (जल भराव क्षमता 56 मिलियन क्यूबिक मीटर) परलकोट क्षमता 54 मिलियन क्यूबिक मीटर व मयाना जल भराव क्षमता 5 मिलियन क्यूबिक मीटर को छोड़ दिया जाये, तो शेष लघु योजनाएं हैं, जिनकी जल भराव क्षमता प्रत्येक की औसतन आधा क्यूबिक मीटर से एक क्यूबिक मीटर तक है।
जल संसाधन विभाग के संभागीय कार्यालय इंद्रावती परियोजना मंडल के अनुसार कोसारटेड में जलभराव क्षमता का करीब 35 फीसदी, परलकोट में 24 और मयाना में 7 फीसदी ही पानी बचा है। दूसरी तरफ 137 के आसपास जलाशय ऐसे हैं जहां पानी नहीं है या सूखने की कगार पर है। विभागीय जानकारी के अनुसार सबसे खराब स्थिति मध्यम बस्तर व नारायणपुर जिले के जलाशयों की है। दक्षिण बस्तर में पथरीली जमीन होने से जलाशयों में कुछ ज्यादा ही पानी ठहरता है, परंतु मई मध्य से लेकर मानसूनी बारिश शुरू होने तक वहां की स्थिति भी संतोषजनक नहीं रहती है।
बस्तर अंचल में रोजगार के नए अवसर सृजित करने के लिए कल-कारखानों, खेती के नए तरीकों और पारंपरिक कला को बाजार देने की कई योजनाएं सरकार बना रही है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि जब तक इलाके में पीने का शुद्ध पानी नहीं मिलेगा, ऐसी किसी भी योजना का सफल होना संदिग्ध है और इसके लिए जरूरी है कि पारंपरिक जल संसाधनों को पारंपरिक मानदंडों के अनुरूप ही संरक्षित पर पल्लवित किया जाए। 
(पंकज चतुर्वेदी स्वतंत्र लेखक हैं।)

बुधवार, 20 सितंबर 2017

जल संरक्षण की चिंता और बेफिक्री

देश के 233 जिलों में औसत से कम बारिश हुई है। इससे कई हिस्सों में सूखे के हालात बन सकते हैं। जून से सितंबर के मानसून सीजन में करीब 6 फीसद कम बारिश हुई। चूंकि देश में कृषि ज्यादातर हिस्सों में बारिश पर निर्भर है। इसलिए खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा और इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, लेकिन अगर हम जल संचय के परंपरागत उपायों को बचाकर रखते तो ऐसे संकट की आशंका से निपटने का भरोसा कायम रहता



गणपति के विदा होते ही बादल और बारिश भी विदा हो जाते हैं। अब यदि बरसात हो भी तो वह खेत या किसान के लिए किसी काम का नहीं। यदि बिहार और पूवरेत्तर राज्यों में आई बीते एक दशक की सबसे भयावह बाढ़ को अलग रख दें तो भारतीय मौसम विभाग का यह दावा देश के लिए चेतावनी देने वाला है कि पिछले साल की तुलना में इस साल देश के 59 फीसद हिस्से में कम बारिश हुई है। मौसम विभाग के मुताबिक देश के 630 जिलों में से 233 में औसत से कम बारिश हुई है। इससे देश में सूखे का संकट खड़ा हो गया है। जून से सितंबर के मानसून सीजन में करीब 6 फीसद कम बारिश हुई। देश में कृषि ज्यादातर हिस्सों में मानसून पर निर्भर है। ऐसे में कम बारिश होने से खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा और इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। वित्त वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में जीडीपी 5.7 फीसद रही, जबकि पिछले साल इसी दौरान यह 7.9 फीसद थी। 2014 में राजग के केंद्र की सत्ता में आने के बाद इस वित्त वर्ष में जीडीपी अपने सबसे निचले स्तर है। फसल वर्ष 2017-18 में (जुलाई-जून) में 273 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा। 1मानसून अभी बिदा हो रहा है। यानी देश को अगली बारिश के लिए कम से कम नौ महीने का इंतजार करना होगा। अभी से भारत का बड़ा हिस्सा सूखे, पानी की कमी और पलायन से जूझ जा रहा है। उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, समूचा पूवरेत्तर, केरल से लेकर अंडमान तक सामान्य से 8-36 प्रतिशत कम बारिश हुई है। बुंदेलखंड में तो सैंकड़ों गांव वीरान होने शुरू हो गए हैं। एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक देश के लगभग सभी हिस्सों में बड़े जल संचयन स्थलों यानी जलाशयों में पिछले साल की तुलना में कम पानी है। सवाल है, हमारा विज्ञान मंगल पर तो पानी खोज रहा है, लेकिन जब कायनात छप्पर फाड़ कर पानी देती है तो उसे पूरे साल तक सहेज कर रखने की हमारे पास कोई तकनीक नहीं है। हम भारतीय अभागे हैं कि हमने अपने पुरखों से मिली ऐसे सभी ज्ञान को खुद ही बिसरा दिया। जरा गौर करें कि यदि पानी की कमी से लोग पलायन करते तो राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके तो कभी के वीरान हो जाने चाहिए थे, लेकिन वहां रंग, लोक, स्वाद और पर्व सभी कुछ है। क्योंकि वहां के पुश्तैनी बाशिंदे कम पानी से बेहतर जीवन जीना जानते थे। पानी संचय के तौर तरीकों को हमने सहेजना जरूरी नहीं समझा और अब बारिश का पानी अक्सर ऐसे इंतजाम के अभाव में बर्बाद हो जाता है। फिर बारिश के दिनों में पानी न बरसे तो लोक व सरकार दोनों ही चिंतित हो जाते हैं।1यह सवाल देश में लगभग हर तीसरे साल खड़ा हो जाता है कि ‘औसत से कम’ पानी बरसा या बरसेगा तो क्या होगा? 13 राज्यों के 135 जिलों की कोई दो करोड़ हेक्टर कृषि भूमि प्रत्येक दस साल में चार बार पानी के लिए त्रहि-त्रहि करती है। हकीकत जानने के लिए देश की जल-कुंडली भी बांच ली जाए। भारत में दुनिया की कुल जमीन या धरातल का 2.45 फीसद क्षेत्रफल है। दुनिया के कुल संसाधनों में से चार फीसद हमारे पास है जबकि जनसंख्या की भागीदारी 16 प्रतिशत है। हमें हर साल बारिश से कुल 4000 घन मीटर पानी प्राप्त होता है, जबकि धरातल या उपयोग लायक भूजल 1,869 घन किलोमीटर है। इसमें से महज 1,122 घन मीटर पानी ही काम आता है। जाहिर है कि बारिश का जितना हल्ला होता है, उतना उसका असर पड़ना नहीं चाहिए। हां, एक बात सही है कि कम बारिश में भी उग आने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी आदि की खेती व इस्तेमाल कम हुआ है, वहीं ज्यादा पानी मांगने वाले सोयाबीन व अन्य कृषि फसलों ने खेतों में अपना स्थान बढ़ाया है। इसके चलते बारिश पर निर्भर खेती बढ़ी है। तभी थोड़ा भी कम पानी बरसने पर किसान रोता दिखता है।1मौसम विज्ञान के मुताबिक किसी इलाके में बारिश औसत से यदि 19 फीसद से कम हो तो इसे ‘अनावृष्टि’ कहते हैं, लेकिन जब बारिश इतनी कम हो कि उसकी माप औसत बारिश से 19 फीसद से भी नीचे रह जाए तो इसको ‘सूखे’ के हालात कहते हैं। असल में, हमने पानी को लेकर अपनी आदतें खराब कर ली हैं। जब कुएं से रस्सी डाल कर पानी खींचना होता था या चापाकल चलाकर पानी भरना होता था तो जितनी जरूरत होती थी, उतना ही जल उलींचा जाता था। घर में टोंटी वाले नल लगने और उसके बाद बिजली या डीजल पंप से चलने वाले ट्यूबवेल लगने के बाद एक गिलास पानी के लिए बटन दबाते ही दो बाल्टी पानी बर्बाद करने में हमारी आत्मा नहीं कांपती है। हमारी परंपरा पानी की हर बूंद को स्थानीय स्तर पर सहेजने, नदियों के प्राकृतिक मार्ग में बांध, रेत निकालने, मलवा डालने, कूड़ा मिलाने जैसी गतिविधियों से बचकर, पारंपरिक जल स्नोतों मसलन तालाब, कुएं, बावड़ी आदि के हालात सुधार कर एक महीने की बारिश के साथ सालभर के पानी की कमी से जूझने की रही है। अब कस्बाई लोग बीस रुपये में एक लीटर पानी खरीद कर पीने में संकोच नहीं करते हैं तो समाज का बड़ा वर्ग पानी के अभाव में कई बार शौच और स्नान से भी वंचित रह जाता है या कुछ देर के लिए टाल देता है।1भारत में औसतन 110 सेंटीमीटर बारिश होती है जो कि दुनिया के अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है। यहां बरसने वाले कुल पानी का हम महज 15 प्रतिशत ही संचित कर पाते हैं। शेष पानी नालियों, नदियों से होते हुए समुद्र में जा कर मिल जाता है और बेकार हो जाता है। गुजरात के जूनागढ, भावनगर, अमेरली और राजकोट के 100 गांवों ने पानी की आत्मनिर्भरता का गुर खुद ही सीखा। विछियावाडा गांव के लोगों ने डेढ लाख व कुछ दिन की मेहनत के साथ 12 रोक बांध बनाएं और एख ही बारिश में 300 एकड़ जमीन सींचने के लिए पर्याप्त पानी जुटा लिया। इतने में एक नल कूप भी नहीं लगता। ऐसे ही प्रयोग मध्य प्रदेश में झाबुआ व देवास में भी हुए। कर्नाटक से लेकर असम तक और बिहार से लेकर बस्तर तक ऐसे हजारों हजार सफल प्रयोग हुए हैं जिनमें स्थानीय स्तर पर लेागो ने सुखाड़ को मात दी है तो ऐसे छोटे प्रयास करने में कहीं कोई दिक्कत तो होना नहीं चाहिए।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

commercialisation of schooling is main accuse of Pradhyuma

स्कूलों के दुकान बनने से असुरक्षित हुए बच्चे

                                                                                                                                        पंकज चतुर्वेदी



वह सुबह हंसतो-खेलता, अपने खाने का  डिब्बा ले कर स्कूल पहुंचा था, आधे घंटे बाद ही घर फोन पहुंच गया कि बच्चे को चोट लगी है। दौड़ते-भागते माता-पिता स्कूल पुहंचे तो पाया कि सात साल के प्रद्युमन का गला उसके स्कूल के बाथरूम में किसी ने बड़ी ही निमर्मता से काट्र दिया था। दिल्ली से सटे आधुनिक चमक-दमक वाले गुडगाँव के सोहना रोड के मशहूर रायन इंटरनेश्नल स्कूल के कक्षा दो के इस बच्चे से किसकी ऐसी दुश्मनी थी ?  दिल्ली से ही सटे गाजियाबाद के एक स्कूल में इकलौते बच्चे अरमान की मौत के कारणों की जांच के लिए एक माता-पिता .एक महीने से संघर्ष कर रहे हैं। नौ साल का अरमान भी घर से आने स्कूल जीडी गायनका पब्लिक स्कूल के लिए ऐसे ही आनंद से निकला था और कुछ ही देर में उसके घर खबर आई कि पैर फिसलने से सीढ़ी पर गिर कर उसकी मात हो गई। नौ साल के इस बच्चे की मौत में भी कई पैंच हैं। अभी -अभी नोएडा के स्कूल में एक बच्चे को बच्चों द्वारा ही चांटे मारने का वीडियो वायरल हुआ। उससे पहले एक स्कूल में एक शिक्षिका द्वारा एक बच्चे को 140 चांटे मारने व उसका सिर बोड़ पर पटक देने का वीडियो भी चर्चा में रहा था। मध्यप्रदेश के एक स्कूल में  शिक्षक द्वारा बच्चों से पचास-पचास रूपए मंगवाए और जब वे नहीं लाए तो उन्हें सामूहिक मुर्गा बना कर डंडे से पीटा गया। फीस ना लाने पर बच्चे को बंधक बनाने या यूनीफार्म ना पहन कर आने पर लड़की को लउ़कों के शौचालय में खउ़ा कर देने जैसी घटनांए अब आम हैं। ये सभी और ऐसी ही कई घटनाएं स्कूल के परिसर के भीतर अभी एक महीने के भीतर दर्ज हुई हैं। आखिर स्कूल को कभी घर से भी ज्यादा निरापद माना जाता था और आज वह बच्चें के लिए शोषण -प्रताड़ना का खौफ पैदा कर रहा है।



दिल्ली के आरकेपुरम में एक अंध विद्यालय में एक ब्रिटिश नागरिक विकलांग बच्चों का यौन शोषण करता था उसे भी अभी इसी सप्ताह पकड़ कर जेल भ्ेाजा गया। विडंबना देखिए कि इतने गंभीर अपराध पर मीडिया में ना तो विमर्श हुआ और ना ही समाज का प्रतिरोध। कुछ साल पहले दिल्ली की पूसा रोड के एक बड़े स्कूल के तीन बच्चों का यौन षोशण उन्हें स्कूल तक लाने ले जाने का काम करने वाले वेन के चालक द्वारा करने का निर्मम कांड सामने आया। बच्चे अल्प आय परिवार से थे, सो उन लोगों से सड़क पर थोड़ा-बहुत गुस्सा निकाला। पुलिस ने भी आम धाराओं में मुकदमा कायम करने की रस्म अदायगी कर ली। समाज इससे बेखबर रहा कि 1-14  साल के इन मासूमों की मानसिक हालत खराब हो गई और जब पूरा देष बुराई-स्वरूप रावण का पुतला जला रहा था, तब उन बाल गोपालों को मानसिक चिकित्सालय में भर्ती करवाना पड़ा था। पूरे मामले में स्कूल ने अपना यह कह कर हाथ झाड़ लिया कि उन बच्चों के परिवहन की व्यवस्था उनकी अपनी थी और उसका स्कूल से कोई लेना-देना नहीं है।  और अभी पता चला कि उस कांड का आरोपी अदालत से बाइज्जत बरी हो गया। उस घटना को भी हम भूल गए जब गुड़गांव में ही एक बच्चा अपने पिता की पिस्तौल ले कर स्कूल गया था और उसने एक बच्चे को गोली मार दी थी।
असल में ऐसी घटनओं का मूल कारण है स्कूल का घनघौर व्यावसायीकरण होना और इसके एक व्यापार बनने के कारण विद्वालय प्रशासन व शिक्षकों का संवेदनाहीन होना। अभी एनसीआर के एक स्कूल ने 34 ऐसे बच्चों को टीसी दे कर स्कूल के बाहर खड़ा कर दिया, जनके माता-पिता ने स्कूल की विकास फंड के नाम पर नाजायज वसूली को स्वीकार नहीं किया। क्या बीच सत्र में स्कूल से निष्कासित किए गए बच्चे कभी विद्यालय व्यवस्था या शिक्षक को सम्मान से देख पाएंगे?
घूम-फिर कर बात एक बार फिर विद्यालयों के दुकानीकरण पर आ जाती है। शिक्षा का सरकारी सिस्टम जैसे जाम हो गया है। अब छोटे-छोटे गांवों में भी पब्लिक या कानवेंट स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं। कच्ची झोपड़ियों, गंदगी के बीच, बगैर माकूल बैठक व्यवस्था के कुछ बेरोजगार एक बोर्ड लटका कर प्राइमरी स्कूल खोल लेते हैं। इन ग्रामीण स्कूलों के छात्र पहले तो वे लोग होते हैं, जिनका पालक पैसे वाले होते हैं और अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजना हेठी समझते हैं। फिर कुछ ऐसी अभिभावक, जो खुद तो अनपढ़ होते हैं लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने की महत्वाकांक्षा पाले होते हैं, अपना पेट काट कर ऐसे पब्लिक स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने लगते हैं। कुल मिला कर दोष जर्जर सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सिर पर जाता है। जो आम आदमी का विश्वास पूरी तरह खो चुकी है। लोग भूल चुके हैं कि दसवीं पंचवर्शीय योजना के समापन तक यानी सन 2007 तक षत-प्र्रतिषत बच्चों को प्राथमिक षिक्षा का सपना बुना गया था जिसे ध्वंस्त हुए दस साल बीत चुके हैं। उधर स्कूली शिक्षा खुद वर्गवाद की शिकार है।एक शिक्षक पूरे वेतन और पैंशन वाला है तो ठीक वही काम करने वाला शिक्षा मित्र या अतिथि शिक्षक को घर चलाने के लाले पड़े हैं वहीं निजी स्कूल कितने पर दस्तखत करवा कर कितना वेतन देते हंेउसकी कहानियां हर कस्बे-गांव में सभी जानते हैं। कुल मिला कर जहां ससरकारी स्कूल संसाधनों और नवाचार के लिए प्यासे हैं तो निजी स्कूल चमक-दमक के साथ केवल पैसे के लिए ।
समाजवाद की अवधारणा पर सीधा कुठाराघात करने वाली यह शिक्षा प्रणाली शुरुआत से ही उच्च और निम्न वर्ग तैयार कर रही है, जिसमें समर्थ लोग और समर्थ होते हैं, जबकि विपन्न लोगों का गर्त में जाना जारी रहता हैं। विश्व बैंक की एक रपट कहती है कि भारत में छह से 10 साल के कोई तीन करोड़ बीस लाख बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। रपट में यह भी कहा गया है कि भारत में शिक्षा को ले कर बच्चों-बच्चों में खासा भेदभाव है। लडकों-लड़कियों, गरीब-अमीर और जातिगत आधार पर बच्चों के लिए पढ़ाई के मायने अलग-अलग हैं। रपट के अनुसार 10 वर्ष तक के सभी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए 13 लाख स्कूली कमरे बनवाने होंगे और 740 हजार नये शिक्षकों की जरूरत होगी। सरकार के पास खूब बजट है और उसे निगलने वाले कागजी षेर भी। लेकिन मूल समस्या स्कूली षिक्षा में असमानता की है। ‘प्रथम’ की ताजातरीन रिपोर्ट बताती है कि बच्चों को प्राईवेट स्कूलों में भेजने का प्रचलन गांवों में बढ़ रहा है। सरकारी स्कूल का षिक्षक ज्यादा पढ़ा-लिखा होता है, उसकी नौकरी में वेतन के अलावा कई सुरक्षाएं भी जुड़ी होती हैं, इसके बावजूद आम पालकों का निजी स्कूल पर भरोसा करना असल में सरकारी स्कूल के जर्जर प्रबंधन पर अविष्वास का प्रतीक है। सभी स्कूलों का राश्ट्रीयकरण कर सभी को षिक्षा, समान षिक्षा और स्तरीय षिक्षा का सपना साकार करना बहुत आसान होगा। प्राइवेट स्कूलों की आय की जांच, फीस पर सरकारी नियंत्रण, पाठ्यक्रम, पुस्तकों आदि का एकरूपीकरण, सरकारी स्कूलों को सुविधा संपन्न बनाना, आला सरकारी अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों की सरकारी स्कूलों में शिक्षा की अनिवार्यता, निजी संस्था के शिक्षकों के सुरक्षित वेतन की सुनिश्चित व्यवस्था सरीखे सुझाव समय-समय पर आते रहे और लाल बस्तों में बंध कर गुम होते रहे हैं।
सरकार में बैठे लोगों को इस बात को आभास होना आवश्यक है कि बच्चे राष्ट्र की धरोहर हैं तथा उन्हें पलने-बढ़ने-पढ़ने और खेलने का अनुकूल वातावरण देना समाज और सरकार दोनों की  नैतिक व विधायी जिम्मेदारी हैं । नेता अपने आवागमन और सुरक्षा के लिए जितना धन व्यय करते हैं, उसके कुछ ही प्रतिशत धन से बच्चों को किलकारी के साथ स्कूल भेजने की व्यवस्था की जा सकती हैं ।


शनिवार, 9 सितंबर 2017

How bastar has been forbidding his dialects

गोलियों से छलनी बस्तर की बोलियां


                                                                                                                                                   पंकज  चतुर्वेदी


बोलियां कैसे गुमती हैं? उसे समझने के लिए बस्तर पर्याप्त है। हिंसा-प्रतिहिंसा के बीच लोगों का पलायन और नई जगह बसे कि उनकी पारंपरिक बोली पहले कम हुई और फिर गुम हुई। एक बोली के लुप्त होने का अर्थ उसके सदियों पुराने संस्कार, भोजन, कहानियां, खानपान सभी का गुम हो जाना। बारूद, बंदूक से बेहाल बस्तर में आंध्र प्रदेश से सटे सुकमा जिले में दोरला जनजाति की बड़ी संख्या है। उनकी बोली है दोरली। बस्तर में द्रविड़ परिवार की बोलियां भी हैं, आर्य कुल की भी और मुंडारी भी। उनके बीच इतना विभेद है कि एक इलाके का गोंडी बोलने वाला दूसरे इलाके की गोंडी को भी समझने में दिक्कत महसूस करता है। दोरली बोलने वाले वैसे ही बहुत कम हुआ करते थे, पिछली जनगणना में शायद बीस हजार। पुलिस व नक्सली दोनों तरफ से पिसने वाले आदिवासी पलायन कर आंध्रप्रदेश (अब तेलंगाना के वारंगल जिले में चले गए। जब वे लौटे तो उनके बच्चों की दोरली में तेलुगू का घालमेल हो चुका था।

प्रसिद्ध नृशास्त्री ग्रियर्सन की सन‍् 1938 में लिखी गई पुस्तक ‘माड़िया गोंड्स अॉफ बस्तर’ की भूमिका में एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख है जो कि बस्तर की 36 बोलियों को समझता-बूझता था। जाहिर है कि आज से अस्सी साल पहले वहां कम से कम 36 बोलियां तो थीं ही। सभी जनजातियों की अपनी बोली, प्रत्येक हस्तशिल्प या कार्य करने वाले की अपनी बोली। राजकाज की भाषा हल्बी थी जबकि जंगल में गोंडी का बोलबाला था। गोंडी का अर्थ कोई एक बोली समझने का भ्रम ना पालें—घोटुल मुरिया की अलग गोंडी तो दंडामी और अबूझमाड़िया की गोंडी में अलग किस्म के श्ाब्द। उत्तरी गोंडी में अलग भेद। राज गोंडी में छत्तीसगढ़ी का प्रभाव ज्यादा है। इसका इस्तेमाल गोंड राजाओं द्वारा किया जाता था। सन‍् 1961 की जनगणना में इसको बोलने वालों की संख्या 12,713 थी और आज यह घटकर 500 के लगभग रह गई है। चूंकि बस्तर भाषा के आधार पर गठित तीन राज्यों महाराष्ट्र, ओड़िसा, तेलंगाना से घिरा हुआ है, सो इसकी बोलियां छूते राज्य की भाषा से अछूती नहीं हैं। दक्षिण बस्तर में भोपालपट्टनम, कोंटा आदि क्षेत्रों में दोरली बोली जाती है जिसमें तेलंगांना आंध्रप्रदेश से लगे होने के कारण तेलुगू का प्रभाव दिखता है तो दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा दण्डामी बोली का क्षेत्र हैं। जगदलपुर, दरभा, छिन्द्गढ़ धुरवी बोली का बोलबाला है वहीं कोंडागांव क्षेत्र के मुरिया अधिकतर हल्बी बोलते हैं। नारायणपुर घोटुल मुरिया और माड़िया क्षेत्र है। बस्तर और ओडिशा राज्य के बीच सबरी नदी के किनारे धुरवा जनजाति की बहुलता है। जगदलपुर का नेतानार का इलाका, दरभा और सुकमा जिले के छिंदगढ़ व तोंगपाल क्षेत्र में धुरवा आदिवासी निवास करते हैं। इस जनजाति की बोली धुरवी है। इसी तरह नारायणपुर ब्लॉक में निवासरत अबूझमाड़िया माड़ी बोली बोलते हैं। इन दोनों जनजातियों की आबादी मिलाकर भी 50 हजार से अधिक नहीं है। नई पीढ़ी में इन बोलियों का प्रचलन धीरे-धीरे घट रहा है। बस्तर के बारे में कहा जाता है कि यहां हर 20 किलोमीटर में बोलियां बदलने लगती हैं। गोंडी, हल्बी, भतरी, धुरवी, माड़ी, दोरली, परजा, गदबी आदि यहां की प्रमुख बोलियां हैं।

बस्तर के हिंसक संघर्ष से सबसे बड़ा संकट यहां की आदिवासी अस्मिता के बीज यानी बोलियों के समक्ष खड़ा हो गया है। एक तरफ बाजार का प्रवेश तो दूसरी ओर विस्थापन का दंश तो तीसरी तरफ आधुनिक शिक्षा का दबाव—देखते ही देखते कई बोलियां अतीत हो गईं, कई के व्याकरण गड़बड़ा गए और कई ने अपना मूल स्वरूप ही खो दिया। साठ के दशक तक यहां कोई 36 बोलियां थीं। सन‍् 1910 में धुरबा जनजाति ने अपनी संस्कृति की रक्षा के सवाल पर अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए थे। उस विद्रोह को अंग्रेजों ने इस निर्ममता से कुचला कि शौर्य का प्रतीक धुरबा अादिवासियों का जल-जंगल-जमीन का हक समाप्त हो गया। आज ध्ाुरबा श्ाहरों में मजदूर बनकर रह गया है और धुरबी बोली इलाके की संकटग्रस्त बोली बन गई है। धुरबी पर जब बाहरी प्रभाव पड़ा तो कुछ अलग ही बोली उपजी जिसे परजी कहा गया। यह बोली भी धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। बस्तर की बोलयां तीन परिवारों में बंटी हैं—आर्यन, द्रविड़ और मुंडारी। मुंडारी समुदाय की बोली गदबा लगभग विलुप्त हो गई है। आर्य कुल की बोली में सबसे ज्यादा प्रचलन हल्बी का है। उसके बाद भतरी। नोताकानी, मिरगानी, चंडारी जैसी बोलियां खड़ी हिंदी और हल्बी के प्रचलन में पहले घुली-मिलीं, फिर उन्हीं में समा गईं। बस्तर में बाहर से आए बंजारों की भी अपनी बोली है—लम्मान या लम्माणी। लगता है कि यह बोली अब उनकी आखिरी पीढ़ी में ही बची है। कुल मिलाकर देखें तो आज बस्तर के श्ाहर-कस्बों में हल्बी और भतरी ही बची है। जबकि दुर्गम आंचलिक क्षेत्रों में गोंडी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।
जान लें कि बस्तर में बाहरी यानी नेपाली से लेकर मैथिल और बुंदेली से लेकर गुजराती तक सदियों से बस्तर में जा कर बसते रहे और वहां की लोक संस्कृति में ‘तर’ कर बस्तरिया बनते रहे। हां, इन लोगाें ने कभी लोकजीवन में घुसपैठ या उनके इलाकों में दखल का प्रयास नहीं किया। वैश्वीकरण के चलते अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की प्रवृत्ति ने आदिवासियों और सरकार के बीच टकराव उत्पन्न किया और उसके गर्भ से नक्सली उपजे। नक्सलवाद अब आतंक बनकर रह गया। सुरक्षा बलों द्वारा स्थापित कालोनियां में पहले उनका भोजन बदलता है, फिर रहन-सहन और फिर बोली बदल जाती है। पलायन, मशीनीकरण और बाजार के विस्तार से कई हस्तशिल्प भी लुप्त हो गए, जिसके साथ उनकी बोलियां भी गायब हुईं। लोहारी, पनका, घड़वा, पारधी, कसेर जैसी छोटी-छोटी जातियों की बोलियां भी इस आंधी में या तो समाप्त हो गईं या फिर किसी करीबी बोली में संगम कर एकसार हो गईं।
हाल ही में केंद्रीय भाषा संस्थान, मैसूर द्वारा जगदलपुर यानी बस्तर के संभागीय मुख्यालय में आयोजित हल्बी भाषा के संरक्षण के लिए दो दिवसीय गोष्ठी, जिसमें मात्र 14 लोग ही आए। विडंबना है कि जो लोग भी पलायन कर श्ाहर आ रहे हैं उनके लिए भाषा का सवाल महज रोजगार की प्राप्ति का जरिया है और इस तरह वे सहजता से अपनी सांस्कृतिक अस्तित्व की पहचान, अपनी पारंपरिक बोली को बिसरा देते हैं। गत 40 साल में ही बस्तर ने ऐसी कई संस्कृतियों को बोली के रास्ते बिसरा दिया। आज जरूरत है कि तत्काल बस्तर में बोलियों का एक संग्रहालय बनाया जाए, जिसमें गुम हो चुकी या संकटग्रस्त बोलियों को आॅडियो, वीडियो और मुद्रित स्वरूप में संरक्षित किया जाए। इसके साथ ही स्थानीय बोलियों में साहित्य लेखन और पठन को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष योजनाएं जिला व राज्य स्तर पर तैयार की जाएं।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

Hindi " not a official language. it is mass language

हिंदी: राजभाषा या लोकभाषा

                                                                              पंकज चतुर्वेदी
दिल्ली के एक नामचीन पब्लिक स्कूल के कक्षा तीन के बच्चे को गृह-कार्य डॉयरी में में लिख कर भेजा गया कि बच्चे का ‘श्रुत लेखन’ का टेस्ट होगा। अब बच्चे के माता-पिता दोनों अंग्रेजी माध्यम से पढे हुए और कारपोरेट में नौकरी करने वाले। वे अपने परिचितों को फोन कर पूछते रहे कि यह श्रुत लेख क्या होता है ?

लखनऊ महानगर की सीमा से सटे फैजाबदा मार्ग पर स्थित चिन्हट के एक माध्यमिक स्कूल की कक्षा आठ की एक घटना राज्य में षिक्षण व्यवस्था की दयनीय हालत की बानगी है । स्कूल षुरू होने के कई महीने बाद विज्ञान की किताब के पहले पाठ पर चर्चा हो रही थी । पाठ था पौघों के जीवन का । दूसरे या तीसरे पृश्ठ पर लिखा था कि पौध्ेा ष्वसन क्रिया करते हैं । बच्चों से पूछा कि क्या वे भी ष्वसन करते हैं तो कोई बच्चा यह कहने को तैयार नहीं हुआ कि वे भी ष्वसन करते है। । यानि जो कुछ भी पढ़ाया जा रहा है उसे व्यावहारिक धरातल पर समझाने के कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं, महज तोता रटन को ही षिक्षा मान लिया जा रहा है ।

मध्य प्रदेश के भोपाल में अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय का प्रारंभ इस उद्छेश्य से किया गया कि वहां सभी तकनीकी विषयों की शिक्षा हिंदी में दी जाएगी। इसमें कुल 231 पाठ्यक्रम हैं। इस साल इसमें से 170 में एक भी प्रवेश नहीं हुआ। 14 कोर्स में केवल एक-एक छात्र है तो 46 पाठ्यक्रम ऐसे हें जिनमें पढ़ने वालों की संख्या दस से भी कम है। जरा गौर करें कि वे बच्चे जो उच्च शिक्षा में अंग्रेी को व्यवधान मानते रहे हैं, बेहद कम फीस के साथ जब हिंदी में शिक्ष की व्यवस्था हुई तो भी वे क्यों नहीं आए ? इसके लिए विश्वविद्यालय की वेबसाईट पर कुछ हिंदी शब्द गौररतलब हैं - भेषज विज्ञान(फार्मेसी), भ्रमणभाष(मोबाईल), अंतरताना(वेबसाईट)। यही कारण है कि यहां पिछले साल अभियांत्रिकी यानि इंजीनियरिंग में सात छात्र थे जो इस साल घट कर दो रह गए हैं।

ये तीन घटनां बानगी हैं कि जब हम हिंदी में संप्रेशण के किसी माध्यम की चर्चा करते हैं, उस पर प्रस्तुत सामग्री पर विमर्ष करते हैं तो सबसे पहले गौर करना होता है कि समीचित माध्यम को पढ़ने- देखने वाले कौन हैं , उनकी पठन क्षमता कैसी है और वे किस उद््ेष्य से इस माध्यम का सहारा ले रहे हैं। जैसे कि अखबार का पाठक अलग होता है जबकि खेती किसानी की पुस्तकों के खरीदार का नजरिया भिन्न। वहीं आफिस की नोटिंग, पत्र का पाठक, लेखक और उसका उद्देश्य अलग होता है। विडंबना है कि हिंदी को राजकाज की भाषा बनाने के सरकारी प्रयासों ने हिंदी को अनुवाद की, और वह भी भाव-विहीन शाब्दीक-संस्कृतनिष्ठ हिंदी की ऊबाउ भाषा बना कर रख दिया है।

सन 1857 के आसपास हमारी जनगणना में महज एक प्रतिशत लोग साक्षर पाए गए थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उससे पहले भाषा, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, आयुर्वेद ज्योतिष अंतरिक्ष का ज्ञान हमारे पास नहीं था। वह था- देश की बोलियों में, संस्कृत , उससे पहले प्राकृत या पालि में जिसे सीमित लोग समझते थे, सीमित उसका इस्तेमाल करते थे । फिर अमीर खुसरो के समय आई हिंदी, हिंद यानि भारत के गोबर पट्टी के संस्कृति, साहित्य व ज्ञान की भाषा, उनकी बोलियों का एक समुच्चय। इधर भक्ति काल का दौर था । । हिंदी साहित्य का भक्ति काल 1375 ई. से 1700 ई. तक माना जाता है। यह हिंदी साहित्य का श्रेष्ठ युग है। समस्त हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ कवि और उत्तम रचनाएं इस युग में प्राप्त होती हैं।
दक्षिण में आलवार बंधु नाम से कई प्रख्यात भक्त हुए हैं। इनमें से कई तथाकथित नीची जातियों के भी थे। वे बहुत पढे-लिखे नहीं थे, परंतु अनुभवी थे -सूरदास, नंददास, कृष्णदास, परमानंद दास, कुंभनदास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी, गोविन्दस्वामी, हितहरिवंश, गदाधर भट्ट, मीराबाई, स्वामी हरिदास, सूरदास-मदनमोहन, श्रीभट्ट, व्यास जी, रसखान, ध्रुवदास तथा चैतन्य महाप्रभु।इसके अलावा कई मुस्लिम लेखक भी सूफी या साझा संस्कृति की बात कर रहे थे । इस तरह से हिंदी के उदय ने ज्ञान को आम लोगों तक ले जाने का रास्ता खोला और इसी लिए हिंदी को प्रतिरोध या  पंरपराएं तोडने वाली भाषा कहा जाता हैं।  भाषा का अपना स्वभाव होता है अैर हिंदी के इस विद्रोही स्वभाव के विपरीत जब इसे लोक से परे हट कर राजकाज की या राजभाषा बनाने का प्रयास होता है तो उसमें सहज संप्रेषणीय शब्दों का टोटा प्रतीत होता है।
आज जिस हिंदी की स्थापना के लिए पूरे देश में हिंदी पखवाड़ा  मनाया जाता है उसकी सबसे बडी दुविधा है मानक हिंदी यानि संस्कृतनिष्ठ हिंदी। सनद रहे संस्कृत की स्वभाव शास्त्रीय है और दरबारी, जबकि हिंदी का स्वभाव लोक है और विद्रोही । ऐसा नहीं कि आम लेागांे की हिंदी में संस्कृत से कोई परहेज है। उसमें संस्कृत से यथावत लिए गए तत्सम शब्द भी हैं तो संस्कृत से परिशोधित हो कर आए तत्दव शब्द जैसे अग्नि से आग, उष्ट से ऊंट आदि । इसमें देशज शब्द भी थे, यानि बोलियों से आए स्थानीय शब्द और विदेशज भी जो अंग्रेजी, फारसी व अन्य भाषाओं से आए।
अब राजभाषा में सिखाया जाता है अमुक पंजी के आलेाक में प्रस्तुत आख्या में निर्दिष्ट है  इसे ना तोलिखने वाला और ना ही पढने वाला और ना ही जिसके लिए है, वह समझ रहा है, यदि कोई ऐसी नोटिंग सूचना के अधिकार के तहत मांग भी ले तो उसके पल्ले इसका अर्थ नहीं पड़ेगा। यदि आंकड़ो पर भरेसा करें तो हिंदी में अखबार  व अन्य पठन सामग्री के पाठक हर साल बढ़ रहे हें लेकिन जब हिंदी में शिखा की बात आती है तो उसके हाल ‘अ.बि. हिंदी विश्वविद्यालय’ जैसे हो जाते हैं। यह जानना और समझना अनिवार्य है कि हिंदी की मूल आत्मा उसकी बोलियां हैं और विभिन्न बोलियों को संविधान सम्मत भाषाओं में शािमल करवाने , बोलियों के लुप्त होने पर बेपरवाह रहने से हिंदी में विदेशी और अग्रहणीय शब्दों का अंबार लग रहा है। भारतीय भाषाओं और बोलियों को संपन्न, समृद्ध करे बगैर हिंदी में काम करने को प्रेरित करना मुश्किल है।
संचार माध्यमों की हिंदी आज कई भाषाओं से प्रभावित है। विशुद्ध हिंदी बहुत ही कम माध्यमों में है। दृश्य और श्रव्य माध्यमों में हिंदी की विकास-यात्रा बड़ी लंबी है। हिंदी के इस देश में जहां की जनता गांव में बसती है, हिंदी ही अधिकांश लोग बोलते-समझते हैं, इन माध्यमों में हिंदी विकसित एवं प्रचारित हुई है। इसके लिए मानक हिंदी कुछ बनी हैं। ध्वनि-संरचना, शब्द संरचना में उपसर्ग-प्रत्यय, संधि, समास, पद संरचना, वाक्य संरचना आदि में कुछ मानक प्रयोग, कुछ पारंपरिक प्रयोग इन दृश्य-श्रव्य माध्यमों में हुए है, किंतु कुछ हिंदीतर शब्दों के मिलने से यहाँ विशुद्ध खड़ी बोली हिंदी नहीं है, मिश्रित शब्द, वाक्य प्रसारित, प्रचारित हो रहे हैं।
असल में कोई भी भाषा ‘बहता पानी निर्मला’ होती है, उसमें समय के साथ शब्दों का आनाजाना लगा रहता है।  यदि हिंदी को वास्तव में एक जीवंत भाषा बना कर रखना ह तो शब्दों का यह लेनदेन पहले अपनी बोलियों व फिर भाषाओं से हो, वरना हिंदी एक नारे, सम्मेलन, बैनर, उत्सव की भाषा बनी रहेगी।

Grabage is byproduct of modern society


यह कूड़ा तो हमने ही बढ़ाया है

                                                                                                                                      पंकज चतुर्वेदी

हालांकि दिल्ली के गाजीपुर के कूड़ा घर की क्षमता सन 2006 में आवष्यकता से अधिक हो गई थी,अदालत चेता रही थी कि पचास मीटर उंचा कूड़े का ढेर धरती, समाज के लिए खतरनाक है, लेकिन जब तक कोई इसकी सुध लेता, बड़ा हादसा हो गया। अब सरकार की चिंता है कि कूड़े की नई खत्ती कहां बनाई जाए। यह सच है कि हर दिन कूड़ा तो निकलना ही है और उसके निबटान की आधुनिक वैज्ञानिक तरीके खोजे जाने चाहिए, लेकिन उसे भी अनिवार्य है कि समाज कूड़े को कम करना सीखे। भले ही हम कूड़े को अपने पास फटकने नहीं देना चाहते हों, लेकिन विडंबना है कि यह कूड़ा हमारी गलतियों या बदलती आदतों के कारण ही दिन-दुगना, रात-चौगुना बढ़ रहा है।

नेषनल इनवायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, नागपुर के मुताबिक देष में हर साल 44 लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है।  हमारे देष में औसतन प्रति व्यक्ति 20 ग्राम से 60 ग्राम कचरा हर दिन निकलात है। इसमें से आधे से अधिक कागज, लकड़ी या पुट्ठा होता है, जबकि 22 फीसदी कूड़ा-कबाड़ा,  घरेलू गंदगी होती है। कचरे का निबटान पूरे देष के लिए समस्या बनता जा रहा है। दिल्ली की नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर तक दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाष रही है। जरा सोचें कि इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढो कर ले जाना कितना महंगा व जटिल काम है।  यह सरकार भी मानती है कि देष के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिषत का ईमानदारी से निबटान हो पाता है।  राजधानी दिल्ली का तो 57 फीसदी कूड़ा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यमुना में बहा दिया जाता है।  कागज, प्लास्टिक, धातु  जैसा बहुत सा कूड़ा तो कचरा बीनने वाले जमा कर रिसाईकलिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके, खाने-पीने की चीजें, मरे हुए जानवर आदि कुछ समय में सड़-गल जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए विकराल संकट का रूप लेता जा रहा है। सनद रहे दिल्ली तो बानगी है, ठीक यहीह ालात लखनउ, पटना, गौहाटी, सतना, जयपुर या चंडीगढ़ के भी हैं। हम कूड़ा निकाल कर षहर से दूर कहीं फैंक देते है। और फिर वही कूड़ा हमारी जमीन, जल और जीवन को जहरीला करता जाता है। सुंदर षहरों में तनिक सी बरसात के बाद बनते दरिया हों या फिर भजल के जहरीला होने की चिंता या फिर तालाब समाप्त होने व नदियों के उथला होने के सरोकार, जरा गंभीरता से देखें तो यह सबकुछ उस कूड़े के कुप्रभाव हें जिसके निबटान की माकूल व्यवस्था ना होने पर स्थानीय निकाय के कूड़ा-प्रबंधक चुपके से उसे कहीं भी फैंक आते हैं।

कोई नहीं चाहता कि उसके करीब कूड़ा निश्पादन का काम हो लेकिन असल में कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल-पेन आए, जिनकी केवल रिफील बदलती थी। आज बाजार मे ंऐसे पेनों को बोलबाला है जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं।  देष की बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। जरा सोचें कि तीन दषक पहले एक व्यक्ति साल भर में बामुष्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह षेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले ‘यूज एंड थ्रो’ वाले रेजर ही बाजार में मिलते हैं। हमारा बाथ्रूम और किचन तो कूड़े का बड़ा उत्पादनकर्ता बन गया है।
अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन ले कर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देष में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फैंकी जाती हैं। मेकअप का सामान, घर में होने वाली पार्टी में डिस्पोजेबल बरतनों का प्रचलन, बाजार से सामन लाते समय पोलीथीन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग ;ऐसे ही ना जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। घरों में सफाई  और खुषबू के नाम पर बढ़ रहे साबुन व अन्य रसायनों के चलन ने भी अलग किस्म के कचरे को बढ़ाया है।
सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों और मोबाईल का है। इसमें पारा, कोबाल्ट, और ना जाने कितने किस्म के जहरीले रसायन होते हैं। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलो ग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा लेड और 0.693 ग्राम परा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता हे। षेश हिस्सा प्लास्टिक होता है। इसमें से अधिकांष सामग्री गलती-’सड़ती नहीं है और जमीन में जज्ब हो कर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने  और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने  का काम करती है। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाईलो ंसे भी उपज रहा है।  भले ही अदालतें समय-समय पर फटकार लगाती रही हों, लेकिन अस्पतालों से निकलने वाले कूड़े का सुरक्षित निबटान दिल्ली, मुंबई व अन्य महानगरों से ले कर छोटे कस्बों तक संदिग्ध व लापरवाहीपूर्ण रहा है।
राजधानी दिल्ली में कचरे का निबटान अब हाथ से बाहर निकलती समस्या बनता जा रहा है। अभी हर रोज सात हजार मीट्रिक टन कचरा उगलने वाला महानगर 2021 तक 16 हजार मीट्रिक टन कचरा उपजाएगा। दिल्ली के अपने कूड़-ढलाव पूरी तरह भर गए हैं और आसपास 100 किलोमीटर दूर तक कोई नहीं चाहता कि उनके गांव-कस्बे में कूड़े का अंबार लगे। कहने को दिल्ली में दो साल पहले पोलीथीन की थैलियों पर रोक लगाई जा चुकी है, लेकिन आज भी प्रतिदिन 583 मीट्रिक टन कचरा प्लास्टिक का ही है। इलेक्ट्रानिक और मेडिकल कचरा तो यहां के जमीन और जल को जहर बना रहा है। हाल ही में गाजियाबाद नगर निगम ने दिल्ली नगर निगम के ऐसे दो ट्रकों को पकड़ कर पांच-पाच हजार का जुर्माना लगाया था जो दिल्ली का कचरा सीमावर्ती गाजियाबाद की कोलेनियों में रात में चुपके से फैंक रहे थे।
कूड़ा अब नए तरह की आफत बन रहा है, सरकार उसके निबटान के लिए तकनीकी व अन्य प्रयास भी कर रही है। लेकिन असल में कोषिष तो कचरे को कम करने की होना चाहिए। इसके लिए केरल के कन्नूर जिले का उदाहरण सामने है कि जब जिला प्रषासन व समाज ने ठान लिया तो अब वहां ना तो पॉलीथील मिलती है और ना ही डिस्पोजेबल बर्तन और ना ही रिफील वाले बॉलपेन ।
प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल, पुराने कंप्यूटर व मोबाईल के आयात पर रोक तथा बेकार उपकरणों को निबटाने के लिए उनके विभिन्न अवयवों को अलग करने की व्यवस्था करना, होगा। सामानों की मरम्मत करने वाले हाथों को तकनीकी रूप से सषक्त बनाने व उन्हें मदद करने से उपकरणों को कंडम कर फैंकने की प्रवृति पर रोक लग सकती है। वाहनों के नकली व घटिया पार्ट्स की बिक्री पर कड़ाई भी कचरे को रोकने में मददगार होगी। सबसे बड़ी बात उच्च होती जीवन-षैली में कचरा-नियंत्रण और उसका निबटान की षिक्षा स्कूली स्तर पर अनिवार्य बनाना जरूरी है।

पंकज चतुर्वेदी
संपर्क- 9891928376



The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...