My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्ठ ब्लाॅग के पुरस्कार से सम्मानित
मंगलवार, 21 जुलाई 2020
inundation-pushes-the-economy-back
शुक्रवार, 17 जुलाई 2020
Why should there not be a library in every hospital
फिर क्यों ना हो हर अस्पताल में पुस्तकालय
पंकज चतुर्वेदी
मई के दूसरे सप्ताह में दिल्ली से सटे गाजियाबद में कोरोना के मरीजों के मिलने का सिलसिला तेज था, मरीज भी भय और भ्रम के चलते बदवहास से थे। उनके लिए एकांतवास या क्वारंटीन किसी सजा की तरह था। आए रोज एकांतवास केंद्रो से मरीजों के झगडे या तनाव की खबरें आ रही थीं। तभी जिला प्रषासन ने नेषनल बुक ट्रस्ट के सहयोग से कोई 200 बच्चें की पुस्तकें वहां वितरित कर दीं। उस समय 65 महिलाओं सहित लगभग 250 लोगों को कोविड-19 के सामान्य लक्षण या एहतियात के तौर पर एकांतवास शिविर में थे। रंगबिरंगी पुस्तकों ने कुछ ही दर में उनके दिल में जगह बना ली, कोई जोर-जोर से पढ़ कर दूसरे को सुना रहा था तो कोई चित्र देख कर ही खुश थे। जहां एक-एक पल बिताना मुश्किल हो रहा था, उनका समय पंख लगा कर उड़ गया। डॉक्टर्स ने भी माना कि पुस्तकों ने क्वारंटीन किए गए लोगों को तनावरहित बनाया, उन्हें गहरी नींद आई और सकारात्मकता का संचार भी हुआ। इससे उनके स्वस्थ्य होने की गति भी बढ़ी | इसी को देख कर दिल्ली में भी छतरपुर स्थित राधास्वामी सतसंग में बनाए गए विश्व के सबसे बड़े क्वारंटीन सेंटर में हजारों पुस्तकों के साथ लायब्रेरी शुरू करने की पहल की गई है। यहा नेशनल बुक ट्रस्ट ने एक हज़ार किताबों के साथ उनकी पत्रिका - पाठक मंच बुलेटिन ओर पुस्तक संस्कृति के सौ -सौ अंक भी रखे हैं |
वैसे दुनिया के विकसित देशों के अस्पतालो में पुस्तकालय की व्यवस्था का अतीत
सौ साल से भी पुराना है। अमेरिका में 1917 में सेना के
अस्पतालों में कोई 170 पुस्तकालय स्थापित कर दिए गए थे।
ब्रिटेन में सन 1919 में वार लायब्रेरी की शुरू आत हुई। इसके
बाद आज अधिकांश यूरोपीय देशों के अस्पतालों में मरीजों को व्यस्त रखने,
उन्हें ठीक होने का भरोसा देने के लिए उन्हें ऐसी पुस्तकों प्रदान
करने की व्यवस्था हैं। आस्ट्रेलिया के सार्वजनिक अस्पतालों में तो ऐसे पुस्तकालय
हैं जहां से आम लोग अर्थात जो मरीज नहीं हैं, वे भी पुस्तकें
पढ़ने के लिए ले सकते हैं। इंग्लैंड के मैनचेस्टर का क्रिस्टी कैंसर अस्पताल का
पुस्तकालय तो बहुत बड़ा और अनूठा है, वहां पुस्तकों का
वर्गीकरण रंगों में है-जैसे पर्यावरण की पुस्तकें हरे रंग का बैज, जानवरों की पुस्तकें भूरे रंग का बैज- जो मरीज या उनका तिमारदार जितनी
अधिक पुस्तकें पढता है, उसे उस रंग के उतने ही बैज मिलते हैं
और वह अस्ताल से विदा होते समय उन रंग से संबंधित कोई किताब उपहार में पाने का
हकदार होता है। ऐसे ही कई प्रयोग स्पैन और जर्मनी के अस्पतालों में पुस्तकालयों की
भीड़ व आकर्षण बढ़ाने का कारक बने हुए हैं। जापान
के अस्पतालों में बच्चों की किताबे ढेर सारी मिल जाती हैं ओर उन्हें अक्सर वयस्क ही
पढते हैं |
भारत में अंदाजन अडतीस हजार अस्पताल हैं जिनमें कोई
आठ लाख से अधिक मरीज हर दिन भर्ती होते हैं। इनके साथ तिमारदार भी होते हैं तो
मोटा अनमान है कि कोई बीस लाख लोग चौबीसों घंटे अस्पताल परिसर में होते हैं। इनमें
बीस फीसदी ही बेहद गंभीर होते हैं, शेष लोग बुद्धि से चैतन्य और ऐसी अवस्था में
होते हैं जहां उन्हें बिस्तर पर लेटने या बाहर अपने मरीज का इंतजार करना एक उकताहट
भरा काम होता है। आमतौर पर बड़े अस्पतालों में अब तिमारदारों के लिए बने प्रतीक्षा
कक्ष और निजी कक्ष में भर्ती मरीजों के लिए टीवी की व्यवस्था कर दी गई है। इन टेलीविजन पर या तो सांप्रदायिक, बेवजह सनसनी फैलाने वाली खबरें या विमर्ष या फिर अपराध-साजिश - प्रतिघात
वाले सोप ऑपेरा चलते रहते हैं। ऐसे कार्यक्रम मरीज के रक्तचाप को प्रभावित करते
है। और बैचेनी बढ़ाते हैं, वहीं अपने मरीज के स्वास्थय के लिए पहले से चिंतित और समय काट रहे
तिमारदार के लिए भी या सबकुछ देखना महज समय को काटना ही होता है। यदि मरीज या उनका
तिमारदार टेलीविजन ना देखे तो वह मोबाईल में व्यस्त रहता है। मोबाईल भी इन दिनो
अफवाह, झूठे दावों के प्रसार का माध्यम बना है। मरीज के
जल्दी स्वस्थ होने की लालसा हो या बाहर बैठे उनके रिश्तेदार या शुभचिंतक , मोबाईल के लगातार
इस्तेमाल से अपनी आंख की रेाषनी और गैरप्रामाणिक सूचनाओं के जाल में उलझे
हैरान-परेशान से ही रहते हैं।
यह सर्वविदित हैं कि पुस्तकें एकांत में सबसे अच्छा
साथ निभाती हैं। ये काले छपे हुए षब्द दर्द और उदासी के दौर में दवा का काम करते
हैं। हर किसी की जिंदगी में कुछ अच्छी किताबों का होना जरूरी है। किताबें सिर्फ
मनोरंजन या इम्तेहान उत्तीर्ण करने के लिए नहीं होतीं, जिंदगी के रास्ते बनाने के लिए होती हैं। जैसे व्यक्ति अपने दोस्त का हर पल, हर घड़ी,
हर मुश्किल में साथ देते हैं, वैसे ही किताबें
भी हर विषम परिस्थिति में मनुष्य की सहायक होती है। किताबों में हर मुश्किल सवाल,
परिस्थिति का हल भले ही ना छुपा हो लेकिन दुविधा काल में कितबों में
पढ़ने से, समझने से उसकी सोच का विस्तार होता है। अस्पताल या
बीमारी के दिन किसी भी इंसान के षारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौती के दिन होते हैं। अच्छी पुस्तकें
लोगों को एक सात्विक मानसिक खुराक दे सकती
हैं, जो उनके जल्दी रोगमुक्त होने में सहायक हो सकता है ।
.यदि देश के सभी जिला अस्पतालों, मेडीकल
कालेज और बड़े समूह के निजी अस्पतालों में हिंदी, अंग्रेजी और
स्थानी भाशा की कुछ सौ अच्छी पुस्तकें रखी जाएं, प्रत्येक
भर्ती मरीज से सौ-दो सौ रूपए ले कर उनका पुस्तकालय से एक या दो किताबों जारी करने
का कार्ड बना दिया जाए तो यह नए तरीके का पुस्तकालय अभियान बन सकता है। यदि प्रशासन
या अस्पताल चाहें तो हर शहर में कुछ साहित्यप्रेमी लोग, सेवानिवृत
जागरूक व्यक्ति ऐसे पुस्तकालयों के लिए निषुल्क सेवा देने को भी तैयार हो जाएंगे।
प्रारंभ में साहित्य, सूचना, बाल
साहित्य की पुस्तकें रखी जाएं जो मरीज या तिमारदार को भाषा -विषयवस्तु और
प्रस्तुति के स्तर पर ज्यादा कठिन ना लगे। जब एक बार पढने की आदत हो जाएगी तो पाठक
को हर तरह का साहित्य या सूचनात्मक पुस्तकें दी जा सकती हैं। प्राय अस्पताल के
दिनों में लगे समय को मरीज और उनके साथ आए लोग अपनी जिंदगी का बुरा समय ही मानते
हैं, लेकिन यदि पुस्तकों से आया आत्मविश्वास व सकारात्मक उर्जा मरीज को दी जा रही दवा के साथ
उत्प्ररेक का काम करे तो जब वह वे जब अस्पताल से जायेंगे तो उनके पास ज्ञान,
सूचना, जिज्ञासा का एक ऐसा खजाना होगा जो उनके
साथ जीवनभर रहेगा और अस्पताल के दिन उन्हें एक उपलब्धी की तरह प्रतीत होंगे । यही
नहीं ये पुस्तकें अस्पताल में काम कर रहे लोगों के लिए भी एक उर्जा का संचार कर
सकती हैं। देष की स्वास्थय नीति बनाते हुए हर अस्पताल में पुस्तकालय के लिए बजट का
प्रावाधान किसी निशुल्क दवा के वितरण की
तरह ही प्रभावी कदम होगा।
बुधवार, 15 जुलाई 2020
The Agony Of Kazirangas Wildlife
असम की राजधानी गुवाहाटी से कोई 225 किलोमीटर दूर गोलाघाट व नगांव जिले में 884 वर्ग किलोमीटर में फैले कांजीरंगा उद्यान की खासियत एक सींग का गैंडा है. इस प्रजाति के सारी दुनिया में उपलब्ध गैंडों का दो-तिहाई हिस्सा इसी क्षेत्र में है.
इसके अलावा बाघ, हाथी, हिरण, जंगली भैंसा, जंगली बनैला जैसे कई जानवर यहां हैं. सनद रहे, 1905 में वायसराय लाॅर्ड कर्जन की पत्नी ने इस इलाके का दौरा किया, तो यहां संरक्षित वन का प्रस्ताव हुआ, जो 1908 में स्वीकृत हुआ. साल 1916 में इसे शिकार के लिए संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया. फिर 1950 में वन्य जीव अभ्यारण, 1968 में राष्ट्रीय उद्यान और 1974 में विश्व धरोहर बनाया गया.
ताजा गणना में यहां 2413 गैंडे, 1089 हाथी, 104 बाघ, 907 हाॅग हिरण, 1937 जंगली भैंसे आदि जानवर पाये गये थे. पिछले कुछ सालों में यहां चौकसी भी तगड़ी हुई है, सो शिकारी अपेक्षाकृत कम सफल रहे हैं. हालांकि इस बार बरसात सामान्य ही है, फिर भी ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी बाढ़ प्रभावित इलाके में बसे कांजीरंगा के जानवरों के लिए काल बन कर आयी है. साल 2016 में कोई डेढ़ हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले 140 ऐसे ऊंचे टीले बनाये गये थे, जहां वे पानी भरने पर सुरक्षित आसरा बना सकें.
ये टीले चार से पांच मीटर ऊंचाई के हैं. पिछले साल ऐसे ही जल विप्लव में 20 गैंडे, एक हाथी, कई हिरण व अन्य जानवर मारे गये थे. इस बार 183 सुरक्षित ठिकानों में से 70 जलमग्न हो चुके हैं. अनेक क्षेत्रों में गहरा पानी है. यहां सबसे बड़ी समस्या है कि पानी से बचने के लिए जानवर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 37 पर आ जाते है और तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आ जाते हैं. हालांकि प्रशासन वाहनों की गति सीमित रखने की चेतावनी जारी करता है, लेकिन मूसलाधार बारिश में यातायात को नियंत्रित करना मुश्किल होता है.
वैसे इस संरक्षित पार्क में जानवरों के विचरण के आठ पारंपरिक मार्गो को संरक्षित रखा गया है, लेकिन बाढ़ के पानी ने सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है. वन के दूसरे छोर पर कार्बी आंगलांग का पठार है. सदियों से जानवर ब्रह्मपुत्र के कोप से बचने के लिए यहां शरण लेते रहे हैं और इस बार भी जिन्हें रास्ता मिला, वे वहीं भाग रहे हैं. दुर्भाग्य है कि वहां उनका इंतजार दूसरे किस्म का काल करता है. इस इलाके में कई आतंकी गिरोह सक्रिय हैं, जिनका मूल धंधा जानवरों के अंगों की तस्करी है. इसमें शीर्ष पर गैंडे का सींग है. एक सींग का वजन एक किलो तक होता है और इसकी स्थानीय कीमत कम से कम अस्सी लाख है, जो बाहर तीन करोड़ तक हो जाती है.
असम में समुचित विकास न होने का कारण हर साल पांच महीने ब्रह्मपुत्र का रौद्र रूप है, जो पलक झपकते ही सालभर की मेहनत को चाट जाता है. वैसे तो यह नद सदियों से बह रहा है और बाढ़ से पार्क का क्षेत्र निर्मित हुआ है, लेकिन बीते कुछ सालों से इसकी तबाही का विकराल रूप सामने आ रहा है. इसका बड़ा कारण विकास और प्रबंधन के नाम पर इंसान के प्रयोग भी हैं. हालिया बाढ़ हिमालय के ग्लेशियर क्षेत्र में मानवजन्य छेड़छाड़ का ही परिणाम हैं.
जानवरों की जिंदगी से स्थानीय लोगों को कोई सरोकार है नहीं, न ही उनकी मौत पर किसी के वोट बैंक पर असर होता है, सो काजीरंगा की नैसर्गिक सरिताओं व जल-मार्गों पर कहीं सड़कें बना दी जाती हैं, तो कहीं उन्हें पर्यटकों के अनुरूप अवरूद्ध किया जाता है. तभी पानी बहने के बजाय एकत्र हो जाता है. साल 1915 से अब तक इस जंगल की कोई 150 वर्ग किलोमीटर जमीन कट कर नदी में उदरस्थ हो चुकी है. सरकार भले ही वन के परिक्षेत्र को बढ़ाने के लिए नये इलाके शामिल कर रही हो, लेकिन हकीकत में वहां की जमीन लगातार कम हो रही है.
आज जरूरत है कि नदी तट के लगभग 20 किलोमीटर इलाके में पक्के मजबूत तटबंध या अन्य व्यवस्था से भूक्षरण को रोका जाये. बाढ़ तो प्राकृतिक आपदा है, लेकिन इसमें फंस कर इतनी बड़ी संख्या में जानवरों का मारा जाना तंत्र की नाकामी है. कभी 11 स्पीड बोट भी खरीदी गयी थीं, आज उनमें से एक भी उपलब्ध नहीं है. बचाव के लिए दूरगामी योजना बनाना अनिवार्य है क्योंकि जंगल में दूसरा खतरा पानी उतरने के बाद शुरू होता है, जब दलदल बढ़ जाता है, सूखा पर्यावास बचता नहीं और पानी मरे जानवरों के सड़ने से दूषित हो जाता है.
रविवार, 12 जुलाई 2020
library in each hospital can change way of medical treatment
फिर क्यों ना हो हर अस्पताल में
पुस्तकालय
पंकज चतुर्वेदी
मई के दूसरे सप्ताह में दिल्ली से सटे
गाजियाबद में कोरोना के मरीजों के मिलने का सिलसिला तेज था, मरीज भी भय और भ्रम के चलते बदवहास से थे। उनके लिए
एकांतवास या क्वारंटीन किसी सजा की तरह था। आए रोज एकांतवास केंद्रो से मरीजों के
झगडे या तनाव की खबरें आ रही थीं। तभी जिला प्रषासन ने नेषनल बुक ट्रस्ट के सहयोग
से कोई 200 बच्चें की पुस्तकें वहां वितरित कर दीं। उस समय 65 महिलाओं सहित लगभग 250 लोगों को कोविड-19 के सामान्य लक्षण या एहतियात के तौर पर एकांतवास शिविर में थे। रंगबिरंगी पुस्तकों ने कुछ ही दर में
उनके दिल में जगह बना ली, कोई जोर-जोर से पढ़ कर दूसरे को
सुना रहा था तो कोई चित्र देख कर ही खुश थे। जहां एक-एक पल बिताना मुश्किल हो रहा था, उनका समय पंख
लगा कर उड़ गया। डॉक्टर्स ने भी माना कि पुस्तकों ने क्वारंटीन किए गए लोगों को
तनावरहित बनाया, उन्हें गहरी नींद आई और सकारात्मकता का
संचार भी हुआ। इससे उनके स्वस्थ्य होने की गति भी बढ़ी | इसी को देख कर दिल्ली में
भी छतरपुर स्थित राधास्वामी सतसंग में बनाए गए विश्व के सबसे बड़े क्वारंटीन सेंटर में हजारों
पुस्तकों के साथ लायब्रेरी शुरू करने की
पहल की गई है। यहा नेशनल बुक ट्रस्ट ने एक हज़ार किताबों के साथ उनकी पत्रिका -
पाठक मंच बुलेटिन ओर पुस्तक संस्कृति के सौ -सौ अंक भी रखे हैं |
वैसे दुनिया के विकसित देशों के अस्पतालो में पुस्तकालय की व्यवस्था का अतीत
सौ साल से भी पुराना है। अमेरिका में 1917 में सेना के अस्पतालों में कोई 170 पुस्तकालय
स्थापित कर दिए गए थे। ब्रिटेन में सन 1919 में वार
लायब्रेरी की शुरू आत हुई। इसके बाद आज अधिकांश यूरोपीय देशों के अस्पतालों में मरीजों को व्यस्त रखने,
उन्हें ठीक होने का भरोसा देने के लिए उन्हें ऐसी पुस्तकों प्रदान
करने की व्यवस्था हैं। आस्ट्रेलिया के सार्वजनिक अस्पतालों में तो ऐसे पुस्तकालय
हैं जहां से आम लोग अर्थात जो मरीज नहीं हैं, वे भी पुस्तकें
पढ़ने के लिए ले सकते हैं। इंग्लैंड के मैनचेस्टर का क्रिस्टी कैंसर अस्पताल का
पुस्तकालय तो बहुत बड़ा और अनूठा है, वहां पुस्तकों का
वर्गीकरण रंगों में है-जैसे पर्यावरण की पुस्तकें हरे रंग का बैज, जानवरों की पुस्तकें भूरे रंग का बैज- जो मरीज या उनका तिमारदार जितनी
अधिक पुस्तकें पढता है, उसे उस रंग के उतने ही बैज मिलते हैं
और वह अस्ताल से विदा होते समय उन रंग से संबंधित कोई किताब उपहार में पाने का
हकदार होता है। ऐसे ही कई प्रयोग स्पैन और जर्मनी के अस्पतालों में पुस्तकालयों की
भीड़ व आकर्षण बढ़ाने का कारक बने हुए हैं। जापान
के अस्पतालों में बच्चों की किताबे ढेर साडी मिल जाती हैं ओर उन्हें अक्सर वयस्क
ही पढते हैं |
भारत में अंदाजन अडतीस हजार अस्पताल
हैं जिनमें कोई आठ लाख से अधिक मरीज हर दिन भर्ती होते हैं। इनके साथ तिमारदार भी
होते हैं तो मोटा अनमान है कि कोई बीस लाख लोग चौबीसों घंटे अस्पताल परिसर में
होते हैं। इनमें बीस फीसदी ही बेहद गंभीर होते हैं, शेष लोग बुद्धि से चैतन्य और ऐसी
अवस्था में होते हैं जहां उन्हें बिस्तर पर लेटने या बाहर अपने मरीज का इंतजार
करना एक उकताहट भरा काम होता है। आमतौर पर बड़े अस्पतालों में अब तिमारदारों के लिए
बने प्रतीक्षा कक्ष और निजी कक्ष में भर्ती मरीजों के लिए टीवी की व्यवस्था कर दी
गई है। इन टेलीविजन पर या तो सांप्रदायिक,
बेवजह सनसनी फैलाने वाली खबरें या विमर्ष या फिर अपराध-साजिश -
प्रतिघात वाले सोप ऑपेरा चलते रहते हैं। ऐसे कार्यक्रम मरीज के रक्तचाप को
प्रभावित करते है। और बैचेनी बढ़ाते हैं,
वहीं अपने मरीज के स्वास्थय के लिए पहले से चिंतित और समय काट रहे
तिमारदार के लिए भी या सबकुछ देखना महज समय को काटना ही होता है। यदि मरीज या उनका
तिमारदार टेलीविजन ना देखे तो वह मोबाईल में व्यस्त रहता है। मोबाईल भी इन दिनो
अफवाह, झूठे दावों के प्रसार का माध्यम बना है। मरीज के
जल्दी स्वस्थ होने की लालसा हो या बाहर बैठे उनके रिश्तेदार या शुभचिंतक , मोबाईल के
लगातार इस्तेमाल से अपनी आंख की रेाषनी और गैरप्रामाणिक सूचनाओं के जाल में उलझे
हैरान-परेशान से ही रहते हैं।
यह सर्वविदित हैं कि पुस्तकें एकांत
में सबसे अच्छा साथ निभाती हैं। ये काले छपे हुए षब्द दर्द और उदासी के दौर में
दवा का काम करते हैं। हर किसी की जिंदगी में कुछ अच्छी किताबों का होना जरूरी है।
किताबें सिर्फ मनोरंजन या इम्तेहान उत्तीर्ण करने के लिए नहीं होतीं, जिंदगी के रास्ते बनाने के लिए होती हैं। जैसे
व्यक्ति अपने दोस्त का हर पल, हर घड़ी, हर मुश्किल में साथ देते हैं, वैसे ही किताबें भी हर विषम परिस्थिति में मनुष्य की सहायक होती है।
किताबों में हर मुश्किल सवाल, परिस्थिति का हल भले ही ना
छुपा हो लेकिन दुविधा काल में कितबों में पढ़ने से, समझने से
उसकी सोच का विस्तार होता है। अस्पताल या बीमारी के दिन किसी भी इंसान के शारीरिक ,
मानसिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौती के दिन होते हैं। अच्छी पुस्तकें
लोगों को एक सात्विक मानसिक खुराक दे सकती
हैं, जो उनके जल्दी रोगमुक्त होने में सहायक हो सकता है ।
.यदि देश के सभी जिला अस्पतालों, मेडीकल
कालेज और बड़े समूह के निजी अस्पतालों में हिंदी, अंग्रेजी और
स्थानी भाशा की कुछ सौ अच्छी पुस्तकें रखी जाएं, प्रत्येक
भर्ती मरीज से सौ-दो सौ रूपए ले कर उनका पुस्तकालय से एक या दो किताबों जारी करने
का कार्ड बना दिया जाए तो यह नए तरीके का पुस्तकालय अभियान बन सकता है। यदि प्रशासन
या अस्पताल चाहें तो हर शहर में कुछ साहित्यप्रेमी लोग, सेवानिवृत
जागरूक व्यक्ति ऐसे पुस्तकालयों के लिए निशुल्क सेवा देने को भी तैयार हो जाएंगे।
प्रारंभ में साहित्य, सूचना, बाल
साहित्य की पुस्तकें रखी जाएं जो मरीज या तिमारदार को भाषा -विषयवस्तु और
प्रस्तुति के स्तर पर ज्यादा कठिन ना लगे। जब एक बार पढने की आदत हो जाएगी तो पाठक
को हर तरह का साहित्य या सूचनात्मक पुस्तकें दी जा सकती हैं। प्राय अस्पताल के
दिनों में लगे समय को मरीज और उनके साथ आए लोग अपनी जिंदगी का बुरा समय ही मानते
हैं, लेकिन यदि पुस्तकों से आया आत्मविश्वास व सकारात्मक उर्जा मरीज को दी जा रही दवा के साथ
उत्प्ररेक का काम करे तो जब वह वे जब अस्पताल से जायेंगे तो उनके पास ज्ञान,
सूचना, जिज्ञासा का एक ऐसा खजाना होगा जो उनके
साथ जीवनभर रहेगा और अस्पताल के दिन उन्हें एक उपलब्धी की तरह प्रतीत होंगे । यही
नहीं ये पुस्तकें अस्पताल में काम कर रहे लोगों के लिए भी एक उर्जा का संचार कर
सकती हैं। देश की स्वास्थय नीति बनाते हुए हर अस्पताल में पुस्तकालय के लिए बजट का
प्रावाधान किसी निशुल्क दवा के वितरण की
तरह ही प्रभावी कदम होगा।
रविवार, 5 जुलाई 2020
Reduce Garbage is only solution of garbage disposal problem
कूड़ा निस्तारण : ढूंढ़ना होगा समाधान
हालांकि दिल्ली के गाजीपुर के कूड़ा घर की क्षमता सन 2006 में आवश्यकता से अधिक हो गई थी, समय-समय पर अदालत चेताती रही है कि पचास मीटर ऊंचा कूड़े का ढेर धरती, समाज के लिए खतरनाक है, लेकिन अब जाकर सरकार जागी है।
उसे चिंता है कि कूड़े की नई खत्ती कहां बनाई जाए। यह सच है कि हर दिन कूड़ा तो निकलना ही है और उसके निबटान के आधुनिक वैज्ञानिक तरीके खोजे जाने चाहिए, लेकिन उससे भी अनिवार्य है कि समाज कूड़े को कम करना सीखे। भले ही हम कूड़े को अपने पास फटकने नहीं देना चाहते हों, लेकिन विडंबना है कि यह कूड़ा हमारी गलतियों या बदलती आदतों के कारण ही दिन-दुगना, रात-चौगुना बढ़ रहा है।
नेशनल इन्वायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, नागपुर के मुताबिक देश में हर साल 44 लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है। हमारे देश में औसतन प्रति व्यक्ति 20 ग्राम से 60 ग्राम कचरा हर दिन निकालता है। इसमें से आधे से अधिक कागज, लकड़ी या पुट्ठा होता है, जबकि 22 फीसद कूड़ा-कबाड़ा, घरेलू गंदगी होती है। कचरे का निबटान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है।
दिल्ली के नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर तक दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाश रहे हैं। जरा सोचें कि इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढोकर ले जाना, कितना महंगा और जटिल काम है। यह सरकार भी मानती है कि देश के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिशत का ही ईमानदारी से निबटान हो पाता है। राजधानी दिल्ली का तो 57 फीसद कूड़ा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यमुना में बहा दिया जाता है। कागज, प्लास्टिक, धातु जैसा बहुत-सा कूड़ा तो कचरा बीनने वाले जमा कर रिसाइकलिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके, खाने-पीने की चीजें, मरे हुए जानवर आदि कुछ समय में सड़-गल जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए विकराल संकट का रूप लेता जा रहा है। सनद रहे दिल्ली तो बानगी है, ठीक यही हालात लखनऊ, पटना, गुवाहाटी, सतना, जयपुर या चंडीगढ़ के भी हैं। हम कूड़ा निकाल कर शहर से दूर कहीं फेंक देते हैं और फिर वही कूड़ा हमारी जमीन, जल और जीवन को जहरीला करता जाता है। सुंदर शहरों में तनिक-सी बरसात के बाद बनते दरिया हों या फिर भूजल के जहरीला होने की चिंता या फिर तालाब समाप्त होने और नदियों के उथला होने के सरोकार, जरा गंभीरता से देखें तो यह सब कुछ उस कूड़े के कुप्रभाव हैं। हमारे देश के शहर हर दिन लगभग 1,50,000 टन ठोस कचरा (एमएसडब्ल्यू) उगल रहे हैं, जिसमें से महज 25 फीसद का प्रसंस्करण हो पाता है। बाकी बचा कचरा या तो खुले में फेंक दिया जाता है, या जला दिया जाता है। वर्ष 2030 तक कचरे की यह मात्रा 4,50,000 टन प्रति दिन हो जाएगी। सालों से हमारे यहां इस कूड़े से बिजली बनाने की चर्चा रही है, लेकिन यह प्रयोग बुरी तरह असफल रहा। इस तरह का पहला संयंत्र (डब्ल्यूटीई) दिल्ली के तिमारपुर में वर्ष 1987 में लगा लेकिन चला नहीं। तब से देश में 130 मेगावाट क्षमता के चौदह और डब्ल्यूटीई संयंत्र लगाए गए, लेकिन इनमें से आधे बंद हो चुके हैं। बाकी पर पर्यावरण नियमों की अनदेखी की जांच चल रही है।
दिल्ली के ओखला संयंत्र पर तो पच्चीस लाख का जुर्माना भी हो गया। इन संयंत्रों के फेल होने का कारण कचरे की गुणवत्ता और संघटन है। कचरे में नमी ज्यादा होती है। इसलिए उसे जलाने में अधिक ऊर्जा लगती है जबकि बिजली कम मिलती है। कूड़ा अब नये तरह की आफत बन रहा है, सरकार उसके निबटान के लिए तकनीकी और अन्य प्रयास भी कर रही है। लेकिन असल में कोशिश तो कचरे को कम करने की होनी चाहिए। इसके लिए केरल में कन्नूर जिले से सीख ले सकते हैं, जहां पूरे जिले में बॉल पेन के इस्तेमाल से लोगों ने तौबा कर ली है क्योंकि इससे हर दिन लाखों रिफिल का कूड़ा निकलता था। पूरे जिले में कोई भी दुकानदार पॉलीथीन की थैली या प्लास्टिक के डिस्पोजेबल बर्तन ना तो बेचता है और ना ही इस्तेमाल करता है। सबसे बड़ी बात उच्च होती जीवन-शैली में कचरा-नियंत्रण और उसके निबटान की शिक्षा स्कूली स्तर पर दिया जाना अनिवार्य बनाना जरूरी है।
शुक्रवार, 3 जुलाई 2020
How will rural India fight with Corona without water
बगैर पानी के कैसे केारेाना से लड़ेगा ग्रामीण भारत
बुधवार, 1 जुलाई 2020
China invest lots for intellectual war
चीन से फौजी ही नहीं बौद्धिक स्तर भी निबटना होगा
पंकज चतुर्वेदी
![]() |
| नव भारत टाइम्स 02 जुलाई 2020Add caption |
The right to a dignified farewell and a new standard in medical world
गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग 12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ जीवन जी रहे हरीश राणा अं...
-
नर्मदा की कहानी सहयात्री के शब्द नर्मदा की कहानी सहयात्री के शब्द [1] ...
-
असफल राष्ट्र , विफल फौज, निष्फल इंतजाम पंकज चतुर्वेदी बीते 15 दिनों से सारी दुनिया को पता था कि भारत पहलगाम का बदला लेगा और जाहीर था ...
-
आखिर मौतघर क्यों बन जाते हैं सीवर? पंकज चतुर्वेदी केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय द्वारा कराए गए एक सोशल ऑडिट की एक...












