My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

carelessness towards health services in Bastar

बीमार बस्तर से बेपरवाही


                                                                                                                                      पंकज चतुर्वेदी

इस बार बारिश बस्तर पर खूब मेहरबान है। आशाढ के पहले दिन से ही जो झड़ी लगी है कि थमने का नाम नहीं ले रही। भले ही कुछ लेाग बस्तर में केवल बारूद की गंध सूंघते हों लेकिन बरसात में यहां का नैसर्गिक सौंदर्य देश में अप्रतिम होता है। विडंबना यही है कि घने जंगलों, प्राकृतिक झरनों और पहाड़ों जैसी सुंदरता से भरपूर बस्तर में भी पूरे देश की तरह मौसम बदलते हैं, उनके स्थानीय बोलियों में नाम भी हैं, लेकिन वहां के बाशिंदे इन मौसमों को बीमारियों से चीन्हते हैं। बीते एक महीने में बस्तर इलाके में कहीं तेज गर्मी हुई तो अचानक मूसलाधार बारिश होने लगी। इस उमस के मौसम में हर साल आने वाली बीमारियां तेजी से व एकसाथ आ रही हैं। प्रकृति , मौसम और बीमारियों पर किसी का इतना बस नहीं होता लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उस इलाके में स्वास्थ्य सुविधाओं का ताना-बाना बुरी तरह तार-तार है। जितनी कमी जागरूकता की है उससे कहीं ज्यादा चिकित्सा स्टाफ व दवाओं की
बीजापुर जिला बेहद दुर्गम इलाकों में गिना जता है। वहां अस्पताल तक पहुंचने वाले सीमित होते हैं, इसके बावजूद वहां बीते एक महीने में चार हजार से ज्यादा लेाग केवल मलेरिया के दर्ज हुए हैं। गत 11 से 23 जुलाई तक यहां डायरिया पखवाड़ा मनाया गया, लेकिन प्रशासन के पास इस बात के कोई आंकड़े नहीं है ंकि उल्टी-दस्त के कितने मरीज आए। बस्तर में अभी मलेरिया को जोर कुछ कम हुआ है और उलटी-दस्त का मौसम चल रहा है। इसके साथ यहां के संभागीय मुख्यालय के करीबी मुख्य मार्ग के लोहडीगुंडा ब्लाक में ही डेंगू के 22 मरीज मिले।  जान लें कि यहां का 60 फीसदी इलाका सड़कों से नहीं जुड़ा है। कई सौं गांव  प्राथमिक स्वासथ्य केंद्र से 25-30 किलोमीटर दूर हैं। कई बार मरीज को उल्टी खटिया पर डाल कर पैदल ही लाया जाता है। यहां प्रसव के दौरान मौत बेहद आम बात है। सरकारी खजाने का मुंह बस्तर के जंगलों की तरफ इस तरह खुला हुआ है कि लगता है अब वहां की गरीबी, पिछड़ापन, अशिक्षा बस बीते दिनों की बात बनने ही वाले हैं। जबकि हकीकत यह है कि कभी प्रकृति के सहारे जीने-मरने वाले यहां के आदिवासी साफ पानी के अभाव में सारे साल बीमारियों से त्रस्त रहते हैं। सरकारी दस्तावेज खुद गवाह है कि जिन इलाकों में लोग जहरीले पानी से मर रहे हैं, वहां सरकारी मशीनरी पहंुच ही नहीं पा रही है और अपनी नाकामी को नक्सलवाद का मुलम्मा चढा कर लाचार दिख रही है। बहुत से बस्तर-विशेशज्ञ इसे हर साल की स्थाई त्रासदी करार दे कर मामले को हल्का बना रहे हैं तो कुछ सारा ठीकरा नक्सलियों के सर फोड कर सत्ताधारी दल के गुण गा रहे हैं। जंगल में नक्सली हिंसा में कितने मरे, उसके आंकड़े तो राजधानी व दिल्ली का मीडिया पहले पन्ने पर छापता है लेकिन मार्च से अभी तक वहां पीलिया से पचास मौतें हो चुकी हैं, यह कहीं छपा नहीं दिखेगा।
असल में बस्तर  कभी इतना बड़ा जिला हुआ करता था कि केरल राज्य उसके क्षेत्रफल के सामने छोटा था। आज उस बस्तर को सात जिलों में बांट दिया गया है - कांकेर, कोंडागांव, जगदलपुर, नारायाणपुर ,दंतेवाड़ा, सुकमा और कोंटा। इस संभाग का मुख्यालय जगदलपुर है। कह सकते हैं कि बस्तर की राजधानी अब जगदलपुर बन गया है। भले ही प्रशासनीक स्तर पर यह बंट गया हो, लेकिन यहां के दुख-दर्द कतई नहीं बंट पाए हैं।
यहां ग्रामीणें के पास पेयजल का एक ही माध्यम होता है - हैंड पंप, जबकि यहां के अधिकंाश हैंडपंप पानी के नाम पर लोहा व फ्लोराईड के आधिक्य वाला जहर फैंकते हैं। यह बात सामने आ रही है कि नदी के किनारे बसे गांवों में बीमारियों का ज्यादा प्रकोप है। असल में यहां धान के खेतों में अंधाधुंध रसायन का प्रचलन बढने के बाद यहां के सभी प्राकृतिक जल-धाराएं जहरीली हो गई हैं। इलाके भर के हैंड पंपों पर फ्लोराईड या आयरन के आधिक्य के बोर्ड लगे हैं, लेकिन वे आदिवासी तो पढना ही नहीं जानते हैं और जो पानी मिलता है, पी लेते हैं। माढ़ के आदिवासी षौच के बाद भी जल का इस्तेमाल नहीं करते हैं। ऐसे में उनके षरीर पर बाहरी रसायन तत्काल तेजी से असर करते हैं। सरकारी अमले हेपेटाईटस-ए और बी के टीके लगाने के आंकड़े तो पेश करते हैं , लेकिन यह नहीं बताते कि इन टीकों को पांच डिगरी सेंटीग्रेट तापमान पर रखना होता है, वरना यह खराब हो जाते हैं। हकीकत यह है कि प्रशासन के पास अभी तक ऐसी कोई व्यवसथा नहीं है कि आंचलिक क्षेत्रों तक इतने कम तापमान में टीके पहुंचाए जाएं।
यह पहली बार नहीं हुआ था कि, बीते दस सालों के दौरान यहां गरमी षुरू होते ही जल-जनित रोगों से लोग मरने लगते हैं। और जैसे ही बारिश हुई ,उससे सटे-सटे ही मलेरिया आ जाता है।  बस्तर में गत तीन सालों के दौरान मलेरिया से 200 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।  कह सकते हैं कि बीमार होना, मर जाना यहां की नियति हो गई है और तभी हल्बी में इस पर कई लोक गीत भी हैं।  आदिवासी अपने किसी के जाने की पीड़ा गीत गा कर कम करते हैं तो सरकार सभी के लिए स्वास्थ्य के गीत कागजों पर लिख कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाती है। बस्तर संभाग में 12 सौ प्राथमिक अस्पताल हैं, लेकिन इनमें से आधे से ज्यादा के पास अपने भवन नहीं हैं। बस्तर यानी जगदलपुर के छह विकास खंडों के सरकारी अस्पतालों में ना तो कोई स्त्री रोग विशेशज्ञ है और ना ही बाल रोग विशेशज्ञ। सर्जरी या बेहोश करने वाले या फिर एमडी डाक्टरों की संख्या भी षून्य है।  जिले के बस्तर, बकावंड, लोहडीगुडा, दरभा, किलेपाल, तोकापाल व नानगुर विकासखंड में डाक्टरों के कुल 106 पदों में से 73 खाली हैं। तभी सन 2012-13 के दौरान जिले में  दर्ज औरतों व लड़कियों की मौत में 60 फीसदी कम खून यानी एनीमिया से हुई हैं। बडे किलेपाल इलाके में 25 प्रतिशत से ज्यादा  किशोरियां व औरतें कम खून से ग्रस्त हैं। वैसे यहां गर्भवती महिलओं को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए महतारी योजना, मोटरसाईकिल पर एंबुलेंस जैसे ्रपयोग भी किए गए हैं, लेकिन आंचलिक इलाकों में संचार व जागरूकता का अभाव और सरकारी मशीनरी में नक्सलियों का डर कोई भी योजना को सफल नहीं होने देता हैं।
टीकाकरण, गोलियों का वितरण, मलेरिया या हीमोग्लोबीन की जांच जैसी बाते यहां सपने की तरह हैं।  जब अस्पताल में ही स्टाफ नहीं है तो किसी माहामरी के समय गांवों में जा कर कैंप लगाना संभव ही हनीं होता। अभी बीजापुर जिले के भैैरमपुर ब्लाक में  इंद्रावती नदी के उस पार बेथधरमा,ताकीलांड, उतला, गोरमेटा जैसे कई गांवों में हर रोज तीन से पांच लोगों की चिताएं जलने की खबर आ रही है। स्वास्थ्य विभाग नक्सलियों के डर से वहां जाता ही नहीं है। ऐसे कोई 450 गांव पूरे संभाग में हैं जहां आज तक कोई स्वास्थ्य कर्मी गया ही नहीं, क्योंकि या तो वहां तक रास्ता नहीं है या फिर वहां जाना मौत को बुलाना कहा जाता है और वहां उल्टी-दस्त व अब मलेरिया मौत का तांडव कर रहा है।
बस्तर बीमार है, इसका असर वहां जंगलों में रह कर संघर्श कर रहे पुलिस व अर्ध सैन्य बलों के जवानों पर भी पड़ता हे। यहां तक कि जवानों को ना तो षुद्ध पेय जल मिल रहा है और ना ही मच्छर से निबटने के साधन। इस तरह वे नक्सली व बीमारियों से दोहरा संघर्श कर रहे हैं।
बस्तर के आदिवासियों का निश्चल जीवन और लेाकरंग, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में बेरंग हो रहा हैं। इलाके में जल-जंगल-जमीन को बाहरी दखल ने जहरीला बना दिया है, वरना वहां हर मरज की जड़ी-बूटी थी। सरकार असहाय है और इसका फायदा कतिपय झाड़-फूंक, गुलिया-ओझा उठा रहे हैं। लोगों को बस्तर की याद तभी आती है जब वहां नक्सल या पुलिस के बैरल से निकली गोली के साथ किसी निर्दोश का खून बहता है या फिर कहीं मुल्क की समृद्ध संस्कृति के नाम पर वहां के लोक-नृत्य का प्रदर्शन करना होता है। काश सरकार में बैठे लोगों पर भी कोई टोना-टोटका कर दे ताकि वे पीलिया, डायरिया जैसे सामान्य रोग से मरते अपने ही बस्तर के प्रति गंभीर हो सकें।

Advance booking for my soon coming book JAL MAANGTA JIWAN

मेरी नई पुस्‍तक ''जल मांगता जीवन'' एक महीने से कम समयमें आ रही है. यह भारत में जल के चार प्रमुख स्‍त्राेत - नदी, तालाब, समुद्र और भूजल पर है. इसमें कुछ ग्रांउड रिपोर्ट व केस स्‍टडी, कुछ आंकडे, कुछ रोचक घटनाएं, कुछ विश्‍लेषण हैं. कुल मिला कर यह पानी के प्रति संवेदनशील समाज व पर्यावरण के लिए प्रतिबदध पाठकों के लिए एक संदर्भ सामग्री, मार्गदर्शक और दिग्‍दर्शक हो सकती है. इसमें मेरा लगभग चार साल का समय लगा हैृ देश के कई इलाकों में व्‍यक्तिगत जाना व समाज से मुलाकात, कुछ खोज कुछ साथियों से सामग्री.
पुस्‍तक की वि षय वस्‍तु व कवर पेज प्रस्‍तुत है . ताकि पुस्‍तक आने से पूर्व आप इसके बारे में अपनी सोच बना सकें. इसकी कीमत महज तीन सौ रूपए आई है. हमनें कीमत कम करने के लिए कई फोटो डाले नहीं, सामग्री के फांट व पेज के आकार में ज्‍यादा सामग्री डालने का प्रयास किया.
इस पुस्‍तक के प्रकाशक हैं प्रख्‍यात विचारक देश्‍ा निर्मोही द्वारा संचालित ''आधार प्रकाशन, पंचकूला''. हालांकि उनसे मेरी इस बारे में बात नहीं हर्इु है, लेकिन प्रकाशन पूर्व इसका आर्डर करने वालों को बीस प्रतशित की छूट तथा डाक व्‍यय हमारा की पेशकश मेरी है.इस पुस्‍तक की भूमिका जाने माने कार्टूनिस्‍ट, पेंटर, उपन्‍यासकार और पिछले कुछ सालों से बंबई के सेलीब्रेटी प्‍लंबर यानि जल कार्यकर्ता आबिद सुरती ने लि खी है
हां, में चाहता हूं कि पुस्‍तक ज्‍यादा से ज्‍यादा लेागों तक पहुंचे सो, इसका प्रचार कर रहा हूं, बुरा ना मानें, और इसे सहजता से स्‍वीकार करें

शनिवार, 30 जुलाई 2016

Premchand : successful writer , fail on celluloid

मुंशी प्रेमचंद - आज है 135वीं जयंती

कृतियां सफल मगर फिल्में नहीं



साहित्य के भावों की जो उच्चता, भाषा की प्रौढ़ता और स्पष्टता, सुंदरता की जो साधना होती है, वह हमें सिनेमा में नहीं मिलती। -प्रेमचंद



 बीते तीन दशकों के टेलीविजन युग ने एक बात सिद्ध कर दी है कि यदि साहित्यिक कृतियों को थोड़ी मेहनत व गंभीरता से कैमरे में उतारा जाए तो न वे केवल लोकप्रिय होती हैं, बल्कि दर्शकों की पठन जिज्ञासा को भी बढ़ाती हैं। कुछ महान साहित्यकार ऐसे होते हैं, जिनकी रचनाएं अपने समय के साहित्य को तो प्रभावित करती ही हैं, अपितु वे आनेवाले समय के लिए भी पदचिन्ह छोड़ जाती हैं। भारतीय कथा लेखन जगत में जब प्रेमचंद का प्रवेश हुआ था, तब जीवन के यथार्थ से परे कल्पना लोक में विचर रही तिलिस्मी और जासूसी कहानियों/उपन्यासों का चरचराटा था। धनपत राय उर्फ नवाबराय इलाहाबादी उर्फ मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य में दुख-दर्द, खुशी-गमी जैसी अनुभूतियों के रंग पहले उर्दू और फिर हिंदी में भरे। वे अपनी रचनाओं को किसान-मजदूर, ग्रामीण-शहरी, अमीर-गरीब के निजी अनुभवों से खींच कर लाए। तत्कालीन राजनीतिक विचारधाराओं, सामाजिक पाखंडों, स्वतंत्रता आंदोलन की जीवंत तस्वीर उनके कथा साहित्य में थी। अपने 56 साल के जीवन काल में उन्होंने कई विश्वस्तरीय उपन्यास, कथा संग्रह, नाटक, निबंध रचे।
उन्होंने तीन चर्चित पत्रों का संपादन भी किया। जिन दिनों प्रेमचंद की साहित्य साधना चरम पर थी, तब भारत में चित्रपट यानी सिनेमा की लोकप्रियता का भी शुरुआती दौर था। तब की फिल्में स्टंट या कैमरा ट्रिक के कारण नहीं चलती थीं, बल्कि सशक्त पटकथा उनकी सफलता की वजह हुआ करती थी। इसके बावजूद 1934 में उनकी कहानी पर बनी पहली फिल्म से लेकर 1978 में बनी शतरंज के खिलाड़ी तक गिनी-चुनी फिल्में ही दर्शकों को भा सकीं। वैसे प्रेमचंद ने स्वयं इस असफलता का दोष फिल्म निर्माताओं को दिया था, जिन्होंने फिल्मांकन के दौरान उनकी कहानी का कचूमर निकाल दिया था।सन् 1931 में बोलता सिनेमा शुरू हुआ और 1933 में प्रेमचंद ने बंबई का रुख किया। प्रेमचंद ने मिल मजदूरों पर केंद्रित एक कहानी लिखी, फिर उसके संवाद भी लिखे, यहां तक कि एक छोटा-सा रोल भी किया। मोहन भावनानी के अजंता सिनेटोन के बैनर तले बनी इस फिल्म में पहले तो निर्माता ने खूब बदलाव किए, फिर ब्रितानी सेंसर ने बहुत कुछ उड़ा दिया। उसके बाद भी फिल्म को बंबई में प्रदर्शन की इजाजत नहीं मिली। लेकिन पंजाब के लाहौर में इसकोे देखने को भीड़ उमड़ी तो कई जगह इससे प्रेरित होकर मजदूरों के विद्रोह हो गए। उसके बाद सरकार ने फिल्म को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया। बाद में प्रेमचंद ने यह फिल्म बनारस में देखी तो वे बड़े दुखी हुए। उनकी कहानी का हुलिया ही बदल दिया गया था। तभी प्रेमचंद को फिल्मों की दुनिया जमी नहीं और वे मई, 1934 में अजंता सिनेटोन में फिल्मी लेखक के रूप में अनुबंधित होने के बावजूद 1935 में ही मुंबई छोड़कर बनारस वापस आ गए। इसके अगले ही साल सन् 1936 में उनका निधन हो गया। हालांकि इसके ठोस आंकड़े तो मौजूद नहीं हैं, लेकिन यह दावा है कि प्रेमचंद हिंदी में सबसे ज्यादा बिकने वाले लेखक हैं। लेकिन उनके देहावसान के बाद भी उनकी सफल कहानियों पर फिल्में बनती रहीं और लगभग सभी को असफलता का मुंह देखना पड़ा। प्रेमचंद के मुंबई प्रवास में एक फिल्म ‘नवजीवन’ बनी, जिसमें प्रेमचंद का मात्र नाम भर था और कहानी में भरसक परिवर्तन कर दिया गया था। 1934 में ही उनकी कृति ‘सेवा सदन’ पर इसी नाम से
एक फिल्म महालक्ष्मी सिनेटोन के झंडे तले बनी, पर इस फिल्म को देखकर खुद प्रेमचंद हक्के-बक्के रह गए कि यह उनकी ही लिखी कहानी है या किसी और की। वेश्याओं के जीवन सुधार की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म विशुद्ध फिल्मी फार्मूले में पेश की गई थी, जिसमें वेश्या-जीवन की कथा तो थी, पर वह नाच-गाने तक ही सीमित रह गई थी। कृति के मुख्य संदेश-वेश्या भी संवेदनशील प्राणी है। उसकी भी मानवीय भावनाएं हैं’ से यह फिल्म कोसों दूर थी। प्रेमचंद ने पाया कि वे यहां मिसफिट हैं, इसलिए वे एक वर्ष में ही मुंबई छोड़ आए।बंबई से प्रेमचंद द्वारा जैनेंद्र कुमार को लिखा गए एक पत्र के कुछ हिस्से गौरतलब हैं- ‘कर्जदार हो गया था, कर्ज पटा दूंगा, मगर और कोई लाभ नहीं। उपन्यास (गोदान) के अंतिम पृष्ठ लिखने बाकी हैं। उधर मन नहीं जाता। जी चाहता है, यहां से छुट्टी पाकर अपने पुराने अड्डे पर जा बैठूं। वहां धन नहीं है, मगर संतोष अवश्य है। यहां तो जान पड़ता है कि जीवन नष्ट कर रहा हूं।’ सनद रहे कि ‘गोदान’ की कहानी कर्ज पर ही केंद्रित है और जब प्रेमचंद इसे लिख रहे थे, तब खुद कर्ज से दबे हुए थे।मुंबई से लौटने के कोई डेढ़ वर्ष बाद 8 अक्टूबर, 1936 को इस महान कहानीकार का देहांत हो गया। प्रेमचंद के निधन के बाद भी उनकी चर्चित कहानियों पर फिल्में बनती रहीं। सन् 1941 में प्रेमचंद की उर्दू कहानी औरत की फितरत (हिंदी में त्रिया चरित्र) पर सिरको प्रोडक्शन ने फिल्म स्वामी बनाई, पर यह भी फिल्मी फार्मूलों से भरपूर थी। 1946 में भवनानी ने रंगभूमि बनाई, जो किसी सीमा तक कहानी के साथ न्याय करती थी, पर बॉक्स ऑफिस पर यह असफल रही और कुछ समय के लिए प्रेमचंद की कहानियों पर फिल्म निर्माण की बात ठंडी पड़ गई। इस संदर्भ में बिमल राय का उल्लेख जरूरी है। उन्होंने 1953 में प्रेमचंद की कथा, जिसका रूपांतरण सलिल चौधरी ने किया था, पर एक यथार्थपरक चित्र दो बीघा जमीन बनाया। इसे कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले और आर्थिक दृष्टि से भी यह फिल्म सफल रही।
एक लंबे अंतराल के बाद फिर सन् 1959 में कृश्न चोपड़ा ने उनकी चर्चित कहानी दो बैलों की कथा पर आधारित फिल्म हीरा मोती बनाई। कृश्न चोपड़ा प्रेमचंद का मर्म समझते थे, इसलिए उन्होंने प्रभावी ढंग से इस फिल्म में स्वाधीनता और मानवप्रेम की कथा कही। यह फिल्म काफी सराही गई। कृश्न चोपड़ा ने ही प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास गबन पर इसी नाम से 1966 में फिल्म शुरू की, पर वह उसे पूरी नहीं कर पाए। इसे बाद में ऋषिकेश मुखर्जी ने पूरा किया। इसमें कथा-वस्तु का निरूपण तो विशद था, पर फिल्म नहीं चली । इसी बीच त्रिलोक जेटली ने 1963 में गोदान बनाई, पर यह फिल्म प्रभावी नहीं बन पाई, लेखक-निर्देशक त्रिलोक जेटली उपन्यास और फिल्मी पटकथा में सामंजस्य नहीं कर पाए और इस फिल्म की असफलता के बाद प्रेमचंद फिर कुछ समय के लिए फिल्मों से गायब हो गए। सन् 1978 फिर प्रेमचंद चर्चा का विषय बने। उनकी दो कहानियों शतरंज के खिलाड़ी और कफन पर दो प्रख्यात फिल्मकारों ने फिल्म बनाई। जाने-माने फिल्मकार सत्यजित राय द्वारा हिंदी में निर्मित शतरंज के खिलाड़ी वस्तुत: राय की भी पहली हिंदी फिल्म थी। लंबे-लंबे अंग्रेजी संवादों और उबाऊ ट्रीटमेंट के कारण यह बहुत दुरूह हो गई। राय ने इसमें तथ्यों की ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता पर अत्यधिक जोर दिया, पर राजनीतिक परिवेश से जुड़ी मानवीय संवेदनाओं से भरपूर कहानी के साथ वे अधिक न्याय नहीं कर पाए। दरअसल, यह डॉक्यूमेंट्री अधिक लगती है और फीचर फिल्म कम, इसलिए इसके सफल होने का सवाल ही नहीं उठता।प्रेमचंद की यथार्थपरक कहानी कफन पर मृणाल सेन ने सन् 1977 में तेलुगु में ओका ओरी कथा (एक गांव की कहानी) बनाई, पर भाषा के कारण इसका प्रदर्शन क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रह गया। इसलिए इसे आंशिक सफलता मिली। मृणाल सेन की इस बात के लिए तारीफ करनी पड़ेगी कि उन्होंने कथा के साथ न्याय किया और उसका कैनवस भी बढ़ा दिया। वास्तविक लोकेशन्स पर शूटिंग के कारण यह गरीबी की समस्या का प्रामाणिक दस्तावेज बन गई है, जिसके प्रेमचंद भी हिमायती रहे और जिसके लिए लड़ते रहे। इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। प्रेमचंद की कहानियों पर कुछ बाल फिल्में भी बनीं, जिसमें सबसे ज्यादा चर्चित ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा निर्देशित ‘ईद मुबारक’ थी। सन् 1960 में बनी यह 21 मिनट की फिल्म कई भाषाओं में उपलब्ध है। ‘सद्गति’ (1981) सत्यजीत राय निर्देशित और प्रेमचंद की अमर कहानी ‘सद्गति’ पर आधारित एकमात्र ऐसी फिल्म है, जो अप्रतिम कथाशिल्पी के साथ न्याय करती है। जिस तरह प्रेमचंद ने ‘सद्गति’ में ब्राह्मणवाद पर गहरी चोट की थी, उसी प्रकार सत्यजित राय ने भी तुर्श अभिव्यंजना की है। ओमपुरी, मोहन अगाशे, स्मिता पाटिल और गीता सिद्धार्थ इसके मुख्य कलाकार थे।फिर भी सवाल ज्यों का त्यों है। हिंदी के सबसे चहेते और लोकप्रिय कथाकार की सफल और लोकप्रिय कृतियों पर बनी फिल्में असफल क्यों हुईं? पर अब समय बदल रहा है। दर्शक बदल रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में सफल साहित्यिक कृतियों पर कुछ अच्छी फिल्में और टीवी धारावाहिक बने हैं, जो आर्थिक दृष्टि से भी सफल रहे हैं। सन् 1981 में प्रेमचंद की कृति सद्गति व उसके बाद निर्मला पर बने टीवी सीरियल ने इन पुस्तकों की बिक्री बढ़ा दी थी। जाहिर है कि प्रेमचंद की कृतियों के विस्तार को तीन घंटे में समेटने की कोशिशें असफल रहीं, लेकिन सोप ऑपेरा के तौर पर यह सफल रही हैं। इस संबंध में प्रेमचंद के कथा साहित्य की सामयिकता और उपयोगिता असंदिग्ध है। अब समय आ गया है कि उनकी कृतियों पर अच्छी फिल्में और धारावाहिक बनाए जाएं। अब इसका बाजार भी है। यदि ऐसा होता है तो इससे प्रेमचंद के साहित्य के मूल में जो सर्वग्राह्यता और मानवीय संप्रेषणीयता है, उससे आम आदमी भी खुद को जोड़ पाएगा।

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

first provide alternative than ban on polythene

बगैर विकल्प के बंद नहीं होगी पॉलीथीन पन्नी

पंकज चतुर्वेदी 
राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद महानगर के मेयर आशु वर्मा बीते दो महीने से हर दिन कम से कम दो घंटे केवल इस बात को देते हैं कि लोग पॉलीथीन का प्रयोग बंद कर दें, कभी रैली तो कभी बाजार जा कर समझाईश तो कभी अफसरों के सााथ जब्ती। विडंबना है कि हर एक इंसान यह मानता है कि पॉलीथीन बहुत नुकसान कर रही है, लेकिन उसका मोह ऐसा है कि किसी ना किसी बहाने से उसे छोड़ नहीं पा रहा है। श्री वर्मा कहते हैं कि नगर निगम का बड़ा बजट सीवर व नालों की सफाई में जाता है और परिणाम-शून्य ही रहते हैं और इसका बड़ा कारण पूरे मल-जल प्रणाली में पॉलीथीन का अंबार होना है। यह पहला मामला नहीं है जब स्थानीय प्रशासन ने पॉलीथीन पर पांबदी की पहल की हो, पंजाब हो या कश्मीर या तिरूअनंतपुरम या चैन्ने या फिर रीवा, भुवनेश्वर, शिमला, देहरादून, बरेली, देवास बनारस... देश के हर राज्य के कई सौ षहर यह प्रयास कर रहे हैं, लेकिन नतीजा अपेक्षित नहीं आने का सबसे बड़ा कारण विकल्प का अभाव है।
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यों - श्री गोपाल गौड़ा व आदर्श कुमार गोयल की बैंच ने केंद्र सरकार को एक ऐसी उच्च स्तरीय समिति के गठन के निर्देश दिए हैं जो कि पूरे देश में प्लास्टिक थैलियों के इस्तेमाल, बिक्री और निबटान पर पर्यावरणीय कारणों से पूर्ण पांबदी की येाजना की रूपरेखा प्रस्ततु कर सके। यह आदेश एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए जारी किए गए हैं जिसमें पूरे देश में पोॅलीथीन थैलियों को खाने से मवेशियों के मरने की व्यथा बताई गई थी। असल बात तो यह है कि कच्चे तेल के परिशोधन से मिलने वाले डीजल, पेट्रोल आदि के साथ ही पॉलीथीन बनान का मसाला भी पेट्रो उत्पाद ही है। और इससे बड़ा मुनाफा कमाने वाले इस पर पाबंदी लगाने में अड़ंगे लगाते हैं। हालांकि पॉलीथीन प्रकृति, इंसान और जानवर, सभी के लिए जानलेवा है। घटिया पॉलिथीन का प्रयोग सांस और त्वचा संबंधी रोगों तथा कैंसर का खतरा बढ़ाता है । पॉलीथीन की थैलियां नश्ट नहीं होती हैं और धरती उपजाऊ क्षमता को नष्ट कर इसे जहरीला बना रही हैं। साथ ही मिट्टी में इनके दबे रहने के कारण मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता भी कम होती जा रही है, जिससे भूजल के स्तर पर असर पड़ता है।  पॉलीथीन खाने से गायों व अन्य जानवरों के मरने की घटनाएं तो अब आम हो गई है। फिर भी बाजार से सब्जी लाना हो या पैक दूध या फिर किराना या कपड़े, पॉलीथीन के प्रति लोभ ना तो दुकानदार छोड़ पा रहे हैं ना ही खरीदार। मंदिरों, ऐतिहासिक धरोहरों, पार्क, अभ्यारण्य, रैलियों, जुलूसों, शोभा यात्राओं आदि में धड़ल्ले से इसका उपयोग हो रहा है। शहरों की सुंदरता पर इससे ग्रहण लग रहा है। पॉलीथीन न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी नष्ट करने पर आमादा है। यह मानवोचित गुण है कि इंसान जब किसी सुविधा का आदी हो जाता है तो उसे तभी छोड पाता है जब उसका विकल्प हो। यह भी सच है कि पॉलीथीन बीते दो दशक के दौरान बीस लाख से ज्यादा लेागों के जीवकोपार्जन का जरिया बन चुका है जो कि इसके उत्पादन, व्यवसाय, पुरानी पन्नी एकत्र करने व उसे कबाड़ी को बेचने जैसे काम में लगे हैं। वहीं पॉलीथीन के विकल्प के रूप में जो सिंथेटिक थैले बाजार में डाले गए हैं, वे एक तो महंगे हैं, दूसरे कमजोर और तीसरे वे भी प्राकृतिक या घुलनशील सामग्री से नहीं बने हैं और उनके भी कई विशम प्रभाव हैं।  कुछ स्थानों पर कागज के बैग और लिफाफे बनाकर मुफ्त में बांटे भी गए लेकिन मांग की तुलना में उनकी आपूर्ति कम थी।
असल में प्लास्टिक या पॉलीथीन के कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला फाउंटेन पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल-पेन आए, जिनकी केवल रिफील बदलती थी। आज बाजार मे ंऐसे पेनों को बोलबाला है जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं।  देश की बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। जरा सोचें कि तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में बामुश्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह षेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले ‘यूज एंड थ्रो’ वाले रेजर ही  बाजार में मिलते हैं। अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन ले कर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फैंकी जाती हैं। मेकअप का सामान, घर में होने वाली पार्टी में डिस्पोजेबल बरतनों का प्रचलन, बाजार से सामन लाते समय पोलीथीन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग ;ऐसे ही ना जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं।
यदि वास्तव में बाजार से पॉलीथीन का विकल्प तलाशना है तो पुराने कपड़े के थैले बनवाना एकमात्र विकल्प है। इससे कई लेागों को विकल्प मिलता है- पॉलीथीन निर्माण की छोटी-छोटी इकाई लगाए लेागों को कपड़े के थैले बनाने का,  उसके व्यापार में लगे लोगों को उसे दुकानदार तक पहुंचाने का और आम लेागों को सामाना लाने-लो जाने का। सनद रहे पूरे देश में कोई दस हजार से ज्यादा पौलीथीन थैलियां बनाने के छोअे-बउ़े कारखाने काम कर रहे हैं। जहां कोई 10 लाख टन थैलियां हर साल बनती व बाजार में आ कर प्रकृति को दूशित करती हैं। यह सच है कि जिस तरह पॉलीथीन की मांग है उतनी कपड़े के थैले की नहीं होगी, क्योंकि थैला कई-कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन कपड़े के थैले की कीमत, उत्पादन की गति भी उसी तरह पॉलीथीन के मानिंद तेज नहीं होगी। इस तरह पौलीथीन बनाने वाली यूनिटों को रोजगार व उतनी ही आय का एक विकल्प मिलेगा। सबसे बड़ी दिक्कत है दूध, जूस, बनी हुई करी वाली सब्जी आदि के व्यापार की। हालांकि यह भयानक तथ्य है कि बाजार में उपलब्ध अधिकांश प्लास्टिक या पन्नी की भोजन पैकेजिंग खतरनाक है और उससे क्लोरीन जैसे पदार्थ खाने में जुटते हैं, परिणाम गुर्दे खराब होना। इस बारे में जागरूकता फैलाने के साथ-साथ विकल्प के तौर पर एल्यूमिनियम या अन्य मिश्रित धातु के खाद्य-पदार्थ के लिए माकूल कंटेनर बनाए जा सकते है।। सबसे बड़ी बात घर से बर्तन ले जाने की आदत फिर से लौट आए तो खाने का स्वाद, उसकी गुणवत्ता, दोनो ही बनी रहेगी। कहने की जरूरत नहीं है कि पॉलीथीन में पैक दूध या गरम करी उसके जहर को भी आपके पेट तक पहुंचाती है। आजकल बाजार माईक्रोवेव में गरम करने लायक एयरटाईट बर्तनों से पटा पड़ा है, ऐसे कई-कई साल तक इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को भी विकल्प के तौर पर विचार किया जा सकता है। प्लास्टिक से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बायो प्लास्टिक को बढ़ावा देना चाहिए। बायो प्लास्टिक चीनी, चुकंदर, भुट्टा जैसे जैविक रूप से अपघटित होने वाले पदार्थों के इस्तेमाल से बनाई जाती है। हो सकता है कि षुरूअ ात में कुछ साल पन्नी की जगह कपड़े के थैले व अन्य विकल्प के लिए कुछ सबसिडी दी जाए तो लोग अपनी आदत बदलने को तैयार हो जाएंगे। लेकिन यह व्यय पॉलीथीन से हो रहे व्यापक नुकसान के तुलना में बेहद कम ही होगा।
सनद रहे कि 40 माइक्रान से कम पतली पन्नी सबसे ज्यादा खतरनाक होती है। जान कर दुखह ोगा कि कचरे-कबाउ़े से बीन-बीन कर एक. पुरानी पनी को ही गला कर नई पॉलीथीन बना दी जाती है, लेकिन एक सीमा ऐसी आती है जब उसका पुनर्चक्रण संभव नहीं होता व वह महज धरती पर बोझ होती है। सरकारी अमलों को ऐसी पॉलीथीन उत्पादन करेन वाले कारखानों को ही बंद करवाना पड़ेगा। वहीं प्लास्टिक कचरा बीन कर पेट पालने वालों के लिए विकल्प के तौर पर बंगलुरू के प्रयोग को विचार कर सकते हैं, जहां लावारिस फैंकी गई पन्नियों को अन्य कचरे के साथ ट्रीटमेंट करके खाद बनाई जा रही है। हिमाचल प्रदेश में ऐसी पन्नियों को डामर के साथ गला कर सड़क बनाने का काम चल रहा है। जर्मनी में प्लास्टिक के कचरे से बिजली का निर्माण भी किया जा रहा है।  विकल्प तो और भी बहुत कुद हैं, बस जरूरत है तो एक नियोजित  दूरगामी योजना और उसके क्रियान्वयन के लिए जबरदस्त इच्छाशक्ति की।

बुधवार, 27 जुलाई 2016

"No school going " status is warning for Pakistan

भारत-पाक तल्ख रिश्तों की बानगी है बच्चों का स्कूल छुड़वाना

पंकज चतुर्वेदी
हाल ही में भारत ने पाकिसतान स्थित अपने उच्चयोग का दर्जा घटा कर ‘‘नो स्कूल गोईंग’ का करते हुए पाकिस्तान को स्पष्‍ट संदेश दे दिया है। भारत के इस कदम से अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की साख एक असुरक्षित देश के तौर पर दर्ज हुई है और यह उसके लिए वैश्विक रूप से बेहद शर्मनाक है।  सनद रहे कि  भारत के विदेशों में दूतावास व उच्चायोग के कर्मचारी अपने बच्चों को उन्हीं देशों में शिक्षा दिलवाते हैं। कई देशों में तो भारत के सीबीएसई और आईसीएससी बोर्ड के स्कूल हैं। लेकिन जिन देशों के भीतरी हालात खतरनाक होते हैं वहां भारतीय मिशन को अपने बच्चों को साथ रखने या उनकी शिक्षा वहां करवाने की अनुमति नहीं होती है। कश्मीर में कुख्यात आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जानेे के बाद पाकिस्तान की हरकतों से खफा भारत ने इस्लामाबाद स्थित अपने उच्चायेाग के कर्मचारियों को निर्देश दे दिया कि वे अपने बच्चें की शिक्षा की व्यवस्था पाकिस्तान से बाहर करें।
भारत ने इस्लामाबाद स्थित अपने उच्चायोग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को परामर्श दिया है कि वे अपने बच्चों को स्थानीय स्कूलों से हटा लें और उनकी पढ़ाई का प्रबंध पाकिस्तान के बाहर करें। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने  बताया कि सरकार समय-समय पर विदेशों में अपने मिशनों में तैनात कर्मचारियों एवं उनके मुद्दों की तत्कालीन परिस्थितियों की समीक्षा करती रहती है।इसी के तहत इस्लामाबाद में तैनात अपने अधिकारियों को सलाह दी गई है कि वे अपने बच्चों की शिक्षा का प्रबंध पाकिस्तान के बाहर कर लें। प्रवक्ता ने बताया कि इस संबंध में निर्णय पिछले साल जून में ही ले लिया गया था ताकि अधिकारियों को वैकल्पिक इंतजाम करने का पर्याप्त समय मिल जाए। उन्होंने बताया कि इस बारे में पाकिस्तान सरकार को भी बता दिया गया है. सरकारी सूत्रों के अनुसार यह परामर्श केवल सुरक्षा कारणों से जारी किया गया है। इस फैसले से करीब पचास बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए इस्लामाबाद से भारत लौटना होगा। जाहिर है कि यह बच्चों के लिए एक कठिन कार्य होगा, लेकिन भारत सरकार उन बच्चों के भारत या अन्य किसी देश में प्रवेश व उनकी पढ़ाई की भरपाई के तत्काल कदम उठा रही है।
इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों के बच्चों को सिर्फ दो स्कूलों- इंटरनेशनल स्कूल ऑफ इस्लामाबाद या अमेरिकन स्कूल और रूट्स इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाने की अनुमति है। इस पर त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए इस्लामाबाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नफीस जकारिया ने कहा, ‘‘यह एक अनौपचारिक, अंदरूनी, प्रशासनिक व्यवस्था है जिसकी हमें दो महीने पहले सूचना दे दी गयी थी। इसके अलावा हमें कोई और बात नहीं बतायी गयी है।’’
पाकिस्तान में भारत का उच्चायोग आजादी के बाद से यानि 1947 से कार्यरत है। पहले यह कार्यालय कराची में था । सन 1960 में इस्लामाबाद में राजधानी बनने के बाद यह वहां आ गया। पाकिस्तान में हमारे उच्चायुक्त, उपउच्चायाुक्त के अलावा  राजनीतिक, सांस्कृतिक, सुरक्षा, वीजा, प्रशासन, परियोजना आदि अनुभागों में कुल 17 वरिश्ठ अधिकारी पदस्थ है, जिनमें कई सेना के रिटायर्ड अधिकारी हैं। हालांकि भारत ने यह कदम तब प्रचारित किया है जब पाकिस्तान की सरकार ने कश्मीर में आतंकवादियों से कड़ाई से निबटने के विरोध में पाकिस्तान में काला दिवस मनाया था और भारत की कश्मीर  नीति पर जहर उगला था। उससे पहले भारतीय उच्चायोग पर प्रदर्यान व षहर में भारतीयों के खिलाफ लगाए गए पोस्टरों से उपजे भय को प्रमाण्ण के तौर पर प्रस्तुत कर भारत ने अंतरराश्ट्रीय बिरादरी को उजागर किया है कि पाकिस्तान के हलात विदेशियों के लिए माकूल नहीं है। दिसंबर-2014 में  पेशावर के एक स्कूल में आतंकवादियों द्वारा सैंकड़ों बच्चों की हत्या की नृशंस घटना तो लेागों के स्मृति पटल पर हैं ही।
वैसे अंतरराष्‍ट्रीय राजनीति में इसे एक बड़ा कदम कहा जाता है। जानकारी के मुताबिक ऐसा कारगिल युद्ध के वक्त भी नहीं हुआ। हां, पाकिस्तान के साथ वर्ष 1965 और 1971 के युद्ध के दौरान जरूर यह कदम उठाया गया था। उस समय भारत ने अपना अधिकांश स्टाफ ही वापिस बुलवा लिया था। कहने की जरूरत नहीं है कि हमारा खुफिया तंत्र पाकिस्तान की हर हरकत पर गहरी नजर रखता है। यह भी सही है कि पाकिस्तान में हाफिज सईद व ऐसे ही कई अंतरराष्‍ट्रीय आतंकवादी खुलेआम घूम रहे हैं। हो सकता है कि कश्मीर के नाम पर पाकिस्तान में जिस तरह से लोगों को उकसाया जा रहा है उससे सुरक्षा खतरे की किसी गोपनीय सूचना को देखते हुए यह कदम उठाया गया हो। भारत मानता है कि पाकिस्तान की गतिविधियां बेहद आपत्तिजनक हैं। भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों के बच्चे अगर पाकिस्तान के स्कूलों में जाते हैं तो उनकी सुरक्षा को भी खतरा होने की संभावना है। इसलिए सरकार ने इस तरह के निर्देश जारी किए हैं। ं
यह बात इशारा तो कर रही है कि दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है। इन दिनों पाकिस्तान के अलग अलग षहरों में नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर सैनिक शासन के पोस्टर भी चस्पा किए गए हैं। नवाज शरीफ की पकड़ सत्ता पर ढ़ीली होती जा रही है। संभव है कि वहां किसी बड़े खून-खराबे की आशंका या संभावना को देखते हुए भारत के उच्चायोग के स्टाफ के बच्चों को हटाया जा रहा हो। कहने की जरूरत नहीं है कि युद्ध व हिंसा के हालात में सबसे ज्यादा कष्‍ट बच्चे ही सहते हैं। भातर के इस कदम से पाकिस्तन में कई अन्य देशों के विदेशी राजनयीक भी सतर्क हो गए है। और इससे पाकिस्तान के विदेश्ी निवेश आकर्शित करने व वहां के पर्यटन उद्योग को बड़ा झटका लगा है। वहीं भातर के इस कदम ने पाकिस्तान को भी कड़ा संदेश दे दिया है कि यदि वह नहीं सुधरा तो बल प्रयोग से परहेज नहीं किया
जाएगा।

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

Kwadiya now become Deuce in the name of religion


आस्था में न टूटे संस्कार की डोर

जनसंदेश मप्र
देहरादून से ले कर दिल्ली और फरीदाबाद से करनाल तक और राजस्थान तक के पांच राज्यों के कोई 70 जिले आगामी दस दिनों तक कांवड़ यात्रा को ले कर भयभीत और आशंकित हैं। हालांकि, प्रशासन ने कांवड़ में डीजे न बजाने, लाठी-डंडे आदि ले कर न चलने जैसे निर्देश जारी किए हैं। लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि यह सबकुछ महज कागजी कवायद रह जाता है। कुछ लोगों की हरकतें हजारों श्रद्धालुओं, कठिन पद यात्रा करने वालों की आस्था पर भारी पड़ती हैं। प्रशासन असहाय-सा होता है व उनके रास्ते में रहने वाले लाखों लोगों का जीवन नर्क। धर्म व उसके संस्कारों का व्यापक उद्देश्य मानव कल्याण रहा है, लेकिन जिस तरह कांवड़ के फेर में बीमारों का अस्पताल जाना, बच्चों का स्कूल जाना व कर्मचारियों का अपने काम पर जाना थम जाता है, उससे इनके संस्कार पर सवाल खड़े होना लाजिमी है। जैसा कि बीते पांच सालों से घोषणा की जाती है, इस बार भी डीजे बजाने पर रोक जैसे जुमले उछाले जा रहे हैं, लेकिन यह तय है कि इनका पालन होना मुश्किल ही होता है। बडे़-बड़े वाहनों पर पूरी सड़क घेर कर, उद्दण्डों की तरह डंडा-लाठी-बेसबाल लहराते हुए, श्रद्धा से ज्यादा आतंक पैदा कर रहे कांवड़िए सड़कों पर आ जाते हैं। 
जनसंदेश उप्र
याद करें पिछले साल का श्रावण का महीना और दिल्ली-हरिद्वार राजमार्ग पर एक हत्या, डेढ़ सौ दुकानों में आगजनी व तोड़फोड़, कई बसों को नुकसान, सैकड़ों लोगों की पिटाई, हरिद्वार में विदेशी महिलाओं के साथ छेड़छाड़, स्कूल-दफ्तर बंद, लाखों बच्चों की पढ़ाई का नुकसान, जनजीवन अस्तव्यस्त। वह भी तब, जब दस हजार पुलिस वालों की दिन-रात ड्यूटी लगी हुई थी। यह कहानी किसी दंगे-फसाद की नहीं, बल्कि ऐसी श्रद्धा की है, जोकि अराजकता का रूप लेती जा रही है। श्रावण की शिवरात्रि से पहलेे लगातार दस दिनों तक देश की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास 200 किलोमीटर के दायरे में इस तरह का आतंक धर्म के कंधों पर सवार हो कर निर्बाध चलता है। इसमें कितना धर्म या श्रद्धा थी, इसका आकलन कोई नहीं कर पाया। अब तो सुदूर गांवों में बाकयदा इसके क्लब बनते हैं, वे एक जैसे रंग की वर्दी बनवाते हैं। एक वाहन होता है, जिसमें खाने-पीने, लड़ने-भिड़ने का सामान होता है। श्रद्धा, आस्था, समर्पण के भाव नदारद होते हैं, उसकी जगह भीड़ मनोविज्ञान व लंपटाई हावी होती है। जरा विचार करें कि इस पूरे उत्सव से समाज या धर्म को मिल क्या रहा है? कुछ लोग केसरिया कच्छे व टीशर्ट बेच लेते हैं, कांवड़ का डिजाइनर सामान बिक जाता है, दिल्ली से लेकर रास्ते के कस्बों में चंदा जोड़ कर कैंप लगाने वालों को कुछ दिन काम मिल जाता है। लेकिन इसकी कीमत चुकानी होती है कई हजार करोड़ के नुकसान से। 
दिल्ली में यूपी बार्डर से लेकर आईएसबीटी और वहां से रोहतक व गुड़गांव और वहां से जयपुर की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को जगह-जगह निर्ममता से खोद कर बड़े-बड़े पंडाल लगाए जा रहे हैं। राजधानी में भले ही बिजली की कमी हो, लेकिन बिजली को चुराकर सड़कों को कई-कई किलोमीटर तक जगमगा दिया गया है। कई शहरों में दूध, सब्जी जैसी आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई बाधित होती है व इसका फायदा मुनाफाखोर उठाते हैं। बच्चों के स्कूल की पढ़ाई का हर्जा तो कहीं गिना ही नहीं जाता। जब हम अपने देश को विकास के मार्ग पर वैश्विक स्तर पर ले जाने की कल्पना कर रहे हैं तो सोचना होगा कि दस दिनों तक मानव संसाधन का इस तरह दुरुपयोग, परिवहन पर पाबंदी से हम क्या पा रहे हैं। क्या यह भीड़ अपने गांव के तालाब या नदी को साफ कर धर्म की सेवा नहीं कर सकती? अभी कुछ साल पहले तक ये सात्विक कांवड़िए अनुशासन व श्रद्धा में इस तरह डूबे रहते थे कि राह चलते लोग स्वयं ही उनको रास्ते दे दिया करते थे। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश में धर्म की राजनीति का जो दौर शुरू हुआ, उसका असर कांवड़ यात्रा पर साल-दर-साल दिखने लगा। पहले संख्या में बढ़ोतरी हुई, फिर उनकी सेवा के नाम पर लगने वाले टेंटों-शिविरों की संख्या बढ़ी। गौरतलब है कि इस तरह के शिविर व कांवड़ लेकर आ रहे भक्तों की सेवाके सर्वाधिक शिविर दिल्ली में लगते हैं, जबकि कांवड़ियों में दिल्ली वालों की संख्या बमुश्किल 10 फीसदी होती है। यदि किसी कांवड़िए का जल छलक गया, किसी को सड़क के बीच में चलने के दौरान मामूली टक्कर लग गई तो खैर नहीं है। हॉकी, बेसबाल के बल्ले, भाले, त्रिशूल और ऐसे ही हथियारों से लैस ये भोले के भक्त तत्काल भालेबन जाते हैं और कानून-व्यवस्था, मानवता और आस्था सभी को छेद देते हैं। दिल्ली की एक तिहाई आबादी यमुना-पार रहती है। राजधानी की विभिन्न संस्थाओं में काम करने वाले कोई सात लाख लोग जीटी रोड के दोनों तरफ बसी गाजियाबाद जिले की विभिन्न कालोनियों में रहते हैं। इन सभी लोगों के लिए कांवड़ियों के दिनों में कार्यालय जाना त्रासदी से कम नहीं होता। इस बार दिल्ली एनसीआर में कांवड़ यात्रा के दौरान जबरदस्त अराजकता होगी, क्योंकि गाजियाबाद में नए बस अड्डे से दिलशाद गार्डन तक मेट्रो के काम के चलते जीटी रोड बेहद संकरी व गहरे गड्ढों वाली हो गई है। जाहिर है कि इस पर कांवड़ वालों का ही राज होगा व इसके दोनों तरफ बसी कालोनियों के लाखों लोग हाउस अरेस्ट होंगे। गाजियाबाद-दिल्ली सीमा पर अप्सरा बार्डर पूरी तरह कांवड़ियों की मनमानी की गिरफ्त में रहता है, जबकि इस रास्ते से गुरुतेग बहादुर अस्पताल जाने वाले गंभीर रोगियों की संख्या प्रतिदिन हजारों में होती है। ये लोग सड़क पर तड़पते हुए देखे जाते हैं। चूंकि मामला धर्म से जुड़ा होता है, सो कोई विरोध की सोच भी नहीं सकता। फिर कांवड़ सेवा केंद्रों की देखरेख में लगे स्वयंसेवकों के हाथों में चमकते त्रिशूल, हॉकियां, बेसबाल के बल्ले व लाठियां किसी की भी जुबान खुलने ही नहीं देती हैं। धर्म दूसरों के प्रति संवेदनशील हो, धर्म का पालन करने वाला स्वयं को तकलीफ देकर जन कल्याण की सोचे, यह हिंदू धर्म की मूल भावना है। कांवड़ियों की यात्रा में यह सभी तत्व नदारद हैं। फिल्मी पेरोडियों की धुन पर नाचना, जगह-जगह रास्ता जाम करना, आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देना, सड़कों पर हंगामा करना और जबरिया वसूले गए चंदों से चल रहे शिविरों में आहार लेना, किसी भी तरह धार्मिक नहीं कहा जा सकता है। जिस तरह कांवड़ियों की संख्या बढ़ रही है, उसको देखते हुए सरकार व समाज दोनों को ही इस पावन पर्व को दूषित होने से बचाने की जिम्मेदारी है। कांवड़ियों का पंजीयन, उनके मार्ग पर पैदल चलने लायक पतली पगडंडी बनाना, महानगरों में कार्यालय व स्कूल के समय में कांवड़ियों के आवागमन पर रोक, कांवड़ लाने की मूल धार्मिक प्रक्रिया का प्रचार-प्रसार, सड़क घेर कर शिविर लगाने पर पाबंदी जैसे कदम लागू करने के लिए अभी से कार्यवाही प्रारंभ करना जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस धार्मिक अनुष्ठान में सांप्रदायिक संगठनों की घुसपैठ को रोका नहीं गया तो देश को जो नुकसान होगा, उससे बड़ा नुकसान हिंदू धर्म को ही होगा।

बुधवार, 20 जुलाई 2016

MY NEW FORTHCOMING BOOK JAL MAANGTAA JEEWAN

साथी देश निर्मोही ने आज का दिन कुछ खास बना दिया , मैं किताबे लिखने में आलसी हूँ या बहुत समय लेता हूँ, एक पुस्तक में दो से तीन साल , यह कताब लिखने से पहले ही श्री देश निर्मोही से करार हो गया था, महज पाठ-विस्तार देख कर कि , इसे वे छापेंगे. हमारे यहाँ पानी के चार स्रोत - नदी, तालाब, समुद्र और भू जल, सभी कि आधुनिकता की आँधी ने जहर बना दिया हे. यह पुस्तक कुछ फील्ड रपट के जरिये पानी के संकट पर विश्लेषण है. उम्मीद करता हूँ कि दोस्त इसे पसंद करेंगे .
धन्यवाद देश जी, शानदार कवर तैयार करने के लिए महेश्वर जी और इसकी भूमिका लिखने के लिए आबिद सुरती जी और मेरे सभी शुभ चिन्तक व् आलोचक.
श्री देश निर्मोही की टिप्पणी
आने वाली किताब
पर्यावरणविद एवं विज्ञान लेखक पंकज चतुर्वेदी की पुस्तक 'जल मांगता जीवन' इसी माह प्रकाशित होने जा रही है। पुस्तक की भूमिका में जाने माने साहित्यकार आबिद सुरती लिखते हैं -'भारत के सबसे दूषित वायु वाले शहर दिल्ली में कई जाने-माने पत्रकार, कथाकार, कलाकार रहते हैं पर उन प्रबुद्ध लोगों में से गिने-चुने लोग ही इन हालात से वाकि॰फ हैं। और इन विद्ववानों में से भी केवल इक्के-दुक्के धरती के लाल ही समाज की भलाई के लिए मैदान में उतरे हैं। पंकज, मेरा मित्र, मेरा हमदर्द उनमें से एक है। विषय चाहे नाले बने दरिया का हो या गायब होते तालाबों का, भूजल स्तर का हो या नंगे पर्वतों पर पेड़ो की खेती का, नीरस शिक्षा का हो या उजड़े गांवों का, कफन बांधकर कूद पड़ना उसकी फितरत में है। पानी, झील, कुएं जैसे विषयों पर अब तक उसके तीन हजार से अधिक आलेख देश भर के अखबारों, पत्रिकाओं में छप चुके हैं। हैरत की बात तो यह है कि उनकी लेखनी में रवानी होती है जो पाठक को बहते दरिया में यात्रा करते तिनके की तरह अंत तक ले जाती है। पानी तेरे रूप अनेक। बात ॰गलत नहीं, पर पानी का एक रूप ऐसा भी है जिसके विषय में हमारे यहां बहुत कम जानकारी है। क्योंकि पानी को हमने केवल प्राणहीन, तरल पदार्थ के रूप में ही देखा है, जबकी पानी प्राणदायी भी है और प्राणयुक्त भी। हम जो बोलते हैं वह पानी सुनता है। हम शुभ-शुभ बोलते हैं तो पानी प्रसन्न होता है। अशुभ बोलते हैं तो पानी का रंग मैला हो जाता है। जीभ पर शब्द लाने से पहले याद रहे कि हमारे जिस्म का लगभग सत्तर प्रतिशत हिस्सा पानी है।'
'जल मांगता जीवन' पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर आधार से प्रकाश्य किताबों की एक पूरी सीरीज़ की पहली पुस्तक है। इसी कड़ी में हमारे युवा कथाकार मित्र कबीर संजय लुप्त होते वन्य जीवों पर एक दिलचस्प पुस्तक 'चीता: भारतीय जंगलों का गुम हुआ शहजादा' तैयार कर रहे हैं। संभवतया यह पुस्तक हम आगामी विश्व पुस्तक मेला के अवसर पर जारी कर पाएंगे।
आवरण: महेश्वर दत्त शर्मा

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...