My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शनिवार, 21 मई 2016

Conservation of traditional water resources are only solution to water equation

जल संकट से मुक्ति का यज्ञ

परंपरागत जल स्रोतों को सहेजने-संवारने को अनिवार्य आवश्यकता बता रहे हैं 

पंकज चतुर्वेदी

बढती आबादी, जल की जरुरत में इजाफा और जलवायु परिवर्तन के अबूझ खेल के सामने लोक विज्ञान की जल संरक्षण नीतियों की शरण में जाना ही एकमात्र निदान है 13


देश में इस समय गरमी तो चरम पर है ही, सूखे की त्रसदी भी विकट रूप से सामने आ रही है। ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी कुछ गांव-मजरे ऐसे भी हैं जो रेगिस्तान में ‘नखलिस्तान’ की तरह जल संकट से निरापद हैं। असल में यहां के लोग पानी जैसी बुनियादी जरुरत के लिए सरकार पर निर्भरता और प्रकृति को कोसने की आदत से मुक्त हैं। इन लोगों ने आज की इंजीनियरिंग और डिग्रीधारी ज्ञान के बजाय पूर्वजों के देशज ज्ञान पर ज्यादा भरोसा किया। हमें यह जानना चाहिए कि वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक विभिन्न कालखंडों में समाज के द्वारा अपनी जरूरत के मुताबिक बनाई गई जल संरचनाओं और जल प्रणालियों के अस्तित्व के अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनमें तालाब सभी जगह मौजूद रहे हैं। रेगिस्तान में तो तालाबों को सागर की उपमा दे दी गई। ऋग्वेद में सिंचित खेती, कुओं और गहराई से पानी खींचने वाली प्रणालियों का उल्लेख मिलता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी जल संरचनाओं के बारे में अनेक विवरण उपलब्ध हैं। इन विवरणों से पता चलता है कि तालाबों का निर्माण राज्य की जमीन पर होता था। स्थानीय लोग तालाब निर्माण की सामग्री जुटाते थे। असहयोग और तालाब को नुकसान पहुंचाने वालों पर राजा द्वारा जुर्माना लगाया जाता था। 1जो लेाग इस समय ताल-तलैयों, नदी-नालों को संवारने में लग गए हैं वे पानी की कमी से उत्पन्न होने वाली समस्याओं से मुक्ति का यज्ञ कर रहे हैं। आमतौर पर हमारी सरकारें बजट का रोना रोती हैं कि पारंपरिक जल संसाधनों की सफाई के लिए बजट का टोटा है। हकीकत में तालाबों की सफाई और गहरीकरण अधिक खर्चीला काम नही है। इसके लिए भारी-भरकम मशीनों की जरुरत भी नहीं होती। तालाबों की गादे सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ट पदार्थो की देन होती है। यह उम्दा दर्जे की खाद है। रासायनिक खादों ने किस कदर जमीन को चौपट किया है, यह किसान जान चुके हैं और अब उनका रुख कंपोस्ट एवं अन्य देशी खादों की ओर है। किसानों को यदि इस खादरूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपा जाए तो वे सहर्ष राजी हो जाते हैं। राजस्थान के झालावाड़ जिले में ‘खेतों मे पालिश करने’ के नाम से यह प्रयोग अत्यधिक सफल और लोकप्रिय है। कर्नाटक में समाज के सहयोग से करीब 50 तालाबों का कायाकल्प हुआ है, जिसमें गाद की ढुलाई मुफ्त हुई यानी ढुलाई करने वाले ने इस कीमती खाद को बेचकर पैसा कमाया। सिर्फ आपसी तालमेल, समझदारी और तालाबों के संरक्षण की दिली भावना हो तो न तो तालाबों में गाद बचेगी और न ही सरकारी अमलों में घूसखोरी की कीच होगी। जल संकट से जूझ रहे समाज ने नदी को तालाब से जोड़ने, गहरे कुओं से तालाब भरने, पहाड़ पर नालियां बना कर उसका पानी तालाब में जुटाने जैसे अनगिनत प्रयाग किए हैं और प्रकृति के कोप पर विजय पाई है। यह जरूरी है कि लोग पारंपरिक जल संसाधनों-तालाब, बावड़ी, कुओं की सुधि लें। उनकी सफाई, मरम्मत का काम करें। ऐसा करते समय बस एक बात ख्याल करना होगा कि पारंपरिक जलस्रोतों को गहरा करने में भारी मशीनों के इस्तेमाल से परहेज ही करें। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के अंधियारा तालाब की कहानी गौर करें। एक अर्सा पहले यहां सूखा राहत के तहत तालाब गहराई का काम हुआ। इंजीनियर साहब ने तालाब के बीचों-बीच खूब गहरी खुदाई करवा दी। जब पानी बरसा तो तालाब एक रात में ही लबालब हो गया, लेकिन अगली सुबह ही उसकी तली दिखने लगी। असल में बगैर सोचे-समङो की गई खुदाई में तालाब की वह ङिार टूट गई, जिसका संबंध सीधे इलाके की ग्रेनाईट भू संरचना से था। पानी आया और ङिार से बह गया। 1तालाब महज एक गड्ढा नहीं है, जिसमें बारिश का पानी जमा हो जाए और लोग इस्तेमाल करने लगें। तालाब कहां खुदेगा, इसको परखने के लिए वहां की मिट्टी, जमीन पर जल आगमन एवं निगमन की व्यवस्था, स्थानीय पर्यावरण का खयाल रखना भी जरूरी होता है। वरना यह भी देखा गया है ग्रेनाईट संरचना वाले इलाकों में कुएं या तालाब खुदे, रात में पानी भी आया और कुछ ही घंटों में कहीं बह गया। इसी तरह यदि बगैर सोचे-समङो पीली या दुरमट मिट्टी में तालाब खोदा तो धीरे-धीरे पानी जमीन में बैठेगा, फिर दल-दल बनाएगा। क्या हम जानते हैं कि बुंदेलखंड में तालाबों की देखभाल का काम पारंपरिक रूप से ढीमर समाज के लोग करते थे। बदले में तालाब की मछली, सिंघाड़े आदि पर उनका हक होता। इसी तरह प्रत्येक इलाके में तालाबों को सहेज ने का जिम्मा समाज के एक वर्ग ने उठा रखा था। उसकी रोजी-रोटी की व्यवस्था वही करते थे जो तालाब के जल का इस्तेमाल करते थे। तालाब लोक की संस्कृति-सभ्यता का अभिन्न अंग हैं। इन्हें सरकारी बाबुओं पर नहीं छोड़ा जा सकता।1यह जान लें कि रेल से पानी पहुंचाने जैसे प्रयोग तात्कालिक उपाय भर हैं। बढती आबादी, जल की जरुरत में इजाफा और जलवायु परिवर्तन के अबूझ खेल के सामने लोक विज्ञान की जल संरक्षण नीतियों की शरण में जाना ही एकमात्र निदान है। अगर किसी बड़े बांध पर हो रहे समूचे व्यय के बराबर राशि एक बार एक साल विशेष अभियान चला कर पूरे देश के तालाबों की संवारने, उन्हें अतिक्रमण से मुक्त करने, उनकी गाद हटाने, पानी की आवक-जावक के रास्ते को निरापद बनाने में खर्च कर दिया जाए तो भले ही कितनी भी कम बारिश हो, न तो देश का कोई कंठ सूखा रहेगा और न ही जमीन की नमी खत्म होगी।1(पर्यावरण मामलों के जानकार लेखक ने बुंदेलखंड के तालाबों पर गहन शोध किया है)

शुक्रवार, 20 मई 2016

Useless school education which do not prepare students mentally strong

विषम हालात में सामना करने काबिल नहीं है यह पढाई  

                                                                                                                               
पंकज चतुर्वेदी

मध्यप्रदेश में कक्षा दस के बोर्ड के इम्तेहान के नतीजे आ गए हैं। इसके बाद के 12 घंटों में आठ बच्चों ने आत्महत्या कर ली और उनमें से भी आधी बच्चियां थीं। जरा गौर करं कक्षा 10 की बच्च्ी यानि बामुष्किल 15 या सोलह साल की। बीते दस सल से स्कूल ेमं जा रही थी, लेकिन वहां बिताया समय और बांची गई पुस्तकें उसकों इतनी सी असफलता को स्वीकार करने और उसका सामना करने का साहस नहीं सिखा पाईं। उसमें अपने परिवार , षिक्षक व समाज के प्रति भरोसा नहीं पैदा कर पाइंर् कि महज एक इम्तेहान के नतीजे के अच्छे नहीं होने से वे लेग उसे स्वीकार करेंगे, अपनों की तरह। उसे ढांढस बंधाएंगे व आगे की तैयारी के लिए साथ देंगे। साफ जाहिर है कि बच्चे ना तो कुछ सीख रहे हैं और ना ही जो पढ रहे हैं उसका आनंद ले पा रहे हैं, बस एक ही धुन है या दवाब है कि परीक्षा में जैसे-तैसे अव्वल या बढ़िया नंबर आ जाएं।
यह विचारणीय है कि जो षिक्षा बारह साल में बच्चों को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना ना सिखा सके, जो विशम परिस्थिति में अपना संतुलन बनाना ना सिखा सके, वह कितनी प्रासंगिक व व्यावहारिक है ? कक्षा दस के बच्चें का अव्वल आना इस लिए जरूरी है कि वह अपने मां-बाप की पसंद के विशय से अगली कक्षा में दाखिला ले पाए। ज्यादा नंबर तो साईंस , उससे कम तो कामर्स और सबसे कम तो आर्टस या ह्यूमेनेटेरियन। बचपन, षिक्षा, सीखना सब कुछ इम्तेहान के सामने कहीं गौण हो गया है । रह गई हैं तो केवल नंबरों की दौड़, जिसमें धन, धर्म , षरीर, समाज सब कुछ दांव पर लग गया है । बारहवी के बच्चे कालेज में प्रवेष के लिए आयोजित हुई अनगिनत इम्तेहानों के लिए भी चिंतित रहत हैं। एक तरफ बोर्ड का दवाब तो दूसरे तरफ दीगर प्रवेष परीक्षाओं का ।
क्या किसी बच्चे की योग्यता, क्षमता और बुद्धिमता का तकाजा महज अंकों का प्रतिषत ही है ? वह भी उस परीक्षा प्रणाली में , जिसकी स्वयं की योग्यता संदेहों से घिरी हुई है । सीबीएसई की कक्षा 10 में पिछले साल दिल्ली में हिंदी में बहुत से बच्चों के कम अंक रहे । जबकि हिंदी के मूल्यांकन की प्रणाली को गंभीरता से देखें तो वह बच्चों के साथ अन्याय ही है । कोई बच्चा ‘‘हैं’’ जैसे षब्दो ंमें बिंदी लगाने की गलती करता है, किसी के छोटी व बड़ी मात्रा की दिक्कत है । कोई बच्चा ‘स’ , ‘ष’ और ‘श’ में भेद नहीं कर पाता है । स्पश्ट है कि यह बच्चे की महज एक गलती है, लेकिन मूल्यांकन के समय बच्चे ने जितनी बार एक ही गलती को किया है, उतनी ही बार उसके नंबर काट लिए गए । यानी मूल्यांकन का आधार बच्चों की योग्यता ना हो कर उसकी कमजोरी है । यह सरासर नकारात्मक सोच है, जिसके चलते बच्चों में आत्महत्या, पर्चे बेचने-खरीदने की प्रवृति, नकल व झूठ का सहारा लेना जैसी बुरी आदतें विकसित हो रही हैं । षिक्षा का मुख्य उद्देष्य इस नंबर- दौड़ में गुम हो कर रह गया है ।
वास्तव में परीक्षाओं का मौजूदा स्वरूप आनंददायक षिक्षा के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है । इसके स्थान पर सामूहिक गतिविधियों को प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाना चाहिए । ण्मण् पास बच्चे जब बैक में पैसा जमा करने की स्लीप नहीं भर पाते या बारहवीं पास बच्च होल्डर में बल्ब लगानाया साईकिल की चैन चढ़ाने में असमर्थ रहतास है तो पता चलता है कि हम जो कुछ पढ़ा रहे हैं वह कितना चलताउ है। यह बात सभी षिक्षाषास्त्री स्वीकारते हैं ,इसके बावजूद बीते एक दषक में कक्षा में अव्वल आने की गला काट में ना जाने कितने बच्चे कुंठा का षिकार हो मौत को गले लगा चुके हैं । हायर सैकेंडरी के रिजल्ट के बाद ऐसे हादसे सारे देष में होते रहते हैं । अपने बच्चे को पहले नंबर पर लाने के लिए कक्षा एक-दो में ही पालक युद्ध सा लड़ने लगते हैं ।
कुल मिला कर परीक्षा व उसके परिणामों ने एक भयावह सपने, अनिष्चितता की जननी व बच्चों के नैसर्गिक विकास में बाधा का रूप  ले लिया है । कहने को तो अंक सूची पर प्रथम श्रेणी दर्ज है, लेकिन उनकी आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों ने भी दरवाजों पर षर्तों की बाधाएं खड़ी कर दी हैं । सवाल यह है कि षिक्षा का उद्देष्य क्या है - परीक्षा में स्वयं को श्रेश्ठ सिद्ध करना, विशयों की व्यावहारिक जानकारी देना या फिर एक अदद नौकरी पाने की कवायाद ? निचली कक्षाओं में नामांकन बढ़ाने के लिए सर्व षिक्षा अभियान और ऐसी ही कई योजनाएं संचालित हैं । सरकार हर साल अपनी रिपोर्ट में ‘‘ड्राप आउट’’ की बढ़ती संख्या पर चिंता जताती है । लेकिन कभी किसी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि अपने पसंद के विशय या संस्था में प्रवेष ना मिलने से कितनी प्रतिभाएं कुचल दी गई हैं । एम.ए और बीए की डिगरी पाने वालों में कितने ऐसे छात्र हैं जिन्होंने अपनी पसंद के विशय पढ़े हैं । विशय चुनने का हक बच्चों को नहीं बल्कि उस परीक्षक को है जो कि बच्चों की प्रतिभा का मूल्यांकन उनकी गलतियों की गणना के अनुसार कर रहा है ।
आजादी के बाद हमारी सरकार ने शिक्षा विभाग को कभी गंभीरता से नहीं लिया । इसमें इतने प्रयोग हुए कि आम आदमी लगातार कुंद दिमाग होता गया । हम गुणात्मक दृष्टि से पीछे जाते गए, मात्रात्मक वृद्वि भी नहीं हुई । कुल मिला कर देखें तो षिक्षा प्रणाली का उद्देष्य और पाठ्यक्रम के लक्ष्य एक दूसरे में उलझ गए व एक गफलत की स्थिति बन गई । क्या कोई अपने पुराने अनुभवों से कुछ सीखते हुए बच्चों की बौद्धिक समृद्धता व अपने प्रौढ़ जीवन की चुनौतियों से निबटने की क्षमता के विकास के लिए कारगर कदम उठाते हुए नंबरों की अंधी दौड़ पर विराम लगाने की सुध लेंगे ?

पंकज चतुर्वेदी
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गुरुवार, 19 मई 2016

keep away drinking water from trade

पाबन्दी जरूरी है प्लास्टिक बोतलों पर

पंकज चतुर्वेदी हाल ही में केन्द्र सरकार ने आदेश दिया है कि अब सरकारी आयोजनों में टेबल पर बोतलबन्द पानी की बोतलें नहीं सजाई जाएँगी, इसके स्थान पर साफ पानी को पारम्परिक तरीके से गिलास में परोसा जाएगा। सरकार का यह शानदार कदम असल में केवल प्लास्टिक बोतलों के बढ़ते कचरे पर नियंत्रण मात्र नहीं है, बल्कि साफ पीने का पानी को आम लोगों तक पहुँचाने की एक पहल भी है।

सनद रहे पिछले साल अमेरिका के सेनफ्रांसिस्को नगर में सरकार व नागरिकों ने मिलकर तय किया कि अब उनके यहाँ किसी भी किस्म का बोतलबन्द पानी नहीं बिकेगा। एक तो जो पानी बाजार में बिक रहा था उसकी शुद्धता संदिग्ध थी, फिर बोतलबन्द पानी के चलते खाली बोतलों का अम्बार व कचरा आफत बनता जा रहा था।

यह सर्वविविदत है कि प्लास्टिक नष्ट नहीं होती है व उससे जमीन, पानी, हवा सब कुछ बुरी तरह प्रभावित होते हैं। ऐसे ही संकट को सेनफ्रांसिस्को शहर ने समझा। वहाँ कई महीनों सार्वजनिक बहस चलीं। इसके बाद निर्णय लिया गया कि शहर में कोई भी बोतलबन्द पानी नहीं बिकेगा।

प्रशासन ही थोड़ी-थोड़ी दूरी पर स्वच्छ परिशोधित पानी के नलके लगवाएगा तथा हर जरूरतमन्द वहाँ से पानी भर सकता है। लोगों का विचार था कि जो जल प्रकृति ने उन्हें दिया है उस पर मुनाफाखोरी नहीं होना चाहिए। भारत की परम्परा तो प्याऊ, कुएँ, बावड़ी और तालाब खुदवाने की रही है। हम पानी को स्रोत से शुद्ध करने के उपाय करने की जगह उससे कई लाख गुणा महंगा बोतलबन्द पानी को बढ़ावा दे रहे है।

पानी की तिजारत करने वालों की आँख का पानी मर गया है तो प्यासे लोगों से पानी की दूरी बढ़ती जा रही है। पानी के व्यापार को एक सामाजिक समस्या और अधार्मिक कृत्य के तौर पर उठाना जरूरी है वरना हालात हमारे संविधान में निहित मूल भावना के विपरीत बनते जा रहे हैं जिसमें प्रत्येक को स्वस्थ्य तरीके से रहने का अधिकार है व पानी के बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।

दिल्ली में घर पर नलों से आने वाले एक हजार लीटर पानी के दाम बमुश्किल चार रुपए होता है। जो पानी बोतल में पैककर बेचा जाता है वह कम-से-कम पन्द्रह रुपए लीटर होता है यानि सरकारी सप्लाई के पानी से शायद चार हजार गुणा ज्यादा। इसके बावजूद स्वच्छ, नियमित पानी की माँग करने के बनिस्पत दाम कम या मुफ्त करने के लिये हल्ला-गुल्ला करने वाले असल में बोतलबन्द पानी की उस विपणन व्यवस्था के सहयात्री हैं जो जल जैसे प्राकृतिक संसाधन की बर्बादी, परिवेश में प्लास्टिक घोलने जैसे अपराध और जल के नाम पर जहर बाँटने का काम धड़ल्ले से वैध तरीके से कर रहे हैं।

क्या कभी सोचा है कि जिस बोतलबन्द पानी का हम इस्तेमाल कर रहे हैं उसका एक लीटर तैयार करने के लिये कम-से-कम चार लीटर पानी बर्बाद किया जाता है। आरओ से निकले बेकार पानी का इस्तेमाल कई अन्य काम में हो सकता है लेकिन जमीन की छाती छेद कर उलीचे गए पानी से पेयजल बनाकर बाकी हजारों हजार लीटर पानी नाली में बहा दिया जाता है।

प्लास्टिक बोतलों का जो अम्बार जमा हो रहा है उसका महज बीस फीसदी ही पुनर्चक्रित होता है, कीमतें तो ज्यादा हैं ही; इसके बावजूद जो जल परोसा जा रहा है, वह उतना सुरक्षित नहीं है, जिसकी अपेक्षा उपभोक्ता करता है। कहने को पानी कायनात की सबसे निर्मल देन है और इसके सम्पर्क में आकर सब कुछ पवित्र हो जाता है।

विडम्बना है कि आधुनिक विकास की कीमत चुका रहे नैसर्गिक परिवेश में पानी पर सबसे ज्यादा विपरीत असर पड़ा है। जलजनित बीमारियों से भयभीत समाज पानी को निर्मल रखने के प्रयासों की जगह बाजार के फेर में फँसकर खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है।

चीन की राजधानी पेईचिंग भी एक बानगी है हमारे लिये, उसकी आबादी दिल्ली से डेढ़ गुणा है। वहाँ हर घर में तीन तरह का पानी आता है व सभी के दाम अलग-अलग हैं। पीने का पानी सबसे महंगा, फिर रसोई के काम का पानी उससे कुछ कम महंगा और फिर टॉयलेट व अन्य निस्तार का पानी सबसे कम दाम का।

सस्ता पानी असल में स्थानीय स्तर पर फ्लश व सीवर के पानी का शोधन कर सप्लाई होता है। जबकि पीने का पानी बोतलबन्द पानी से बेहतरीन क्वालिटी का होता है। बीच का पानी आरओ से निकलने वाले पानी का शोधित रूप होता है। यह बात दीगर है कि वहाँ मीटरों में ‘जुगाड़’ या वर्ग विशेष के लिये सब्सिडी जैसी कोई गुंजाईश होती नहीं है। अनधिकृत आवासीय बस्तियाँ हैं ही नहीं। प्रत्येक आवासीय इलाके में पानी, सफाई पूरी तरह स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है।

देश की राजधानी दिल्ली से बिल्कुल सटा हुआ इलाका है शालीमार गार्डन, यह गाजियाबाद जिले में आता है, बीते एक दशक के दौरान यहाँ जम कर बहुमंजिला मकान बने, देखते-ही-देखते आबादी दो लाख के करीब पहुँच गई। यहाँ नगर निगम के पानी की सप्लाई लगभग ना के बराबर है। हर अपार्टमेंट के अपने नलकूप हैं और पूरे इलाके का पानी बेहद खारा है।

यदि पानी को कुछ घंटे बाल्टी में छोड़ दें तो उसके ऊपर सफेद परत और तली पर काला-लाल पदार्थ जम जाएगा। यह पूरी आबादी पीने के पानी के लिये या तो अपने घरों में आरओ का इस्तेमाल करती है या फिर बीस लीटर की केन की सप्लाई लेती है। यह हाल महज शालीमार गार्डन का ही नहीं हैं, वसुन्धरा, वैशाली, इन्दिरापुरम, राजेन्द्र नगर तक की दस लाख से अधिक आबादी के यही हाल है।। फिर नोएडा, गुड़गाँव व अन्य एनसीआर के शहरों की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। यह भी ना भूलें कि दिल्ली की एक चौथाई आबादी पीने के पानी के लिये पूरी तरह बोतलबन्द कैन पर निर्भर है।

यह बात सरकारी रिकार्ड का हिस्सा है कि राष्ट्रीय राजधानी और उससे सटे शहरों में 10 हजार से अधिक बोतलबन्द पानी की इकाईयाँ सक्रिय हैं और इनमें से अधिकांश 64 लाइसेंसयुक्त निर्माताओं के नाम का अवैध उपयोग कर रही हैं। यह चिन्ता की बात है कि सक्रिय इकाईयाँ ब्यूरो ऑफ इण्डियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) की अनुमति के बगैर यह काम कर रही हैं।

प्लास्टिक बोतलों का जो अम्बार जमा हो रहा है उसका महज बीस फीसदी ही पुनर्चक्रित होता है, कीमतें तो ज्यादा हैं ही; इसके बावजूद जो जल परोसा जा रहा है, वह उतना सुरक्षित नहीं है, जिसकी अपेक्षा उपभोक्ता करता है। कहने को पानी कायनात की सबसे निर्मल देन है और इसके सम्पर्क में आकर सब कुछ पवित्र हो जाता है। विडम्बना है कि आधुनिक विकास की कीमत चुका रहे नैसर्गिक परिवेश में पानी पर सबसे ज्यादा विपरीत असर पड़ा है। जलजनित बीमारियों से भयभीत समाज पानी को निर्मल रखने के प्रयासों की जगह बाजार के फेर में फँसकर खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। इस तरह की अवैध इकाईयाँ झुग्गियों और दिल्ली, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के शहरों की तंग गलियों से चलाई जा रही हैं। वहाँ पानी की गुणवत्ता के मानकों का पालन शायद ही होता है। यही नहीं पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करने वाले सरकारी अधिकारी भी वहाँ तक नहीं पहुँच पाते हैं।

कुछ दिनों पहले ईस्ट दिल्ली म्यूनिसिपल कारपोरेशन के दफ्तर में जो बोतलबन्द पानी सप्लाई किया जाता है, उसमें से एक बोतल में काक्रोच मिले थे। जाँच के बाद पता चला कि पानी की सप्लाई करने वाला अवैध धन्धा कर रहा हैै। उस इकाई का तो पता भी नहीं चल सका क्योंकि किसी के पास उसका कोई रिकॉर्ड ही नहीं है।

इस समय देश में बोतलबन्द पानी का व्यापार करने वाली करीब 200 कम्पनियाँ और 1200 बॉटलिंग प्लांट वैध हैं । इस आँकड़े में पानी का पाउच बेचने वाली और दूसरी छोटी कम्पनियाँ शामिल नहीं है। इस समय भारत में बोतलबन्द पानी का कुल व्यापार 14 अरब 85 करोड़ रुपए का है। यह देश में बिकने वाले कुल बोतलबन्द पेय का 15 प्रतिशत है। बोतलबन्द पानी का इस्तेमाल करने वाले देशों की सूची में भारत 10वें स्थान पर है। भारत में 1999 में बोतलबन्द पानी की खपत एक अरब 50 करोड़ लीटर थी, 2004 में यह आँकड़ा 500 करोड़ लीटर का पहुँच गया। आज यह दो अरब लीटर के पार है।

पर्यावरण को नुकसान कर, अपनी जेब में बड़ा सा छेदकर हम जो पानी खरीद कर पीते हैं, यदि उसे पूरी तरह निरापद माना जाये तो यह गलतफहमी होगी। कुछ महीनों पहले भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर के एनवायर्नमेंटल मानिटरिंग एंड एसेसमेंट अनुभाग की ओर से किये गए शोध में बोतलबन्द पानी में नुकसानदेह मिले थे। हैरानी की बात यह है कि यह केमिकल्स कम्पनियों के लीनिंग प्रोसेस के दौरान पानी में पहुँचे हैं।

यह बात सही है कि बोतलबन्द पानी में बीमारियाँ फैलाने वाला पैथोजेनस नामक बैक्टीरिया नहीं होता है, लेकिन पानी से अशुद्धियाँ निकालने की प्रक्रिया के दौरान पानी में ब्रोमेट क्लोराइट और क्लोरेट नामक रसायन खुद-ब-खुद मिल जाते हैं। ये रसायन प्राकृतिक पानी में होते ही नहीं हैं। भारत में ऐसा कोई नियामक नहीं है जो बोतलबन्द पानी में ऐसे केमिकल्स की अधिकतम सीमा को तय करे।

उल्लेखनीय है कि वैज्ञानिकों ने 18 अलग-अलग ब्रांड के बोतलबन्द पानी की जाँच की थी। एक नए अध्ययन में कहा गया कि पानी भले ही बहुत ही स्वच्छ हो लेकिन उसकी बोतल के प्रदूषित होने की सम्भावनाएँ बहुत ज्यादा होती है और इस कारण उसमें रखा पानी भी प्रदूषित हो सकता है। बोतलबन्द पानी की कीमत भी सादे पानी की तुलना में अधिक होती है, इसके बावजूद इसके संक्रमण का एक स्रोत बनने का खतरा बरकरार रहता है। बोतलबन्द पानी की जाँच बहुत चलताऊ तरीके से होती है।

महीने में महज एक बार इसके स्रोत का निरीक्षण किया जाता है, रोज नहीं होता है। एक बार पानी बोतल में जाने और सील होने के बाद यह बिकने से पहले महीनों स्टोर रूम में पड़ा रह सकता है। फिर जिस प्लास्टिक की बोतल में पानी है, वह धूप व गर्मी के दौरान कई जहरीले पदार्थ उगलती है और जाहिर है कि उसका असर पानी पर ही होता है।

घर में बोतलबन्द पानी पीने वाले एक चौथाई मानते हैं कि वे बोतलबन्द पानी इसलिये पीते हैं क्योंकि यह सादे पानी से ज्यादा अच्छा होता है लेकिन वे इस बात को स्वीकार नहीं कर पाते हैं कि नगर निगम द्वारा सप्लाई पानी को भी कठोर निरीक्षण प्रणाली के तहत रोज ही चेक किया जाता है। सादे पानी में क्लोरीन की मात्रा भी होती है जो बैक्टीरिया के खतरे से बचाव में कारगर है। जबकि बोतल में क्लोरीन की तरह कोई पदार्थ होता नहीं है। उल्टे रिवर ऑस्मोसिस के दौरान प्राकृतिक जल के कई महत्त्वपूर्ण लवण व तत्व नष्ट हो जाते हैं।

अब पानी की छोटी बोतलों पर सरकारी पाबन्दी तो कल्याणकारी है ही साथ ही प्लास्टिक के डिस्पोजेबल गिलास व प्लेट्स के इस्तेमाल पर पाबन्दी की भी पहल जरूरी है क्योंकि काँच के गिलास टूटें ना या फिर उन्हें कौन साफ करेगा, इन कारणों से बोतल की जगह कहीं प्लास्टिक के गिलास ना ले लें।

शुक्रवार, 13 मई 2016

Death due to hunger in bundelkhand is national shame

कमी भोजन की नहीं प्रबन्धन की है 


.सूखे और पानी से त्रस्त बुन्देलखण्ड में जहाँ भूख से मौतें हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर केन्द्र और राज्य सरकार के बीच पानी एक्सप्रेस को लेकर विवाद में मशगूल हैं।

जिस समय देश विकासोन्मुखी व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उभर कर आये नए भारत की वर्षगाँठ की बधाईयाँ लेने व देने में मशगूल था, ठीक उसी समय एक ऐसी भी खबर आई जो राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों से वंचित रह गई। वह खबर एक ऐसे राज्य से आई जहाँ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली व खाद्य सुरक्षा योजनाओं की बानगी देश-दुनिया में दी जाती रही है।

ललितपुर जिले के गुगुरवारा गाँव के एक 45 साल केे शख्स की भूख से मौत अभी छह मई को हो गई। उसकी लाश ललितपुर में लावारिस मिली थी। सुखलाल की पत्नी तेजा के मुताबिक घर में चार दिन से चूल्हा नहीं जला था। इससे कुछ दिन पहले ही बांदा जिले में नत्थू नाम के शख्स की भूख से मौत हो चुकी थी।

सुखलाल की जेब से सूखी रोटी के टुकड़े मिले थे और प्रशासन भूख से मौत, समय पर राहत पहुँचाने जैसे कागजी घोड़े दौड़ाने लगा था। चार एकड़ खेत का मालिक तीन साल से लगातार सूखे के कारण कर्ज में दब गया था। उसके खेत का मोटर पम्प भी साहूकार उठाकर ले गए थे। वह काम की तलाश में भटक रहा था, लेकिन काम नहीं था, उसका अन्तोदय कार्ड भी कुछ महीनों पहले सरकारी लालफीताशाही में उलझ कर निरस्त हो गया था।

कुछ लोग कह रहे थे कि वह कर्ज और भूख के चलते मानसिक विक्षिप्त हो गया था। जिस देश में नए खरीदे गए अनाज को रखने के लिये गोदामों में जगह नहीं है, जहाँ सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ा-घर का पेट भरता है, वहाँ ऐसे भी लोग हैं जो अन्न के एक दाने के अभाव में दम तोड़ देते हैं।

बंगाल के बन्द हो गए चाय बागानों में आये रोज मजूदरों के भूख के कारण दम तोड़ने की बात हो या फिर महाराष्ट्र में अरबपति शिरडी मन्दिर के पास ही मेलघाट में हर साल हजारों बच्चों की कुपोषण से मौत की खबर या फिर राजस्थान के बारां जिले में सहरिया आदिवासियों की बस्ती में पैदा होने वाले कुल बच्चें के अस्सी फीसदी के उचित खुराक ना मिल पाने के कारण छोटे में ही मर जाने के वाकिए.... यह इस देश में हर रोज हो रहा है, लेकिन विज्ञापन में मुस्कुराते चेहरों, दमकती सुविधाओं के फेर में वास्तविकता से परे उन्मादित भारतवासी तक ऐसी खबरें या तो पहुँच नहीं रही हैं या उनकी संवेदनाओं को झकझोर नहीं रही हैं।

हाल की ही रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना बुन्देलखण्ड के ललितपुर जिले की है। मृतक ने अपनी डायरी में लिखा था -

‘मरो-मरो सब कोई कहे, पर मरना न जाने कोई,
एक बार ऐसा मरो कि फिर न मरना होए’।


उसके तीन बच्चे स्कूल में मिलने वाले मिड डे मील के बदौलत जिन्दगी चला रहे थे, रविवार या शाला अवकाश के दिन बच्चे भी फांका करते थे। गाँव के प्रधान कनई रजक का कहना कि गाँव के ज्यादातर घरों में अनाज की कमी है। हालांकि अब प्रशासन सुखलाल को पागल करार देकर भूख से मौत का कलंक मिटाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन मृतक के मानसिक अस्थिर होने, उसके पास काम ना होने से हम इस राष्ट्रीय शर्म से खुद को परे नहीं कर सकते हैं। फिर उसकी डायरी का हर पन्ना उसकी बेबसी, भूख और अन्धकारमय भविष्य की दर्दनाक कथा कह रहा है और इस मार्मिक अभिव्यक्ति को एक पागल-कृत्य कहकर नकारना अपने आप में मार्मिक व गैरसंवेदनशील है।

भूख से मौत वह भी उस देश में जहाँ खाद्य और पोषण सुरक्षा की कई योजनाएँ अरबों रुपए की सब्सिडी पर चल रही हैं, जहाँ मध्यान्ह भोजन योजना के तहत हर दिन 12 करोड़ बच्चे को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा हो, जहाँ हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन करोड़ों का सरकारी फंड खर्च होता हो; दर्शाता है कि योजनाओं व हितग्राहियों के बीच अभी भी पर्याप्त दूरी है।

वैसे भारत में हर साल पाँच साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आँकड़े संयुक्त राष्ट्र संगठन ने जारी किये हैं। ऐसे में पिछले नवरात्रि पर गुजरात के गाँधीनगर जिले के एक गाँव में माता की पूजा के नाम पर 16 करोड़ रुपए दाम के साढ़े पाँच लाख किलो शुद्ध घी को सड़क पर बहाने, मध्य प्रदेश में एक राजनीतिक दल के महासम्मेलन के बाद नगर निगम के सात ट्रकों में भर कर पूड़ी व सब्जी कूड़ेदान में फेंकने की घटनाएँ बेहद दुभाग्यपूर्ण व शर्मनाक प्रतीत होती हैं।

हर दिन कई लाख लोगों के भूखे पेट सोने के गैर सरकारी आँकड़ों वाले भारत देश के ये आँकड़े भी विचारणीय हैं। देश में हर साल उतना गेहूँ बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूँ की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को साल भर भरपेट खाना दिया जा सकता है।

हमारा 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इस लिये बेकाम हो जाते हैं, क्योंकि उसे रखने के लिये हमारे पास माकूल भण्डारण की सुविधा नहीं है। देश के कुल उत्पादित सब्जी, फल का 40 फीसदी समय पर मंडी तक नहीं पहुँच पाने के कारण सड़-गल जाता है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है।

जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी को सड़ने से बचा सके। एक साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूँ खुले में पड़े होने के कारण मिट्टी हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पाँच हजार वेयर हाउस बनाए जा सकते हैं। यह आँकड़ा किसी से दबा-छुपा नहीं है, बस जरूरत है तो एक प्रयास करने की। यदि पंचायत स्तर पर ही एक क्विंटल अनाज का आकस्मिक भण्डारण व उसे जरूरतमन्द को देने की नीति का पालन हो तो कम-से-कम कोई भूखा तो नहीं मरेगा।

विकास, विज्ञान, संचार व तकनीक में हर दिन कामयाबी की नई छूने वाले मुल्क में इस तरह बेरोजगारी व खाना ना मिलने से होने वाली मौतें मानवता व हमारे ज्ञान के लिये भी कलंक हैं। हर जरूरतमन्द को अन्न पहुँचे इसके लिये सरकारी योजनाओं को तो थोड़ा चुस्त-दुरुस्त होना होगा, समाज को भी थोड़ा संवेदनशील बनना होगा। हो सकता है कि हम इसके लिये पाकिस्तान से कुछ सीख लें जहाँ शादी व सार्वजनिक समारोह में पकवान की संख्या, मेहमानों की संख्या तथा खाने की बर्बादी पर सीधे गिरफ्तारी का कानून है। जबकि हमारे यहाँ होने वाले शादी समारोह में आमतौर पर 30 प्रतिशत खाना बेकार जाता है। गाँव स्तर पर अन्न बैंक, प्रत्येक गरीब, बेरोजगार के आँकड़े रखना जैसे कार्य में सरकार से ज्यादा समाज को अग्रणी भूमिका निभानी होगी।

बहरहाल हमें एकमत से स्वीकार करना होगा कि ललितपुर जिले में एक अनुसूचित जाति के किसान की ऐसी मौत हम सभी के लिये शर्म की बात है। यह विडम्बना है कि मानवता पर इतना बड़ा धब्बा लगा और उस इलाके के एक कर्मचारी या अफसर को सरकार ने दोषी नहीं पाया, जबकि ये अफसरान इलाके की हर उपलब्धि को अपनी बताने से अघाते नहीं हैं।

रविवार, 8 मई 2016

Preparing ourselves for water conservation

जल और जीवन को संवारते लोग

पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकारFirst Published:08-05-2016 09:16:23 PMLast Updated:08-05-2016 09:16:23 PM
अब लोगों ने अपना चंदा जोड़ा व उसकी सफाई व उस पर एक स्टॉप डैम बनाने का काम शुरू कर दिया। वहीं दूसरी तरफ, पन्ना के मदन सागर को अपने पारंपरिक रूप में लौटाने के लिए वहां का समाज भरी गरमी में सारे दिन कीचड़ में उतर रहा है। 75 एकड़ के इस तालाब का निर्माण  1745 के आसपास हुआ था। इसमें 56 ऐसी सुरंंगें बनाई गई थीं, जो शहर की बस्तियों में स्थित कुओं तक जाती थीं। इससे काफी दूर बस्तर के दलपतसागर तालाब को कंक्रीट का जंगल बनने से बचाने के लिए पूरा समाज लामबंद हो गया है। परंपरागत जल साधनों को संवारने के ऐसे ढेर सारे उदाहरण सामने आ रहे हैं।
आमतौर पर हमारी सरकारें बजट का रोना रोती हैं कि पारंपरिक जल संसाधनों की सफाई के लिए बजट का टोटा है। हकीकत में तालाब की सफाई और उसके गहरीकरण का काम अधिक खर्चीला नहीं होता, न ही इसके लिए भारी-भरकम मशीनों की जरूरत होती है। तालाबों में भरी गाद, सालों-साल से सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ट पदार्थों के कारण ही उपजी है, जो वास्तव में उम्दा दर्जे की खाद है। किसानों को अगर इस खाद रूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपा जाए, तो वे सहर्ष इस काम के लिए राजी हो जाते हैं। राजस्थान के झालावाड़ जिले में 'खेतों में पॉलिश' के नाम से यह प्रयोग अत्यधिक सफल व लोकप्रिय हो रहा है। कर्नाटक में समाज के सहयोग से कोई 50 तालाबों का कायाकल्प हुआ है, जिनमें गाद की मुफ्त ढुलाई करने वालों ने इस खाद को बेचकर पैसा कमाया।
जल-संकट से जूझ रहे लोग अब जगह-जगह नदी को तालाब से जोड़ने, गहरे कुओं से तालाब भरने, पहाड़ पर नालियां बनाकर उसका पानी तालाब में जमा करने, उपेक्षित पड़ी झिरिया का पानी तालाब में एकत्र करने जैसे अनगिनत प्रयोग कर रहे हैं। इसके विपरीत जहां सरकार इसके लिए सक्रिय है, वहां नतीजे उतने अच्छे नहीं हैं। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के अंधियारा तालाब की कहानी पर गौर करें।
काफी पहले वहां सूखा राहत के तहत तालाब को गहरा करने का काम शुरू किया गया था। खोदने वालों ने तालाब के बीचोबीच खूब गहरी खुदाई कर दी। जब इंद्र देवता मेहरबान हुए, तो तालाब एक रात में लबालब हो गया, पर अगली सुबह ही उसकी तली दिख रही थी। बगैर सोचे-समझे की गई खुदाई में तालाब की वह झिर टूट गई, जिसका संबंध इलाके की ग्रेनाइट भू-संरचना से था। यह काम सरकारी अमले व ठेकेदार की बजाय स्थानीय ज्ञान से ही बेहतर हो सकता है। लोग अब यही कर रहे हैं।

Naxalism can not be combat with fake administrative claims

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खात्मे के फर्जी दावे 

नक्सलवाद
                                                 पंकज चतुर्वेदी
एक खबर को छत्तीसगढ़ की राज्य शासन ने जम कर प्रसारित किया कि अब आम ग्रामीणों का नक्सलियों से भरोसा उठ रहा है और सुकमा जिले के एक गांव कुमाकालेंग के लोगों ने अपने इलाके में नक्सलियों को घुसने से रोकने के लिए खुद मोर्चाबंदी कर ली है। बताया गया कि पंचायत के दो गांव-कुमाकालेंग और नामा के कोई युवा अपने पारंपरिक हथियारों के साथ अपने गांव में पहरा दे रहे हैं व नक्सलियों को अपने यहां घुसने नहीं दे रहे हैं। सनद रहे यह गांव तोंगापाल थाने से 22 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-30 पर स्थित है।याद करें, इसी तोंगपाल थाने के पांच किलोमीटर के दायरे में नक्सली पिछले दो सालों में कई बड़ी वारदातें कर चुके हैं। ठीक उसी समय बस्तर में नक्सलियों की दंडकारण्य विंग ने दो दिन के बंद का आयोजन किया। चार-पांच मई के बंद के दौरान इलाके में 95 प्रतिशत बसें चलीं, बीजापुर मुख्यालय सहित अधिकांश बाजार बंद रहे। कई जगह हाट-बाजार भी। नहंटा 78 किलोमीटर और सुकमा-दंतेवाड़ा 80 किलोमीटर मागरे पर हर बीस किलोमीटर दूरी पर सुरक्षा बलों के कैप हैं और ये ग्रामीणों, व्यापारियों व बस चालाकों को यह भरोसा नहीं दिला पाए कि उनके रहते नक्सली कुछ नहीं कर पाएंगे। इतनी फोर्स होने के बावजूद इलाके में नक्सलियों के पच्रे बंटे, कई जगह पेड़ काट कर सड़क जाम की गई। यह दो दिन बंद की बानगी है कि जिस कुमाकालेंग को बदलाव का प्रतीक बता कर प्रचारित किया जा रहा है, उसकी असलियत क्या है।लोग अब भी नहीं भूले हैं सलवा जुड़ुम को जिसमें स्थानीय युवाओं को प्रशासन ने नक्सलियों के विरुद्ध हथियार थमा दिए थे और उसके बाद ऐसा खून-खराबा हुआ कि हजारों लोग गांव-घर छोड़ कर भागे, गांव के गांव जलाए गए। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा व सलवा जुडुम को अवैध बता कर उसको समाप्त करने के आदेश दिए गए। बाद में सलवा जुड़ुम के प्रणोता व बस्तर के सबसे कद्दावर नेता महेन्द्र कर्मा की नृशंस हत्या कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के साथ कर दी गई। इतनी बड़ी घटना के बाद भी बस्तर के किसी गांव से यह आवाज नहीं आई थी कि वे नक्सलियों का बहिष्कार करेंगे। आदिवासी इलाकों की कई करोंड़ो-अरबों की प्राकृतिक संपदा पर अपना कब्जा जताने के लिए पूंजीवादी घरानों को समर्थन करने वाली सरकार सन 1996 में संसद द्वारा पारित आदिवासी इलाकों के लिए विशेष पंचायत कानून (पेसा अधिनियम) को लागू करना तो दूर उसे भूल ही चुकी है। इसके तहत ग्राम पंचायत को अपने क्षेत्र की जमीन के प्रबंधन और रक्षा करने का पूरा अधिकार था। इसी तरह परंपरागत आदिवासी अधिनियम 2006 को संसद से तो पारित करवा दिया लेकिन उसका लाभ दंडकारण्य तक नहीं गया, कारण वह बड़े घरानों के हितों के विपरीत है। असल में यह समय है, उन कानूनों-अधिनियमों के क्रियान्वयन पर विचार करने का, लेकिन हम बात कर रहे हैं कि जनजीय इलाकों में सरकारी बजट कम किया जाए, क्योंकि उसका बड़ा हिस्सा नक्सली लेवी के रूप में वसूल रहे हैं। नक्सली इलाकों में सुरक्षा बलों को ‘‘खुले हाथ’ दिए गए हैं। बंदूकों के सामने बंदूकें गरज रही हैं, लेकिन कोई मांग नहीं कर रहा है कि स्थाई शांति के लिए कहीं से पहल हो। इसके बीच पिस रहे हैं आदिवासी, उनकी संस्कृति, सभ्यता, बोली और मानवता।इतिहास गवाह है कि चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र बड़े से बड़े ताज जमीन पर गिरे हैं, लेकिन मानवता हर समय जीवंत रही है। नक्सलियों के कुछ सवाल भी जायज हैं। हां उनका तरीका गलत है, लेकिन इस आधार पर उनकी बात अनसुनी नहीं की जा सकती। सुरक्षा बलों को अपनी ड्यूटी निभाने के लिए हथियार ले कर जंगल में जाना ही होगा, लेकिन यह जरूरी नहीं कि उनकी हर गोली केवल अपराधी या नक्सली को ही लगे। पिछले छह महीने के दौरान सुरक्षा बलों ने कई सौ नक्सलियों को मार गिराने का दावा किया है। आत्मसमर्पण तो लगभग हर रोज हो रहे हैं। यदि इन सब की संख्या जोड़ लें तो लगेगा कि जंगल में जितने असली नक्सली नहीं हैं, उनसे ज्यादा या तो मार दिए गए या उनका हृदय परिवर्तन हो गया। जाहिर है कि प्रशासन की फर्जी कार्यवाहियां व दावे उसका केवल एक ही पहलू है-नक्सलवादियों की मजबूती और जनता में अपनी विश्वसनीयता को सवालों में खड़ा करना। लेकिन ताश के घर हवा के एक झोके से ढह जाया करते हैं और ऐसे में हवा खुद को मजबूत साबित करती है।

शुक्रवार, 6 मई 2016

Those who win over drought

जिन्होंने दी सूखे को मात




जब बात हाथ से निकल गई, जब सुखाड़ के दुष्प्रभाव अपने चरम पर आ गए, तब दिल्ली के मीडिया को खयाल आया कि उनसे महज पांच सौ किलोमीटर दूर बुंदेलखंड की आधी आबादी पानी की कमी के कारण पलायन कर चुकी है। सूखे कुएं, बंद घरों और तड़क चुकी जमीन के फोटो के साथ आएरोज खबरें तैर रही हैं। यह भी इतना नपातुला गणित हो चुका है, दिल्ली से पत्रकार जाता है, वहां वह कतिपय एनजीओबाज के पास होता है और वह अपने नजरिए से हालात दिखा देता है। आकर रपट फाइल हो जाती है। ऐसे में वे लोग तो गुमनाम ही रहते हैं, जिनके कार्य असल में पूरे समाज व सरकार के लिए अनुकरणीय बन सकते हैं। लगातार तीसरे साल अल्पवर्षा की मार से कराहते, बेहाल बंुदेलखंड से गांव और अपने जीवन तक से पलायन, प्यास से परेशानी और पेट पालने की जटिलताओं की कहानियां बढ़ती गरमी के साथ तेजी से फैल रही हैं। जब हालात पूरी तरह हाथ से निकल गए, तब मीडिया, प्रशासन और समाज की दीर्घ तंद्रा टूटी और सरकारी शेर कागजों पर दहाड़ने लगे। इस दौड़-भाग से उपजी मृग मरीचिका प्यासे बुंदेलखंडियों में भ्रम ही फैला रही है।
ऐसी निराशा के बीच समाज के वे लोग चर्चा में हैं ही नहीं, जिन्होंने इस सूखे व जल-संकट के समक्ष अपने हथियार नहीं डाले। विकट हालातों में भी स्थानीयता के पारंपरिक ज्ञान को याद किया और 45 डिग्री से अधिक गर्मी वाले इलाकों में भी सुखाड़ उन पर बेअसर है। एक दशक के दौरान कम से कम तीन बार उम्मीद से कम मेघ बरसना बुंदेलखंड की सदियों की परंपरा रही है। यहां के पारंपरिक कुएं, तालाब और पहाड़ कभी भी समाज को इंद्र की बेरुखी के सामने झुकने नहीं देते थे। जिन लोगों ने तालाब बचाए, वे प्यास व पलायन से निरापद रहे। ब्रितानी हुकूमत के दौर में ‘पॉलिटिकल एजेंट’ का मुख्यालय रहे नौगांव जनपद के करारा गांव की जल-कुंडली आज शेष बुंदेलखंड से बिल्कुल विपरीत हो गई है। पहले यहां के लोग भी पानी के लिए पैदल चलकर तीन किलोमीटर दूर जाया करते थे। इस साल जनवरी में जब ग्रामीणों को समझ आ गया कि सावन बहुत संकट के साथ आएगा तो उन लोगों ने गांव के ही एक कुएं के भीतर बोरिंग करवा दी, जिसमें खूब पानी मिला। फरवरी आते-आते पूरे गांव ने जुटकर अपने पुराने बड़े तालाब की सफाई, मरम्मत व गहरीकरण कर दिया। लगभग सौ फुट लंबा एक पाइप कुएं से तालाब तक डाला गया। फिर दो महीने में जब बिजली आती, मोटर चलाकर तालाब भरा जाता। आज यहां भरे पानी से घर के काम, मवेशियों के लिए पानी तो र्प्याप्त मिल ही रहा है, पूरे गांव के अन्य कुओं व हैंडपंप का जलस्तर भी शानदार हो गया है। सब एकमत है कि इस बार बारिश से तालाब को भरेंगे। पानी बचाने के लिए पहाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका को महसूस किया घुवारा ब्लॉक के बमनौराकलां गांव के समजा ने। दस हजार से अधिक आबादी और ढाई हजार मवेशियों वाला यह गांव बुंदेलखंड की अन्य बसावटों की ही तरह चारों तरफ पहाड़ों से घिरा है। पिछली बारिश शुरू होने से पहले समाज ने पहाड़ों पर ऊपर से नीचे की तरफ लगभग डेढ़ किलोमीटर लंबाई की एक फुट तक गहरी नालियां बना दीं। जब पानी बरसा तो इन नालियों के दस सिरों के माध्यम से बरसात की हर बूंद गाव के विशाल ‘चंदिया तालाब’ में जमा हो गई। आज पूरे गांव में कोई बोरवेल सूखा नहीं है, घरों में 210 नलों के जरिए पर्याप्त जल पहुंच रहा है। अब ग्रामीणों ने नालियों को और गहरा करने व पहाड़ पर हरियाली का संकल्प लिया है। सनद रहे बुंदेलखंड के सभी गांव, कस्बे, शहर की बसाहट का एक ही पैटर्न है, चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैया और उनके किनारों पर बस्ती। पहाड़ के पार घने जंगल व उसके बीच से बहती बरसाती या छोटी नदियां। आजादी के बाद यहां के पहाड़ बेहिसाब काटे गए, जंगलों का सफाया हुआ व पारंपरिक तालाबों को पाटने में किसी ने संकोच नहीं किया। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुंदेलखंड के हर गांव-कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। जिन्होंने पहाड़ बचाए, वे प्यास से नहीं हारे।दमोह शहर की जनता भले ही एक-एक बूंद पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही हो, लेकिन जिला मुख्यालय के करीबी गांव इमलाई में पानी का किसी तरह का संकट नहीं है। यहां की तेंदू तलैया का गहरीकरण व सफाई खुद गांव वालों ने कर ली थी। जब थोड़ी सी बारिश की हर बूंद इस कुदरती बचत खाते में जमा हुई तो उसके ब्याज से ही गांव वालों का कंठ तर हो गया। इसी जिले के तेंदूखेड़ा के पाठादो व उससे सटे तीन गांवों को पानीदार बनाने के लिए ग्रामीणों ने एक उपेक्षित पड़ी झिरिया का सहारा लिया। झिरिया यानी छोटा सा झरना, जहां से पानी का स्रोत फूटता है। यह झिरिया बरसात में खूब पानी देती है, गर्मी में इसकी रफ्तार कम हो जाती है। गांव वलों ने इस झिरिया से निकल कर बहने वाले पानी के रास्ते में एक तलैया बना दी, एक कुआं भी खोद दिया। नतीजा, बगैर किसी बड़े व्यय के पूरे इलाके की नमी बरकरार है। गांव के बुजुर्ग पूरे दिन इसी झिरिया के किनारे रहते हैं व लोगों को किफायत से पानी खर्चने की सीख देते हैं। टीकमगढ़ जिले में पारंपरिक ज्ञान पर आधारित बराना गांव के चंदेलकालीन तालाब को जामनी नदी से जोड़ने की योजना बेहद सफल रही है। इससे 18 गांव लाभान्वित हो रहे हैं। ऐसे कई-कई उदाहरण पानी के लिए बेहाल बस्तर से ले कर झारखंड तक में हैं, जहां समाज ने ही अपनी समस्या का निदान पारंपरिक ज्ञान के सहारे खोज लिया। कर्नाटक में तो समाज ने अपने व्यय व श्रम से खूब तालाब बना डाले और सूखे को ठेंगा दिखा दिया। जान लें कि देश की जल समस्या का निदान भारी-भरकम तकनीक के साथ अरबों रुपए व्यय के बाद दशकों तक अधूरी रहने वाली योजनाओं से मिलने से रहा। झारखंड के गुमला जिले के भरनो प्रखंड के खरतंगा पहाड़ टोला के लोगों का संकल्प तारीफ के काबिल है। उन लोगों ने आपस में मिलकर 250 फुट लंबा, 200 फुट चौड़ा और दस फुट गहरा तालाब खोद लिया। यदि यह ताल भर जाता है तो पूरे इलाके में कभी जल-संकट होगा ही नहीं।हालांकि कुछ लोग ऐसे उदाहरणों से सीख लेकर इस भरी गरमी में आने वाले दिनों में पानी को सहेजने के लिए कमर कस चुके हैं। नौगांव शहर के जब सारे नलकूप सूख गए व पानी मिलने की हर राह बंद हो गई तो वहां के समाज ने एक स्थानीय छोटी सी नदी को सहेजने का जिम्मा खुद उठा लिया। बिलहरी से निकल कर भडार तक जाने वाली कुम्हेडी नदी बीते कई दशकों से गंदगी, रेत व गाद के चलते चुक गई थी। अब लोगों ने अपना चंदा जोड़ा व उसकी सफाई व उस पर एक स्टॉप डेम बनाने का काम शुरू कर दिया। पन्ना के मदन सागर को अपने पारंपरिक रूप में लौटाने के लिए वहां का समाज भरी गरमी में सारे दिन कीचड़ में उतर रहा है। सनद रहे कोई 75 एकड़ के इस तालाब का निर्माण सन् 1745 के आसपास हुआ था। इस तालाब में 56 ऐसी सुरंगंे बनाई गई थीं, जो शहर की बस्तियों में स्थित कुओं तक जाती थीं व उन्हें लबालब रखती थीं। आधुनिकता की आंधी में ये सब चौपट हो गया था। आज यहां बच्चे अपनी बचत व जन्मदिन में मिले पैसों को इस कार्य के लिए दान कर रहे हैं। बस्तर के दलपतसागर तालाब को कंक्रीट का जंगल बनने से बचाने को पूरा समाज लामबंद हो गया है। झारखंड से ले कर मालवा तक ऐसे ही उदाहरण सामने आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के सभी जिलों में राज्य सरकार ने छोटे किसानों के खेतों में तालाब बनाने की शुरुआत कर दी है, जिसके तहत महोबा जिले में 500 और शेष जिलों- झांसी, ललितपुर, चित्रकूट, जालौन और बांदा में ढाई-ढाई सौ तालाबों की खुदाई का काम किसानों ने भरी धूप में पूरा कर दिया है। यदि इसमें पानी भर जाता है तो एक एकड़ के खेत में हर तालाब दो बार तराई कर सकेगा।यह जान लें कि यहां पानी तो इतना ही बरसेगा, यह भी जान लें कि आधुनिक इंजीनियरिंग व तकनीक यहां कारगर नहीं है। बंुदेलखंड, झाारखंड, बस्तर या फिर मालवा को बचाने का एकमात्र तरीका है- अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। समाज जानता है कि तालाब महज पानी जमा नहीं करते, वे बेकार हो जाने वाले बारिश के पानी को साधते भी हैं। तालाबों की अधिकता से नदी-दरिया में बह कर जाने वाला बरसात का पानी गंदला नहीं होता, क्योंकि तालाब पानी की मिट्टी को अपने में जज्ब कर लेते हैं। यहां से उछल कर गया पानी ही नदी में जाता है। यानी पहाड़ या जमीन से जो मिट्टी तालाब की तलहटी में आई, उससे खेत को भी संपन्नता मिलती है। ऐसे लोकज्ञान को महज याद करने, उसमें समय के साथ मामूली सुधार करने और उनका क्रियान्वयन स्थानीय स्तर पर ही करने से हर इंसान को जरूरत मुताबिक पानी मिल सकता है। आवश्यकता है, ऐसे ही सफल प्रयोगों को सहेजने, सराहने और संवारने की।
= पंकज चतुर्वेदी

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

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