My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

When developments goes wild ---

विकास के विस्तारवादी होने से दूषित  हो रहा है पर्यावरण

पंकज चतुर्वेदी

लगभग एक साल से दिल्ली से सटा गाजियाबाद देश के सबसे दूषित  नगरों में अव्वल बना है। दिल्ली तो है ही जल-जमीन और वायू के दूषित  होने का विश्वव्यापी कुख्यात  स्थान। यदि गंभीरता से इस बात का आकलन करें तो स्पष्ट होता है कि जिन शहरों में पलायन व रेाजगार के लिए पलायन कर आने वालों की संख्या बढ़ी व इसके चलते उसका अनियेाजित विकास हुआ, वहां के हवा-पानी में ज्यादा जहर पाया जा रहा है। असल में शहरीकरण के कारण पर्यावरण को हो रहा नुकसान का मूल कारण अनियोजित शहरीकरण है। बीते दो दशकों के दौरान यह प्रवृति पूरे देश में बढ़ी कि लोगों ने जिला मुख्यालय या कस्बों की सीमा से सटे खेतों पर अवैध कालोनियां काट लीं। इसके बाद जहां कहीं सड़क बनी, उसके आसपास के खेत, जंगल, तालाब को वैध या अवैध तरीके से कंक्रीट के जंगल में बदल दिया गया।

यह दुखद है कि आज विकास का अर्थ विस्तार हो गया है। विस्तार- शहर के आकार का, सड़क का, भवन का आदि-आदि। लेकिन बारिकी से देखें तो यह विस्तार या विकास प्राकृतिक संरचनाओं जैसे कि धरती, नदी या तालाब, पहाड़ और पेड़, जीव-जंतु आदि के नैसर्गिक स्थान को घटा कर किया जाता है। नदी के पाट को घटा कर बने रिवर फ्रंट हों या तालाब को मिट्टी से भर कर बनाई गई कालोनियां, तात्कालिक रूप से तो सुख देती है। लेकिन प्रकृति के विपरीत जाना इंसान के लिए संभव नहीं है और उसके दुष्परिणाम  कुछ ही दिनों मे ंसामने आ जाते हैं। पीने के जल का संकट, बरसात में जलभराव, आबादी और यातायात बढ़ने से उपजने वाले प्राण वायु का जहरीला होना आदि।
देश के अधिकांश उभरते शहर अब सड़कों के दोनेां ओर बेतरतीब बढ़ते जा रहे हैं। ना तो वहां सार्वजनिक परिवहन है, ना ही सुरक्षा, ना ही बिजली-पानी की न्यूनतम मांग। असल में देश में बढ़े काले धन को जब बैंक या घर मे ंरखना जटिल होने लगा तो जमीन में निवेश के अंधे कुंए का सहरा लिया जाने लगा। इससे खेत की कीमतें बढ़ीं, खेती की लागत भी बढ़ी और किसानी लाभ का काम नहीं रहा गया। पारंपरिक शिल्प और रोजगार की त्यागने वालों का सहारा षहर बने और उससे वहां का अनियोजित व बगैर दूरगामी सोच के विस्तार का आत्मघाती कदम उभरा।

साल दर साल बढता जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और उसके कारण मौसम की अनियमितता,, गांव-गांव तक फैल रहा जल-संकट का साया, बीमारियों के कारण पट रहे अस्पताल,.. ऐसे कई मसले हैं जो आम लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बना रहे हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील व्यवस्था वाले देश में पर्यावरण का सबसे बड़ा संकट तेजी से विस्तारित होता ‘शहरीकरण’ एक समग्र विषय  के तौर लगभग उपेक्षित है। असल में देखें तो संकट जंगल का हो या फिर स्वच्छ वायु का या फिर पानी का ; सभी के मूल में विकास की वह अवधरणा है जिससे षहररूपी सुरसा सतत विस्तार कर रही है और उसकी चपेट में आ रही है प्रकृति और नैसर्गिकता।
हमारे देश में संस्कृति, मानवता और बसावट का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है । सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीनव फलता-फूलता रहा है । बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहां जगह मिली वह बस गई । और यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर । बेहतर रोजगार, आधुनिक जनसुविधाएं और, उज्जवल भविष्य की लालसा में अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़ कर शहर की चकाचाैंंध की ओर पलायन करने की बढ़ती प्रवृति का परिणाम है कि देश में एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या 302 हो गयी है । जबकि 1971 में ऐसे शहर मात्र 151 थे । यही हाल दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की है । इसकी संख्या गत दो दशकों में दुगुनी होकर 16 हो गयी है । पांच से 10 लाख आबादी वाले शहर 1971 में मात्र नौ थे जो आज बढ़कर आधा सैंकड़ा हो गये हैंं । विशेषज्ञों का अनुमान है कि आज देश की कुल आबादी का 8.50 प्रतिशत हिस्सा देश के 26 महानगरों में रह रहा है ।

विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट बताती है कि आने वाले 20-25 सालों में 10 लाख से अधिक आबादी वाले षहरों की संख्या 60 से अधिक हो जाएगी जिनका देश के सकल घरेलू उत्पाद मे ंयोगदान 70 प्रतिशत होगा। एक बात और बेहद चौकाने वाली है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या षहरों में रहने वाले गरीबों के बबराबर ही है । यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, यानी यह डर गलत नहीं होगा कि कहीं भारत आने वाली सदी में ‘अरबन स्लम’ या षहरी मलिन बस्तियों में तब्दील ना हो जाए।
षहर के लिए सड़क चाहिए, बिजली चाहिए, मकान चाहिए, दफ्तर चाहिए, इन सबके लिए या तो खेत होम हो रहे हैं या फिर जंगल। निर्माण कार्य के लिए नदियों के प्रवाह में व्यवधान डाल कर रेत निकाली जाती है तो चूने के पहाड़ खोद कर सीमेंट बनाने की सामग्री। इसके कारण प्रकृति को हो रहे नुकसान की भरपाई संभव ही नहीं है। जंगल को हजम करने की चाल में पेड़, जंगली जानवर, पारंपरिक जल स्त्रोत, सभी कुछ नश्ट हो रहा है। यह वह नुकसान है जिसका हर्जाना संभव नहीं है। षहरीकरण यानी रफ्तार, रफ्तार का मतलब है वाहन और वाहन हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार से खरीदे गए ईंधन को पी रहे हैं और बदले में दे रहे हैं दूशित वायु। षहर को ज्यादा बिजली चाहिए, यानी ज्यादा कोयला जलेगा, ज्यादा परमाणु संयंत्र लगेंगे।
षहर का मतलब है औद्योगिकीकरण और अनियोजित कारखानों की स्थापना का परिणाम है कि हमारी लगभग सभी नदियां अब जहरीली हो चुकी हैं। नदी थी खेती के लिए, मछली के लिए , दैनिक कार्यों के लिए , नाकि उसमें गंदगी बहाने के लिए। गांवों के कस्बे, कस्बों के षहर और षहरों के महानगर में बदलने की होड़, एक ऐसी मृग मरिचिका की लिप्सा में लगी है, जिसकी असलियत  कुछ देर से खुलती है। दूर से जो जगह रोजगार, सफाई, सुरक्षा, बिजली, सड़क के सुख का केंद्र होते हैं, असल में वहां सांस लेना भी गुनाह लगता है।
षहरों की घनी आबादी संक्रामक रोगों के प्रसार का  आसान जरिया होते हैं, यहां दूशित पानी या हवा भीतर ही भीतर इंसान को खाती रहती है और यहां बीमारों की संख्या ज्यादा होती है।  देश के सभी बड़े षहर इन दिनों कूड़े को निबटाने की समस्या से जूझ रहे हैं। कूड़े को एकत्र करना और फिर उसका षमन करना, एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। एक बार फिर षहरीकरण से उपज रहे कचरे की मार पर्यावरण पर ही पड़ रही है।
केवल पर्यावरण प्रदूशण ही नहीं, षहर सामाजिक और सांस्कृतिक प्रदूशण की भी ंगंभीर समस्या उपजा रहे हैं। लोग अपनों से मानवीय संवेदनाओं से , अपनी लोक परंपराओं व मान्यताओं से कट रहे हैं। इसकी जगह उनका झुकाव आधुनिक किस्म के बाबा-फकीरों, देवताओं और पंथों में बढ़ रहा है, जो अलग किस्म के अंधविश्वास और रूढ़ियों का कारक है।
तो क्या लोग गांव में ही रहें ? क्या विकास की उम्मीद ना करें ? ऐसे कई सवाल षहरीकरण में अपनी पूंजी को हर दिन कई गुणा होते देखने वाले कर सकते हैं। असल में हमें अपने विकास की अवधारणा को ही बदलना होगा- पक्की सड़क, अंग्रेजी दवाई स्थानीय भाशा को छो़ कर अं्रग्रेजी का प्रयोग, भोजन व कपड़े का पाश्चात्यीकरण असल में विकास नहीं है। यदि कोई चमड़े का काम करने वाला है, वह अपने काम को वैज्ञानिक तरीके से करना सीखता है, आपे श्रम की वास्तविक कीमत वसूलने के प्रति जागरूक होता है, अपने समान सामाजिक अधिकार के प्रति सचेत हो जाता है तो जरूरी नहीें है कि वह गावं में अपने हाथ के काम को छेाड़ कर षहर मे ंचपरासी या दैनिक मजदूर की नौकरी कर संकरी गलियों की गंदी झुगियों में रहे।  इंसान की क्षमता, जरूरत और योग्यता के अनुरूप उसे अपने मूल स्थान पर अपने सामाजिक सरोकारों के साथ जीवचनयापन का  हक मिले, यदि विकास के प्रतिमान ऐसे होंगे तो षहर की ओर लोगों का पलायन रूकेगा। इससे हमारी धरती को कुछ राहत मिलेगी।



पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060


River front is killing Gomti In Lucknow

कभी गोमती लखनऊ के बाशिंदों के जीवन-जगत का मुख्य आधार हुआ करती थी। सूर्य की अस्ताचलगामी किरणों इस नदी की जलनिधि से परावर्तित होकर पूरे शहर को सुनहरे लाल रंग से सराबोर कर देती थीं। लखनऊ में गोमती के बहाव की दिशा पूर्व-पश्चिम है सो डूबते सूरज की किरणों का सीधा परावर्तन होता है। लेकिन रिवर फ्रंट के नाम पर जैसे ही नदी को बांधा, गोमती गंदा नाला बन कर रह गई है। नदी में पानी कम और काई अधिक दिखाई देती है। सूरज की रोशनी वही है, उसके अस्त होने की दिशा भी वही है, लेकिन शाम-ए-अवध का सुनहरा सुरूर नदारद है ।
पीलीभीत से 32 किमी दूर पूर्व दिशा में ग्राम बैजनाथ की फुल्हर झील गोमती का उद्गम स्थल है। करीब 20 किमी तक इसकी चौड़ाई किसी छोटे से नाले सरीखी संकरी है, जहां गरमियों में अक्सर पानी नाममात्र होता है। फिर इसमें गैहाई नाम की छोटी सी नदी मिलती है और एक छिछला जल-मार्ग बन जाता है। उद्गम से 56 किमी का सफर तय करने के बाद जब इसमें जोकनई नदी मिलती है तब इसका पूरा रूप निखर आता है। शाहजहांपुर और खीरी होकर यह आगे बढ़ती है। मुहमदी से आगे इसका स्वरूप बदल जाता है और इसका पाट 30 से 60 मीटर चौड़ा हो जाता है। जब यह नदी लखनऊ पहुंचती है तो इसके तट 20 मीटर तक ऊंचे हो जाते हैं। फिर यह बाराबंकी, सुल्तानपुर और जौनपुर जिलों से गुजरती हुई जौनपुर के करीब सई नदी में मिल जाती है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार गोमती नदी लखनऊ आने तक काफी हद तक निर्मल रहती है। लेकिन लखनऊ के बाद इसमें ‘डी’ व ‘ई’ स्तर का प्रदूषण रहता है। बोर्ड के मानदंडों के मुताबिक ‘डी’ स्तर का पानी केवल वन्य जीवों और मछली पालन योग्य होता है, जबकि ‘ई’ स्तर के पानी को मात्र सिंचाई, औद्योगिक शीतकरण व नियंत्रित कचरा डालने लायक माना जाता है। वैसे गोमती नदी में प्रदूषण की शुरुआत लखनऊ से 50 किमी पहले सीतापुर जिले के भट्टपुर घाट से हो जाती है। यहां गोमती की एक प्रमुख सहायक नदी सरिया इसमें आकर मिलती है। सरिया के पानी में सीतापुर जिले में स्थित शक्कर और शराब के कारखानों का प्रदूषित स्त्रव होता है। जैसे-तैसे गोमती लखनऊ तक शुद्ध हो पाती है, लेकिन इस राजधानी शहर में पहुंचते ही यह नाले के स्वरूप में आ जाती है। करीब 28 लाख आबादी वाले इस शहर का लगभग 1,800 टन घरेलू कचरा और 33 करोड़ लीटर गंदा पानी हर रोज गोमती में घुलता है। लखनऊ में बीकेटी से इंदिरा नहर तक कुल 28 नाले नदी में गिरते हैं।
लगभग 1,500 करोड़ रुपये खर्च करके महानगर के साढ़े आठ किलोमीटर में गोमती को संवारने की योजना ने गोमती को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। गोमती किसी ग्लेशियर से निकलने वाली नदी नहीं है, इसका उद्गम व संवर्धन भूजल से ही होता है। रिवर फ्रंट के नाम पर गोमती की धारा को संकरा कर दिया गया। इसके दोनों तरफ कंक्रीट की दीवार बना दी गई। जाहिर है कि इस दीवार को टिकाकर रखने के लिए गहराई में भी दीवार उतारी गई होगी। हर नदी के तट की मिट्टी, उसकी नमी, उसके लिए ऑक्सीजन उपजाती है, उसके पानी को शुद्ध करती है। गोमती को घेर कर खड़ी दीवारों ने नदी के जीवन को ही समाप्त कर दिया। शहर के भीतर स्थित कई कारखाने बगैर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए अपशिष्ट निकास गोमती में कर रहे हैं।
साबरमती : इसी प्रकार गुजरात के अहमदाबाद में साबरमती नदी के दोनों किनारों पर कंक्रीट की दीवार खड़ी करके जिस तरह से रिवर फ्रंट बनाया गया है उससे नदी का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ रहा है। हमें नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बचाए रखना होगा ताकि उसके अस्तित्व को कायम रखा जा सके।

बुधवार, 22 जनवरी 2020

water scarcity in rural India



कुप्रबंधन की भेंट चढ़ती भूजल योजनाएं

पंकज चतुर्वेदी

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर शुरू ‘अटल भूजल योजना’ में छह हजार करोड़ से छह राज्यों के हर गांव-घर तक पानी पहुंचाने की चुनौती बेहद जटिल है। यह समझना होगा कि भूजल प्यास बुझाने का जरिया नहीं हो सकता। आज 16 करोड़ से अधिक भारतीयों के लिए सुरक्षित पीने के पानी की आस अभी बहुत दूर है। आज भी देश की कोई 17 लाख ग्रामीण बसावटों में से लगभग 78 फीसदी में पानी की न्यूनतम आवश्यक मात्रा तक पहुंच है।
यह भी विडंबना है कि अब तक परियोजना पर 89,956 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने के बावजूद, सरकार परियोजना के लाभों को प्राप्त करने में विफल रही है। आज महज 45,053 गांवों को नल-जल और हैंडपंपों की सुविधा मिली है, लेकिन लगभग 19,000 गांव ऐसे भी हैं जहां साफ पीने के पानी का कोई नियमित साधन नहीं है। हजारों बस्तियां ऐसी हैं जहां लोग कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाते हैं। यह आंकड़े भारत सरकार के पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के हैं।

अगस्त, 2018 में सरकार की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया था कि सरकारी योजनाएं प्रतिदिन प्रति व्यक्ति सुरक्षित पेयजल की दो बाल्टी प्रदान करने में विफल रही हैं। भारत सरकार ने प्रत्येक ग्रामीण व्यक्ति को पीने, खाना पकाने और अन्य बुनियादी घरेलू जरूरतों के लिए स्थायी आधार पर गुणवत्ता मानक के साथ पानी की न्यूनतम मात्रा उपलब्ध करवाने के इरादे से राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम सन‍् 2009 में शुरू किया था। इसमें हर घर को परिशोधित जल घर पर ही या सार्वजनिक स्थानों पर नल द्वारा मुहैया करवाने की योजना थी। इसमें सन‍् 2022 तक देश में शत प्रतिशत शुद्ध पेयजल आपूर्ति का संकल्प था। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट बानगी है कि कई हजार करोड़ खर्च करने के बाद भी यह परियोजना सफेद हाथी साबित हुई हैं।
हर जगह यह बात सामने आई है कि स्थानीय समाज से सलाह लिए बगैर, स्थानीय पारंपरिक स्रोतों में जल की उपलब्धता पर विचार किए बगैर योजनाएं बनाई गई और जब वे पूरी हुईं तो उनका इस्तेमाल ही नहीं हो सका। उदाहरण के लिए पारंपरिक कुओं को असुरक्षित पेयजल स्रोत घोषित कर दिया गया जबकि महज मामूली साधन व्यय कर इन कुओं को सुरक्षित बनाया जा सकता था। सारी योजना ऊंची टंकी खड़ी करने और पाइप डालने तक सीमित रह गई। यह सोचा ही नहीं गया कि गांव में जब बिजली की आपूर्ति ही नियमित नहीं है तो पानी टंकी में पहुंचेगा कैसे और वितरित कैसे होगा।

ग्रामीण भारत में पेयजल मुहैया करवाने के लिए 10वीं पंचवर्षीय योजना (2002-2007) तक 1,105 अरब रुपये खर्च किये जा चुके थे। इसकी शुरुआत 1949 में हुई जब 40 वर्षों के भीतर 90 प्रतिशत जनसंख्या को साफ पीने का पानी उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया। इसके ठीक दो दशक बाद 1969 में यूनिसेफ की तकनीकी मदद से करीब 255 करोड़ रुपये खर्च कर 12 लाख बोरवेल खोदे गए और पाइप से पानी आपूर्ति की 17,000 योजनाएं शुरू की गईं। उसके बाद 2009 से दूसरी योजना प्रारंभ हो गई। हजारों करोड़ रुपये और दसियों योजनाओं के बावजूद आज भी कोई करीब 3.77 करोड़ लोग हर साल दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमार पड़ते हैं। लगभग 15 लाख बच्चे दस्त से अकाल मौत मरते हैं। अंदाजा है कि पीने के पानी के कारण बीमार होने वालों से 7.3 करोड़ कार्य-दिवस बर्बाद होते हैं। इन सबसे भारतीय अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 39 अरब रुपये का नुकसान होता है।

गौरतलब है कि ग्रामीण भारत की 85 फीसदी आबादी अपनी पानी की जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है। एक तो भूजल का स्तर लगातार गहराई में जा रहा है, दूसरा भूजल एक ऐसा संसाधन है जो यदि दूषित हो जाए तो उसका निदान बहुत कठिन होता है। दिल्ली से सटे मेरठ मंडल के कई हजार हैंडपंपों में हिंडन नदी के जहर का असर हो जाने के कारण उखाड़ फेंकने के आदेश एनजीटी ने कोई तीन साल पहले दिए थे। चूंकि प्रशासन वहां पानी की केाई वैकल्पिक व्यवस्था कर नहीं पाया सो स्थानीय समाज जहर के वाकिफ होते हुए भी इन हैंडपंपों को उखाड़ने नहीं दे रहा।

यदि देश की जल कुंडली देखें तो नदी, तालाब, जोहड़, बावड़ी और कई अन्य पारंपरिक जल स्रोत पर्याप्त संख्या में हैं और ये बरसात की हर बूंद को सहेज कर हमारी आनी वाली 2050 तक की जल-मांग को पूरा करने में सक्षम हैं। आज जरूरत इस बात की है कि सुरक्षित जल मुहैया करवाने की योजनाओं का पैसा टंकी बनाने के बनिस्बत जल संसाधनों को निरापद बनाने, उनके जल ग्रहण क्षेत्र व आगम क्षेत्रों को अविरल रखने, जैसे कार्य पर व्यय करे। इससे भूजल तंदुरुस्त होगा।कुप्रबंधन की भेंट चढ़ती भूजल योजनाएं

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

Hindon river now effecting health of Delhi

अब दिल्ली को बीमारी बांट रहा है ंिहंडन का जहरीला जल
पंकज चतुर्वेदी

राजधानी दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कभी जीवन-रेखा रहीं हिंडन व उनकी सखा-सहेली कृश्णा और काली नदियों के हालात अब इतने खराब हो गए है कि उनका जहर अब दिल्ली के लोगों की सेहत भी खराब हो रही है। सहारनपुर, बागपत, मेरठ, षामली, मुजफ्फरनगर और गाजियाबाद के ग्रामीण अंचलों में नदियों ने भूजल को भी गहरे तक विशेैला कर दिया है। तीन साल पहले अक्तूबर 2016 में ही एनजीटी ने नदी के किनारे के हजारों हैंडपंप बंद कर गांवों में पानी की वैकल्पिक व्यवस्था का आदेश दिया था। कुछ हैंडपंप तो बंद भी हुए लेकिन विकल्प ना मिलने से मजबूर ग्रामीण वही जहर पी रहे हैं। एनजीटी ने यह भी यह मान ही लिया है कि पानी को प्रदूशण से बचाने के लिए धरातल पर कुछ काम हुआ ही नहीं।
हिंडन नदी भले ही उत्तर प्रदेश में बहती हो और उसके विषमय जल ने गांव-गांव में तबाही मचा रखी हो, लेकिन अब दिल्ली भी इसके प्रकोप से अछूती नहीं है। जानना जरूरी है कि हिंडन के पानी से सिंची गई फसल, फल-सब्जी, आदि दिल्ली की जरूरतों को पूरा करती है। हिंडन के हालात इतने खराब हैं कि एक तरफ एनजीटी राज्य सरकार को ख्ीिंचती रहती है तो दूसरी तरफ राज्य सरकार बैठकें व योजनाओं की बात करती है लेकिन जमीन पर हालात सुधरने की जगह बदतर ही हो रहे हैं। अगस्त 2018 में एनजीटी के सामने बागपत जिले के गांगनोली गांव के बारे में एक अध्ययन प्रस्तुत किया गया जिसमें बताया गया कि गांव में अभी तक 71 लोग कैंसर के कारण मर चुके हैं और 47 अन्य अभी भी इसकी चपेट में हैं। गांव में हजार से अधिक लोग पेट के गंभीर रोगों से ग्रस्त हैं और इसका मुख्य कारण हिंडन  व कृश्णा का जहर ही है। इस पर एनजीटी ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जिसकी रिपोर्ट  फरवरी 2019 पेश की गई। इस रिपोर्ट में बताया गया कि हिंडन व उसकी सहायक नदियों के प्रदूषण के लिए मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर जिलों में अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट जिम्मेदार हैं। एनजीटी ने तब आदेश दिया कि यह सुनिश्चित किया जाए कि हिंडन का जल कम से कम नहाने काबिल तो हो। मार्च 2019 में कहा गया कि इसके लिए एक ठोस कार्ययोजना छह महीने में पेश की जाए। समय सीमा निकल गई लेकिन बात कागजी घोड़ो ंसे आगे बढ़ी ही नहीं।
गौर करने वाली बात है कि हिंडन का जहर अब दिल्ली के लिए भी काल बन रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश  चूंकि गंगा-यमुना के दोआब की उपजाउ भूमि वाला है  और यहां के किसान दिल्ली की सुरसामुख आबादी की जरूरतों के लिहाज से ही अपने खेतों में फल-सब्जी, अनाज उगाते हैं। सिंचाई भी हिंडन के जहरीले पानी से ही हो रही है और इसका जानलेवा असर इन खाद्य पदाथों के जरिये दिल्ली वालों को भी बीमारी बांट रहा है। अब यहां खेती नदी के जल से हीे रही हो या फिर भूजल से, भले ही कोई दावा करे कि उनकी खेती पूरी तरह रसायन-मुक्त या आर्गेंनिक है, हर तरह के पानी में इतना जहर घुला हुआ है कि उससे उपजे उत्पाद में उसका असर गहराई तक हो रहा है।
ऐसी कई रिपोर्ट सरकारी बस्तों में जज्ब है जिसमें कहा गया है कि अगर हिंडन नदी के पानी को पानी नहीं बल्कि जहरीले रसायनों का मिश्रण कहना बेहतर होगा। पानी में आक्सीजन षून्य है। पानी में किसी भी तरह का कोई जीव-जंतु बचा नहीं है। यदि पानी में अपना हाथ डुबो दें तो इससे त्वचा रोग हो सकता है और यदि आप इसे पीते हैं तो हेपेटाइटिस या कैंसर जैसी कई समस्याएं हो सकती हैं। हिंडन को सीवर से रिवर बनाने के लिए भले ही एनजीटी खूब आदेश दे लेकिन नीति-निर्मातओं को हिंडन की मूल समस्याओं को समझना होगा। एक तो इसके नैसर्गिक मार्ग को बदलना,दूसरा इसमें षहरी व औद्योगिक नालों का मिलना, तीसरा इसके जलग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमण- इन तीनों पर एकसाथ काम किए बगैर नदी का बचना मुश्किल है।
दिक्कत यह भी है कि कतिपय कारखानों का बचाव कर रही सरकार मानने को तैयार नहीं है कि हिंडन का पानी जहर से बदतर है।  कुछ साल पहले  देश की नदियों में प्रदूषण की जांच में जुटे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने उत्तर प्रदेश की हिंडन नदी के पानी को नहाने लायक भी नहीं पाया है। बोर्ड ने यह जानकारी राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) के तत्कालीन प्रमुख स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ को सौंपे हलफनामे में दी थी। सीपीसीबी ने प्रदेश के सहारनपुर, मेरठ और गाजियाबाद में नदी के पानी की जांच की। हलफनामे में बताया कि नदी का पानी पर्यावरण अधिनियम, 1986 के तहत तय नहाने के पानी के मानकों के अनुरूप नहीं है। इसके समाधान के लिए बोर्ड ने ठोस अवशिष्ट को नदी किनारे और नदी में न फेंकने की हिदायत दी है। इसके अलावा बोर्ड ने कहा है कि अशोधित कचरा नदी में न फेंका जाए बल्कि नगर पालिका अवशिष्ट प्रबंधन अधिनियम, 2000 के तहत इसकी सही व्यवस्था की जाए। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंडन नदी के पानी को जहरीला बताए जाने के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति के दावे को झुठला दिया है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण समिति ने कहा है कि नदी के पानी में कोई जहरीला पदार्थ नहीं है। जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति ने ट्रिब्यूनल में स्वीकार किया था कि सहारनपुर से लेकर गौतमबुद्ध नगर तक हिंडन नदी का पानी है दूषित हो गया है।
हिंडन नदी जहां भी षहरी क्षेत्रों से गुजर रही है, इसके जल-ग्रहण क्षेत्र में बहुमंजिला आवास बना दिए गए और इन कालोनियों के अपशिश्ट भी इसी में जाने लगे हैं। नए पुल, मेट्रो आदि के निर्माण में हिंडन को सुखा कर वहां कंक्रीट उगाने में हर कानून को निर्ममता से कुचला जाता रहा । आज भी गाजियाबाद जिले में हिंडन के तट पर कूड़ा फैंकने, मलवा या गंदा पानी डालने से किसी को ना तो भय है ना ही संकोच। अब नदी केजहर का दायरा विस्तारित होता जा रहा है और उसकी जद में वे सभी भी आएंगे जो नदी को जहर बनाने के पाप में लिप्त हैं।



शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

Polluted Sambhal lake cause death of thousnads migrant birds

 साम्भर जील में प्रदूषण के कारण मरे हज़ारो प्रवासी पंछी 


वे हजारो किलोमीटर दूर से जीवन की उम्मीद के साथ यहां आए थे, क्योंकि उनकी पिछली कई पुश्तें, सदियों इस मौसम में यहां आती थीं। इस बार वे सात संमंदर तो पार कर गए लेकिन जैसे ही इस खारे पानी की झील पर बसे, उनके पैर, पंख सभी ने काम करना बंद कर दिया और देखते ही देखते हजारों की संख्या में उनकी लाशंे बिछने लगीं। जब भारत की जनता दीपावली के माध्यम से अपने घर में सुख-समृद्धि की कामना का पर्व मना रही थी , लगभग उसी समय दूर देश से आए इन मेहमानों के दुर्दिन षुरू हो गए थे। एक अनुमान है कि देश की सबसे बड़ी खारे पानी की झील कहे जाने वाली राजस्थान की सांभर झील में अभी तक 25 हजार से ज्यादा प्रवासी पंछी मारे जा चुके हैं। षुरूआत में तो पक्षियों की मौत पर ध्यान ही नहीं गया, लेकिन जब हजारों लााशें दिखीं,  दूर-दूर से पक्षी विशेशज्ञ आने ले तो पता चला कि दूर देश से आए इन मेहमानों की जान का दुश्मन उनके प्राकृतिक पर्यावास में लगातार हो रही छेड़छाड़ व बहुत कुछ जलवायूु परिवर्तन का असर भी है।

 क्यों आते हैं ये मेहमान पंक्षी
यह सभी जानते हैं कि आर्कटिक क्षेत्र और उत्तरी ध्रुव में जब तापमान षून्य से चालीस डिगरी तक नीचे जाने लगता है तो वहां के पक्षी भारत की ओर आ जाते हैं ऐसा हजारों साल से हो रहा है, ये पक्षी किस तरह रास्ता  पहचानते हैं, किस तरह हजारों किलोमीटर उड़ कर आते हैं, किस तरह ठीक उसी जगह आते हैं, जहां उनके दादा-परदादा आते थे, विज्ञान के लिए भी अनसुलझी पहेली की तरह है। इन पक्षियों के यहां आने का मुख्य उद्देश्य भोजन की तलाश, तथा गर्मी और सर्दी से बचना होता है।
 हर साल भारत आने वाले पक्षियों में साइबेरिया से पिनटेल डक, शोवलर, डक, कॉमनटील, डेल चिक, मेलर्ड, पेचर्ड, गारगेनी टेल तो उत्तर-पूर्व और मध्य एशिया से पोचर्ड, ह्विस्लिंग डक, कॉमन सैंड पाइपर के साथ-साथ फ्लेमिंगो जैसे कई पक्षी आते हैं। भारतीय पक्षियों में शिकरा, हरियल कबूतर, दर्जिन चिड़िया, पिट्टा, स्टॉप बिल डक आदि प्रमुख हैं। अपनी यात्रा के दौरान हर तरह के पंक्षी अपने हिसाब से उड़ते हैं और उनकी ऊँचाई भी वे अपने हिसाब से निर्धारित कर लेते हैं। हंस जैसे पक्षी करीब 80 किलोमीटर प्रति घण्टे के हिसाब से भी उड़ान भरते हैं, तो जो पंछी बिना रुके यात्रा करते हैं, उनकी गति मुश्किल से 10 से 20 किलोमीटर प्रति घण्टे तक होती है। वे भले ही मंद गति से उड़ते हों, लेकिन अपने ठिकाने पर पहुँचकर ही दम लेते हैं। उदाहरण के लिये ईस्टर्न गोल्डन प्लॉवर लगातार उड़कर अपने निवास स्थान से भारत तक की 3200 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी बिना रुके पूरी करता है। इस दौरान वह समुद्र भी पार करता है। पहाड़ी इलाकों में पंछी कई बार एवरेस्ट से भी ज्यादा ऊँचाई पर उड़ते हैं, वहीं समुद्री इलाके में वे बेहद नीची उड़ान भरते हैं।

सांभर झील
कभी वहां समुद्र था, धरती में हुए लगातार परिवर्तनों से रेगिस्तान विकसित हुए और इसी क्रम में भारत की सबसे विशाल खारे पानी की झील ‘सांभर’ अस्तित्व में आई।  इसका विस्तार 190 किलोमीटर,लंबाई 22.5 किलोमीटर है।  इसकी अधिकतम गहराई तीन मीटर तक है।  अरावली पर्वतमाला की आड़ में स्थित यह झील राजस्थान के तीन जिलांे- जयपुर,अजमेर और नागौर तक विस्तारित है।  सन 1990 ें इसे ‘रामसर झील’ घोषित किया गया। भले ही इस अतंरराष्ट्रीय महत्व हो लेकिन समय की मार इस झील पर भी पड़ी। सन 1996 में 5,707.62 वर्ग किलामीटर जल ग्रहण क्षेत्र वाली यह झील सन 2014 में 4700 वर्गकिमी में सिमट गई। चूंकि भारत में नमक के कुल उत्पादन का लगभग नौ फीसदी- 196000 टन नमक यहां से निकाला जाता है अतः नमक-माफिया भी यहां की जमीन पर कब्जा करता रहता है। इस विशाल झील के पपानी में खारेपन का संतुलन बना रहे, इसके लिए इसमें मैया, रूपनगढ़, खारी, खंडेला जैसी छोटी नदियों से मीठा पानी लगातार मिलता रहता है तो उत्तर में कांतली, पूर्व में बांदी, दक्षिण में मासी और पश्चिम में नूणी नदी में इससे बाहर निकला पानी जाता रहा है।
राजशाही के दिनों में जयपुर और जोधपुर की सरकारें यहां से निकले नमक की तिजारत करती थीं। आजादी के बाद सांभर साल्ट लिमिटेड को नमक निकालने का जिम्मा दिया गया। सर्दी शुरू होते ही दूर देश के 83 से ज्यादा प्रजाति के पंक्षियों का यहां डेरा हो जाता है। कभी इसे फ्लेमिंगो की पसंदीदा प्रजनन स्थली भी माना जाता था।

पक्षियों की मौत
दीपावली बीती ही थी कि हर साल की तरह सांभर झील में विदेशी मेहमानों के झुंड आने शुरू हो गए। वे नए परिवेश में खुद को व्यवस्थित कर पाते, उससे पहले ही उनकी गर्दन लटकने लगी, उनके पंख बेदम हो गए, वे न तो चल पा रहे थे और न ही उड़ पा रहे थे। लकवा जैसी बीमारी से ग्रस्त पक्षी तेजी से मरने लगे। जब प्रशासन चेतता दस हजार से अधिक पक्षी मारे जा चुके थे। राजस्थान पशु चिििकत्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर(राजुवास) की टीम सबसे पहले पहुंची। फिर एनआईएचएसडी, भोपाल का दल आया व उसने सुनिश्चित कर दिया कि यह मौत बर्ड फ्लू के कारण नहीं हैं। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) बरेली के एक बड़े दल ने मृत पक्षी के साथ-साथ वहां के पानी व मिट्टी के नमूने लिए और गहन जांच कर बताया कि  मौत का कारण ‘‘एवियन बॉटुलिज़्म ’’ नामक बीमारी है। यह बीमारी क्लोस्ट्रिडियम बॉट्यूलिज्म नाम के बैक्टीरिया की वजह से फैलती है। एवियन बॉटुलिज़्म को 1900 के दशक के बाद से जंगली पक्षियों में मृत्यु दर का एक प्रमुख कारण माना गया है। यह बीमारी आमतौर पर मांसाहारी पक्षियों को ही होती है। इसके वैक्टेरिया से ग्रस्त मछली खाने या इस बीमारी का शिकार हो कर मारे गए पक्षियों का मांस खाने से इसका विस्तार होता है।  सांभर झील में भी यही पाया गया कि मारे गए सभी पक्षी मांसाहारी प्रजाति के थे।
और भी कई कारण हैं पक्षियों के मरने के
हालांकि अधिकांश पक्षी वैज्ञानिकों की राय में इतनी बड़ी संख्या में पक्षियों के मरने का कारण एवियन बॉटुलिज़्म ही है, लेकिन बहुत से वैज्ञानिक  इसके पीछे ‘हाईपर न्यूट्रिनिया’ को भी मानते हैं।  नमक में सोडियम की मात्रा ज्यादा होने पर,  पक्ष्यिों के तंत्रिका तत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। वे खानापीना छोड़ देतें हैं व उनके पंख और पैर में लकवा हो जाता है। कमजांेरी के चलते उनके प्राण निकल जाते हैं। माना जा रहा है कि पक्षियों की प्रारंभिक मौत  आईपर न्यूट्रिनिया से ही हुई। बाद में उनमें एवियन बॉटुलिज़्म के जीवाणु विकसित हुए और ऐसे मरे पक्षियों को जब अन्य पंछियो ने भक्षण किया तो बड़ी संख्या मंे उनकी मौत हुई।
वैसे खारे पानी में प्रदूषण बढ़ने से ‘माइक्रोसिस्टिल शैवाल’ के विशैले हाने से भी पक्षियों को लकवा हाने के संभावना रहती है। सनद रहे एवियन बॉटुलिज़्म का कोई वैक्सीन या इलाज नहीं है। इससे बचाव ही एकमात्र रास्ता है।
 सांभर झील के पर्यावरण से छेड़छाड़
सांभर झील लंबे समय से लापरवाही का शिकार रही है। एक तो सांभर साल्ट लिमिटेड ने नमक निकालने के ठेके कई कंपनियों को दे दिए। ये मानकों की परवाह किए बगैर गहरे कुंए और झील के किनारे दूर तक नमकीन पानी एकत्र करने की खाई बना रहे हैं। फिर परिशोधन के बाद गंदगी को इसी में डाल दिया जाता है। विशाल झील को छूने वाले किसी भी नगर कस्बे में घरों से निकलने वाले गंदे पानी को परिशेाधित करने की व्यवस्था नहीं है औरह जारों लीटर गंदा-रासायनिक पानी हर दिन इस झील में मिल रहा है।
इस साल औसत से काई 46 फीसदी ज्यादा पानी बरसा। इससे झील के जल ग्रहण क्षेत्र का विस्तार हो गया।  चूंंिक इस झील में नदियों से मीठा पानी  की आवक और अतिरिक्त खारे पानी को नदियों में मिलने वाले मार्गों पर भयंकर अतिक्रमण हो गए हैं, सो पानी में क्षारीयता का स्तर नैसर्गिक नहीं रह पाया। भारी बरसात के बाद यहां तापमान फिर से 27 डिगरी के पार चला गया। इससे पानी को क्षेत्र सिंकुड़ा व उसमें नमक की मात्रा बढ़ गई इसका असर झील के जलचरों पर भी पड़ा। हो सकता है कि इसके कारण मरी मछलियों को दूर देश से थके-भूखे आए पक्षियों ने खा लिया हो व उससे एवियन बॉटुलिज़्म के बीज पड़ गए हों। यह सभी जनते हैं कि एवियन बॉटुलिज़्म का प्रकोप तभी होता है जब विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक कारक समवर्ती रूप से होते हैं। इसमें आम तौर पर गर्म पानी के तापमान, एनोक्सिक (ऑक्सीजन से वंचित) की स्थिति और पौधों, शैवाल या अन्य जलचरों के प्रतिकूल परिस्थिति का निर्माण आदि प्रमुख हैं।  यह सर्वविदित है कि धरती का तापमान बढ़ना और जलवायु चक्र में बदलाव वैश्विक समस्या है। राजस्थान जैसे ‘‘चरम ठंउ व गरमी’ वाले इलाकों में अचानक भारी बरसात ऐस हालात बना सकते हैं।
वैसे बरेली के आईवीआरआई की जांच में अच्छी बरसात के चलते सांभर के पानी में नमक घटने व उससे जल की पीएच कीमत में बदलाव तथा उससे पानी में आक्सीजन की मात्रा महज चार मिलीग्राम प्रति लीटर लीटर से भी कम रह जाने के चलते यह त्रासदी उपजने की बात कही गई है।
यह भी जानना जरूरी है कि सांभर साल्ट लिमिटेड ने इस झील के एक हिस्से को एक रिसार्ट को दे दिया है। यहां का सारा गंदा पानी इसी झील में मिलाया जाता है। इसके अलावा कुछ सौर उर्जा परियेाजनाएं भी हैं। फिर तालाब की मछली का ठेका दिया हुआ है। ये विदेशी पक्षी मछली ना खा लें, इके लिए चौकीदार लगाए गए हैं। जब पंक्षी को ताजा मछली नहीं मिलती तो वह झील में तैर रही गंदगी, मांसाहारी भेाजन के अपशिष्ठ या कूड़ा खाने लगता है। यह बातें भी  पक्षियों के इम्यून सिसटम के कमजोर होने वा उनके सहजता से विषाणु के शिकार हो जाने का कारक हैं। वैसे भी सांभर झील में मरे पक्ष्यिों को बेहद लपरवाही से वहीं आसपास गाड़ दिया गया है। बिल्ली, कुत्ते व अन्य जानवरों के लिए उन्हें खोद कर ले जाना सरल है। यदि इन मरे पक्षियो में पड़ गए मीगेट्स(सफेद इल्ली जैसे कीड़े जो आमतौर पर जानवरों में घाव सड़ने पर होते हैं) किसी स्वास्थय पक्षी ने खा लिया तो एवियन बॉटुलिज़्म एक महामारी के रूप में दूर-दूर तक फैल जाएगा।
पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील पक्षी उनके प्राकृतिक पर्यावास में अत्यधिक मानव दखल, प्रदूषण, भोजन के अभाव से भी परेशान है। सनद रहे हमारे यहां साल-दर-साल प्रवासी पक्षियों  की संख्या घटती जा रही है। प्रकृति संतुलन और जीवन-चक्र में प्रवासी पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनका इस तरह से मारा जाना असल में अनिष्टकारी है।



बुधवार, 25 दिसंबर 2019

Solar eclipse ; time for research , not fear

भय नहीं ज्ञान काल है ग्रहण


आज का सूर्य ग्रहण कई मायनों में महत्वपूर्ण है। एक तो यह वलयाकार ग्रहण है, अर्थात इसमें चंद्रमा सूर्य को इस तरह ढंक लेगा कि सूर्य एक अंगूठी की तरह दिखेगा। दूसरा इस ग्रहण की अवधि बहुत है, भारत में लगभग दो घंटा चालीस मिनट, लेकिन कुल अवधि साढ़े तीन घंटे से ज्यादा। एक अजीब विडंबना है कि ब्रह्मांड की अलौकिक घटना को भारत में ही नहीं, दुनिया के अनेक हिस्सों में अनिष्टकारी घटना के रूप में जाना जाता है। आज जब मानव चांद पर झंडे गाड़ चुका है, ग्रह-नक्षत्रों की हकीकत सामने आ चुकी है, ऐसे में पूर्ण सूर्यग्रहण की घटना प्रकृति के अनछुए रहस्यों के खुलासे का सटीक मौका है।
पृथ्वी और चंद्रमा दोनों अलग-अलग कक्षाओं में अपनी धुरी के चारों ओर घूमते हुए सूर्य के चक्कर लगा रहे हैं। सूर्य स्थिर है। पृथ्वी और चंद्रमा के भ्रमण की गति अलग-अलग है। सूर्य का आकार चंद्रमा से 400 गुणा बड़ा है। लेकिन पृथ्वी से सूर्य की दूरी, चंद्रमा की तुलना में बहुत अधिक है। इस निरंतर परिक्रमाओं के दौर में जब सूरज और धरती के बीच चंद्रमा आ जाता है तो धरती से ऐसा दिखता है, जैसे सूर्य का एक भाग ढंक गया हो। होता यह है कि पृथ्वी पर चंद्रमा की छाया पड़ती है। इस छाया में खड़े होकर सूर्य को देखने पर ‘पूर्ण ग्रहण’ सरीखे दृश्य दिखते हैं। परछाई वाला क्षेत्र सूर्य की रोशनी से वंचित रह जाता है, सो वहां दिन में भी अंधेरा हो जाता है।
सूर्य प्रकाश का एक विशाल स्त्रोत है, अत: जब चंद्रमा इसके रास्ते में आता है तो इसकी दो छाया निर्मित होती है। पहली छाया को ‘अंब्रा’ या ‘प्रछाया’ कहते हैं। दूसरी छाया ‘पिनेंब्रा’ या ‘प्रतिछाया’ कहलाती है। इन छायाओं का स्वरूप कोन की तरह यानी शंकु के आकार का होता है। अंब्रा के कोन की नोक पृथ्वी की ओर तथा पिनेंब्रा की नोक चंद्रमा की ओर होती है। जब हम अंब्रा के क्षेत्र में खड़े होकर सूर्य की ओर देखते हैं तो वह पूरी तरह ढंका दिखता है। यही स्थिति पूर्ण सूर्य ग्रहण होती है। वहीं यदि हम पिनेंब्रा के इलाके में खड़े होकर सूर्य को देखते हैं तो हमें सूर्य का कुछ हिस्सा ढंका हुआ दिखेगा। यह स्थिति ‘आंशिक सूर्य ग्रहण’ कहलाती है।
सूर्य ग्रहण का एक प्रकार और है, जो सबसे अधिक रोमांचकारी होता है- इसमें सूर्य एक अंगूठी की तरह दिखता है। जब चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की दूरी इतनी कम हो जाए कि पृथ्वी तक पिनेंब्रा की छाया तो पहुंचे, लेकिन एंब्रा की नहीं। तब धरती पर पिनेंब्रा वाले इलाके के लोगों को ऐसा लगेगा कि काले चंद्रमा के चारों ओर सूर्य किरणों निकल रही है। इस प्रकार का सूर्य ग्रहण ‘एनुलर’ या वलयाकार कहलाता है।
यह समझना मुश्किल नहीं है कि ग्रहण के समय सूर्य देवता राहू का ग्रास कतई नहीं बनते हैं। जैसे-जैसे चंद्रमा सूर्य को ढंकता है, वैसे-वैसे पृथ्वी पर पहुंचने वाली सूर्य-प्रकाश की किरणों कम होती जाती हैं। पूर्ण सूर्य ग्रहण होने पर सूर्य की वास्तविक रोशनी का पांच लाख गुणा कम प्रकाश धरती तक पहुंच पाता है। एक भ्रम की स्थिति बनने लगती है कि कहीं शाम तो नहीं हो गई। तापमान भी कम हो जाता है। पशु-पक्षियों के पास कोई घड़ी तो होती नहीं है, सो अचानक सूरज डूबता देख उनमें बेचैनी होने लगती है।
पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के एक सीध में आने और हटने पर चार बिंदु दृष्टिगोचर होते हैं। इन्हें ‘संपर्क बिंदु’ कहा जाता है। जब सूर्य खग्रास की स्थिति में पहुंचने वाला होता है, तब कुछ लहरदार पट्टियां दिखती हैं। यदि जमीन पर एक सफेद कागज बिछा कर देखा जाए तो इन पट्टियों को देखा जा सकता है। जब चंद्रमा, सूरज को पूरी तरह ढंक लेता है तब सूर्य के चारों ओर हलकी वलयाकार धागेनुमा संरचनाएं दिखाई देती है। चंद्रमा के धरातल पर गहरी घाटियां हैं। इन घाटियों के ऊंचाई वाले हिस्से, सूरज की रोशनी को रोकते हैं, ऐसे में इसकी छाया कणिकाओं के रूप में दिखती है। यह स्थिति खग्रास के शुरू व समाप्त होते समय देखी जा सकती है।
पूर्ण सूर्य ग्रहण को यदि दूरबीन से देखा जाए तो चंद्रमा के चारों ओर लाल-नारंगी लपटें दिखेंगी। इन्हें ‘सौर ज्वाला’ कहते हैं। अभी तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार 18 अगस्त 1868 और 22 जनवरी 1898 को भारत में पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा गया था। फिर 16 फरवरी 1980 और 24 अक्टूबर 1995 और 11 अगस्त 1999 को सौर मंडल का यह अद्भुत नजारा देखा गया था।
वैसे तो कई टीवी चैनल पूर्ण सूर्य ग्रहण का सीधा प्रसारण करेंगे, पर अपने छत से इसे निहारना जीवन की अविस्मरणीय स्मृति होगा। यह सही है कि नंगी आखों से ग्रहण देखने पर सूर्य की तीव्र किरणों आंखों को बुरी तरह नुकसान पहुंचा सकती है। इसके लिए ‘मायलर-फिल्म’ से बने चश्मे सुरक्षित माने गए हैं। पूरी तरह एक्सपोज की गई ब्लैक एंड व्हाइट कैमरा रील या आफसेट प्रिंटिंग में प्रयुक्त फिल्म का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन फिल्मों को दुहरा-तिहरा करें। इससे 40 वॉट के बल्ब को पांच फीट की दूरी से देखें, यदि बल्ब का फिलामेंट दिखने लगे तो समझ लें कि फिल्म की मोटाई को अभी और बढ़ाना होगा। वेल्डिंग में इस्तेमाल 14 नंबर का ग्लास या सोलर फिल्टर फिल्म भी सुरक्षित तरीके हैं। और हां, सूर्य ग्रहण को अधिक देर तक लगातार कतई ना देखें, और कुछ सेकेंड के बाद आंख झपकाते रहें। सूर्य ग्रहण के दौरान घर से बाहर निकलने में कोई खतरा नहीं है। यह पूर्ण सूर्य ग्रहण तो हमारे वैज्ञनिक ज्ञान के भंडार के कई अनुत्तरित सवालों को खोजने में मददगार होगा।


आज प्रात: काल ही सूर्य ग्रहण है। इस प्राकृतिक घटना को लेकर पूर्व काल से ही बहुत मिथक फैला है लोगों के बीच जिसकी वास्तविकता को समझने की जरूरत है

गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

NRC. CAA and hidden agenda


नागरिकता पंजी, नागरिकता संशोधन और छुपा अजेंडा
पंकज चतुर्वेदी
     
जाने माने गायक अदनान सामी अपने व्यावसायिक कार्य से 1999 में भारत आये और हर बार 5 साल के वीजा के साथ आते रहे। परवेज मुशर्रफ उनके पारिवारिक मित्र थे। उनके जरिये उनकी वहां सियासत में मजबूत पकड़ भी थी। सामी के वालिद पाकिस्तान एयर फोर्स में थे और सन 65 71 में उन्होंने भारत पर बम बरसाए थे। अदनान सामी वर्क परमिट पर भारत आते रहे। यूपीए उन्होंने दो बार भारत की नागरिकता के लिए अर्जी दी लेकिन यू पी ए सरकार ने उसे रिजेक्ट कर दिया। पहली अर्ज़ी ख़ारिज होने के बाद मार्च 2015 में अदनान ने दोबारा भारतीय नागरिकता के लिए अपील दायर की थी. अगस्त 2015 में उनके वर्क वीज़ा के ख़त्म होने के बाद भी भारत ने उन्हें अनिश्चितकाल तक के लिए यहां रहने की इजाज़त दे दी थी। और उसके बाद अक्टूबर 2015 केंद्र सरकार ने उनकी बीबी और बेटी को भारतीय नागरिकता दे दी गयी . पाकिस्तान में जिसकी पुश्तें हैं, जो भारत के दुश्मन मुशर्रफ का करीबी है, जिसे किसी तरह की प्रताड़ना नहीं थी----और हां, मुसलमान भी है, को चटपट नागरिकता दे दी। जाहिर है कि भारत में पहले से ही विदेश से आये लोगों को नागरिकता देने का कानूनी प्रावधान पहले से था , ऐसे में पुराने कानून में संशोधन कर केवल मुसलमानों को बाहर रखने से आम लोगों के मन में शक तो उठता ही ही है , यही नहीं यदि इसे राष्ट्रीय नागरिकता पंजी अर्थात एन आर सी  के साथ  मिला लें और असम में संपन्न एनआरसी  के नतीजों के साठ रख कर देखें तो शको- शुबह की गुन्जायिश भी बढ़ जाती है . 
      यह कानून कहता कुछ है, इसको लाने के इरादे कुछ और हैं और इसके परिणाम और कुछ होंगे। गौरतलब है कि सन २०१९  से दिसंबर २०१९ तक कूल ४३१ अफगान और २३०७ पाकिस्तानी शरणार्थियों को भारत  की नागरिकता दी गयी . बीते पांच सालों में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश के  ५६० मुसलमानों को भारत का बाशिंदा बना लिया गया, लेकिन इनमें वह तस्लीमा नसरीन नहीं है  जो असल में  सांप्रदायिक नफरत के कारण बंगलादेश से निर्वासित हैं . इसमें कोई शक नहीं कि पाकिस्तान के आंचलिक क्षेत्रों में हिंदुओं की हालत ख़राब है और कुछ हज़ार वहां से प्रताड़ित हो कर आये और उन्हें भारत की नागरिकता देना चाहिए। इसके लिए हमारे पास पहले से कानून थे। बीते साढ़े पांच साल में सरकार ने ऐसी हज़ारों अर्जियों पर विचार क्यों नहीं किया? यह अब किसी से छुपा नहीं हैं कि साढ़े छ सौ करोड खर्च के साठ कई साल , हज़ारों कर्मचारियों की मेहनत के बाद असम में तैयार एन आर सी में महज साढ़े उन्नीस लाख लोग ही संदिग्ध विदेशी पाए गए, उन्हें भी अभी प्राधिकरण में अपील का अवसर है , चूँकि उन साढ़े उन्नीस लाख में से कोई  ग्यारह लाख गैर मुस्लिम है ,सो ऐसे लोगों को भारत में शामिल करने के लिए नागरिकता संशोधन बील लाया गया, चूँकि असम में सन १९७९  से १९८४ तक के छात्र आंदोलन का मूल प्रयेक घुसपैठिये को बाहर करना था अतः वहाँ के लोग सांप्रदायिक आधार पर अवैध प्रवासियों को भारत का नागरिक बनाए के समर्थन में नहीं हैं .
      एन आर सी के असम के अनुभव सामने हैं जहां अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 1971 से पहले के ये काग़ज़ात बतौर  सबूत जमा करने थे। ये सबूत थे: 1. 1971 की मतदाता सूची में खुद का या माँ-बाप के नाम या 2. 1951 में, यानि बँटवारे के बाद बने एन आर सी में माँ-बाप/ दादा दादी आदि का  जारी किया कोड नम्बर. साथ ही, नीचे दिए गए दस्तावेज़ों में से 1971 से पहले का एक या अधिक सबूत:1. नागरिकता सर्टिफिकेट 2. ज़मीन का रिकॉर्ड 3. किराये पर दी प्रापर्टी का रिकार्ड 4. रिफ्यूजी सर्टिफिकेट 5. तब का पासपोर्ट 6. तब का बैंक डाक्यूमेंट 7. तब की LIC पॉलिसी 8. उस वक्त का स्कूल सर्टिफिकेट 9. विवाहित महिलाओं के लिए सर्किल ऑफिसर या ग्राम पंचायत सचिव का सर्टिफिकेट. असम में जो ये दस्तावेज पेश नहीं कर पाए उनकी नागरिकता संदिग्ध हो गयी . सारे देश में यदि ऐसीही पणजी बनी तो कल्पना कर लें  एक सौ तीस करोड लोग कैसे, कहाँ से दस्तावेज जमा कर्नेगे- खासकर कम पढ़े लिखे या गरीब लोग . यही नहीं इतने दस्तावेज तैयार करने, उनको जांचने, उनका रिकार्ड बनने में असम से बीस गुना व्यय होगा अर्था साढ़े छः सौ करोड का बीस गुना हम सभी जानते है कि देश कि बड़ी आबादी तक आधार पंजीकरण भी अभी आधा-अधूरा है जबकि इसे अब कोई बारह साल होने को आ गए .

नागरिकता खोने  का अर्थ होता है बैंक सुविधा, जमीन जायदाद के अधिकार, सरकारी नौकरी, सरकारी योजनाओं का लाभ , मतदान का हक आदि से मुक्ति .  सरकारी आंकड़े बानगी हैं कि  गत छह सालों में सरकार 4000 विदेशी घुसपैठियों को भी देश से निकाल नहीं पाई। वहीं कई हज़ार करोड़ खर्च कर डिटेंशन सेंटर बनाये जा रहे है। वहां ऐसे लोगों को रखा जाएगा जिनका कोई देश नहीं होगा। अभी भी हज़ार लोग ऐसे सेंटर में नारकीय जीवन जी रहे हैं। एनआरसी में स्थान न पाए लाखों लोगों को ऐसे डिटेंशन सेंटर में रखने का खर्चा , उसकी सुरक्षा और प्रबंधन का भारी भरकम भार भी हम ही उठाएंगे। बंग्लादेश पहले ही कह चुका है कि उनके कोई अवैध रहवासी हैं ही नहीं और यदि है तो हम उसे तत्काल ले लेंगे .
जब नागरिकता रजिस्टर और संशोधन बिल  को साथ देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि यह साम्प्रदयिक मसला नहीं है, बल्कि यह हमारे संविधान की मूल आत्मा के विपरीत भेदभाव का मसला है . इसके विरोध का यह कतई मतलब नहीं कि  यह विरोध पाकिस्तान या बांग्लादेश से आये किसी भी हिन्दू, सिख को नागरिकता देने का है। ऐसे उत्पीड़ित लोगों को नागरिकता का प्रावधान पहले से भी था .
 धर्म के नाम पर बने राज्य में नफरत और विभाजन का सिलसिला जाती, भाषा, और कई रूपों में होता है , आज का दिन उन बिहारियों को भी याद रखना होगा जो "अपने इस्लामिक मुल्क" की आस में सन 1947 में उस तरफ चले गए थे. टीम तरफ से नदियों से घिरे ढाका शहर के सडक मार्ग के सभी पुल तोड़ डाले गये थे और भारतीय सेना के लड़ाकू जहाज ही ढाका की निगेहबानी कर रहे थे . जैसे ही खबर फैली कि पाकिस्तानी सेना आत्म समर्पण कर रही है , बंगला मुक्ति वाहिनी के सशस्त्र लोग सड़कों पर आ गए . ढाका के कमला पुर, शाहजहांपुर, पुराना पलटन, मौलवी बाज़ार. नवाब बाड़ी जैसे इलाकों में गैर बांग्ला भाषी कोई तीन लाख लोग रहते थे- जिन्हें बिहारी कहा जाता था, ये सभी विभाजन पर उस तरफ गए थे-- उन पर सबसे बड़ा हमला हुआ , कई हज़ार मार दिए गए- जहाज़ से पर्चे गिराए जा रहे थे कि आम लोग रेसकोर्स मैदान में एकत्र हों-- वहीँ पाकिस्तानी सेना का समर्पण हुआ - लेकिन उसके बाद जब तक भारतीय फौज बस्तियों में जाती , बहुत से बिहारी मार दिए गए-- लूट लिए गए ---- नए बंगलादेश के गठन की वेला में मुसलमान बिहारी फिर से भारत की और खुद को बचाने को भाग रहे थे. उससे पहले पाकिस्तानी फौज के अत्याचार से त्रस्त हिन्दू शरणार्थी आ रहे थे . शायद आप जानते हों कि हिन्दू शरणार्थियों को देश के आंतरिक हिस्सों में बाकायदा बसाया गया -- छत्तीसगढ़ के बस्तर में ऐसे बंगालियों की घनी बस्तियां आज भी हैं . भारत में बंगलादेश से आने वाले मुसलमान भी उतने ही पीड़ित थे जितने हिन्दू और मुसलमान तो भारत से ही बीस साल पहले भाग कर गए थे . इसका यह भी मतलब नहीं कि भारत में अवैध घुसपैठिये नहीं हैं , उनकी पहचान कर बाहर खदेडना ही चाहिए .


The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...