My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

INDORE BOOK FAIR; A BOOK FESTIVAL

इंदौर पुस्‍तक मेला के नौ दिन साक्षी हैं कि  इंटरनेट, ईबुक्‍स, आनलाईन पठन के दौर में भी ,अभी भी, काले आखरों का जाूद बरकरार हैा हर रोज दो चार लोग झगडा करने आ जाते थे कि पुस्‍तक मेला दस बजे तक क्‍यों नहीं है, अंतिका प्रकाशन के गौरीनाथ से जब मैंने पूछा कि आपका माल कब लौटेगा, तो उन्‍होंने कहा '' कुल जमा सवा सौ किताबें बची हैं, साथ ही ले जाउंग, हो सकत है कि आखिरी क्षण में उन्‍हें भी कोई खरीद ले'' यह बानगी है कि साहित्‍य की पुस्‍तकें भी बिकती हैं, श्री हरवं
श लाड इंदौर के एक उत्‍साही पुस्‍तक व्‍यवसायी हैं उन्‍होंने राजपाल, ज्ञानपीठ आदि की पुस्‍तकें लगाई थीं, उनका कहना था कि उम्‍मीद से ज्‍यादा बिका, खुशी में उन्‍होंने मेला के आखिरी दिन सभी सहभागियों को कचोरी, समोसा, ढेकाला का नाश्‍ता करवा दिया

इस बार पुस्‍तक मेला का हर दिन एक स्‍थानीय ख्‍यातिलब्‍ध हस्‍ती पर केंद्रित रहा और इसी तरह खेल, विधि, पञिका, महिला लेखन जैसे मसलों पर हर शाम विमर्श हुआा गुरू सत्‍यनारायण सत्‍तनजी जैसे लोग, जो कवि सम्‍मेलन में कई कई हजार दे कर बुलाए जाते हैं, यहं बस समन पा कर कई घंटे रहे व रचना पाठ भी कियाा
मेरे दोस्‍त सुबोध खंडेलवाल ने हर दिन की गतिविधियों को एक ब्‍लाग में सिलसिलेवार समेटा हैा इसे जरूर देखें http://sdayvp.blogspot.in/p/blog-page_7.html

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

Why not ban on loudspeakers ?

आफत बनते भोंपू और चुप्पी साधते लोग
पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

hindustan hindi 10-12-14
आफत बनते भोंपू और चुप्पी साधते लोग
पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
First Published: 09-12-14 08:48 PM
Last Updated: 09-12-14 08:48 PM
भले ही कानून कुछ कहता हो,  अदालतें कड़े आदेश देती हों,  लेकिन धर्म के कंधे पर सवार होकर शोर मचाने वाले लाउडस्पीकर हैं कि मानते ही नहीं। पिछले दो साल के दौरान अकेले उत्तर प्रदेश में हुए 20 से ज्यादा दंगों का मुख्य अभियुक्त यही लाउडस्पीकर रहा है। ये न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बने हैं,  बल्कि आम लोगों की सेहत और पर्यावरण के भी दुश्मन बने हुए हैं। सभी लोग इनसे तंग हैं,  लेकिन चुनौती यही है कि इन पर कानून सम्मत कार्रवाई कौन व कैसे करे? बीते जून-जुलाई में मुरादाबाद के कांठ कस्बे में एक मंदिर पर लाउड स्पीकर लगाने का बवाल इतना बढ़ा था कि वहां कई दिन कर्फ्यू लगाना पड़ा था। उस मामले में इलाहबाद हाई कोर्ट ने साफ कर दिया था कि मंदिर पर भोंपू नहीं लगेगा,  इसके बावजूद वहां हंगामा हुआ। मेरठ के मुंडाली क्षेत्र के नंगलामल गांव में रोजा इफ्तार के दौरान करीबी मंदिर पर भोंपू बजाने के कारण हुए झगड़े में दो लोग मारे गए थे। बरेली में तो लाउड स्पीकर बजाने को ले कर दो बार दंगे हो चुके हैं।

दिल्ली में त्रिलोकपुरी में दिवाली के पहले जागरण के लिए लाउड स्पीकर बजाने पर हुआ बवाल 15 दिनों तक चला। देश भर में 21 लाख से ज्यादा गैर-कानूनी धार्मिक स्थलों का आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया गया है और ये सभी पूजा-स्थलों के लिए जमीन कब्जा करने और लोगों को बरगलाने में लाउडस्पीकर बड़ा अस्त्र हैं। अभी कुछ दशक पहले तक सुबह आंखें खुलने पर पक्षियों का कलरव हमारे कानों में मधु घोलता था,  आज देश की बड़ी आबादी अनमने मन से धार्मिक स्थलों के बेतरतीब शोर के साथ अपना दिन शुरू करता है। यह शोर पक्षियों,  प्रकृति प्रेमी कीट-पतंगों,  पालतू जीवों के लिए भी खतरा है। बुजुर्गों, बीमार लोगों व बच्चों के लिए यह असहनीय शोर बड़ा संकट बन कर उभरा है। पूरी रात जागरण या शादी,  जन्मदिन के लिए डीजे की तेज आवाज कई के लिए जानलेवा बन चुकी है। दुखद तो यह है कि अब यह बेकाबू रोग पूरी तरह निरंकुश हो चुका है।

ऐसा नहीं है कि इस बवाली भोंपू पर कानून नहीं है,  लेकिन उन कानूनों-आदेशों का पालन कौन करवाए? अस्सी डेसीबिल से ज्यादा आवाज न करने,  रात दस बजे से सुबह छह बजे तक ध्वनि-विस्तारक यंत्र का इस्तेमाल किसी भी हालत में न करने,  धार्मिक स्थलों पर एक निश्चित से ज्यादा ऊंचाई पर भोंपू न लगाने,  अस्पताल-शैक्षिक संस्थाओं, अदालत व पूजा स्थल के 100 मीटर के आसपास दिन हो या रात,  लाउड स्पीकर का इस्तेमाल न करने, जैसे ढेर सारे नियम किताबों में दर्ज हैं,  लेकिन लोग इनका इस्तेमाल अपना अधिकार मानकर करते हैं। शिकायत मिलने पर भी पुलिस अक्सर कुछ नहीं कर पाती। एक तो यह उनकी प्राथमिकताओं में नहीं आता,  दूसरा कि जिन्हें इनसे शिकायत है,  वे सामने नहीं आते। उनकी चुप्पी इस शोर को लगातार बढ़ा रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)





भले ही कानून कुछ कहता हो,  अदालतें कड़े आदेश देती हों,  लेकिन धर्म के कंधे पर सवार होकर शोर मचाने वाले लाउडस्पीकर हैं कि मानते ही नहीं। पिछले दो साल के दौरान अकेले उत्तर प्रदेश में हुए 20 से ज्यादा दंगों का मुख्य अभियुक्त यही लाउडस्पीकर रहा है। ये न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बने हैं,  बल्कि आम लोगों की सेहत और पर्यावरण के भी दुश्मन बने हुए हैं। सभी लोग इनसे तंग हैं,  लेकिन चुनौती यही है कि इन पर कानून सम्मत कार्रवाई कौन व कैसे करे? बीते जून-जुलाई में मुरादाबाद के कांठ कस्बे में एक मंदिर पर लाउड स्पीकर लगाने का बवाल इतना बढ़ा था कि वहां कई दिन कर्फ्यू लगाना पड़ा था। उस मामले में इलाहबाद हाई कोर्ट ने साफ कर दिया था कि मंदिर पर भोंपू नहीं लगेगा,  इसके बावजूद वहां हंगामा हुआ। मेरठ के मुंडाली क्षेत्र के नंगलामल गांव में रोजा इफ्तार के दौरान करीबी मंदिर पर भोंपू बजाने के कारण हुए झगड़े में दो लोग मारे गए थे। बरेली में तो लाउड स्पीकर बजाने को ले कर दो बार दंगे हो चुके हैं।

दिल्ली में त्रिलोकपुरी में दिवाली के पहले जागरण के लिए लाउड स्पीकर बजाने पर हुआ बवाल 15 दिनों तक चला। देश भर में 21 लाख से ज्यादा गैर-कानूनी धार्मिक स्थलों का आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया गया है और ये सभी पूजा-स्थलों के लिए जमीन कब्जा करने और लोगों को बरगलाने में लाउडस्पीकर बड़ा अस्त्र हैं। अभी कुछ दशक पहले तक सुबह आंखें खुलने पर पक्षियों का कलरव हमारे कानों में मधु घोलता था,  आज देश की बड़ी आबादी अनमने मन से धार्मिक स्थलों के बेतरतीब शोर के साथ अपना दिन शुरू करता है। यह शोर पक्षियों,  प्रकृति प्रेमी कीट-पतंगों,  पालतू जीवों के लिए भी खतरा है। बुजुर्गों, बीमार लोगों व बच्चों के लिए यह असहनीय शोर बड़ा संकट बन कर उभरा है। पूरी रात जागरण या शादी,  जन्मदिन के लिए डीजे की तेज आवाज कई के लिए जानलेवा बन चुकी है। दुखद तो यह है कि अब यह बेकाबू रोग पूरी तरह निरंकुश हो चुका है।

ऐसा नहीं है कि इस बवाली भोंपू पर कानून नहीं है,  लेकिन उन कानूनों-आदेशों का पालन कौन करवाए? अस्सी डेसीबिल से ज्यादा आवाज न करने,  रात दस बजे से सुबह छह बजे तक ध्वनि-विस्तारक यंत्र का इस्तेमाल किसी भी हालत में न करने,  धार्मिक स्थलों पर एक निश्चित से ज्यादा ऊंचाई पर भोंपू न लगाने,  अस्पताल-शैक्षिक संस्थाओं, अदालत व पूजा स्थल के 100 मीटर के आसपास दिन हो या रात,  लाउड स्पीकर का इस्तेमाल न करने, जैसे ढेर सारे नियम किताबों में दर्ज हैं,  लेकिन लोग इनका इस्तेमाल अपना अधिकार मानकर करते हैं। शिकायत मिलने पर भी पुलिस अक्सर कुछ नहीं कर पाती। एक तो यह उनकी प्राथमिकताओं में नहीं आता,  दूसरा कि जिन्हें इनसे शिकायत है,  वे सामने नहीं आते। उनकी चुप्पी इस शोर को लगातार बढ़ा रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
THE SEA EXPRESS AGRA 14-12-14http://theseaexpress.com/epapermain.aspx


रविवार, 7 दिसंबर 2014

Batukeshwar Dutta : a forgotten Hero

18 नवंबर

आजादी की लड़ाई का एक विस्मृत नायक: बटुकेश्‍वर दत्त


पंकज चतुर्वेदी
चार साल पहले लखनउ के पुराना किला स्थित दुर्गाभाभी द्वारा स्थापित लखनउ मांटेंसरी के सभागार में एक आयोजन हुआ था- बटुकेश्‍वर दत्त के
द सी एक्‍सप्रेस आगरा, 7.12.14
ताब्दी वर्श के प्रारंभ में उसके बाद देश में कुछ जगहों पर कुछ लोगों ने अपने स्तर पर ऐसे आयोजन किए। लेकिन बहरी सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी, विपक्षी दलों को इसमें वोट बैंक का मसाला नहीं मिला- साल बीत गया। ऐसी बेरूखी हुई उस क्रांतिकारी के साथ जिसे बहरी गोरों की सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए शहीदेआजम भगत सिंह ने अपना साथी चुना था था। सांडर्स हत्याकांड, लाहैार षडयंत्र, दिल्ली असेंबली बम कांड की सुनवाईयों के दौरान जेल में अनवरत आमरण अनशन करने वाला और हर बार अदालत लाते समय भगत सिंह पर पड़ने वाली चोटों को अपने शरीर पर लेने वाले बटुकदा। किसी को याद नहीं है उसका नाम, यह क्या याद रहेगा कि पिछले साल 18 नवंबर 2010 को उस महान सेनानी की जन्म शताब्दी था- ना कोई जलसा, ना कोई प्रतिमा, ना कोई डाक टिकट  और ना कोई नामलेवा बचा है बटुकेश्‍वर दत्त का। शताब्दी वर्श के पूरे 4 साल भी ऐसे ही गुमनामी में खो गए, ठीक उसी तरह जैसे कि आजाद भारत में यह महान सेनानी जीवित रहते हुए विस्मृत रहा था।














उन्होंने 12 साल जेल में काटे- कई साल तक कालापानी की अमानवीय यातनाएं झेलीं। भगत सिंह की माताजी उन्हें अपना बेटा मानती थीें, जेल के दिनों में  वे  एक हाथ से भगत सिंह को तो दूसरे हाथ से उसे निवाले खिलाती थीें। यही नहीं आजाद हिंदुस्तान में जब उन्हें कैंसर जैसी बीमारी ने घेर लिया तो उनके गृह राज्य ने नहीं, भगत सिंह के कारण पंजाब सरकार ने उनकी देखभाल की। उनकी अंतिम इच्छा के मुताबिक उनका अंतिम संस्कार भी हुसैनीवाला,फिरोजपुर, पंजाब में भगत सिंह की समाधि के बगल में ही किया गया।  महान क्रांतिकारी बटुकेश्‍वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेम्बली में अपने साथी भगत सिंह के साथ बम बिस्फोट कर ब्रिटिश साम्राज्य को समूल हिला कर रख दिया था और वास्तव में उसी घटना के बाद से भारत में ब्रितानी हुकुमत के पैर उखड़ना शुरू हो गए थे। सनद रहे कि उस घटना के समय भगत सिंह की आयु 21 साल थी, जबकि बटुकेश्‍वर दत्त् महज 18 साल के ही थे । उनके साथी चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू, महावीर सिंह आदि एक-एक करके वतन के लिए शहीद होते चले गये।  जब भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई, तब उन्होंने सेंट्रल जेल, लाहौर से बटुकेश्‍वर दत्त को भेजे गए अपने आखिरी खत में लिखा था- ‘‘तुम्हें आजीवन कारावास मिला है, तुम्हें जीवित रह कर दुनिया को यह दिखाना है कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए ना केवल मर सकता है, बल्कि जीवित रह कर भी दुनिया की हर मुष्किलों का जीवटता से सामना कर सकता है। बटुकेष्वर दत्त ने अपने प्रिय साथी भगत सिंह के इस अटल विश्‍वास को ताजिदंगी कायम रखा। उन्होंने पहले तो जीवटतापूर्वक 10 वर्ष अंडमान की नारकीय जेल में कालापानी की सजा भोगी और फिर उसके बाद उन्होंने सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। एक बार फिर वे काल-कोठरी में कैद रहे। सन् 1947 में अंग्रेज भारत छोड़ कर चले गए। यह विडंबना ही है कि स्वाधीन भारत में इस महान क्रांतिकारी को असहाय, निर्धनता, गुमनामी और जिल्लत भरी जिदंगी ही नसीब हुई । आजादी की लड़ाई में हथियार उठाने के कारण उनके सगे भाई ने उन्हें घर से निकाल दिया था और मृत्युपर्यन्त उनका आपस में कोई संपर्क नहीं रहा। लेकिन जिस देश के लिए उन्हानें अपना सब कुछ कुर्बान किया उसने भी उपेक्षा एवं तिरस्कार के ऐसे तीक्ष्ण दंश उन्हें दिए जो गैरो (अंग्रेजों) की यातनाओं के निर्मम प्रहारों से भी अधिक मर्मभेदी थे। वह महान् क्रांतिवीर जिसके भगतसिंह के साथ फोटो असेम्बली बमकांड के बाद देश के हर घर, दुकानों तक में शीशों से मढे़ होते थे, स्वाधीनता उपरांत पेट पालने के लिए उन्हें सिगरेट कंपनी के मामूली एजेंट के रूप में दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं। उन्होंने बिस्कुट डबलरोटी का एक छोटा सा कारखाना खोला, लेकिन उसमें काफी घाटा हो गया और जल्द ही बंद हो गया। कुछ समय तक टूरिस्ट एजेंट एवं बस परिवहन का काम भी किया, परंतु एक के बाद एक अनेक कामों में असफलता ही उनके हाथ लगी।
किसी ने उन्हें बताया कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को बस के परमिट दिए जा रहे हैं। वे अपनी अर्जी ले कर आरटीओ अफसर के पास गए। उनसे पूछा गया कि आपके पास क्या प्रमाण है कि आप स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे हो। इतना सब कुछ होने के बाद भी वे बिना किसी शिकवा शिकायत के खामोशी से अपनों की बेरूखी एवं उपेक्षा सहते रहे। इतने महान सेनानी के साथ यह सब उस राज्य में हुआ, जो अपनी सभ्यता, संस्कृति और अतीत की बड़ी-बड़ी नजीरें पेश करता है। उस राज्य की राजधानी पटना में जहां मटुकनाथ के सैंकड़ों अनुयायी हैं, बटुक दा को पूछने वाला कोई नहीं है।
बटुकेश्‍वर दत्त आगरा और ग्वालियर भी रहे। उन्हें देवघर में भी नजरबंद रखा गया। आजादी के बाद  18 नवम्बर 1947 को जिस दिन दत्त बाबू का जन्मदिन था, उसी दिन उनका विवाह अंजलि देवी से हो गया । विवाह के बाद वे स्थाई रूप से पटना में ही बस गए थे । उन्होंने पटना के मध्यमवर्गीय इलाके न्यू जक्कनपुर में श्री श्‍यामलचंद्र घोष का मकान किराये पर लिया था । दत्त बाबू ने किराये के इस मकान के बाद पटना के इसी क्षेत्र में एक अन्य मकान किराये से लिया था,जहां कुछ दिनों तक सपरिवार रहे थे । इस विवरण को देने का उद्देश्‍य है कि बटुकदा का जन्म, कार्य क्षेत्र, संघर्ष, जीवन यापन कई राज्यों - बंगाल, बिहार, उ.प्र., म.प्र.,झारखंड में हुआ; लेकिन किसी भी राज्य सरकार को यह सुध नहीं है कि यह उनका शताब्दी वर्ष था ा एक सरकारी विभाग नेशनल बुक ट्रस्ट ने जरूर इस अवसर पर श्री दत्त पर केंद्रित एक पुस्तक का प्रकाशन किया है जो शायद उन पर पहली पुस्तक है।
दत्त बाबू ने अपने जीवनकाल में एक डायरी में अपने क्र्रांतिकारी जीवन के महत्वपूर्ण संस्मरण लिखे थे, पर एक बार कोई महाशय उनसे पुस्तक लेखन के नाम पर वह डायरी मांग कर ले गए और कभी वापस नहीं की ।  दत्त बाबू आत्मकथा लिखना चाहते थे ,दुर्भाग्यवष उन्हें अपना यह ख्वाब साकार करने का मौका ना मिला और महज 55 वर्ष की आयु में ही दुनिया को अलविदा कर गए।
सन् 1963 में बटुकेष्वर दत्त ने भगत सिंह की माता विद्यावती के दर्शन उपरांत जीवन को संपूर्णता को आत्मसात कर लिया था । सन् 1964 में दत्त बाबू अचानक गंभीर रूप से बीमार हो गए। उन्हें 10 अगस्त को पटना के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया, पर वहां उचित उपचार एवं देखरेख के उत्तम प्रबंधों का नितांत अभाव था । एक पत्रकार चमनलाल आजाद की प्रखर लेखनी से सत्ता के गलियारों में खलबली मच गयी । पंजाब के मुख्यमंत्री श्री रामकिशन एवं गृहमंत्री दरबारासिंह ने पंजाब सरकार की ओर से तुरंत एक हजार रूपये चैक बिहार के मुख्यमंत्री के.बी.सहाय को भेजकर यह लिखा कि यदि बिहार सरकार श्री दत्त का इलाज कराने में सक्षम नहीं है तो पंजाब सरकार उनका दिल्ली या चंडीगढ़ में इलाज कराने का संपूर्ण व्यय वहन करने के लिए तैयार है।
भगतसिंह की माता विद्यावती तो दत्त बाबू की बीमारी और उन्हें खो देने की कल्पना मात्र से ही काफी व्यथित हो गयी थी, वह दत्त में भगतसिंह की अनुकृति पाती थी । वह स्वयं काफी लंबी बीमारी भुगत चुकी थीं, 85 वर्ष की आयु में चलने फिरने में मजबूर थीं,फिर भी कभी वे दिल्ली पहुंच जाती,कभी गाॅंव लौट जाती ।  20 जुलाई 1965 की रात 1 बज कर 50 मिनट पर बटुकेश्‍वर दत्त इस नश्‍वर दुनिया से अलविदा हो गए । भारतीय क्रांति का एक दैदिव्यवान नक्षत्र सदैव के लिए अस्त हो गया । जैसी की दत्त बाबू की इच्छा थी, उनका अंतिम संस्कार भगत सिंह की समाधि के करीब ही किया गया। उनकी पत्नी अंजली देवी का देहावसान सन 2001 में हुआ। उनकी इकलोती बेटी भारती बागची पटना में ही रहती हैं और एक कालेज में प्रोफेसर हैं। उनके परिवार से कोई ना तो सियासत में है और ना ही सत्ता के गलियारों में उनका कोई दखल है, शायद तभी इतने महान सेनानी की यादों को संरक्षित करने और आज की पीढ़ी को उनके महान अवदान की जानकारी देने के लिए कोई सरकारी प्रयास नहीं हुए।
श्री बटुकेश्‍वर दत्त की एकमात्र संतान, उनकी बेटी, जो पटना में एक कालेज में प्रोफेसर हैं; का कहना है कि बटकुजी के शताब्दी वर्ष के अवसर पर सरकार को दिल्ली में उसी असेंबली हाल में भगत सिंह और बटुकेश्‍वर दत्त की एक प्रतिमा साथ में लगाना चाहिए। इसके अलावा उन पर एक डाक टिकट और दिल्ली में भगत सिंह व अन्य क्रांतिकारियों की स्मृति में एक स्मारक बनवाना चाहिए। शहीदेआजम भगत सिंह के भांजे तथा उनके विचारों के प्रचार-प्रसार में सक्रिय प्रो जगमोहन सिंह का कहना है कि बटुकेश्‍वर दत्त और भगत सिंह का मूल्यांकन अलग-अलग करना ही बेमानी है। वे एक जान, एक विचार और एक लक्ष्य के दो अलग जिस्म मात्र थे।




why children dislike school?

बच्चों को स्कूल क्यों पसंद नहीं आता ?

दैनिक जागरण 7.12.14                                   http://epaper.jagran.com/…/07-dec-2014-262-delhi-edition-na…#  
                                                           पंकज चतुर्वेदी
वह बामुश्‍किल तीन साल की बच्ची होगी, पापा की गोदी में जब कार से उतरी तो चहक रही थी। जैसे ही बस्ता उसके कंधे पर गया तो वह सुबकने लगी, रंग बिरंगे पुते, दरवाजे तक पहुंची तो दहाड़ें मारने लगी। वह स्कूल क्या है, खेल-घर है, वहां खिलौने हैं, झूले हैं, खरगोश व कबूतर हैं, कठपुतलियां हैं। फिर भी बच्ची वहां जाना नहीं चाहती। अब पापा को तो आफिस की देर हो रही है , सो उन्होंने मचलती बच्ची केा चैाकीदार को सौंपा और रूदन को अनदेखा कर  फुर्र हो गए।  मान लिया कि वह बच्ची बहुत छोटी है, उसे मम्मी-पापा की याद आती होगी व उसके माता-पिता नौकरी करते होंगे सो दिन में बच्ची को व्यस्त रखने के लिए उस प्ले स्कूल में दाखिला करवा दिया होगा। लेकिन यह भी सच है कि आम बच्चे के लिए स्कूल एक जबरदस्ती, अनमने मन से जाने वाली जगह और वहां होने वाली गतिविधियों उसकी मन मर्जी की होती नहीं हैं। कई बार तो स्कूल की पढ़ाई पूरा कर लेने तक बच्चे को समझ ही नहीं आता है कि वह अभी 12-14 साल करता क्या रहा है। उसका आकलन तो साल में एक बार कागज के एक टुकड़े पर कुछ अंक या ग्रेड के तौर पर होता है और वह अपनी पहचान, काबिलियत उस अंक सूची के बाहर तलाशने को छटपटाता रहता है।
11वीं पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य रखा गया था कि  भारत में आठवीं कक्षा तक जाते -जाते स्कूल छोड़ देने वाले बच्चों के 50 प्रतिषत को 20 प्रतिशत तक नीचे ले आया जाए, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया। आज भी  कोई 40 प्रतिशत बच्चे आठ से आगे के दर्जे का स्कूल नहीं देख पाते हैं। हां, यह तय है कि ऊपर स्कूल ना जाने के लिए मचल रही जिस बच्ची का जिक्र किया गया है , उस सामाजिक-आर्थिक हालात के बच्चे आमतौर पर कक्षा आठ के बाद के ड्राप आउट की श्रेणी में नहीं आते हैं। सरकारी दस्तावेज कहते हैं कि स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ने वालों में अधिकांष गरीब, उपेक्षित जाति व समाज के और बच्चियां होती हैं। कई नजीर हैं कि बहुत से उपेक्षित या अछूत जैसी त्रासदी भोग रही जाति के लोगों ने आज से कई दशक पहले  स्कूल भी पढ़ा और गरीबी के बावजूद कालेज भी और उससे आगे भी। असल में वे लोग छोटी उम्र में ही जान गए थे कि शिक्षा नौकरी दिलवाने की कुंजी नहीं, बल्कि बदलाव व जागरूकता का माध्यम है। लेकिन ऐसे लोग विरले ही होते हैं और औसत बच्चों के लिए आज भी स्कूल कुछ ऐसी गतिविधि है जो उनकी अपेक्षा के अनुरूप या मन के मुताबिक नहीं है। उसको वहां पढाई जा रही पुस्तकों में वह कुछ ऐसा नहीं पाता जो उसके मौजूदा जीवन में काम आए।
जब बच्चा चाहता है कि वह गाय को करीब से जा कर देखे, तब स्कूल में वह खिडकी बंद कर दी जाती है जिससे बाहर झांक कर वह गाय को साक्षात देखता है। उसे गाय काले बोर्ड पर सफेद लकीरों व षब्दों में पढ़ाई जाती है। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसी गाय ना तो दूध देती है और ना ही सींग हिला कर अपनी रक्षा करने का मंत्र सिखाती है। जो रामायण की कहानी बच्चे को कई साल में समझ नहीं आती, वह उसे एक रावण दहन के कार्यक्रम में षामिल होने या रामलीला देखने पर रट जाती है।  ठेठ गाव के बच्चों को पढाया जाता है कि ‘अ’ ‘अनार’ का, ना तो उनके इलाके में अनार होता है और ना ही उन्‍होंने उसे देखा होता है, और ना ही उनके परिवार की हैसियत अनार को खरीदने की होती है। सारा गांव जिसे गन्ना कहता है।, उसे ईख के तौर पर पढ़ाया जाता है। यह स्कूल में घुसते ही बच्चे को दिए जाने वाले अव्यावहारिक ज्ञान की बानगी है। असल में रंग-आकृति- अंक-षब्द की दुनिया में बच्चे का प्रवेश ही बेहद नीरस और अनमना सा होता है। और मन और सीखने के बीच की खाई साल दर साल बढती जाती हे। इस बीच उसे डाक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर, पायलट जैसी डिगरियां रटा दी जाती हैं और दिमाग में ठोक ठोक कर भर दिया जाता है कि यदि पढ़-लिख कर वह यह सब नहीं बना तो उसकी ढ़ाई बेकार है। विडंबना है कि यही मानसिकता, कस्बाई व षहरी बच्चों को घर से भागने, नषा, झूठ बोलने की ओर प्रेरित करती है, जबकि गांव के बच्चे स्कूल छोड़ कर कोई काम करना श्रेयस्कर समझते हैं। असल में पूरी स्कूली व्यवस्था ब्लेक बोर्ड व एक तरफ से सवाल और दूसरी तरफ से जवाब के बीच प्रश्‍न के तौर पर बच्चों को विचलित करती रहती है। स्कूल, शिक्षक व कक्षा उसके लिए यातना घर की तरह होते हैं। परिवार में भी उसे डराया जाता है कि बदमाशी मत करो, वरना स्कूल भेज देंगे। बात मान लो, वरना टीचर से कह देंगे।  कहीं भी बच्चे के मन में स्कूल जाने की उत्कंठा नहीं रह जाती है और वह षिक्षक को एक भयावह स्वप्न की तरह याद करता है।
बच्चे अपने परिवेश को नहीं पहचानते- अपने आसपास मिलने वाले पेड़, पौधे, पक्षी-जानवर, मिट्टी, कंकड़, सबकुछ से अनभिज्ञ यह बाल-वर्ग किस तरह देष-समाज को अपना समझ सकता है? समय आ गया है कि कक्षा व पाठ्यक्रम को पुस्तको व कमरों से बाहर निकाल कर प्रकृति व समाज की मदद से पढ़ा-समझा जाए। थामस अल्वा एडीसन या मेडम क्यूरी के साथ-साथ सफाई करने वाले, पंचर जोड़ने वाले, खेत में काम करने वाले को भी पाठ में षामिल किया जाए। जब स्‍कूल से भाग जाने को आतुर बच्चा यह देखेगा कि उसकी किताब में वह पाठ भी है जो उसके पिताजी करते हैं तो उसे यह सबकुछ अपना सा लगेगा। 
मध्यमवर्गीय परिवारों के प्री नर्सरी हो या गांव का सरकारी स्कूल,  पांच साल की आयु तक हर तरह की पुस्तक, होमवर्क, परीक्षा से मुक्त रखा जाए। कभी सोचा है कि तीन साल के बच्चे को जब बताया जाता है कि अमुक क्लास में अव्वल आया व अमुक फिसड्डी रहा तो उसके दिल व दिमाग में अजीब किस्म की डर, अहंकार या शिक्षा से पलायन की प्रवृति विकसित होती है जो ताजिंदगी उसके साथ-साथ चलती है। तभी शिक्षा व्यवस्था में सफल से ज्यादा असफल लोगों की संख्या बढती जा रही है। हालांकि परीक्षा में उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता ने भी षिक्षा के स्तर को लेकर सवाल खड़े कर दिए है। दिल्ली में ही कई सरकारी स्कूल के शिक्षक बच्चों की परीक्षा काॅपी में उलटे हाथ से खुद लिखते है। और सीधे हाथ से नंबर देते हैं। एक क्लास में 100 से ज्यादा बच्चे, बैठने-पानी-शौचालय की व्यवस्था ना होना और टीचर के पास पठन-पाठन के अलावा बहुत से काम होना, जैसे कई कारण हैं जिससे बच्चा स्कूल में कुछ अपना सा महसूस नहीं नहीं करता है, वह वहां उबासी लेता है और यही सोचता रहता है कि उसे यहां भेजा क्यों गया है?जैसे ही अवसर मिलता है वह बस्ता, किताब, कक्षा से दूर भाग जाता है। बच्चा कुछ करना चाहता है, ,खुद अपने परिवेश से रूबरू होना चाहता है लेकिन हम उसे पाठ्य पुस्तक, प्रवचन और भविश्य के सुनहरे सपनों में अटका देते हैं, यो उसका शरीर  कमरे में और मन कहीं बाहर उड़ता रहता है।

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

children needs scientific temper


विज्ञान से विमुख क्यों हो रहे हमारे बच्चे
                                                                                                                                                             पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ                                                                                                                                                                                                                         पत्रकार





HINDUSTAN 3-12-14
http://epaper.livehindustan.com/epaper/03-12-2014-1-edition-Delhi-Page-1.html
बाल मन और जिज्ञासा एक-दूसरे के पूरक शब्द हैं। उम्र बढ़ने के साथ अपने परिवेश की हर गुत्थी को सुलझाने की जुगत लगाना बाल्यावस्था की मूल-प्रवृत्ति है। लेकिन हमारे नीति-निर्धारक लगातार चेता रहे हैं कि बच्चे विज्ञान से विमुख हो रहे हैं। कंप्यूटर,  सूचना-तकनीक,  अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के विकसित देशों को टक्कर देने वाले भारत में ज्योतिषियों,  कॉरपोरेट बाबाओं और फकीरों के जलवे चरम पर हैं। जाहिर है,  यह एक अजीब विरोधाभास है और शायद चेतावनी का बिंदु भी। देश में छह से 17 वर्ष के स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या लगभग 16 करोड़ है। इनके अलावा अनगिनत ऐसी बच्चियां और लड़के भी हैं,  जो स्कूल नहीं जा पा रहे,  लेकिन वे भी सांस लेते हैं, भोजन-पानी उनकी भी आवश्यकता है,  फिर उन्हें विज्ञान के ज्ञान से वंचित कैसे रखा जा सकता है?  इतना बड़ा बाजार और पुस्तकें नहीं के बराबर। अनुमान है कि देश में सभी भाषाओं में मिलाकर पाठ्यक्रमों से इतर विज्ञान पुस्तकों का सालाना आंकड़ा बमुश्किल पांच सौ को पार कर पाता है। यह एक कटु सत्य है कि दिल्ली जैसे महानगर में एक फीसदी बच्चों के पास उनके पाठ्यक्रम के अलावा कोई विज्ञान-पुस्तक पहुंच ही नहीं पाती। उन बच्चों के लिए विज्ञान के मायने एक उबासी देने वाला,  कठिन परिभाषाओं वाला विषय मात्र है। लेकिन इन बच्चों को जब कुछ प्रयोग करने को कहा जाता है या फिर यूं ही अपनी प्रकृति में विचरण के लिए कहा जाता है,  तो वे उसमें डूब जाते हैं। पुस्तक मेलों में ही देख लें। जहां जादू,  मनोरंजक खेल,  कंप्यूटर पर नए प्रयोग सिखाने वाली सीडी बिक रही होती है,  वहां बच्चों की भीड़ होती है।
इन दिनों विज्ञान-गल्प के नाम पर विज्ञान के चमत्कारों पर ठीक उसी तरह की कहानियों का प्रचलन भी बढ़ा है, जिनमें अंधविश्वास या अविश्वसनीयता की हद तक के प्रयोग होते हैं। किसी अन्य ग्रह से आए अजीब जीव या एलियन या फिर रोबोट के नाम पर विज्ञान को हास्यास्पद बना दिया जाता है। समय से बहुत आगे या फिर बहुत पीछे जाकर कुछ कल्पनाएं की जाती हैं। यह विडंबना है कि आज बाजार पौराणिक,  लोक और परी कथाओं से पटा हुआ है। हमारे देश के लेखक ऐसा विज्ञान-गल्प तैयार करने में असफल रहे हैं, जिसके गर्भ में नव-सृजन के कुछ अंश हों। बच्चों के बीच विज्ञान की पुस्तकों को लोकप्रिय बनाने और उनके ज्ञान के माध्यम से समाज में जागरूकता लाने का यदि ईमानदार प्रयास करना है,  तो किताबें तैयार करते समय उनकी भाषा,  स्थानीय परिवेश के विज्ञान,  वे जो कुछ पढ़ रहे हैं,  उसका उनके जीवन में उपयोग कहां व कैसे होगा,  पुस्तकों के मुद्रण की गुणवत्ता और उनके वाजिब दाम आदि पर ध्यान देना होगा। हर बच्चा नैसर्गिक रूप से वैज्ञानिक नजरिये वाला होता है। जरूरत है बस उसे अच्छी किताबों व प्रयोगों के जरिये तार्किक बनाने की।

only bullet can not change the bastar

सिर्फ बदला लेने से नहीं बदलेगा बस्तर

पंकज चतुव्रेदी विश्लेषण
पिछले सालों में ठीक इसी तरह नक्सली छुप कर सुरक्षाबलों को फंसाते रहे हैं और उन पर हमला करते रहे हैं। हर बार पिछली घटनाओं से सबक लेने की बात होती है, लेकिन कुछ ही दिनों में सुरक्षाबल पुराने हमलों को भूल जाते हैं व फिर से नक्सलियों के फंदे में फंस जाते हैं जब कोई हमला होता है तो सशस्त्र बलों को जंगल में उतार दिया जाता है, लेकिन इस बात की जिम्मेदारी नहीं तय की जाती है कि तीन सौ नक्सली घंटों तक गोलियां चलाते हैं, सड़कों पर लैंडमाइंस लगाई जाती है, लेकिन इतनी बड़ी योजना की खबर किसी को क्यों नहीं लगती है

RASHTRIYA SAHARA 3-12-14

http://www.rashtriyasahara.com/epapermain.aspx?queryed=9

अड़तालीस घंटे से ज्यादा समय तक सुरक्षाबल छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के चिंतागुफा इलाके में एलमागुंडा और एरागोंडा के बीच फंसे रहे और सरकार राजधानियों में बैठ कर ललकारती रही। जंगल में बीते 16 नवम्बर से राज्य की स्पेशल कोबरा फोर्स, जिला बल और सीआरपीएफ के जवान गांव-गांव घूम रहे थे और तभी घात लगाए नक्सलियों ने उन पर हमला कर दिया। विडंबना यह है कि पिछले सात सालों में ठीक इसी तरह नक्सली छुप कर सुरक्षाबलों को फंसाते रहे हैं और ऊंचे स्थानों पर जगह बनाकर उन पर हमला करते रहे हैं। हर बार पिछली घटनाओं से सबक लेने की बात होती है, लेकिन कुछ ही दिनों में सुरक्षाबल पुराने हमलों को भूल जाते हैं और फिर से नक्सलियों के फंदे में फंस जाते हैं। बदले, प्रतिहिंसा और प्रतिशोध की भावना के चलते ही देश के एक तिहाई इलाके में ‘लाल सलाम’ की आम लोगों पर पकड़ सुरक्षाबलों से ज्यादा है। बदला लेने के लिए गठित सलवा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भी याद करें। बस्तर के जिस इलाके में सुरक्षाबलों का खून बहा है, वहां स्थानीय समाज दो पाटों के बीच पिस रहा है और उसके इस घुटनभरे पलायन की ही परिणति है कि वहां की कई लोक बोलियां लुप्त हो रही हैं। धुरबी बोलने वाले हल्बी वालों के इलाकों में बस गए हैं तो उनके संस्कार, लोक- रंग, बोली सब कुछ उनके अनुरूप हो रही है। इंसान की जिंदगी के साथ-साथ जो कुछ भी अकल्पनीय नुकसान हो रहे हैं, इसके लिए स्थानीय प्रशासन की कोताही ही जिम्मेदार है। नक्सलियों का अपना खुफिया तंत्र सटीक है, जबकि प्रशासन खबर पाकर भी कार्रवाई नहीं करता। खीजे-हताश सुरक्षाबल जो कार्रवाई करते हैं, उनमें कई बार स्थानीय निरीह आदिवासी शिकार बनते हैं और यही नक्सलियों के लिए मजबूती का आधार होता है। बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से सुकमा की ओर जाने वाले खूबसूरत रास्ते का विस्तार आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा तक है। इस पूरे रास्ते में बीच का कोई साठ किमी का रास्ता है ही नहीं और यहां चलने वाली बसें इस रास्ते को पार करने में कई घंटे ले लेती हैं। सड़क से सट कर ओडिशा का मलकानगिरी जिला पड़ता है जहां बेहद घने जंगल हैं। कांगेर घाटी और उससे आगे झीरम घाटी की सड़कों पर कई-कई सौ मीटर गहरी घाटियां हैं, जहां शीशम, साल के पेड़ों की घनी छाया है। अभी नवम्बर के तीसरे सप्ताह में कई स्थानीय अखबारों व समाचार चैनलों ने खबर दिखाई थी कि सुकमा में चिंतागुफा के बीच नक्सलियों की गतिविधियां दिख रही हैं। उधर राज्य की पुलिस पिछले कुछ महीनों से कथित आत्मसमर्पण करवा कर यह माहौल बनाने में लगी थी कि अब नक्सलियों की ताकत खत्म हो गई है। इसके बावजूद पुलिस का खुफिया तंत्र उनकी ठीक स्थिति जानने में असफल रहा। यही नहीं, केंद्रीय गृह विभाग ने भी चेतावनी भेजी थी कि नक्सली हिंसा कर सकते हैं। इसमें सुरक्षाबलों पर हमला, जेल पर हमला आदि की संभावना जताई गई थी। फिर भी चेतावनियों से बेपरवाह सुरक्षाबल जंगल में घुस तो गए, लेकिन वापस आते समय चक्रव्यूह में फंस गए। जिस तरह पहाड़ी पर नक्सलियों ने कब्जा किया था और नीचे स्थित पुलिया पर डायनामाइट लगाया था तथा पीछे आ रही पार्टी को भी रोक लिया था, उससे साफ है कि नक्सलियों को सीआरपीएफ की टुकड़ी के थाने से निकलने के पल-पल की खबर मिल रही थी।
RAJ EXPRESS BHOPAL 4-12-14 http://epaper.rajexpress.in/epapermain.aspx?edcode=19&eddate=12%2f4%2f2014  



वर्ष 2009 में राजनांदगांव के एसपी विनोद चौबे व उनकी टीम पर हुए हमले के बाद नक्सलियों का छत्तीसगढ़ में इस तरह का यह 14वां हमला है। वे छोटी टुकड़ी पर हमला करते हैं और जब बड़ी टुकड़ी बचाव या अपने शहीद साथियों के शव लेने आती है तो उस पर घात लगाकर चारों तरफ से हमला कर देते हैं। इस दौरान उनका मूल उद्देश्य हथियार लूटना होता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ। अब भारत सरकार के गृह मंत्रालय की सात साल पुरानी एक रपट की धूल झाड़ें तो पता चलेगा कि वर्ष 2006 की ‘आंतरिक सुरक्षा की स्थिति’ विषय पर रिपोर्ट में स्पष्ट बताया गया था कि देश का कोई भी हिस्सा नक्सल गतिविधियों से अछूता नहीं है। सरकार ने उस रिपोर्ट में स्वीकारा था कि देश के दो-तिहाई हिस्से पर नक्सलियों की पकड़ है। गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में भी कुछ गतिविधियां दिखाई दी हैं। दो प्रमुख औद्योगिक बेल्टों- ‘भिलाई-रांची, धनबाद-कोलकाता’ और ‘मुंबई-पुणो-सूरत-अहमदाबाद’ में इन दिनों नक्सली लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाए हुए हैं। इस रपट पर कार्यवाही, खुफिया सूचना, दूरगामी कार्ययोजना का कहीं अता-पता नहीं है। बस जब कोई हमला होता है तो सशस्त्र बलों को जंगल में उतार दिया जाता है, लेकिन इस बात की कोई जिम्मेदारी नहीं तय की जाती है कि तीन सौ नक्सली हथियार लेकर तीन घंटों तक गोलियां चलाते हैं, सड़कों पर लैंडमाइंस लगाई जाती है और मुख्य मार्ग पर इतनी बड़ी योजना की खबर किसी को क्यों नहीं लगती है। एक तरफ सरकारी लूट व जंगल में घुस कर उस पर कब्जा करने की बेताबी है, तो दूसरी ओर आदिवासी क्षेत्रों के संरक्षण का भ्रम पाले खून बहाने पर बेताब ‘दादा’ लोग। बीच में फंसी है सभ्यता, संस्कृति और लोकतंत्र की साख। बंदूकों को अपनों पर ही दाग कर खून तो बहाया जा सकता है, नफरत तो उगाई जा सकती है, लेकिन देश नहीं बनाया जा सकता। तनिक बंदूकों को नीचे करें, बातचीत के रास्ते निकालें, समस्या की जड़ में जाकर उसके निरापद हल की कोशिश करें; अन्यथा सुकमा की दरभा घाटी या बीजापुर के आर्सपेटा में खून के दरिया ऐसे ही बहते रहेंगे। लेकिन साथ ही उन खुफिया अफसरों, वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाए जिनकी लापरवाही के चलते 15 सुरक्षाकर्मी व एक ग्रामीण काल के गाल में बेवजह समा गए। यह हमला उन कारणों को आंकने का सही अवसर हो सकता है जिनके चलते आम लोगों का सरकार या पुलिस से ज्यादा नक्सलियों पर विास है। यह नरसंहार अपनी सुरक्षा व्यवस्था व लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आए झोल को ठीक करने की चेतावनी दे रहा है। दंडकारण्य में फैलती बारूद की गंध नीति-निर्धारकों के लिए विचारने का अवसर है कि नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ने के लिए बंदूक का जवाब बंदूक से देना ही एकमात्र विकल्प है या फिर संवाद का रास्ता खोजना होगा या फिर एक तरफ से बल प्रयोग व दूसरी तरफ से संवाद की संभावनाएं खोजना समय की मांग है। आदिवासी इलाकों की कई बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा पर अपना कब्जा जताने के लिए पूंजीवादी घरानों का समर्थन करने वाली सरकार वर्ष 1996 में संसद द्वारा पारित आदिवासी इलाकों के लिए विशेष पंचायत कानून (पेसा अधिनियम) लागू करना तो दूर, उसे भूल ही चुकी है। इसके तहत ग्राम पंचायत को अपने क्षेत्र की जमीन के प्रबंधन और रक्षा करने का पूरा अधिकार था। इसी तरह परंपरागत आदिवासी अधिनियम 2006 को संसद से तो पारित करवा दिया लेकिन उसका लाभ दंडकारण्य तक नहीं गया। कारण वह बड़े घरानों के हितों के विपरीत है। असल में यह समय है उन कानूनों- अधिनियमों के क्रियान्वयन पर विचार करने का, लेकिन हम बात कर रहे हैं कि जनजातीय इलाकों में सरकारी बजट कम किया जाए, क्योंकि उसका बड़ा हिस्सा नक्सली लेवी के रूप में वसूल रहे हैं।

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...