My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

Need To Tackle At The Intellectual Level India China Indian Army Economic Condition Prt

 

बौद्धिक स्तर पर निबटने की जरूरत

दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे स्वतंत्र पत्रकार को गिरफ्तार किया है, जो चीन सरकार के आधिकारिक अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' के लिए लेखन करते थे, भारत में सरकार से अधिमान्यता प्राप्त थे, लंबे समय तक विवेकानंद फाउंडेशन से भी जुड़े रहे. पुलिस की मानें तो, देश की सुरक्षा और सेना से जुड़ी जानकारी साझा करने के लिए एक चीनी महिला की फर्जी कंपनी के माध्यम से उन्हें लाखों रुपये मिल रहे थे.



भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर महीनों से चल रहे विवाद का हमारी सेना ने अपने शौर्य और साहस से मुंहतोड़ जवाब दिया है, लेकिन चीन के साथ समस्या केवल सामरिक, व्यापारिक या डिजिटल नहीं है. चीन दुनियाभर में बौद्धिक स्तर पर ऐसा जाल फैला चुका है, जो कई स्तर पर उसकी सहायता करते है़ं

दरअसल, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ही पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को नियंत्रित करती है. वहां कम्युनिस्ट पार्टी केवल हथियार या तकनीक से सेना को मजबूती नहीं देती, बल्कि कई मोर्चों पर निवेश और नियोजन भी करती है, जिससे उनकी सेना को कई जगह बिना लड़े ही जीत मिल जाती है. इसके लिए उसने सूचना तंत्र तैयार करने, जानकारी एकत्र करने और सहूलियत के हिसाब से उसे दुनिया में प्रचारित करने का काम भी किया है. दूसरे शब्दों में, तो यह धारणाओं की लड़ाई का प्रबंधन है.

नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी, गुओयानहुआ के एक चीनी प्रोफेसर ने साइकोलॉजिकल वारफेयर नॉलेज नामक अपनी पुस्तक में लिखा है, 'जब कोई दुश्मन को हराता है, तो यह महज दुश्मन को मारना या जमीन के एक टुकड़े को जीतना नहीं होता है, बल्कि मुख्य रूप से दुश्मन के दिल में हार का भाव स्थापित करना होता है़' युद्ध के मैदान के बाहर प्रतिद्वंद्वी के मनोबल को कम करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना युद्ध के मैदान में.

जब से शी जिनपिंग ने चीन पर पूरी तरह नियंत्रण किया है, तब से वह न केवल अपने देश में बल्कि अन्य देशों में भी मीडिया को नियंत्रित करने पर बहुत काम कर रहे हैं. सभी जानते हैं कि चीन में अखबार, टीवी, सोशल मीडिया से लेकर सर्च इंजन तक सरकार के नियंत्रण में है. वहां का प्रकाशन उद्योग भी सरकार के कब्जे में है. हर वर्ष जुलाई के अंतिम सप्ताह में लगने वाला पेइचिंग पुस्तक मेला दुनियाभर के बड़े प्रकाशकों को आकर्षित करता है. वहां चीन के फॉरेन पब्लिशिंग डिपार्टमेंट का असली उद्देश्य अपने यहां की पुस्तकों के अधिक से अधिक राइट्स बेचना होता है.

बीते दस वर्षों में अकेले दिल्ली में चीन से प्राप्त अनुदान के आधार पर सैकड़ा भर चीनी पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद हुआ. भारत-चीन के विदेशी विभाग भी ऐसी ही अनुवाद परियोजना पर काम कर रहे हैं. दिल्ली के कई निजी प्रकाशक चीनी पुस्तकों के अनुवाद छापकर मालामाल हो रहे हैं. इस तरह चीन दुनियाभर के जनमत निर्माताओं, पत्रकारों, विश्लेषकों, राजनेताओं, मीडिया हाउसों और लेखकों-अनुवादकों का समूह बनाने में भारी निवेश कर रहा है, जो अपने-अपने देशों में चीनी हित को बढ़ावा देने के लिए प्रयत्नशील और इच्छुक हैं.

इसके पीछे असली एजेंडा शांति और युद्ध के समय चीन की भव्यता, ताकत, क्षमता को दूसरे देशों में प्रसारित करना है. ऑस्ट्रेलिया से संचालित होनेवाली कई चीनी कंपनियां, भारत जैसे देशों में होनेवाले एकेडमिक सेमिनारों में अपने प्रतिनिधि भेजती हैं, जो सेमिनार में पढ़े गये शोध पत्रों को हासिल करते हैं और चुपचाप वापस चले जाते हैं. ऐसे शोध का वे अपने यहां विस्तार से अध्ययन करते हैं और उसके उत्पादों का पेटेंट भी हासिल कर लेते हैं.

चीनी सरकार भारत सहित कई देशों में मीडिया में निवेश के लिए अरबों डॉलर खर्च कर रही है. हाल ही में, चीन ने विदेशी मीडिया प्रकाशनों में विज्ञापन स्थान की खरीद के माध्यम से भारी निवेश किया है. चीन मुख्य रूप से एशिया और अफ्रीकी देशों के विदेशी पत्रकारों के लिए फेलोशिप कार्यक्रम भी चलाता है़, जिसके तहत प्रतिवर्ष सौ पत्रकारों को अपने देशों में चीनी विचारों का प्रचार करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. पेइचिंग विश्वविद्यालय सहित कई जगह हिंदी के कोर्स हैं, जहां छात्रों का कार्य होता है नियमित भारतीय अखबार पढ़ना, उसमें चीन के उल्लेख को अनुदित करना, उसके अनुरूप सामग्री तैयार करना.

टीवी बहस में शामिल होनेवाले कई सेवानिवृत सैन्य अधिकारी ऐसे हैं, जिन्होंने कभी लेह-लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश या उत्तराखंड के सीमाई इलाकों में सेवा नहीं दी. असल में ऐसे अधिकारी या लेखक किसी हथियार एजेंसी या अन्य उत्पाद संस्था के भारतीय एजेंट के तौर पर काम करते हैं. उनकी सेवा शर्तों में भारतीय सैन्य स्थिति का अनुमान, उसकी सतही व्याख्या, किसी हथियार या उपकरण की आवश्यकता के बारे में बातें करना, अन्य देश के वैसे ही उपकरण की तुलना में चीनी उत्पाद को बेहतर बताना, आदि का उल्लेख होता है.

लोगों का विश्वास जीतना और फिर उनमें अपने विचार संप्रेषित करना चीन का बौद्धिक युद्ध कौशल है. सैन्य स्तर पर हम चीन से निश्चित ही निबट लेंगे, लेकिन आर्थिक और बौद्धिक स्तर पर निपटने के लिए हमें अभी और तैयारी करनी होगी़

(ये लेखक के नि


रविवार, 27 सितंबर 2020

sucker-mouth-fish-a-big-ecological-threat

 

सकर माउथ फिश : पारिस्थितिकी के लिए बड़ा खतरा

पंकज चतुर्वेदी


हाल ही में वाराणसी में रामनगर के रमना से होकर गुजरती गंगा में डाल्फिन के संरक्षण के लिए काम कर रहे समूह को एक ऐसी विचित्र मछली मिली, जिसका मूल निवास हजारों किलोमीटर दूर दक्षिणी अमेरिका में बहने वाली अमेजन नदी है।



चूंकि गंगा का जल तंत्र किसी भी तरह से अमेजान से संबद्ध है नहीं तो इस सुंदर सी मछली के मिलने पर आश्चर्य से ज्यादा चिंता हुई। हालांकि दो साल पहले भी इसी इलाके में ऐसी ही एक सुनहरी मछली भी मिली थी।
सकर माउथ कैटफिश नामक यह मछली पूरी तरह मांसाहारी है और जाहिर है कि यह इस जल-क्षेत्र के नैसर्गिक जल-जंतुओं का भक्षण करती है। इसका स्वाद होता नहीं , अत: ना तो इसे इंसान खाता है और ना ही बड़े जल-जीव। सो इसके तेजी से विस्तार की संभावना होती है। यह नदी के पूरे पर्यावरणीय तंत्र के लिए इस तरह हानिकारक है कि ‘नमामि गंगे परियोजना’ पर व्यय हजारों करोड़ इसे बेनतीजा हो सकते हैं। हालांकि गंगा नदी पर मछलियों की कई प्रजातियों के गायब होने का खतरा कई साल पुराना है। पहाड़ों से उतर कर गंगा जैसे ही मैदानी इलाकों में आती है तो उसकी जल-धारा के साथ आने वाली मछलियों की कई प्रजातियां ढूंढे नहीं मिल रही। छह साल पहले राट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड द्वारा करवाए गए सव्रे में पता चला कि गंगा की पारंपरिक रीठा, बागड़, हील समेत छोटी मछलियों की 50 प्रजातियां लुप्त हो गई हैं। जान लें जैव विविधता के इस संकट का कारण हिमालय पर नदियों के बांध तो है। ही, मैदानी इलाकों में तेजी से घुसपैठ कर रही विदेशी मछलियों की प्रजातियां भी इनकी वृद्धि पर विराम लगा रही हैं। गंगा और इसकी सहायक नदियों में पिछले कई वर्षो के दौरान  थाईलैंड, चीन व म्यांमार से लाए बीजों से मछली की पैदावार बढ़ाई जा रही है। ये मछलियां कम समय में बड़े आकार में आ जाती हैं और मछली-पालक अधिक मुनाफे के फेर में इन्हें पालता है। हकीकत में ये मछलियां स्थानीय मछलियों का चारा हड़प करने के साथ ही छोटी मछलियों को भी अपना शिकार बना लेती हैं।

इससे कतला, रोहू और नैन जैसी देसी प्रजाति की मछलियों के अस्तित्व पर खतरा हो गया है। किसी भी नदी से उसकी मूल निवासी जलचरों के समाप्त होने का असर उसके समूचे पारिस्थितिकी तंत्र पर इतना भयानक होता है कि जल की गुणवत्ता, प्रवाह आदि नट हो सकते हैं। मछली की विदेशी प्रजाति खासकर तिलैपिया और थाई मांगुर ने गंगा नदी में पाई जाने वाली प्रमुख देसी मछलियों की प्रजातियों कतला, रोहू और नैन के साथ ही पड़लिन, टेंगरा, सिंघी और मांगुर आदि का अस्तित्व खतरे में डाल दिया है। गंगा के लिए खतरा बन रही विदेशी मछलियों की आवक का बड़ा जरिया आस्था भी है। विदित हो हरिद्वार में मछलियां नदी में छोड़ने को पुण्य कमाने का जरिया माना जाता है। यहां कई लोग कम दाम व सुंदर दिखने के कारण विदेशी मछलियों को बेचते हैं। इस तरह पुण्य कमाने के लिए नदी में छोड़ी जाने वाली यह मछलियां स्थानीय मछलियों और उसके साथ गंगा के लिए खतरनाक हो जाती हैं। एक्सपर्ट के मुताबिक, गंगा में देसी मछलियों की संख्या करीब 20 से 25 प्रतिात तक हो गई है, जिसकी वजह ये विदेशी मछलियां हैं। गंगा नदी में 143 किस्म की मछलियां पाई जाती हैं। हालांकि अप्रैल 2007 से मार्च 2009 तक गंगा नदी में किए गए एक अध्ययन में 10 प्रजाति की विदेशी मछलियां मिली थीं। अंधाधुंध और अवैध मछली पकड़ने, प्रदूषण, जल अमूर्तता, गाद और विदेाशी प्रजातियों के आक्रमण भी गंगा में मछली की विविधता को खतरा पैदा कर रहे हैं और 29 से अधिक प्रजातियों को खतरे की श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है। वैसे गंगा में सकर माउथ कैट फिश के मिलने का मूल कारण घरों में सजावट के लिए पाली गई मछलियां हैं। चूंकि ये मछलियां दिखने मेंंसुदर होती हैं साम सजावटी मछली के व्यापारी इन्हें अवैध रूप से पालते हैं।  
कई तालाब, खुली छोड़ दी गई खदानों व जोहड़ों में ऐसे मछलियों के दाने विकसित किए जाते हैं और फिर घरेलू एक्वेिरियम टैंक तक आते हैं। बाढ़, तेज बरसात की दशा में ये मछलियां नदी-जल धारा में मिल जाती हैं वहीं घरों में ये तेजी से बढ़ती हैं व कुछ ही दिनों में घरेलू एक्वेिरियम टैंक इन्हें छोटा पड़ने लगता हैं। ऐसे में इन्हें नदी-तालाब में छोड़ दिया जाता हैं। थोड़ी दिनों में वे धीरे-धीरे पारिस्थितिक तंत्र घुसपैठ कर स्थानीय जैव विविाता और अर्थव्यवस्था को खत्म करना शुरू कर देती हैं। चिंता की बात यह है कि अभी तक किसी भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश में ऐसी आक्रामक सजावटी और व्यावसायिक रूप से महत्त्वपूर्ण मछली प्रजातियों के अवैध पालन, प्रजनन और व्यापार पर कोई मजबूत नीति या कानून नहीं है।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

My video on Traditional water resources with Rajendra Singh

इस कार्यक्रम में जल संरक्षण की परंपराओं पर चर्चा की गयी है। इस कार्यक्रम में जल संरक्षण संबंधी विभिन्न परंपराओं पर जल पुरुष राजेन्द्र सिंह के विचारों से हम अवगत हो सकेंगे। कार्यक्रम में पंकज चतुर्वेदी द्वारा परंपरागत जल संरचनाओं की विशेषताओं पर प्रकाश डाला है।


https://www.youtube.com/watch?v=IsIXwV3o7Kk&feature=youtu.be

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

negligence enhancing corona

 कोताही से कहर बनता कोरोना

पंकज चतुर्वेदी 



ज्यों-ज्यों समय बीत रहा है, कोरोना वायरस के रंग हर दिन बदल रहे हैं। कई बार लगता है कि सारी दुनिया में सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक व्यवस्थ को तहस-नहस करने वाले इस वायरस की नब्ज पकड़ में आई है, अगले ही पल इसे बदलते स्वरूप, इसकी मार के परिवर्तित कुप्रभाव और इससे निबटने के सलीकों के असफल होने की निराशा के घनघोर बादल और घने हो जाते हैं। इसकी वैक्सीन की आस अभी कुछ महीनों तक तो नहीं दिख रही। 17 सितंबर को जब आंकड़ों का विश्लेशण किया गया तो पता चला कि कोरोना वायरस से फैलने वाले रोग कोविड-19 की गति दस दिन में तीन गुना तक हो गई है। अब कई चर्चित चैहरे व राजनेता इसकी गिरफ्त में आ रहे है। कम से कम दस विधायक या सांसद इसके शिकार हो कर काल के गाल में समा चुके हैं। विडंबना यह है कि जैसे-जैसे चुनौतियां दूभर हो रही हैं, वैसे-वैसे आम लोगों की लापरवाही कोरोनो को फलने-फूलने का अवसर दे रही हैं।

राजधानी दिल्ली, जहां कोरोना की मार सबसे तगड़ी है, जहां कई लोगों को एक बार ठीक होने के बाद फिर से इसने जकड़ लिया, वहां दिलशाद गार्डन, जाफराबाद, रोहिणी या मेहरोली, कोई भी इलाके में तीन सवारियों के लिए अधिकृत तिपहिया स्क्ूटर में आठ से दस लोगों की सवारी, बगैर मास्क के ठुंसे हुए लोग देखने को मिल जाएंगे। हर बार सवारी के उतरने-चढ़ने पर सेनीटाइजर से सीट को साफ करने की सरकार के दिशा-निर्देश तो कही दिखते ही नहीं। सार्वजनिक बसों के पीछे भागते लोग, बाहर तक लटकी सवारियों के साथ ग्रामीण सेवा, यह दृश्य पूरे दिल्ली एनसीआर में आम हैं। सनद रहे दो महीने पहले लागू हुए नए परिवहन कानून में क्षमता से अधिक सवारी बैठाने पर बहुत अधिक जुर्माना राशि है, लेकिन ना किसी को जान की परवाह है न ही जुर्माना की। यदि एक लाख से कम आबादी वाले कस्बे में जाएं तो पूरे देश में एक से हालात हैं- ना मास्क है, ना षारीरिक दूरी और ना ही बार-बार हाथ धोने  की अनिवार्यता। जाहिर है कि इस तरह की अव्यवस्था, समाज और सरकार दोनो के सहकार से ही संभव होती है। 

यह तो एक बानगी है कि अब लोग या तो उकता गए हैं या अभी उनके लिए कोरोना एक सामान्य सी बात हैं। गौर करना होगा कि इजराइल में फिर से दो सप्ताह का लॉकडाउन लागू करना पड़, क्योंकि वहां तालाबंदी खुलने के बाद आम लोगों की बाजार-व्यापार, सामाजिक आयोजनों में आमदरफ्त इतनी बढ़ी कि वहां के आंकड़े डराने लगे। छत्तीसगढ़ के शहरी क्षेत्रों में कई जगह लॉकडाउन की वापिसी हो गई है। राजस्थान में भी ऐसी संभावना बन रही है। भारत में राजनीति, चुनाव व सस्ती लोकप्रियता  के कारण कोरोना अनियंत्रित हो रहा है, यदि यह कहा जाए तो अतिशियोक्ति नहीं होगा। मध्य प्रदेश का इंदौर चीन के वुहान से अधिक भयानक हालत में हैं, उसके बावजूद वहां ताजिया हो या एक राजनीतिक दल की कलश यात्रा, पांच से दस हजार लोग एकत्र हो रहे हैं। प्रदेाके ग्वालियर में उपचुनाव की घोशण होने से पहले ही हर राजनीतिक दल हजारों लोगों का जमावड़ा कर रहा है। यह भी दुर्भायपूर्ण है कि इस प्रदेश में मुख्यमंत्री सहित कम से कम तीस विधायक इस रोग की चपेट में आ चके हैं व दो की मौत भी हुई। जब इस तरह की राजनीतिक भीड़ सड़क पर होती है तो रोजगार, अन्य बीमारियों, सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से लोग सड़क पर निकलते ही हैं और उनका तर्क भी ताकतवर होता है कि जब अमुक की रैली में हजारों के एकत्र होने से कोरोना नहीं फैला तो अकेले मुझसे क्यों फैलेगा। बिहार में तो चुनावी चकल्लस में कोरोना के संक्रमण को जमींदोज ही कर दिया गया है। 


यह बात सच है कि हमोर देश में अभी तक सात करोड़ से ज्यादा लोगों के टेस्ट हो चके है। और अधिक टेस्ट का ही परिणाम है कि मरीजों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन यह जान लें कि टेस्ट व जागरूकता अभी महानगर या राजधानी में अधिक हैं। तभी एकबारगी लगता है कि दिल्ली-मुंबई महानगरों में इसका चरम हो गया व अब यहां खतरा ज्यादा नहीं है। मध्यम व छोटे कस्बों तक जब यह परीक्षण पहुंचेगा तब वहां कोरोना का कहर चरम पर होगा। यह भी समझना होगा कि जो लोग मार्च-अप्रेल में तालाबंदी से उपजे बेराजगारी व भूख के हालात से उम्मीदों के साथ अपने गांव - कस्बे गए थे, अब उनका  ‘‘अतिथि-काल’’ समाप्त हो गया है व उनके सामने फिर से रोजगार का संकट मुंह बाए खड़ा है।  उनमें से अधिकशं लेाग फिर से अपने पुराने काम-धंधे वाले महानगरों की तरफ लौट रहे हैं। ऐसे में इस बासत की बड़ी संभावना है कि अभी तक लापरवाही के साथ जीवन जी रहे ये गांव-कस्बे के लोग महानगरों तक कोरोना का संक्रमण फिर से ले कर आ जाएं। अर्थात एक तरफ जब गांवों तक कोरोना की तगड़ी मार होगी, ठीक तभी बड़े षहरों में भी संक्रमितों की संख्या में इजाफा होगा। मार्च की भरी गरमी में षुरू हुए कोरोना वायरस के संक्रमण से सारी दुनिया के सामाजिक-आर्थिक तानेबाने को छिन्न-भिन्न करने वाले रोग कोविड ने घनघोर बरसात भी देख ली और अब अपने हर दिन बदलते स्वरूप के साथ यह ठंड में प्रवेश कर रहा है। ठंड में बड़े षहर वाहन व औद्योगिक प्रदूशण के चलते वैसे ही सांस की बीमारियों का घर बन जाते हैं। ऐसे में नोबल-कोरोना वायरस के प्रसार को गति मिलना संभव है। 

कोरोना ने देश को एक बात की चेतावनी दे दी कि स्वास्थ्य सेवाएं भी राश्ट्रीय सुरक्षा का मसला है। कोरोना ने यह भी बता दिया कि हर इंसान को पर्याप्त मात्रा में साफ पानी लिम, यह भी देश की सुरक्षा के लिए उतना ही जरूरी है जितना फौज के लिए गोला-बारूद की आपूर्ति। जब तक कोई माकूल इलाज या वैक्सीन नहीं मिलती, तब तक देश को इस संक्रमण से बचाने का एकमात्र उपाय व्यक्तिगत स्वच्छता और उसमें भी बार-बार  साबुन से हाथ धोना है। कोरोना से जूझते समय चिकित्सा तंत्र के अलावा दूसरी सबसे बड़ी चुनौती इस संग्राम के लिए अनिवार्य साफ पानी की बेहद कमीऔर उसका लाचार सा प्रबंधन। 

सनद रहे बीस सैकंड हाथ धोने के लिए कम से कम दो लीटर पानी की जरूरत होती है। इस तरह पांच लोगों को परिवार को यदि दिन में पांच से सात बार हाथ धोना पड़े तो उसका पचास लीटर पानी इसी मद में चाहिए, जबकि देश में औसतन 40 लीटर पानी प्रति व्यक्ति बामुश्किल मिल पा रहा है। नेशनल सैंपल सर्वे आफिस(एनएसएसओ) की ताजा 76वीं रिपोर्ट बताती है कि देश में 82 करोड़ लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक पानी  मिल नहीं पा रहा है। देश के महज 21.4 फीसदी लोगों को ही घर तक सुरक्षित जल उपलब्ध है।  78 फीसदी ग्रामीण और 59 प्रतिशत षहरी घरों तक स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं हैं। आज भी देश की कोई 17 लाख ग्रामीण बसावटों में से लगभग 78 फीसदी में पानी की न्यूनतम आवश्यक मात्रा तक पहुंच है। 


यह बेहद कडव़ी सच्चाई है कि  कोविड-19 का इलाज दुनिया में किसी के पास नहीं हैं। जो लोग ठीक भी हुए हैं वे वायरस के प्रभाव के प्रारंभिक असर में थे। यहां तक कि एचआईवी, टीबी, मलेरिया आदि की दवाएं भी इस वायरस के विरूद्ध प्रभावी नहीं रही हैं। प्लाज्मा थैरेपी की सफलता की संदिग्धता अब सरकारी एजेंसी भी मान रही हैं। ऐसे में केवल सतर्कता, लापरवाहों पर कड़ाई और बेवजह सार्वजनिक स्थानों पर लोगों को आने से रोकना, गरीब लोगो के लिए रोजगार की व्यवस्था, व्यापार-उद्योग को नए सलीके से संचालन को अपनी जीवन षैली में स्थाई रूप से जोड़ना होगा। जान लें वैक्सीन की खोज होने के बाद सवा अरब से अधिक आबादी वाले देश में उसके आम लोगों को तक पहुंचने में भी सालों लगेंगे। 


शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

Camera-court can not able to deliver justice to mass

 वर्चुअल कोर्ट से न्याय की अधूरी आस

                                                                                                                        पंकज चतुर्वेदी



 लोकतंत्र के दो प्रमुख स्तंभ - कार्यपालिका व विधायिका अब ठीक गति से काम करने लगी हैं। सरकारी आफिस खुल ही रहे हैं और संसद व कई राज्यों की विधानसभाएं भी काम कर रही हैं। लेकिन तीसरे स्तंभ न्यायपालिका के कार्य करने की गति इतनी मंथर है कि हर दिन एकत्र हो रहें लंबित मामले, अदालतों में रिक्त पड़े न्याय अधिकारियों के पदों को देखते हुए साफ लगा रहा है कि न्याय के मामले में हम कई दशक पीछे खिसक रहे है। कोरोना संकट के कारण बंद हुई अदालतों ने आम लोगांे ही नहीं, बल्कि न्याय के लिए सहयोगी अधिवक्तओं के लिए भी कई संकट खड़े कर दिए हैं। कहने को अदालतें कैमरों पर चल रही है। लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि इस तरह की अदालतें केवल अत्यधिक आवश्यक प्रकरणों पर ही ध्यसान दे पा रही हैं, दूसरा देश के अधिकांश वकील इस उच्च तकनीक से  अभ्यस्त भी नहीं है और हमारा सिस्टम अभी इतने ताकतवर इंटरनेट कनेक्शन व कैमरों से लैस नहीं है कि समूची कार्यवाही सहजतासे हो। यह दुर्भायपूर्ण सच है कि कौरोना काल में अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या में इजाफा हुआ है, साथ ही न्यायिक अभिरक्षा या विचाराधीन कैदियों की संख्या अब असहनीय हो गई है। दूसरी तरफ देश के हजारों वकील, उनके स्टाफ के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है वहीं, कैमरे वाली अदालतों में षामिल हो रहे वकीलों की फस भी बढ़ गई है। यह डराने वाला आंकड़ा है कि आज जितने मामले लंबित हैं और इसी गति से मुकदमों का निबटान होता रहा तो सभी को न्याय मिलने के लिए 340 साल चाहिए। लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था तीसरा स्तंभ है और उसकी ऐसी जर्जर हालत पूरे तंत्र को कमजोर कर रही 



 पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.ए बोबडे भी कोरोना के चलते लंबित मामलों की बाढ़ के प्रति चिंता जताते हुए अधिक संे अधिक मध्यस्थता पर जोर दे चुके हैं। यदि विधि मंत्रालय के आंकड़ों पर ही भरोसा करें तो इस समय देश के सभी अदालतों में लगभग 3.38 करोड़ मामले लंबित हैं । यह संख्या इस साल अप्रैल में 3.21 करोड़ थी । जाहिर है कि तीन महीने में लंबित मामलों में इजाफा 17 लाख हुआ है। वहीं जेल में कैदियों की संख्या कुल क्षमता के 117 फीसदी हो गई है। हमारे यहां आबादी की तुलना में न्यायाधीशों का अनुपात प्रति 10 लाख पर 17.86 न्यायाधीशों का है। मिजोरम में यह अनुपात सर्वाधिक है। वहां प्रति 10 लाख पर 57.74 न्यायाधीश हैं। दिल्ली में यह अनुपात 47.33 है और देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में प्रति 10 लाख आबादी पर मात्र 10.54 न्यायाधीश हैं। पश्चिम बंगाल में न्यायाधीशों का यह अनुपात सबसे कम है। वहां प्रति 10 लाख की आबादी पर सिर्फ 10.45 न्यायाधीश हैं। कोई भी जज हर साल 2600 से ज्यादा मुकदमों का निबटारा नहीं कर पाता , जबकि नए दर्ज मालों की संख्या इससे कहीं अधिक होती है। दरअसल, ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या संसद द्वारा कानून बनाकर ही बढ़ाई जा सकती है। विडंबना तो यह है कि काम के बोझ को देखते हुए नई नियुक्तियां तो हो नहीं रहीं, हां कुल स्वीकृत पदों पर भी जज आसीन नहीं है। 

आज कैमरों पर चल रही अदालतें  जमीन, निर्माण, पारिवारिक वाद और छोटे-मोटे मुकदमों में गवाही या फैसलों को टाल रहे हैं। जहां आम अदालतों मे हर दिन 60 से 70 केस सुने जाते थे, अजा दिल्ली जैसे महानगर में इनकी संख्या 10 से 12 रह गई है। निश्चित ही इससे लंबित मामलों की संख हर दिन बढ़ रही है और बंदियों की संख्या से भी जेल परेशान हैं। यह विडंबना है कि देश का बहुत बड़ा तबका थोडे़ से भी न्याय की उम्मीद न्यायपालिका से कर ही नहीं पाता है। गरीब लोग तो न्यायालय तक पहुंच ही नहीं पाते। इसकी औपचारिकताओं और जटिल प्रक्रियाओं के कारण केवल वकीलों द्वारा ही न्यायालय में बात कही जा सकती है, लेकिन गरीब लोग वकीलों की बड़ी-बड़ी फीसें नहीं दे सकते, वे न्याय से वंचित रह जाते हैं। वर्चुअल अदालत के दौर में देश के अस्सी फसदी वकील भी अदालत में खड़े नहीं हो पा रहे हैं। जो कुछ लोग न्यायालय तक पहुंच पाते हैं उन्हें यह उम्मीद नहीं होती कि एक निश्चित समयावधि में उनके विवाद का निपटारा हो पाएगा। मुकदमे के निर्णय में जितने समय की सजा दी जाती है उससे ज्यादा समय तो मुकदमों की सुनवाई में ही लग जाता है। 



वैसे भी हमारे न्याय-तंत्र में पुलिस और प्रभावशाली लोग न्यायिक प्रक्रिया को और भी ज्यादा दूरूह बना रहे हैं क्योंकि प्रभावशाली लोग पुलिस को अपने इशारों पर नचाते हैं और उन लोगों को डराने धमकाने और चुप कराने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करते हैं जो अत्याचारी और शोषणपूर्ण व्यवस्था को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। एक तरफ कैमरों पर न्याय प्रक्रिया जटिल है तो दूसरी ओर वकील या अदालतों पर कोई जिम्मेदारी या समयबद्धता का दवाब नहीं है। एक पेशी चूकने से उनके मुवक्किल की न्याय से दूरी कई साल की बढ़ जाती है। 



 हाल ही में दिल्ली दंगो के आरोप में गिरफ्तार उमर खलिद के वकील को जाच एजंसी ने बाकायदा मोबाईल पर संदेश भेज कर सूचित किया कि उनके मुवक्किल को अदालत में पेश किया जाएगा। जब वकील साहब कोई 30 किलोमीटर गाड़ी चला कर कोर्ट पहुंचे तो कह दिया कि अब वीडियो से पेशी होगी। अब वकील साहब के पास अदालत परिसर से सुनवाई के लिए अपने मोबाईल का सहारा रह गया और सभी जानते हैं कि दिल्ली में डाटा की स्पीड, कॉल ड्रापआउट की तरह हैं। यह बानगी है कि राजधानी दिल्ली में हाई प्रोफाईल केसों में वर्चुअल कोर्ट के नाम पर वकील व  अभियुक्त देानेंा निराश हैं। इस समय अदालतों का नियमित खुलना बेहद जरूरी है क्योंकि विचाराधीन कैदियों की जमानत या जमीन-जायदाद के मुकदमें जो आगे चल कर कानून-व्यवस्था को चुनौती बनते है।, पर नियमित सुनवाई अनिवार्य है। अदालतों में भीड़ नियंत्रित करने के कई तरीके हैं। मुजरिमों को कैमरे से जज के सामने पेश कर दिया जाए, मुजरिम की पैरवी वाले की संख्या एक ही रखी जाए, टाईपिंग, स्टांप वैंडर को रोस्टर के अनुसार एक दिन छोड़ कर एक दिन बुलाया जाए, वकेवल मुकदमें वाले वकीलों को ही अदालत आने दिया जाए- ऐसे कई एक उपाय हैं जिनके साथ अदालतो ंपर बढ़ रहे मुकदमों के बोझ को कम किया जा सकता है । साथ ही न्याय की आस में बैठे लोगों का इस प्रणाली पर भरोंसा भी जीवित रखा जा सकता है। 



क्या यह वक्त नही आ गया है कि लिखे कानून के बनिस्पत सुधार के लिए जरूरी कदमों या अपराध-निवारण को अपनाया जाए ?आज की न्यायीक व्यवस्था बेहद महंगी, डरावनी, लंबी खिंचने वाली है। गरीब लोग तो अदालतों की प्रक्रिया में सहभागी ही नहीं हो पाते हैं। उनके लिए न्याय की आस बेमानी है। साक्ष्य अधिनियम को सरल बनाना, सात साल से कम सजा वाले मामालों में सयब़ नीति बनाना, अदालतों में बगैर वकील की प्रक्रिया को प्रेरित करना, कोरोना जैसे हालत में तारीख आगे बढ़ाने की हर मुकदमें को समयबद्ध मान कर सुनवाई करना जैसे कदम अदालतों के प्रति आम आदमी के विश्वास को बहाल करने में मददगार हो सकते हैं। 

पंकज चतुर्वेदी






शनिवार, 12 सितंबर 2020

Need of special authority to protect traditional water tanks

 जरूरत है तालाबों को बचाने के लिए एक सशक्त निकाय की 

पंकज चतुर्वेदी 



यह बात किसी से छुपी नहीं है कि देश के 32 फीसदी हिस्से को पानी की किल्लत के लिए गरमी के मौसम का इंतजार भी नहीं करना पड़ता है- बारहों महीने, तीसों दिन यहां ‘जेठ’ ही रहता है। सरकार संसद में बता चुकी है कि देश की 11 फीसदी आबादी साफ पीने के पानी से महरूम है। वहीं जिन इलाकों की जनता जुलाई-अगस्त में अतिवृश्टि के लिए हाय-हाय करती दिखती है, सितंबर आते-आते उनके नल सूख जाते हैं। बारिश से सड़क व नदियां उफनती हैं और पानी देखते ही देखते गायब हो जाता है। इस पानी को सहेजने के लिए पारंपरिक स्त्रोत ताल-तलैया को तो सड़क, बाजार, कालोनी के कंक्रंीट जंगल खा गए । दूसरी तरफ यदि कुछ दशक पहले पलट कर देखें तो आज पानी के लिए हाय-हाय कर रहे इलाके अपने स्थानीय स्त्रोतों की मदद से ही खेत और गले दोनों के लिए अफरात पानी जुटाते थे। एक दौर आया कि अंधाधुंध नलकूप रोपे जाने लगे, जब तक संभलते जब तक भूगर्भ का कोटा साफ हो चुका था। ण्क बात और आज थोड़ी सी बरसात में आधुनिकता के प्रतीक षहरों में जिस तरह जल-भ्राव हो रहा है, उसका बारिकी से अध्ययन करे तो पता चलेगा कि पानी वहीं रूक रहा है जहां किसी पुराने तालाब , जोहड़ या जल-धारा को सुखा कर आबादी बसाई गई। जाहिर है कि तालाबों का न बचाना बाढ़ और सुखाड़ दोनों को न्यौता दे रहा है। 

समाज को एक बार फिर बीती बात बन चुके जल-स्त्रोतों की ओर जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है - तालाब, कुंए, बावड़ी। लेकिन एक बार फिर पीढ़ियों का अंतर सामने खड़ा है, पारंपरिक तालाबों की देखभाल करने वाले लोग किसी ओर काम में लग गए और अब तालाब सहेजने की तकनीक नदारद हो गई है। यही नहीं सरकार का भी कोई एक महकमा मुकम्मल नहीं है जो सिमटते तालाबों के दर्द का इलाज कर सके। तालाब कहीं कब्जे से तो कहीं गंदगी से तो कहीं तकनीकी ज्ञान के अभाव से सूख रहे है।। कहीं तालाबों को जानबूझ कर गैरजरूरी मान कर समेटा जा रहा है तो कही उसके संसाधनों पर किसी एक ताकतवर का कब्जा है। ऐसे कई मसले हैं जो अलग-अलग विभागों, मंत्रालयों, मदों में बंट कर उलझे हुए हैं। देश के इतने बड़े प्राकृतिक संसाधन, जिसकी कीमत खरबों-खरब रूप्ए हैं के संरक्षण के लिए एक स्वतंत्र, ताकतवर प्राधिकरण महति है। 

तालाब केवल इस लिए जरूरी नहीं हैं कि वे पारंपरिक जल स्त्रोत हैं, तालाब पानी सहेजते हैं, भूजल का स्तर बनाए रखते हैं, धरती के बढ़ रहे तापमान को नियंत्रित करने में मदद करते हैं और उससे बहुत से लोगों को रोजगार मिलता है। सन 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे । कमीशन की रिर्पाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई । आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया । चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना ; देश के जल-संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार भी होते थे । मछली, कमल गट्टा , सिंघाड़ा , कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी ; यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं । तालाबों का पानी यहां के कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे  । शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है । 

वैसे तो मुल्क के हर गांव-कस्बे- क्षेत्र के तालाब अपने समृद्ध अतीत और आधुनिकता की आंधी में बर्बादी की एक जैसी कहानी कहते हैं। जब पूरा देश पानी के लिए त्राहि-त्राहि करता है, सरकारी आंकड़ो के षेर दहाड़ते हैं तब उजाड़ पड़े तालाब एक उम्मीद की किरण की तरह होते हैं। इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीटयूट फार द सेडिएरीडट्रापिक्स के विशेषज्ञ बोन एप्पन और श्री सुब्बाराव का कहना है कि तालाबों से सिंचाई करना आर्थिक दृष्टि से लाभदायक और अधिक उत्पादक होता है । उनका सुझाव है कि पुराने तालाबों के संरक्षण और नए तालाब बनाने के लिए ‘भारतीय तालाब प्राधिकरण’ का गठन किया जाना चाहिए । पूर्व कृषि आयुक्त बी. आर. भंबूला का मानना है कि जिन इलाकों में सालाना बारिश का औसत 750 से 1150 मिमि है, वहां नहरों की अपेक्षा तालाब से सिंचाई अधिक लाभप्रद होती है । 

एक आंकड़े के अनुसार, मुल्क में आजादी के समय लगभग 24 लाख तालाब थे। बरसात का पानी इन तालाबों में इकट्ठा हो जाता था, जो भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी होता था। अकेले मद्रास प्रेसीडेंसी में ही पचास हजार तालाब और मैसूर राज्य में 39 हजार होने की बात अंग्रेजों का रेवेन्यू रिकार्ड दर्शाता है। दुखद है कि अब हमारी तालाब-संपदा अस्सी हजार पर सिमट गई है। देश भर में फैले तालाबों ,बावड़ियों और पोखरों की 2001-02 में गिनती की गई थी। देश में इस तरह के जलाशयों की संख्या साढे पांच लाख से ज्यादा है, इसमें से करीब 4 लाख 70 हजार जलाशय किसी न किसी रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं, जबकि करीब 15 प्रतिशत बेकार पड़े हैं। यानी आजादी के बाद के 53 सालों में हमारा समाज कोई 20 लाख तालाब चट कर गया। बीस लाख तालाब बनवाने का खर्च आज बीस लाख करोड़ से कम नहीं होगा। दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2005 में केंद्र सरकार ने जलाशयों  की मरम्मत , नवीकरण और जीर्णोध्दार ( आर आर आर ) के लिए योजना बनाई। ग्यारहवीं योजना में काम शुरू भी हो गया, योजना के अनुसार राज्य सरकारों को योजना को अमली जामा पहनाना था। इसके लिए कुछ धन केंद्र सरकार की तरफ से और कुछ विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से मिलना था। इस योजना के तहत इन जलाशयों की क्षमता बढ़ाना, सामुदायिक  स्तर पर  बुनियादी ढाँचे का विकास करना था। गाँव ,ब्लाक, जिला व राय स्तर पर योजना को लागू किया गया है। हर स्तर पर तकनीति सलाहकार समिति का  गठन किया जाना था। केंद्रीय जल आयोग और  केंद्रीय भूजल बोर्ड को इस योजना को तकनीकी सहयोग देने का  जिम्मा दिया गया, जबकि निरीक्षण का काम जल संसाधन मंत्रालय कर रहा है। बस खटका वही है कि तालाब का काम करने वाले दीगर महकमें तालाब तो तैयार कर रहे हैं, लेकिन तालाब को तालाब के लिए नहीं। मछली वाले को मछली चाहिए तो सिंचाई वाले को खेत तक पानी। जबकि तालाब र्प्यावरण, जल, मिट्टी, जीवकोपार्जन की एक एकीकृत व्यवस्था है और इसे अलग-अलग आंकना ही बड़ी भूल है। एक प्राधिकरण ही इस काम को सही तरीके से संभाल सकता है।

असल में तालाबों पर कब्जा करना इसलिए सरल है कि पूरे देश के तालाब अलग-अलग महकमों के पास हैं - राजस्व, विभाग, वन विभाग, पंचायत, मछली पालन, सिंचाई, स्थानीय निकाय, पर्यटन ...षायद और भी बहुत कुछ हों। कहने की जरूरत नहीं है कि तालाबों को हड़पने की प्रक्रिया में स्थानीय असरदार लोगों और सरकारी  कर्मचारी की भूमिका होती ही है। अभी तालाबों के कुछ मामले राश्ट्रीय हरित प्राधिकरण के पास हैं और चूंकि तालाबों के बारे में जानकारी देने का जिम्मा उसी विभाग के पास होता हे, जिसकी मिली-भगत से उस की दुर्गति होती है, सो हर जगह लीपापोती होती रहती हैं। आज जिस तरह जल संकट गहराता जा रहा है, जिस तरह सिंचाई व पेयजल की अरबों रूप्ए वाली योजनाएं पूरी तरह सफल नहीं रही हैं, तालाबों का सही इस्तेमाल कम लागत में बड़े परिणाम दे सकता है। इसके लिए जरूरी है कि केंद्र में एक सशक्त तालाब प्राधिकरण गठित हो, जो सबसे पहले देशभर की जल-निधियों का सवे।ं करवा कर उसका मालिकाना हक राज्य के माध्यम से अपने पास रखे, यानी तालाबों का राश्ट्रीयकरण हो,। फिर तालाबों के संरक्षण, मरम्मत की व्यापक योजना बनाई जाए। यहां उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड के टीकमगढ जिले में  बराना के चंदेलकालीन तालाब को 35 किलोमीटर लंबी नहर के माध्यम से जामनी नदी से जोड़ा जा रहा है। इससे 18 गांव लाभान्वित होंगे। अब इस इलाके में केन-बेतवा नदी को जोड़ने की कई अरब की योजना लागू करने पर सरकार उतारू है, जबकि उसके बीस फीसदी व्यय पर छोटी, मौसमी नदियों को तालाबों से जोड़ने, तालाबों की मरम्मत और सहेजने का काम आसानी से हो सकता है। इस तरह की लघु योजनाएं तभी संभव है जब न्यायिक, राजस्व अधिकार प्राप्त तालाब प्राधिकरण पूरे देश के तालाबों को संरक्षित करने की जिम्मेदारी ले। 

हकीकत में तालाबों की सफाई और गहरीकरण अधिक खर्चीला काम नही है ,ना ही इसके लिए भारीभरकम मशीनों की जरूरत होती है। यह सर्वविदित है कि तालाबों में भरी गाद, सालों साल से सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ठ पदार्थो के कारण ही उपजी है, जो उम्दा दर्जे की खाद है। रासायनिक खादों ने किस कदर जमीन को चौपट किया है? यह किसान जान चुके हैं और उनका रुख अब कंपोस्ट व अन्य देशी खादों की ओर है। किसानों को यदि इस खादरूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपा जाए तो वे वे सहर्ष राजी हो जाते हैं।यदि जल संकट ग्रस्त इलाकों के सभी तालाबों को मौजूदा हालात में भी बचा लिया जाए तो वहां के हर्र इंच खेत को तर सिंचाई, हर कंठ को पानी और हजारों हाथों को रोजगार मिल सकता है । एक बार मरम्मत होने के बाद तालाबों के रखरखाव का काम समाज को सौंपा जाए, इसमें महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, मछली पालन सहकारी समितियां, पंचायत, गांवों की जल बिरादरी को शामिल किया जाए । जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता की आंधी के विपरीत दिशा में ‘‘अपनी जड़ों को लौटने’’ की इच्छा शक्ति विकसित करनी होगी ।






शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

Hindon River producing illness for Delhi

करोड़ों को बीमारी बांट रहा हिंडन का जहरीला जल



 दिल्ली के पड़ोसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहने वार्ली हिंडन और उसकी सहायक कृष्णा व काली नदियों के हालात अब इतने खराब हो गए हैं कि उनसे दिल्ली के लोगों की सेहत खराब हो रही है। सहारनपुर, बागपत, मेरठ, शामली, मुजफ्फरनगर और गाजियाबाद के ग्रामीण अंचलों में इन नदियों ने भूजल तक को जहरीला बना दिया है। अक्तूबर 2016 में ही एनजीटी ने हिंडन के किनारे के हजारों हैंडपंप को बंद करके गांवों में पानी की वैकल्पिक व्यवस्था का आदेश दिया था। कुछ हैंडपंप बंद भी हुए, लेकिन चार साल बाद भी जब साफ पानी का विकल्प नहीं मिला, तो बेबस ग्रामीणों ने फिर उसी पानी को पीना शुरू कर दिया। विडंबना यह कि कोरोना-काल में कारखाने बंद होने के बावजूद हिंडन के हालात ज्यादा नहीं सुधरे, क्योंकि असल में यह नदी अब नाबदान बन गई है।

अगस्त 2018 में एनजीटी के सामने बागपत के गांगनोली गांव पर किया गया एक अध्ययन प्रस्तुत किया गया, जिसमें बताया गया था कि इस गांव में 71 लोग कैंसर के कारण मर चुके हैं और 47 अन्य इसकी चपेट में हैं। गांव में हजार से अधिक लोग पेट के गंभीर रोगों से ग्रस्त हैं और इसका मुख्य कारण हिंडन व कृष्णा का जल है। इस पर एनजीटी ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया, जिसने फरवरी 2019 में अपनी रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि हिंडन और उसकी सहायक नदियों के प्रदूषण के लिए मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर के अशोधित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट जिम्मेदार हैं। एनजीटी ने तब आदेश दिया था कि हिंडन का जल कम से कम नहाने के काबिल हो, यह सुनिश्चित किया जाए। मार्च 2019 में कहा गया कि इसके लिए एक ठोस कार्ययोजना छह महीने के भीतर पेश की जाए। समय-सीमा निकल गई, लेकिन बात कागजी घोड़ों से आगे बढ़ी ही नहीं। 
लेकिन हिंडन का जहर अब दिल्ली के लिए भी काल बन रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश चूंकि गंगा और यमुना का दोआब क्षेत्र है, इसलिए इसकी भूमि काफी उपजाऊ है और यहां के किसान दिल्ली की आबादी के लिहाज से ही अपने खेतों में फल-सब्जी, अनाज उगाते हैं। चूंकि इन फसलों की सिंचाई ज्यादातर हिंडन के जहरीले पानी से हो रही है, ऐसे में खाद्य पदार्थों के जरिए दिल्ली वालों की सेहत भी अब इससे प्रभावित होने लगी है।
ऐसी अनेक रिपोर्टें सरकारी फाइलों में दबी हुई हैं, जिनमें कहा गया है कि हिंडन के पानी को जहरीले रसायन का मिश्रण कहना बेहतर होगा। इसके पानी में ऑक्सीजन शून्य है। हालत यह है कि यदि कोई पानी में अपना हाथ डुबो दे और उसे फिर स्वच्छ  पानी से साफ न करे, तो उसे चर्मरोग हो सकता है। हिंडन को सीवर से रिवर बनाने के लिए एनजीटी चाहे जितने भी आदेश दे, मगर जब तक नीति-निर्माता इसकी मूल समस्याओं को नहीं समझेंगे, इस नदी का कायाकल्प नहीं हो सकता। इस नदी की मूल समस्याएं हैं- इसके नैसर्गिक मार्ग को बदलना, इसमें शहरी व औद्योगिक नालों का बिना किसी उपचार के गिरना, और तीसरा, इसके जलग्रहण क्षेत्र का अतिक्रमण। इन तीनों समस्याओं पर एक साथ काम किए बगैर हिंडन को बचाना मुश्किल है। 
दिक्कत यह है कि कुछ उद्योगों का बचाव कर रही राज्य सरकार अभी भी यह मानने को तैयार नहीं कि हिंडन का पानी जहरीला हो चुका है, जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण में कुछ ही वर्ष पहले बाकायदा यह स्वीकार किया था कि सहारनपुर से लेकर गौतमबुद्ध नगर तक हिंडन नदी का पानी काफी दूषित हो गया है।
हिंडन जहां भी शहरी क्षेत्रों से गुजर रही है, इसके जल-ग्रहण क्षेत्र में बहुमंजिली इमारतें खड़ी कर दी गई हैं और इन कॉलोनियों के अपशिष्ट सीधे इसी में जाने लगे हैं। गाजियाबाद जिले में हिंडन तट पर कूड़ा फेंकने या इसमें मलबा डालने को लेकर न तो किसी को कोई भय है, और न ही संकोच। जाहिर है, इसके जहर का दायरा अब विस्तारित होता जा रहा है और देर-सवेर इसकी जद में वे भी आएंगे, जो इसे जहरीला बनाने में लिप्त हैं। सरकार गाजियाबाद में हिंडन पर रिवर फ्रंट बनाने की योजना बना रही है, लेकिन जब तक नदी का पानी साफ नहीं होगा, तब तक ऐसी कोई भी योजना नदी तट की जमीन को कब्जाने की कवायद ही मानी जाएगी।

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...