My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

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देश की अर्थ व्यवस्था को पीछे ढकेल देता है सैलाब

पंकज चतुर्वेदी


अजीब विडंबना है कि आंकड़ों में देखें तो अभी तक देश के बड़े हिस्से में मानसून नाकाफी रहा है, लेकिन जहां जितना भी पानी बरसा है, उसने अपनी तबाही का दायरा बढ़ा दिया है। पिछले कुछ सालों में बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ौतरी हुई है । कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनने लगी हैं और मौसम बीतते ही, उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है। असल में बाढ़ महज एक प्राकृतिक आपदा ही नहीं है, बल्कि यह देश के गंभीर पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक संकट का कारक बन गया है। हमारे पास बाढ़ से निबटने को महज राहत कार्य या यदा-कदा कुछ बांध या जलाशय निर्माण का विकल्प है, जबकि बाढ़ के विकराल होने के पीछे नदियों का उथला होना, जलवायु परिवर्तन,  बढ़ती गरमी, रेत की खुदाई व शहरी प्लास्टिक व खुदाई मलवे का नदी में बढ़ना, जमीन का कटाव जैसे कई कारण दिनों-दिन गंभीर होते जा रहे हैं। जिन हजारों करोड़ की सड़क, खेत या मकान बनाने में सरकार या समाज को दशकों लग जाते हैं, उसे बाढ़ का पानी पलक झपकते ही उजाड़ देता है। हम नए कार्याे के लिए बजट की जुगत लगाते हैं और जीवनदायी जल उसका काल बन जाता है। 
जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय  के ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारत देश में पिछले 65 वर्षाे के दौरान बाढ़ के कारण लगभग 3.65 लाख करोड़ का नुकसान हुआ और 1.07 लाख लोगों की मौत हुई, आठ करोड़ से अधिक मकान नष्ट हुए और 25.6 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में 109202 करोड़ रूपये मूल्य की फसलों को नुकसान पहुंचा है। इस अवधि में बाढ़ के कारण देश में 202474 करोड़ रूपये मूल्य की सड़क, पुल जैसी सार्वजनिक संपत्ति पानी में मिल गई। मंत्रालय बताता है कि बाढ़ से प्रति वर्ष औसतन 1654 लोग मारे जाते हैं, 92763 पशुओं का नुकसान होता है। लगभग 71.69 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जल प्लावन से बुरी तरह प्रभावित होता है जिसमें 1680 करोड़ रूपये मूल्य की फसलें बर्बाद हुईं और 12.40 लाख मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं। 
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सन 1951 में भारत की बाढ़ ग्रस्त भूमि की माप एक करोड़ हेक्टेयर थी । 1960 में यह बढ़ कर ढ़ाई करोड़ हेक्टेयर हो गई । 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी आज देश के कुल 329 मिलियन(दस लाख) हैक्टर में से चार करोड़ हैक्टर इलाका नियमित रूप से बाढ़ की चपेट में हर साल बर्बाद होता है।  सन 2016 में 70 लाख हैक्टर जमीन को बाढ़ ने बर्बाद किया, जिससे 2.4 करोड़ आबादी प्रभावित हूई। संपत्ति के नुकसान का सरकारी अनुमान 5675 करोड़ था। वहीं सन 2018 में नुकसान की राशि बढ़ कर 95737 करोड़ हो गई व इसकी चपेट में आई आबादी की संख्या 7.9 करोड़ थी। बिहार राज्य का 73 प्रतिशत हिस्सा आधे साल बाढ़ और शेष दिन सुखाड़ की दंश झेलता है और यही वहां के पिछड़ेपन, पलायन और परेशानियों का कारण है। यह विडंबना है कि राज्य का लगभग 40 प्रतिषत हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पस्त रहता है। असम में इन दिनों 23 जिलों के कोई साढ़े सात लाख लोग नदियों के रौद्र रूप के चलते घर-गांव से पलायन कर गए है और ऐसा हर साल होता है। यहां अनुमान है कि सालाना कोई 200 करोड़ का नुकसान होता है जिसमें - मकान, सड़क, मवेषी, खेत, पुल, स्कूल, बिजली, संचार आदि षामिल हैं। राज्य में इतनी मूलभूत सुविधाएं खड़ा करने में दस साल लगते हैं , जबकि हर साल औसतन इतना नुकसान हो ही जाता है। यानि असम हर साल विकास की राह पर 19 साल पिछड़ता जाता है।  
देश में सबसे ज्यादा सांसद व प्रधानमंत्री देने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की उर्वरा धरती, कर्मठ लोग, अयस्क व अन्य संसाधन उपलब्ध होनेे के बावजूद विकास की सही तस्वीर ना उभर पाने का सबसे बड़ा कारण हर साल आने वाली बाढ़ से होने वाले नुकसान हैं।  बीते एक दशक के दौरान राज्य में बाढ़ के कारण 45 हजार करोड़ रूपए कीमत की तो महज खड़ी फसल नष्ट हुई है। सड़क, सार्वजनिक संपत्ति, इंसान, मवेशी आदि के नुकसान अलग हैं। राज्य सरकार की रपट को भरोसे लायक मानें तो सन 2013 में राज्य में नदियों के उफनने के कारण 3259.53 करोड़ का नुकसान हुआ था जो कि आजादी के बाद का सबसे बड़ा नुकसान था। सन 2016 में राज्य की 5.6 लाख हैक्टर जमीन बाढ़ से नष्ट हुई , 20 लाख लोग प्रभावित हुए और 123 करोड़ की संपत्ति को नुकसान हुआ। । सन 2018 में 59 लाख लोग प्रभावित हुए और नुकसान का आकलन 547 करोड़ का था। 
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकार (एनडीएमए) के पूर्व सचिव नूर मोहम्मद का मानना है कि देश में समन्वित बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया गया। नदियों के किनारे स्थित गांव में बाढ़ से बचाव के उपाए नहीं किये गए। आज भी गांव में बाढ़ से बचाव के लिये कोई व्यवस्थित तंत्र नहीं है। उन्होंने कहा कि उन क्षेत्रों की पहचान करने की भी जरूरत है जहां बाढ़ में गड़बड़ी की ज्यादा आशंका रहती है। आज बारिश का पानी सीधे नदियों में पहुंच जाता है। वाटर हार्वेस्टिंग की सुनियोजित व्यवस्था नहीं है ताकि बारिश का पानी जमीन में जा सके। शहरी इलाकों में नाले बंद हो गए हैं और इमारतें बन गई हैं। ऐसे में थोड़ी बारिश में शहरों में जल जमाव हो जाता है। अनेक स्थानों पर बाढ़ का कारण मानवीय हस्तक्षेप है।  जलवायु परिवर्तन एक ऐसा कारक है जो अचानक ही बेमौसम बहुत तेज बरसात की जड़ है और इससे सबसे ज्यादा नुकसान होता है। 
मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों का त्रासदी है । अतएव बाढ़ के बढ़ते सुरसा-मुख पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र्र कुछ करना होगा । कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई-स्तर में अंतर जैसे विशयों का हमारे यहां कभी निश्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा कर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी , नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेउ़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जोकि बाढ़ सरीखी भीशण विभीशिका का मुंह-तोड़ जवाब हो सकते हैं।


शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

Why should there not be a library in every hospital

फिर क्यों ना हो हर अस्पताल में पुस्तकालय

पंकज चतुर्वेदी

मई के दूसरे सप्ताह में दिल्ली से सटे गाजियाबद में कोरोना के मरीजों के मिलने का सिलसिला तेज था, मरीज भी भय और भ्रम के चलते बदवहास से थे। उनके लिए एकांतवास या क्वारंटीन किसी सजा की तरह था। आए रोज एकांतवास केंद्रो से मरीजों के झगडे या तनाव की खबरें आ रही थीं। तभी जिला प्रषासन ने नेषनल बुक ट्रस्ट के सहयोग से कोई 200 बच्चें की पुस्तकें वहां वितरित कर दीं। उस समय 65 महिलाओं सहित लगभग 250 लोगों को कोविड-19 के सामान्य लक्षण या एहतियात के तौर पर एकांतवास शिविर  में थे। रंगबिरंगी पुस्तकों ने कुछ ही दर में उनके दिल में जगह बना ली, कोई जोर-जोर से पढ़ कर दूसरे को सुना रहा था तो कोई चित्र देख कर ही खुश  थे। जहां एक-एक पल बिताना मुश्किल  हो रहा था, उनका समय पंख लगा कर उड़ गया। डॉक्टर्स ने भी माना कि पुस्तकों ने क्वारंटीन किए गए लोगों को तनावरहित बनाया, उन्हें गहरी नींद आई और सकारात्मकता का संचार भी हुआ। इससे उनके स्वस्थ्य होने की गति भी बढ़ी | इसी को देख कर दिल्ली में भी छतरपुर स्थित राधास्वामी सतसंग में बनाए गए विश्व  के सबसे बड़े क्वारंटीन सेंटर में हजारों पुस्तकों के साथ लायब्रेरी शुरू  करने की पहल की गई है। यहा नेशनल बुक ट्रस्ट ने एक हज़ार किताबों के साथ उनकी पत्रिका - पाठक मंच बुलेटिन ओर पुस्तक संस्कृति के सौ -सौ अंक भी रखे हैं |


वैसे दुनिया के विकसित देशों  के अस्पतालो में पुस्तकालय की व्यवस्था का अतीत सौ साल से भी पुराना है। अमेरिका में 1917 में सेना के अस्पतालों में कोई 170 पुस्तकालय स्थापित कर दिए गए थे। ब्रिटेन में सन 1919 में वार लायब्रेरी की शुरू आत हुई। इसके बाद आज अधिकांश  यूरोपीय देशों  के अस्पतालों में मरीजों को व्यस्त रखने, उन्हें ठीक होने का भरोसा देने के लिए उन्हें ऐसी पुस्तकों प्रदान करने की व्यवस्था हैं। आस्ट्रेलिया के सार्वजनिक अस्पतालों में तो ऐसे पुस्तकालय हैं जहां से आम लोग अर्थात जो मरीज नहीं हैं, वे भी पुस्तकें पढ़ने के लिए ले सकते हैं। इंग्लैंड के मैनचेस्टर का क्रिस्टी कैंसर अस्पताल का पुस्तकालय तो बहुत बड़ा और अनूठा है, वहां पुस्तकों का वर्गीकरण रंगों में है-जैसे पर्यावरण की पुस्तकें हरे रंग का बैज, जानवरों की पुस्तकें भूरे रंग का बैज- जो मरीज या उनका तिमारदार जितनी अधिक पुस्तकें पढता है, उसे उस रंग के उतने ही बैज मिलते हैं और वह अस्ताल से विदा होते समय उन रंग से संबंधित कोई किताब उपहार में पाने का हकदार होता है। ऐसे ही कई प्रयोग स्पैन और जर्मनी के अस्पतालों में पुस्तकालयों की भीड़ व आकर्षण  बढ़ाने का कारक बने हुए हैं। जापान के अस्पतालों में बच्चों की किताबे ढेर सारी  मिल जाती हैं ओर उन्हें अक्सर वयस्क ही पढते हैं |


भारत में अंदाजन अडतीस हजार अस्पताल हैं जिनमें कोई आठ लाख से अधिक मरीज हर दिन भर्ती होते हैं। इनके साथ तिमारदार भी होते हैं तो मोटा अनमान है कि कोई बीस लाख लोग चौबीसों घंटे अस्पताल परिसर में होते हैं। इनमें बीस फीसदी ही बेहद गंभीर होते हैं,  शेष लोग बुद्धि से चैतन्य और ऐसी अवस्था में होते हैं जहां उन्हें बिस्तर पर लेटने या बाहर अपने मरीज का इंतजार करना एक उकताहट भरा काम होता है। आमतौर पर बड़े अस्पतालों में अब तिमारदारों के लिए बने प्रतीक्षा कक्ष और निजी कक्ष में भर्ती मरीजों के लिए टीवी की व्यवस्था कर दी गई है।  इन टेलीविजन पर या तो सांप्रदायिक, बेवजह सनसनी फैलाने वाली खबरें या विमर्ष या फिर अपराध-साजिश - प्रतिघात वाले सोप ऑपेरा चलते रहते हैं। ऐसे कार्यक्रम मरीज के रक्तचाप को प्रभावित करते है। और बैचेनी  बढ़ाते हैं, वहीं अपने मरीज के स्वास्थय के लिए पहले से चिंतित और समय काट रहे तिमारदार के लिए भी या सबकुछ देखना महज समय को काटना ही होता है। यदि मरीज या उनका तिमारदार टेलीविजन ना देखे तो वह मोबाईल में व्यस्त रहता है। मोबाईल भी इन दिनो अफवाह, झूठे दावों के प्रसार का माध्यम बना है। मरीज के जल्दी स्वस्थ होने की लालसा हो या बाहर बैठे उनके रिश्तेदार  या शुभचिंतक , मोबाईल के लगातार इस्तेमाल से अपनी आंख की रेाषनी और गैरप्रामाणिक सूचनाओं के जाल में उलझे हैरान-परेशान से ही रहते हैं।

यह सर्वविदित हैं कि पुस्तकें एकांत में सबसे अच्छा साथ निभाती हैं। ये काले छपे हुए षब्द दर्द और उदासी के दौर में दवा का काम करते हैं। हर किसी की जिंदगी में कुछ अच्छी किताबों का होना जरूरी है। किताबें सिर्फ मनोरंजन या इम्तेहान उत्तीर्ण करने के लिए नहीं होतीं, जिंदगी के रास्ते बनाने के लिए होती हैं। जैसे व्यक्ति अपने  दोस्त का हर पल, हर घड़ी, हर मुश्किल में साथ देते हैं, वैसे ही किताबें भी हर विषम परिस्थिति में मनुष्य की सहायक होती है। किताबों में हर मुश्किल सवाल, परिस्थिति का हल भले ही ना छुपा हो लेकिन दुविधा काल में कितबों में पढ़ने से, समझने से उसकी सोच का विस्तार होता है। अस्पताल या बीमारी के दिन किसी भी इंसान के षारीरिक, मानसिक, आर्थिक  और  सामाजिक चुनौती के दिन होते हैं। अच्छी पुस्तकें लोगों को एक सात्विक मानसिक खुराक  दे सकती हैं, जो उनके जल्दी रोगमुक्त होने में सहायक हो सकता है ।

.यदि देश  के सभी जिला अस्पतालों, मेडीकल कालेज और बड़े समूह के निजी अस्पतालों में हिंदी, अंग्रेजी और स्थानी भाशा की कुछ सौ अच्छी पुस्तकें रखी जाएं, प्रत्येक भर्ती मरीज से सौ-दो सौ रूपए ले कर उनका पुस्तकालय से एक या दो किताबों जारी करने का कार्ड बना दिया जाए तो यह नए तरीके का पुस्तकालय अभियान बन सकता है। यदि प्रशासन या अस्पताल चाहें तो हर शहर में कुछ साहित्यप्रेमी लोग, सेवानिवृत जागरूक व्यक्ति ऐसे पुस्तकालयों के लिए निषुल्क सेवा देने को भी तैयार हो जाएंगे। प्रारंभ में साहित्य, सूचना, बाल साहित्य की पुस्तकें रखी जाएं जो मरीज या तिमारदार को भाषा -विषयवस्तु और प्रस्तुति के स्तर पर ज्यादा कठिन ना लगे। जब एक बार पढने की आदत हो जाएगी तो पाठक को हर तरह का साहित्य या सूचनात्मक पुस्तकें दी जा सकती हैं। प्राय अस्पताल के दिनों में लगे समय को मरीज और उनके साथ आए लोग अपनी जिंदगी का बुरा समय ही मानते हैं, लेकिन यदि पुस्तकों से आया आत्मविश्वास  व सकारात्मक उर्जा मरीज को दी जा रही दवा के साथ उत्प्ररेक का काम करे तो जब वह वे जब अस्पताल से जायेंगे तो उनके पास ज्ञान, सूचना, जिज्ञासा का एक ऐसा खजाना होगा जो उनके साथ जीवनभर रहेगा और अस्पताल के दिन उन्हें एक उपलब्धी की तरह प्रतीत होंगे । यही नहीं ये पुस्तकें अस्पताल में काम कर रहे लोगों के लिए भी एक उर्जा का संचार कर सकती हैं। देष की स्वास्थय नीति बनाते हुए हर अस्पताल में पुस्तकालय के लिए बजट का प्रावाधान किसी निशुल्क  दवा के वितरण की तरह ही प्रभावी कदम होगा।


बुधवार, 15 जुलाई 2020

The Agony Of Kazirangas Wildlife

काजीरंगा के वन्यजीवों की व्यथा

एक सींग के गेंडे और रॉयल बंगाल टाइगर यानी बाघ के सुरक्षित ठिकानों के लिए मशहूर यूनेस्को द्वरा संरक्षित घोषित कांजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के लगभग 80 फीसदी हिस्से में पानी भर गया है. जानवर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में गहरे पानी में थक कर हताश होने की हद तक तैरते हैं, दौड़ते है, दलदली जमीन पर थक कर पस्त हो जाते हैं. या तो पानी उन्हें अपने आगोश में ले लेता है या फिर भूख.
कुछ बच कर बस्ती की तरफ दौड़ते हैं, तो सड़क पर तेज गति वाहनों की चपेट में आ जाते हैं. हाॅग हिरण (पाढ़ा) जैसे पशु शिकारियों के हाथों मारे जाते हैं. इस बार अभी से असम की बाढ़ भयावह है. इससे राज्य के 15 जिलों के 18 लाख लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है. इंसान तो अपने दुख-दर्द को कह लेते हैं, लेकिन इन मासूम जंगली जानवरों की परवाह कौन करे!

असम की राजधानी गुवाहाटी से कोई 225 किलोमीटर दूर गोलाघाट व नगांव जिले में 884 वर्ग किलोमीटर में फैले कांजीरंगा उद्यान की खासियत एक सींग का गैंडा है. इस प्रजाति के सारी दुनिया में उपलब्ध गैंडों का दो-तिहाई हिस्सा इसी क्षेत्र में है.

इसके अलावा बाघ, हाथी, हिरण, जंगली भैंसा, जंगली बनैला जैसे कई जानवर यहां हैं. सनद रहे, 1905 में वायसराय लाॅर्ड कर्जन की पत्नी ने इस इलाके का दौरा किया, तो यहां संरक्षित वन का प्रस्ताव हुआ, जो 1908 में स्वीकृत हुआ. साल 1916 में इसे शिकार के लिए संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया. फिर 1950 में वन्य जीव अभ्यारण, 1968 में राष्ट्रीय उद्यान और 1974 में विश्व धरोहर बनाया गया.

ताजा गणना में यहां 2413 गैंडे, 1089 हाथी, 104 बाघ, 907 हाॅग हिरण, 1937 जंगली भैंसे आदि जानवर पाये गये थे. पिछले कुछ सालों में यहां चौकसी भी तगड़ी हुई है, सो शिकारी अपेक्षाकृत कम सफल रहे हैं. हालांकि इस बार बरसात सामान्य ही है, फिर भी ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी बाढ़ प्रभावित इलाके में बसे कांजीरंगा के जानवरों के लिए काल बन कर आयी है. साल 2016 में कोई डेढ़ हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले 140 ऐसे ऊंचे टीले बनाये गये थे, जहां वे पानी भरने पर सुरक्षित आसरा बना सकें.

ये टीले चार से पांच मीटर ऊंचाई के हैं. पिछले साल ऐसे ही जल विप्लव में 20 गैंडे, एक हाथी, कई हिरण व अन्य जानवर मारे गये थे. इस बार 183 सुरक्षित ठिकानों में से 70 जलमग्न हो चुके हैं. अनेक क्षेत्रों में गहरा पानी है. यहां सबसे बड़ी समस्या है कि पानी से बचने के लिए जानवर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 37 पर आ जाते है और तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आ जाते हैं. हालांकि प्रशासन वाहनों की गति सीमित रखने की चेतावनी जारी करता है, लेकिन मूसलाधार बारिश में यातायात को नियंत्रित करना मुश्किल होता है.

वैसे इस संरक्षित पार्क में जानवरों के विचरण के आठ पारंपरिक मार्गो को संरक्षित रखा गया है, लेकिन बाढ़ के पानी ने सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है. वन के दूसरे छोर पर कार्बी आंगलांग का पठार है. सदियों से जानवर ब्रह्मपुत्र के कोप से बचने के लिए यहां शरण लेते रहे हैं और इस बार भी जिन्हें रास्ता मिला, वे वहीं भाग रहे हैं. दुर्भाग्य है कि वहां उनका इंतजार दूसरे किस्म का काल करता है. इस इलाके में कई आतंकी गिरोह सक्रिय हैं, जिनका मूल धंधा जानवरों के अंगों की तस्करी है. इसमें शीर्ष पर गैंडे का सींग है. एक सींग का वजन एक किलो तक होता है और इसकी स्थानीय कीमत कम से कम अस्सी लाख है, जो बाहर तीन करोड़ तक हो जाती है.

असम में समुचित विकास न होने का कारण हर साल पांच महीने ब्रह्मपुत्र का रौद्र रूप है, जो पलक झपकते ही सालभर की मेहनत को चाट जाता है. वैसे तो यह नद सदियों से बह रहा है और बाढ़ से पार्क का क्षेत्र निर्मित हुआ है, लेकिन बीते कुछ सालों से इसकी तबाही का विकराल रूप सामने आ रहा है. इसका बड़ा कारण विकास और प्रबंधन के नाम पर इंसान के प्रयोग भी हैं. हालिया बाढ़ हिमालय के ग्लेशियर क्षेत्र में मानवजन्य छेड़छाड़ का ही परिणाम हैं.

जानवरों की जिंदगी से स्थानीय लोगों को कोई सरोकार है नहीं, न ही उनकी मौत पर किसी के वोट बैंक पर असर होता है, सो काजीरंगा की नैसर्गिक सरिताओं व जल-मार्गों पर कहीं सड़कें बना दी जाती हैं, तो कहीं उन्हें पर्यटकों के अनुरूप अवरूद्ध किया जाता है. तभी पानी बहने के बजाय एकत्र हो जाता है. साल 1915 से अब तक इस जंगल की कोई 150 वर्ग किलोमीटर जमीन कट कर नदी में उदरस्थ हो चुकी है. सरकार भले ही वन के परिक्षेत्र को बढ़ाने के लिए नये इलाके शामिल कर रही हो, लेकिन हकीकत में वहां की जमीन लगातार कम हो रही है.

आज जरूरत है कि नदी तट के लगभग 20 किलोमीटर इलाके में पक्के मजबूत तटबंध या अन्य व्यवस्था से भूक्षरण को रोका जाये. बाढ़ तो प्राकृतिक आपदा है, लेकिन इसमें फंस कर इतनी बड़ी संख्या में जानवरों का मारा जाना तंत्र की नाकामी है. कभी 11 स्पीड बोट भी खरीदी गयी थीं, आज उनमें से एक भी उपलब्ध नहीं है. बचाव के लिए दूरगामी योजना बनाना अनिवार्य है क्योंकि जंगल में दूसरा खतरा पानी उतरने के बाद शुरू होता है, जब दलदल बढ़ जाता है, सूखा पर्यावास बचता नहीं और पानी मरे जानवरों के सड़ने से दूषित हो जाता है.

रविवार, 12 जुलाई 2020

library in each hospital can change way of medical treatment

फिर क्यों ना हो हर अस्पताल में पुस्तकालय

पंकज चतुर्वेदी



मई के दूसरे सप्ताह में दिल्ली से सटे गाजियाबद में कोरोना के मरीजों के मिलने का सिलसिला तेज था, मरीज भी भय और भ्रम के चलते बदवहास से थे। उनके लिए एकांतवास या क्वारंटीन किसी सजा की तरह था। आए रोज एकांतवास केंद्रो से मरीजों के झगडे या तनाव की खबरें आ रही थीं। तभी जिला प्रषासन ने नेषनल बुक ट्रस्ट के सहयोग से कोई 200 बच्चें की पुस्तकें वहां वितरित कर दीं। उस समय 65 महिलाओं सहित लगभग 250 लोगों को कोविड-19 के सामान्य लक्षण या एहतियात के तौर पर एकांतवास शिविर  में थे। रंगबिरंगी पुस्तकों ने कुछ ही दर में उनके दिल में जगह बना ली, कोई जोर-जोर से पढ़ कर दूसरे को सुना रहा था तो कोई चित्र देख कर ही खुश  थे। जहां एक-एक पल बिताना मुश्किल  हो रहा था, उनका समय पंख लगा कर उड़ गया। डॉक्टर्स ने भी माना कि पुस्तकों ने क्वारंटीन किए गए लोगों को तनावरहित बनाया, उन्हें गहरी नींद आई और सकारात्मकता का संचार भी हुआ। इससे उनके स्वस्थ्य होने की गति भी बढ़ी | इसी को देख कर दिल्ली में भी छतरपुर स्थित राधास्वामी सतसंग में बनाए गए विश्व  के सबसे बड़े क्वारंटीन सेंटर में हजारों पुस्तकों के साथ लायब्रेरी शुरू  करने की पहल की गई है। यहा नेशनल बुक ट्रस्ट ने एक हज़ार किताबों के साथ उनकी पत्रिका - पाठक मंच बुलेटिन ओर पुस्तक संस्कृति के सौ -सौ अंक भी रखे हैं |

वैसे दुनिया के विकसित देशों  के अस्पतालो में पुस्तकालय की व्यवस्था का अतीत सौ साल से भी पुराना है। अमेरिका में 1917 में सेना के अस्पतालों में कोई 170 पुस्तकालय स्थापित कर दिए गए थे। ब्रिटेन में सन 1919 में वार लायब्रेरी की शुरू आत हुई। इसके बाद आज अधिकांश  यूरोपीय देशों  के अस्पतालों में मरीजों को व्यस्त रखने, उन्हें ठीक होने का भरोसा देने के लिए उन्हें ऐसी पुस्तकों प्रदान करने की व्यवस्था हैं। आस्ट्रेलिया के सार्वजनिक अस्पतालों में तो ऐसे पुस्तकालय हैं जहां से आम लोग अर्थात जो मरीज नहीं हैं, वे भी पुस्तकें पढ़ने के लिए ले सकते हैं। इंग्लैंड के मैनचेस्टर का क्रिस्टी कैंसर अस्पताल का पुस्तकालय तो बहुत बड़ा और अनूठा है, वहां पुस्तकों का वर्गीकरण रंगों में है-जैसे पर्यावरण की पुस्तकें हरे रंग का बैज, जानवरों की पुस्तकें भूरे रंग का बैज- जो मरीज या उनका तिमारदार जितनी अधिक पुस्तकें पढता है, उसे उस रंग के उतने ही बैज मिलते हैं और वह अस्ताल से विदा होते समय उन रंग से संबंधित कोई किताब उपहार में पाने का हकदार होता है। ऐसे ही कई प्रयोग स्पैन और जर्मनी के अस्पतालों में पुस्तकालयों की भीड़ व आकर्षण  बढ़ाने का कारक बने हुए हैं। जापान के अस्पतालों में बच्चों की किताबे ढेर साडी मिल जाती हैं ओर उन्हें अक्सर वयस्क ही पढते हैं |

भारत में अंदाजन अडतीस हजार अस्पताल हैं जिनमें कोई आठ लाख से अधिक मरीज हर दिन भर्ती होते हैं। इनके साथ तिमारदार भी होते हैं तो मोटा अनमान है कि कोई बीस लाख लोग चौबीसों घंटे अस्पताल परिसर में होते हैं। इनमें बीस फीसदी ही बेहद गंभीर होते हैं,  शेष लोग बुद्धि से चैतन्य और ऐसी अवस्था में होते हैं जहां उन्हें बिस्तर पर लेटने या बाहर अपने मरीज का इंतजार करना एक उकताहट भरा काम होता है। आमतौर पर बड़े अस्पतालों में अब तिमारदारों के लिए बने प्रतीक्षा कक्ष और निजी कक्ष में भर्ती मरीजों के लिए टीवी की व्यवस्था कर दी गई है।  इन टेलीविजन पर या तो सांप्रदायिक, बेवजह सनसनी फैलाने वाली खबरें या विमर्ष या फिर अपराध-साजिश - प्रतिघात वाले सोप ऑपेरा चलते रहते हैं। ऐसे कार्यक्रम मरीज के रक्तचाप को प्रभावित करते है। और बैचेनी  बढ़ाते हैं, वहीं अपने मरीज के स्वास्थय के लिए पहले से चिंतित और समय काट रहे तिमारदार के लिए भी या सबकुछ देखना महज समय को काटना ही होता है। यदि मरीज या उनका तिमारदार टेलीविजन ना देखे तो वह मोबाईल में व्यस्त रहता है। मोबाईल भी इन दिनो अफवाह, झूठे दावों के प्रसार का माध्यम बना है। मरीज के जल्दी स्वस्थ होने की लालसा हो या बाहर बैठे उनके रिश्तेदार  या शुभचिंतक , मोबाईल के लगातार इस्तेमाल से अपनी आंख की रेाषनी और गैरप्रामाणिक सूचनाओं के जाल में उलझे हैरान-परेशान से ही रहते हैं।

यह सर्वविदित हैं कि पुस्तकें एकांत में सबसे अच्छा साथ निभाती हैं। ये काले छपे हुए षब्द दर्द और उदासी के दौर में दवा का काम करते हैं। हर किसी की जिंदगी में कुछ अच्छी किताबों का होना जरूरी है। किताबें सिर्फ मनोरंजन या इम्तेहान उत्तीर्ण करने के लिए नहीं होतीं, जिंदगी के रास्ते बनाने के लिए होती हैं। जैसे व्यक्ति अपने  दोस्त का हर पल, हर घड़ी, हर मुश्किल में साथ देते हैं, वैसे ही किताबें भी हर विषम परिस्थिति में मनुष्य की सहायक होती है। किताबों में हर मुश्किल सवाल, परिस्थिति का हल भले ही ना छुपा हो लेकिन दुविधा काल में कितबों में पढ़ने से, समझने से उसकी सोच का विस्तार होता है। अस्पताल या बीमारी के दिन किसी भी इंसान के शारीरिक , मानसिक, आर्थिक  और  सामाजिक चुनौती के दिन होते हैं। अच्छी पुस्तकें लोगों को एक सात्विक मानसिक खुराक  दे सकती हैं, जो उनके जल्दी रोगमुक्त होने में सहायक हो सकता है ।

.यदि देश  के सभी जिला अस्पतालों, मेडीकल कालेज और बड़े समूह के निजी अस्पतालों में हिंदी, अंग्रेजी और स्थानी भाशा की कुछ सौ अच्छी पुस्तकें रखी जाएं, प्रत्येक भर्ती मरीज से सौ-दो सौ रूपए ले कर उनका पुस्तकालय से एक या दो किताबों जारी करने का कार्ड बना दिया जाए तो यह नए तरीके का पुस्तकालय अभियान बन सकता है। यदि प्रशासन या अस्पताल चाहें तो हर शहर में कुछ साहित्यप्रेमी लोग, सेवानिवृत जागरूक व्यक्ति ऐसे पुस्तकालयों के लिए निशुल्क  सेवा देने को भी तैयार हो जाएंगे। प्रारंभ में साहित्य, सूचना, बाल साहित्य की पुस्तकें रखी जाएं जो मरीज या तिमारदार को भाषा -विषयवस्तु और प्रस्तुति के स्तर पर ज्यादा कठिन ना लगे। जब एक बार पढने की आदत हो जाएगी तो पाठक को हर तरह का साहित्य या सूचनात्मक पुस्तकें दी जा सकती हैं। प्राय अस्पताल के दिनों में लगे समय को मरीज और उनके साथ आए लोग अपनी जिंदगी का बुरा समय ही मानते हैं, लेकिन यदि पुस्तकों से आया आत्मविश्वास  व सकारात्मक उर्जा मरीज को दी जा रही दवा के साथ उत्प्ररेक का काम करे तो जब वह वे जब अस्पताल से जायेंगे तो उनके पास ज्ञान, सूचना, जिज्ञासा का एक ऐसा खजाना होगा जो उनके साथ जीवनभर रहेगा और अस्पताल के दिन उन्हें एक उपलब्धी की तरह प्रतीत होंगे । यही नहीं ये पुस्तकें अस्पताल में काम कर रहे लोगों के लिए भी एक उर्जा का संचार कर सकती हैं। देश  की स्वास्थय नीति बनाते हुए हर अस्पताल में पुस्तकालय के लिए बजट का प्रावाधान किसी निशुल्क  दवा के वितरण की तरह ही प्रभावी कदम होगा।


रविवार, 5 जुलाई 2020

Reduce Garbage is only solution of garbage disposal problem

कूड़ा निस्तारण : ढूंढ़ना होगा समाधान




हालांकि दिल्ली के गाजीपुर के कूड़ा घर की क्षमता सन 2006 में आवश्यकता से अधिक हो गई थी, समय-समय पर अदालत चेताती रही है कि पचास मीटर ऊंचा कूड़े का ढेर धरती, समाज के लिए खतरनाक है, लेकिन अब जाकर सरकार जागी है।

उसे चिंता है कि कूड़े की नई खत्ती कहां बनाई जाए। यह सच है कि हर दिन कूड़ा तो निकलना ही है और उसके निबटान के आधुनिक वैज्ञानिक तरीके खोजे जाने चाहिए, लेकिन उससे भी अनिवार्य है कि समाज कूड़े को कम करना सीखे। भले ही हम कूड़े को अपने पास फटकने नहीं देना चाहते हों, लेकिन विडंबना है कि यह कूड़ा हमारी गलतियों या बदलती आदतों के कारण ही दिन-दुगना, रात-चौगुना बढ़ रहा है।
नेशनल इन्वायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, नागपुर के मुताबिक देश में हर साल 44 लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है। हमारे देश में औसतन प्रति व्यक्ति 20 ग्राम से 60 ग्राम कचरा हर दिन निकालता है। इसमें से आधे से अधिक कागज, लकड़ी या पुट्ठा होता है, जबकि 22 फीसद कूड़ा-कबाड़ा, घरेलू गंदगी होती है। कचरे का निबटान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है।

दिल्ली के नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर तक दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाश रहे हैं। जरा सोचें कि इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढोकर ले जाना, कितना महंगा और जटिल काम है। यह सरकार भी मानती है कि देश के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिशत का ही ईमानदारी से निबटान हो पाता है। राजधानी दिल्ली का तो 57 फीसद कूड़ा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यमुना में बहा दिया जाता है। कागज, प्लास्टिक, धातु जैसा बहुत-सा कूड़ा तो कचरा बीनने वाले जमा कर रिसाइकलिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके, खाने-पीने की चीजें, मरे हुए जानवर आदि कुछ समय में सड़-गल जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए विकराल संकट का रूप लेता जा रहा है। सनद रहे दिल्ली तो बानगी है, ठीक यही हालात लखनऊ, पटना, गुवाहाटी, सतना, जयपुर या चंडीगढ़ के भी हैं। हम कूड़ा निकाल कर शहर से दूर कहीं फेंक देते हैं और फिर वही कूड़ा हमारी जमीन, जल और जीवन को जहरीला करता जाता है। सुंदर शहरों में तनिक-सी बरसात के बाद बनते दरिया हों या फिर भूजल के जहरीला होने की चिंता या फिर तालाब समाप्त होने और नदियों के उथला होने के सरोकार, जरा गंभीरता से देखें तो यह सब कुछ उस कूड़े के कुप्रभाव हैं। हमारे देश के शहर हर दिन लगभग 1,50,000 टन ठोस कचरा (एमएसडब्ल्यू) उगल रहे हैं, जिसमें से महज 25 फीसद का प्रसंस्करण हो पाता है। बाकी बचा कचरा या तो खुले में फेंक दिया जाता है, या जला दिया जाता है। वर्ष 2030 तक कचरे की यह मात्रा 4,50,000 टन प्रति दिन हो जाएगी। सालों से हमारे यहां इस कूड़े से बिजली बनाने की चर्चा रही है, लेकिन यह प्रयोग बुरी तरह असफल रहा। इस तरह का पहला संयंत्र (डब्ल्यूटीई) दिल्ली के तिमारपुर में वर्ष 1987 में लगा लेकिन चला नहीं। तब से देश में 130 मेगावाट क्षमता के चौदह और डब्ल्यूटीई संयंत्र लगाए गए, लेकिन इनमें से आधे बंद हो चुके हैं। बाकी पर पर्यावरण नियमों की अनदेखी की जांच चल रही है।
दिल्ली के ओखला संयंत्र पर तो पच्चीस लाख का जुर्माना भी हो गया। इन संयंत्रों के फेल होने का कारण कचरे की गुणवत्ता और संघटन है। कचरे में नमी ज्यादा होती है। इसलिए  उसे जलाने में अधिक ऊर्जा लगती है जबकि बिजली कम मिलती है। कूड़ा अब नये तरह की आफत बन रहा है, सरकार उसके निबटान के लिए तकनीकी और अन्य प्रयास भी कर रही है। लेकिन असल में कोशिश तो कचरे को कम करने की होनी चाहिए। इसके लिए केरल में कन्नूर जिले से सीख ले सकते हैं, जहां पूरे जिले में बॉल पेन के इस्तेमाल से लोगों ने तौबा कर ली है क्योंकि इससे हर दिन लाखों रिफिल का कूड़ा निकलता था। पूरे जिले में कोई भी दुकानदार पॉलीथीन की थैली या प्लास्टिक के डिस्पोजेबल बर्तन ना तो बेचता है और ना ही इस्तेमाल करता है। सबसे बड़ी बात उच्च होती जीवन-शैली में कचरा-नियंत्रण और उसके निबटान की शिक्षा स्कूली स्तर पर दिया जाना अनिवार्य बनाना जरूरी है।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

How will rural India fight with Corona without water

बगैर पानी के कैसे केारेाना से लड़ेगा ग्रामीण भारत 

                                                                                                                                            पंकज चतुर्वेदी


कोरोना ने देश  को एक बात की चेतावनी दे दी कि स्वास्थ्य सेवाएं भी राष्ट्रीय  सुरक्षा का मसला है। जब तक कोई माकूल इलाज या वैक्सीन नहीं मिलती, तब तक देश  को इस संक्रमण से बचाने का एकमात्र उपाय व्यक्तिगत स्वच्छता और उसमें भी बार-बार  साबुन से हाथ धोना है। कोरोना से जूझते समय हमारे जर्जर विकित्सा तंत्र के अलावा जो सबसे बड़ी चुनौती देश  के सामने है , वह है इस संग्राम के लिए अनिवार्य पानी की बेहद कमी, दूशित जल और पानी का लाचार सा प्रबंधन। सनद रहे बीस सैकंड हाथ धोने के लिए कम से कम दो लीटर पानी की जरूरत होती है। इस तरह पांच लोगों को परिवार को यदि दिन में पांच से सात बार हाथ धोना पड़े तो उसका पचास लीटर पानी इसी मद में चाहिए, जबकि देश  में औसतन 40 लीटर पानी प्रति व्यक्ति बमुश्किल  मिल पा रहा है। 
नेशनल सैंपल सर्वे आफिस(एनएसएसओ) की ताजा 76वीं रिपोर्ट बताती है कि देश  में 82 करोड़ लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक पानी  मिल नहीं पा रहा है। देश  के महज 21.4 फीसदी लोगों को ही घर तक सुरक्षित जल उपलब्ध है।  सबसे दुखद है कि नदी-तालाब जैसे भूतल जल का 70 प्रतिशत बुरी तरह प्रदूषित  है।  यह सरकार स्वीकार रही है कि 78 फीसदी ग्रामीण और 59 प्रतिषत शहरी घरों तक स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं हैं। कोरोना संकट के चलते ग्रामीण अंचलों में आबादी का भार बढ़ा है। अनुमान है कि कोई आठ करोड़ लोग गांवों को लौटे हैं। जाहिर है कि इनके कारण पानी की मांग भी बढ़ी है। आज भी देश  की कोई 17 लाख ग्रामीण बसावटों में से लगभग 78 फीसदी में पानी की न्यूनतम आवश्यक मात्रा तक पहुंच है। यह भी विडंबना है कि अब तक हर एक को पानी पहुंचाने की परियोजनाओं पर 89,956 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने के बावजूद, सरकार परियोजना के लाभों को प्राप्त करने में विफल रही है। आज महज 45,053 गाँवों को नल-जल और हैंडपंपों की सुविधा मिली है, लेकिन लगभग 19,000 गाँव ऐसे भी हैं जहां साफ पीने के पानी का कोई नियमित साधन नहीं है।सन 1950 में लागू भारत के संविधान के अनुच्छेद 47 में भले ही यह दर्ज हो कि प्रत्येक देशवासी को साफ पानी मुहैया करवाना राज्य का दायित्व है लेकिन 16 करोड़ से अधिक भारतीयों के लिए सुरक्षित पीने का पानी की आस अभी बहुत दूर है। हजारों बस्तियां ऐसी हैं जहां लोग कई-कई किलोमीटर पैदल चल कर पानी लाते हैं। राजधानी दिल्ली की बीस फीसदी से ज्यादा आबादी पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर है। यह आंकड़े भारत सरकार के पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के हैं। 

अगस्त, 2018 में सरकार की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया था कि सरकारी योजनाएं प्रति दिन प्रति व्यक्ति सुरक्षित पेयजल की दो बाल्टी प्रदान करने में विफल रही हैं जोकि निर्धारित लक्ष्य का आधा था। रिपोर्ट में कहा गया कि खराब निष्पादन और घटिया प्रबंधन के चलते सारी योजनएं अपने लक्ष्य से दूर होती गईं । कारण वितरित करने में विफल रही। भारत सरकार ने प्रत्येक ग्रामीण व्यक्ति को पीने, खाना पकाने और अन्य बुनियादी घरेलू जरूरतों के लिए स्थायी आधार पर गुणवत्ता मानक के साथ पानी की न्यूनतम मात्रा उपलब्ध करवाने के इरादे से राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम सन 2009 में शुरू किया था। इसमें हर घर को परिषोधित जल घर पर ही या सार्वजनिक स्थानों पर नल द्वारा मुहैया करवाने की योजना थी। इसमें सन 2022 तक देष में षत प्रतिषत षुद्ध पेयजल आपूर्ति का संकल्प था।  भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की पिछले साल की रिपोर्ट बानगी है कि कई हजार करोड़ खर्च करने के बाद भी यह परियेाजना सफेद हाथी साबित हुई है। सन 2017 तक परियोजना की कुल राषि 89,956 करोड़ रुपये का 90 प्रतिषत खर्च करने के बावजूद, कार्यक्रम में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के  बहुत दूर है। 
ग्रामीण भारत में पेय जल मुहैया करवाने के लिए 10वीं पंचवर्षीय योजना(2002-2007) तक 1,105 अरब रुपये खर्च किये जा चुके थे। इसकी शुरुआत 1949 में हुई जब 40 वर्षों के भीतर 90 प्रतिशत जनसंख्या को साफ पीने का पानी उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया। इसके ठीक दो दशक बाद 1969 में यूनिसेफ की तकनीकी मदद से करीब 255 करोड़ रुपये खर्च कर 12 लाख बोरवेल खोदे गए और पाइप से पानी आपूर्ति की 17,000 योजनाएं शुरू की गईं। इसके अगले दो दशकों में सरकार ने एक्सीलरेटेड वाटर सप्लाई प्रोग्राम (एआरडब्ल्यूएसपी), अंतरराष्ट्रीय पेयजल और स्वच्छता दशक के तहत सभी गाँवों को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिये एक शीर्ष समिति का निर्माण, राष्ट्रीय पेयजल मिशन (एनडीडब्ल्यूएम) और 1987 की राष्ट्रीय जलनीति के रूप में कई योजनाएं बनीं। 
उसके बाद 2009 से दूसरी योजना प्रारंभ हो गई। हजारों करोड़ रुपये और दसियों योजनाओं के बावजूद आज भी  कोई करीब 3.77 करोड़ लोग हर साल दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमार पड़ते हैं। लगभग 15 लाख बच्चे दस्त से अकाल मौत मरते हैं । अंदाजा है कि पीने के पानी के कारण बीमार होने वालों से 7.3 करोड़ कार्य-दिवस बर्बाद होते हैं। इन सबसे भारतीय अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 39 अरब रूपए का नुकसान होता है। 

गौरतलब है कि ग्रामीण भारत की 85 फीसदी आबादी अपनी पानी की जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है।  एक तो भूजल का स्तर लगातार गहराई में जा रहा है , दूसरा भूजल एक ऐसा संसाधन है जो यदि दूशित हो जाए तो उसका निदान बहुत कठिन होता है। यह संसद में बताया गया है कि करीब 6.6 करोड़ लोग अत्यधिक फ्लोराइड वाले पानी के घातक नतीजों से जूझ रहे हैं, इन्हें दांत खराब होने , हाथ पैरे टेड़े होने जैसे रोग झेलने पड़ रहे हैं।  जबकि करीब एक करोड़ लोग अत्यधिक आर्सेनिक वाले पानी के शिकार हैं। कई जगहों पर पानी में लोहे (आयरन) की ज्यादा मात्रा भी बड़ी परेशानी का सबब है।
यह आंकड़ा वैसे बड़ा लुभावना लगता है कि देश  का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.80 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि सभी नदियों को सम्मिलत जलग्रहण क्षेत्र 32.7 लाख वर्गमीटर है। भारतीय नदियों के मार्ग से हर साल 1913.6 अरब घनमीटर पानी बहता है जो सारी दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिषत है।  आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विशय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसदी बारिष के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है और नदियां सूखी रह जाती हैं। जो नदियों बची भी हैं वे भारी प्रदूशण की मारी हैं। हर घर को नल से जल या ऐसी कोई भी योजना तभी सफल है जब हम बरसात के पानी को सहजेने के संसाधन - नदी, तालाब, जोहड़, बावलियों ,कुओं आदि को उनके मूल स्वरूप में लाने का संकल्प नहीं करते। 

यह आशंका पूरी दुनिया जता रही है कि जैव विविधता से हुई छेड़छाड़, जलवायु परिवर्तन और धरती के सतत बढ़ते तापमान के दुश्परिणाम अब अजीब-अंजान से जंतु-जन्य संक्रामक रोगों के रूप में सामने आने लगे हैं। इनके भय से सामाजिक दूरी बनाए रखने के उपायों के चलते बड़ी आबादी के सामने जीवकोपार्जन का संकट खउ़ा हो रहा है। जाहिर है कि ऐसे में स्वच्छ पानी की बतौर पेयजल और व्यक्तिगत स्वच्छता के लिए पर्याप्त उपलब्धता ना केवल स्वास्थ्य का बल्कि राष्ट्र  की सुरक्षा का मामला है। 


बुधवार, 1 जुलाई 2020

China invest lots for intellectual war

चीन से फौजी ही नहीं बौद्धिक स्तर भी निबटना होगा

पंकज चतुर्वेदी
नव भारत टाइम्स 02 जुलाई 2020Add caption

 

भारत और चीन के बीच 3488 किलोमीटर की वास्तविक नियंत्रण रेखा पर मौजूदा विवाद और हमारे बीस जवानों की शहादत से सरकार पर यह जन दवाब है कि चीन को सबक सीखाया जाए , कुछ लोग चीनी उत्पादों के बहिष्कार तोबहुत से लोग पकिस्तान की तरह सर्जिकल स्त्रयिक कर अपने जवानों की मौत का बदला लेना चाहते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि चीन की सोच साम्राज्यवादी है और वह यह कतई नहीं चाहता कि भारत सीमा के
पास सडक –संचार जैसी सुविधाओं को सशक्त करे . लेकिन यह समझना जरुरी है कि चीन जैसी विश्व शक्ति से
महज सैनिक या व्यापारिक कार्यवाही के बल पर मुकाबला नहीं हो सकता, हमारे घर में लगने वाली बिजली के
मीटर का उत्पादन कई महीनों से केवल इस लिए बंद है कि उसमें लगने वाला डिजिटल डिस्प्ले हम चीन से मंगा
ते हैं और कोविड के चलते यह आयात बंद है , यह बानगी है कि चीन किस तरह दुनिया के देशों को मजबूर बनाता है, उसे समझा जाए .
यह जान लें कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ही वहां की फौज अर्थात पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को
नियंत्रित करती है. वहां कम्युनिस्ट पार्टी केवल हथियार या तकनीक से सेना को ताकत देने का काम ही नहीं
, बल्कि ऐसे कई  मोर्चों पर निवेश और नियोजन करती  है जिससे उनकी सेना को बगैर लडे ही कई जगह“ जीत” मिल जाती है . इसके लिए उसने सूचना अतंत्र , जानकारी एकत्र करने और उसे अपनी सहूलियत के हिसाब से दुनिया को  देने का काम भी किया है—इसमें तकनीकी शामिल है और जानकारी देने का तरीका भी - दूसरे शब्दों में, धारणाओं की लड़ाई का प्रबंधन. शांतिकाल में भी चीनी अपनी ताकत को ले कर दुनिया में भ्रम, संदेह, चिंता, भय, आतंक के भाव को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए कई कई स्तर पर काम करते रहते हैं नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी, गुओयानहुआ  के एक चीनी प्रोफेसर  ने “साइकोलॉजिकल वारफेयर नॉलेज” नामक अपनी किताब में लिखा है, "जब कोई दुश्मन को हरा देता है, तो यह महज दुश्मन को मारना  या जमीन के एक टुकड़े को जीतना नहीं होता है, बल्कि मुख्य रूप से दुश्मन के दिल में हार का भाव स्थापित करना होता है ।" युद्ध के मैदान के बाहर प्रतिद्वंद्वी के मनोबल को कम करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि युद्ध के मैदान में। जब से शी जिनपिंग ने चीन पर पूरी तरह नियंत्रण किया है, तब से वह न केवल अपने देश में बल्कि अन्य देशों में भी मीडिया को नियंत्रित करने पर बहुत काम कर रहे हैं। चीन के मिडिया के लिए शी का स्पष्ट निर्देश है कि उसका काम "देश में राजनीतिक स्थिरता के लिए काम करना , पार्टी से प्यार करना, पार्टी की रक्षा करना और पार्टी नेतृत्व के साथ मिलकर नीति और विचार का प्रसार करना  है।"  यह सभी जानते हैं कि चीम में अखबार और टीवी , सोशल मिडिया से ले कर सर्च इंजन तक सरकार के नियंत्रण में है . वहां का प्रकाशन उद्योग भी सरकार के कब्जे में है , हर साल जुलाई के अंतिम हफ्ते में लगने वाला पेइचिंग पुस्तक मेला दुनिअभर के बड़े प्रकाशकों को आकर्षित करता है , वहां चीन के फोरें पब्लिशिं डिपार्टमेंट का असली उद्देश्य उनके यहाँ की पुस्तकों के अधिक से अधिक राइट्स या स्वत्ताधिकार बेचना होता हैं , गत दस सैलून में अकेले दिल्ली में चीन से प्राप्त अनुदान के आधार पर सैंकड़ा भर चीनी पुस्तकों का अनुवाद हुआ, यही नहीं भारत- चीन के विदेशी विभाग भी ऐसे ही अनुवाद परियोजना पर काम कर रहे हैं . दिल्ली के कई निजी प्रकाशक अब अधिकांश चीनी पुस्तकों के अनुवाद छाप कर मालामाल हो रहे हैं इस तरह  चीन दुनियाभर के जनमत निर्माताओं, पत्रकारों, विश्लेषकों, राजनेताओं, मीडिया हाउसों और लेखकों-अनुवादकों का समूह बनाने में भारी निवेश कर रहा है जो अपने-अपने देशों में चीनी हित को बढ़ावा देने के लिए प्रयत्नशील और इच्छुक हैं।
वैसे तो यह महज साहित्यिक या पत्रकारीय कार्य होता है लेकिन इसका असली एजेंडा चीन की भव्यता, ताकत , क्षमता को शांति और युद्ध दोनों के समय दुसरे देशों में प्रसारित करने में होता हैं , ये लोग अपने लेख वीडियों, सोशल मिडिया सामग्री  आदि को इस नेटवर्क के माध्यम से प्रसारित करते हैं . हाल ही की गलवान घाटी में हमारे जवानों की शहादत के मामले को देखें , भारत का मिडिया अधिकांश ग्लोबल टाइम्स या चीनी सहयोग से चलने वाली आस्ट्रेलिया या सिंगापूर की संवाद एजेंसियों की खबर और फूटेज पर बहस, कर रहा है . भारत सरकार ने अद्तालिश घंटे तक कोई आधिकारिक आंकड़े या चित्र जारी नहीं किये, इतनी देर चीन का ही बोलबाला रहा .ऐसी सूचनाओं के कई मनोवैज्ञानिक दूरगामी असर होते हैं जैसे कि उस देश के आम लोगों, सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के बीच चेतावनी और भय-मनोविकृति पैदा करने और उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करने और चीनी दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए मजबूर करना आदी । चीन की सरकार भारत सहित अन्य  कई देशों में मिडिया में निवेश के लिए अरबों डॉलर खर्च कर रही है। हाल ही में, चीन ने विदेशी मीडिया प्रकाशनों में विज्ञापन स्थान की खरीद के माध्यम से भारी निवेश किया है।
चीन मुख्य रूप से एशिया और अफ्रीकी देशों के विदेशी पत्रकारों के लिए फेलोशिप कार्यक्रम भी चलाता है। भारतीयों सहित प्रति वर्ष 100 पत्रकारों को हर साल फ़ेलोशिप कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण मिलता है। उन्हें अपने देशों में चीनी विचारों  का प्रचार करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। पेइचिंग विश्विद्यालय सहित कई स्थान पर बाकायदा हिंदी के कोर्स हैं और वहां अधिकांश लड़कियां होती हैं, ये अपने नाम  भी राधा, बिंदु जैसे भारतीय रखती हैं . नियमित भारत के अखबारों को पढ़ना, उसमें चीन के उल्लेख को अनूदित करना , उसके अनुरूप सामग्री तैयार करना इन छात्रों का कार्य होता है . इसके बदले इन्हें कई सुविधाएँ मिलती हैं , रेडियों चाइना में बांग्ला सेक्शन भी है और उसका कार्य एक कोरिया की महिला देखती है जो कि बांग्ला में पारंगत है . यह बानगी है बताने को कि चीन भारत में अपने पक्ष में धारणा विकसित करें को किस हद तक मेहनत  करता हैं ।
जान कर आश्चर्य होगा कि टीवी बहस में शामिल कई सेवानिवृत सैन्य अधिकारी ऐसे हैं जिन्होंने कभी लेह-लद्दाख , अरुणाचल प्रदेश या उत्तराखंड के सीमाई इलाकों में सेवा ही नहीं दी और वे टीवी पर सीमा विवाद और सैन्य तयारी पर विमर्श करते हैं. यह तय है कि भारत सरकार या सेना उनसे कोई गोपनीय या नीतिगत योजना तो साझा करती नहीं है लेकिन वे दुनिया भर में मिडिया के माध्यम से भारत की सेना की तरफ से बोलते दीखते हैं, हकीकत यह है कि ऐसे अफसर या लेखक किसी हथियार एजेंसी या अन्य  उत्पाद संस्था के भारतीय एजेंट की नौकरी करते हैं और उनकी सेवा शर्तों में इस तरह के उल्लेख होते हैं कि भारतीय सैन्य स्थिति पर अनुमान या सतही व्याख्या करनी होती है , किसी हथियार या उपकरण की आवश्यकता या अन्य देश के वैसे ही उपकरण की तुलना में चीनी उत्पाद या चीन के किसी एनी देश में निवेश द्वारा निर्मित उत्पाद को बेहतर बताना होता है ।
यह भी सच है कि हमारे देश में ही राजनितिक विचारधारा के कारण चीन के प्रति सहानुभूति रखने वाले भले ही बहुत कम हों लेकिन इस बारे में दोषारोपण या गालियाँ देने वाले अधिक हैं , वास्तव में यह आम लोगों में एक दुसरे के प्रति अविश्वास का माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं . युद्ध या तनाव काल में जब देश एकजुट हो, तब ऐसी वैचारिक टकराव सोशल मिडिया पर एकजुटता का भाव दिखने में सफल होते हैं शायद आश्चर्य होगा कि इस तरह के टकराव बाकायदा चीन से नियोजित होते हैं . जो व्यापारी कुछ दिनों पहले तक गणपति की मूर्ति या दिवाली पूजा के सजावटी सामान के सेम्पल ले कर चीन गए थे और उनके साथ व्यापारी के हिंदी दुभाषिये थे , ऐसे ही लोग व्हाट्स एप सन्देश बना क्र भेजते हैं और उसका प्रचार गणपति- दिवाली वाले व्यापारी यह सोच कर करते हैं कि यह खबर तो सीधे वहीँ से मिली है विश्वास जीतना , पैसा कमाई करवाना और फिर अपने तरह के विचार लोगों में संप्रेषित कर देना , यह चीन का बौद्धिक युद्ध- कौशल है
सैन्य स्तर पर हम चीन से निश्चित ही निबट लेंगे लेकिन हमारे देश 65 फीसदी मोबाईल बाज़ार , स्मार्ट टीवी का 35 प्रतिशत . लाखों लोगों को रोजगार देने वाली पेटीएम , ओला, ओयो जैसी कम्पनियाँ , हमारे लघु और माध्यम उद्योगों की कच्चे माल या एसेम्बलिंग मटेरियल के लिए चीन पर निर्भरता के अलावा बौद्धिक सामग्री और मिडिया में चीन का अपरोक्ष दखल ऐसे कारक हैं जिनसे आने वाले कुछ सालों में भारत को पार पाना होगा . भारतीय फौज शारीरिक, मानसिक और अनुभव के क्षेत्र में चीन से कई गुना सक्षम है लेकिन आज का युद्ध बहुत कुछ आर्थिक और बौद्धिक है और इसके लिए हमें अभी से तयारी करना होगा

 


The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...