My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

सोमवार, 11 जुलाई 2016

The ignorance of traditinal tanks flooded Bhopal

दरिया में बदल गया एक स्मार्ट सिटी

चौबीस घंटे में ही 23 सेंटीमीटर वर्षा हुई और एक स्मार्ट सिटी दरिया में तब्दील हो गया। बेशक भोपाल में हुई यह बारिश सामान्य नहीं थी, लेकिन भोपाल का जो हाल हुआ, वह भी उम्मीदों के परे था। इस बारिश से हुए नुकसान का आकलन अभी जारी है।
इतनी बारिश में शायद देश के किसी बड़े शहर का यही हाल होता, पर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का यह हाल हैरत में इसलिए डालता है कि इस शहर के जल प्रबंधन को कभी स्विट्जरलैंड की तरह माना जाता था। पर एक ही घनी बारिश ने बता दिया कि किसी शहर की पारंपरिक जल व्यवस्था से छेड़छाड़ हमें किस संकट की ओर ले जा सकती है। यह उन तमाम शहरों के लिए चेतावनी भी है, जो अपनी कई परंपरागत व्यवस्थाओं को भूलकर स्मार्ट बनने की होड़ में शामिल हो गए हैं।
यह सच है कि भोपाल का जिस तरह से विस्तार हुआ, उसकी तुलना में वहां मूलभूत ढांचे का विकास नहीं हुआ। शहर में 723 नाले हैं, लेकिन उनमें से 80 प्रतिशत पर अवैध कब्जे हैं, सो उनकी कभी सफाई हो नहीं पाती। वहां हर रोज साढे़ सात सौ मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है, मगर नगर निगम की क्षमता महज ढाई सौ मीट्रिक टन कचरा उठाने की है। ऐसे में, कूड़ा बरसों से जमा हो रहा था और पानी का जोर पाकर यह अधमरे सीवरों में फंस गया। सनद रहे कि भोपाल की बसावट पहाड़ों के बीच है और इसी के बीच झीलों की प्राकृतिक संरचना है।
चाहे जितनी भी बदरी बरसे, पूरा पानी तालाबों की गोद में ही गिरेगा। पर आज लोग यह भी भूल चुके हैं कि भोपाल की विशाल ताजुल मस्जिद के पीछे तीन तालाबों की ऐसी शृंखला थी, जो इस शहर की बारिश के पानी का प्रबंधन करती थी। बड़े और छोटे तालाब तो थे ही, मोतिया तालाब, नवाब सिद्दीकी तालाब व मुंशी हुसैन तालाब- ये तीनों एक नहर से जुड़े हुए थे। ईदगाह हिल्स इलाके का बरसाती पानी सबसे पहले मोतिया तालाब में आता, फिर उससे अगले और फिर अगले तालाब में। जब तीनों तालाब भर जाते थे, तो एक और नहर थी मुंशी तालाब में, जो गुरुबख्श तलैया में गिरती थी। आज मोतिया तालाब तो गंदे पानी के निस्तार के कारण नाबदान बन गया है।
नवाब सिद्दीकी तालाब के 60 फीसदी हिस्से पर तो लोगों ने मिट्टी भरकर कॉलोनी बना ली। तीसरे तालाब में अब महज कीचड़ रह गया है। अब यह मान लिया गया है कि इन्हें जिलाना नामुमकिन है। फिर तालाब से ज्यादा महत्वपूर्ण उस पर बने निर्माण हैं। यही सोच शहर की बाकी जल व्यवस्था को लेकर भी है।
अब भी समय है, भोपाल को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए नक्शे तैयार करने वाले सबसे पहले यहां की पारंपरिक जल संरचनाओं के जल-आवक मार्ग और अतिरिक्त जल की निकासी के पारंपरिक सलीके को समझें, उनके अतिक्रमण हटाए जाएं। यह हो सका, तो भोपाल में अगर इससे दोगुने बादल भी बरसें, तब भी यह शहर दरिया नहीं बनेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

रविवार, 10 जुलाई 2016

Bundelkhand : flood in drought area

सूखे से बिलखते बुंदेलखंड में बरसात की तबाही 

                                                                                                                                            पंकज चतुर्वेदी

Raj express 11-7-16
जहां अभी कल तक सूखे का दर्द था, आज बरसात कहर बन गई है। जिसने खेत जोते व बोये, उसे बीज नश्ट होने का डर सता रहा है। याद हो कि मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश के लगभग 14 जिलों में फैले बंुदेलखंड के सैंकडों गांव बीते आठ महीने से पानी की कमी के चलते वीरान हो गए थे । लेकिन इस बार आशाढ़ के पहले ही पक्ष में दो दिन  ऐसा पानी बरसा कि बाढ़ के हालात बन गए। जो प्रशासन अभी तक सूखा राहत की गणित लगा रहा था, अब नाव, रस्सी व बाढ़ की जुगत में लग गया है। बारिश से उपजी तबाही में प्रकृति का असामयिक तेवर तो है ही इंसान ने आफत को खुद बुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड में इस समय बरसात से तबाही वाले इलाके में बड़ा हिस्सा केन या उसकी सहाक नदियें के किनारों का है। आमतौर पर षांत कही जाने वाली छोटी सी नदी केन अचानक  क्यों  उफन गई ? वास्तव में यह इस नदी के जल ग्रहण क्षेत्र के पर्यावरण के साथ किए जा रहे छेड़छाड़ का नतीजा है ।
केन बांदा में खतरे के निशान से ऊपर 105.25 मीटर पर बह रही है। पन्ना जिले में कई गांव इसकी चपेट में आ कर पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं। केन नदी जबलपुर के मुवार गांव से निकलती है । पन्ना की तरफ 40 किमी आ कर यह कैमूर पर्वतमालाओं के ढलान पर उत्तर दिशा में आती है । तिगरा के पास इसमें सोनार नदी मिलती है । पन्ना जिले के अमानगंज से 17 किमी दूर पंडवा नामक स्थान पर छह नदियों - मिठासन, बंधने, फलने, ब्यारमा आदि का मिलन केन में होता है और यहीं से केन का विस्तार हो जाता है ।यहां से नदी छतरपुर जिले की पूर्वी सीमा को छूती हुई बहती है । आगे चल कर नदी का उत्तर बहाव विध्य पर्वत श्रंखलाओं के बीच संकुचित मार्ग में होता है । इस दौरान यह नदी 40 से 50 मीटर ऊंचाई के कई जल प्रपात निर्मित करती है । पलकोहां(छतरपुर) के करीब इसमें सामरी नामक नाला मिलता है । कुछ आगे चल कर नोनापंाजी के पास गंगउ तालाब है । इस पर एक बांध बना हुआ है । यहां से नदी उतार पर होती है । सो इसका बहाव भी तेज होता है । एक अन्य बांध बरियारपुर पर है ।
छतरपुर जिले की गौरीहार तहसील को छूती हुई यह नदी बांदा(उ.प्र.) जिले में प्रवेश करती है । रास्ते में इसमें बन्ने, कुटनी, कुसियार, लुहारी आदि इसकी सहायक नदियां हैं । बांदा जिले में इसके बाएं तट पर चंद्रावल नदी और दाएं तट पर मिरासन नाला आ जुड़ता है । कोई 30 हजार वर्ग किमी जल-ग्रहण क्षमता वाली इस नदी को 1906 में सबसे पहले बंाधा गया । खजुराहो से कुछ ही किलोमीटर दूरी पर स्थित ,सन 1915 में बना गंगउ बांध इतना जर्जर हो चुका है कि किसी भी समय उसमें जमा अथाह जल-निधि दीवारें तोड़ कर बाहर आ सकती हैं। सनद रहे कि मध्यप्रदेश के छतरपुर की सीमा में पांच ऐसे बांध है जिनका मालिकाना हक उ.प्र. का है। लिहाजा इनमें जमा पानी तो उ.प्र. लेता है, लेकिन इनसे उपजे संकटों जैसे - सीलन, दलदल, बाढ़ आदि को म.प्र. झेलता है।
म.प्र. में केन और सिमरी नदी के मिलन स्थल पर बना गंगउ बांध गत कई सालों से बेकार घोशित हो चुका है। ऐसा नहीं है कि गंगउ की जर्जर हालत के बारे में उ.प्र. सरकार को जानकारी नहीं है। इस बांध की मुख्य वियर की निरीक्षण गैलेरी, चैनल गेट की रैलिंग और पुल नंबर चार की कोई 100 मीटर दीवार सन 2003 में ही खराब हो गई थी। चूंकि बांध के मुख्य हिस्से संरक्षित वन क्षेत्र‘ पन्ना राश्ट्रीय वन’ में आते हैं , सो सुप्रीम कोर्ट से इसकी मरम्म्त की अनुमति ली गई थी। कहा जाता है कि राज्य सरकार के पास बजट की कमी थी और मरम्मत का काम कामचलाउ किया गया। बीते चार सालों में कम बारिश के कारण यह बांध भरा ही नहीं सो इसके टूटे-फूटे हिस्सों पर किसी का ध्यान गया नहीं।
बगैर सोचे समझे नदी-नालों पर बंधान बनाने के कुप्रभावों का ताजातरीन उदाहरण मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बहने वाली छोटी नदी ‘‘केन’’ है । बुंदेलखंड सदैव से वाढ़ सुरक्षित माना जाता रहा है । गत डेढ दशक से केन अप्रत्याशित ढंग से उफन रही है, और पन्ना, छतरपुर और बांदा जिले में जबरदस्त नुकसान कर रही है । केन के अचानक रौद्र हो जाने के कारणों को खोजा तो पता चला कि यह सब तो छोटे-बड़े बांधों की कारिस्तानी है । सनद रहे केन नदी, बांदा  जिले में चिल्ला घाट के पास यमुना में मिलती है । जब अधिक बारिश होती है, या किन्हीं कारणों से यमुना में जल आवक बढ़ती है तफ इसके बांधों के कारण इसका जल स्तर कुछ अधिक ही बढ़ जाता है । उधर केन और उसके सहायक नालों पर हर साल सैकड़ों ‘‘स्टाप-डेम’’ बनाए जा रहे हैं, जो इतने घटिया हैं कि थोड़ा ही जल संग्रहण होने पर टूट जाते है । केन में बारिश का पानी बढ़ता है, फिर ‘‘स्टाप-डेमों’’ के टूटने का जल-दबाव बढ़ता है । पन्ना जिले में इटवांखास गांव के पास निर्माणाधीन सिरस्वाहा बांध और बिलखुर बांध पहली ही बरसात में कच्ची मिट्टी के घंरोदों की तरह ढह गए हैं। फिर इस बर बरसात का जल रोकने के नाम पर गांव-गांव में खूब चैक डेब बना दिए गए, ना तो उसकी िडजाईन का ध्यान रखा गया और ना ही गुणवत्ता का। जो पहली बरसात हुई, ये संरचनांए बह गई व इससे नदियों में पानी का वेग तेज हो गया। बेतरतीब रेत निकालने और पत्थर निकाल कर स्टोन क्रशर में डालने, नदियों केजल ग्रहण क्षेत्र में वनस्पति कम होने और नंग ेपहाउ़ो ंसे जम कर मिट्टी बहने के चलते इलाके की नदियां पहले ही उथली हो गई हैं। ऐसे में वेग से आया पानी तबाही ही मचाताएगा।
यह भी तथ्य है कि साथ ही केन की राह पर स्थित पुराने ‘‘ओवर-एज’’ हो गए बांधों में भी टूट-फूट होती है । यानी केन क्षमता से अधिक पानी ले कर यमुना की और लपलपाती है । वहां का जल स्तर इतना उंचा होता है कि केन के प्राकृतिक मिलन स्थल का स्तर नीचे रह जाता है । रौद्र यमुना, केन की जलनिधि को पीछे ढकेलती है । इसी कशमकश में नदियों की सीमाएं बढ़ कर गांवों-सड़कों -खेतों तक पहुंच जाती हैं । इन दिनों  बांदा के भूरा गढ में केन का जल स्तर 108.20 मीटर पर है और इसके बेक-स्ट्रोक का ही प्रभाव है कि बांदा से पन्ना तक इसके व इसकी सहायक नदियों - मिढासन, ब्यारमा, पतने, गलका आदि के किनारे बसे खेत-गांव पानी-पानी हो गए हैं।
अचानक हुई तेज बरसात ने कई सउ़के बहा दीं, खेतांे ंमे ंपानी भरने से वहां बोया गया बीज मरने की संभावना है। यानि राहत की बरसात दुख का कारक बन गई। ऐसे हालातों से निबटने के लिए इलाके के पारंपरिक तालबों को गहरा कर उनके जल ग्रहण क्षेत्र को कब्जों से मुक्त करना, केन व उसकी सहायाक नदियों की गहराई पर ध्यान देना, मुख्य नदी को तालाबों से जोडना आदि ऐसे उपाय है जो कि बुंदेलखंड को प्राकृतिक आपदाओं की देहररी मार से बचा सकते हैं।



शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

This can not be a pond or lake

कम से कम यह तालाब तो नहीं कहलाता 

                                                                                                                                            पंकज चतुर्वेदी

जनसंदेश टाईम्‍स, उप्र 9 जुलाई 16
‘‘ कुलपहाड़ कस्बे के देहाती क्षेत्र की पंचयात में पिछले दिनों कुछ अफसर व एनजीओ वाले आए, वन विभाग की जमीन पर बने पुराने तालाब पर एक घंटे पोकलैंड मशीन चलाई, दूसरे तालाब पर एक घंटे में पत्थर लगवाए , फोटो खिंचवाए और चले गए। ग्राम सरपंच वीरेन्द्र यादव (भान सिंह का खुड़ा) उनसे कहते रहे कि इसमें पानी नहीं टिकेगा क्योंकि इसके निचले हिस्से को खुला छोड़ दिया है, पर किसी ने सुनी नहीं। एक जुलाई को पानी बरसा तो उसमें पानी तो ठहरा नहीं, हां, वहां से निकल पर पानी की धार ने ढेर सारी जमीन काट और दी। सरचंप श्री यादव दुखी हैं कि यह योजना तालाब बचाने से ज्यादा फोटो खिंचाने की है। ’’हाल ही मेंें सेंटर फार साईंस एंड इनवायरमेंट(सीएसई) ने बुंदेलखंड के सूखे पर झांसी में एक सेमीनार और अगले दिन महोबा और बांदा जिले के कुछ ऐसे इलाकों के भ्रमण का अयोजन किया, जहां तालाब खेत बनाए जा रहे हैं।
केंद्र सरकार के पिछले महीने आए  बजट में यह बात सुखद है कि सरकार ने स्वीकार कर लिया कि देश की तरक्की के लिए गांव व खेत जरूरी हैं, दूसरा खेत के लिए पानी चाहिए व पानी के लिए बारिश की हर बूंद को सहेजने के पारंपरिक उपाय ज्यादा कारगर हैं। तभी खेतों में पांच लाख तालाब खोदने व उसे मनरेगा के कार्य में षामिल करने का उल्लेख बजट में किया गया । सबसे बड़े सवाल खड़े हुए खेत-तालाब योजना पर। इस योजना में उत्तर प्रदेश सरकार कुल एक लाख पांच हजार का व्यय मान रही है और इसका आधा सरकार जमा करती है, जबकि आधा किसान वहन करता है। असल में इस येाजना को जब राज्य सरकार के अफसरों ने कुछ एनजीओं के साथ मिल कर तैयार किया था तो उसमें मशीनों से काम करवाने का प्रावधान नहीं था। यह खुदाई इंसान द्वारा की जानी थी, सो इसका अनुमानित व्यय एक लाख रखा गया था। बाद में पलायन के कारण यहां मजूदर मिले नहीं, लक्ष्य को पूरा करना था, सो आधे से भी कम व्यय में मशीने लगा कर कुंड खोदे गए। यही नहीं इसके लिए किसान को पंजीकरण उप्र सरकार के कृशि विभाग के पोर्टल पर आनलाईन करना होता है। कहने की जरूरत नहीं कि यह किसान के लिए संभव नहीं है। और यहीं से बिचौलियों की भूमिका षुरू हो जाती है। जिसमें पंजीकरण करने, खाते में पैसा डलवने, मशीन की व्यवस्था, फोटो ख्ंिाचवा कर काम का सत्यापन का पूरा पैकेज होता है।
कृशि विज्ञान केंद बांदा के निदेशक प्रो. एनके बाजपेयी अपने राजस्थान के अनुभवों को साझा कर कहते हैं कि बीस गुणा बीस फुट आमाप व 10 फुट गहराई का तालाब ठीक से बनाया जाए तो उससे एक एकड़ में सिंचाई हो जाती है।, लेकिन ऐसे तालाब बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है स्थान का चयन। ऐसे तालाब जल ग्रहण क्षेत्र, ऊंचाई वाले स्थान और ऐसी जगह होना चाहिए जहां से पानी बह कर जाता हो, तभी ये सफल होते हैं। वे ऐसे कुंड की सफलता के लिए प्लास्टिक की तली लगाने का सुझाव देते हैं। विडंबना है कि महोबा, बांदा में खेतो ंमें रोपे गए अधिकांश तालाबों में वहां की भूवैज्ञानिक संरचना को गंभीरता से लिया नहीं गया। वहां तो लक्ष्य पूर्ति, मशीन का एक दिन में ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल और वाह-वाही लूटने की होड़ मची है।
महोबा से कानपुर जाने वाले मुख्य मार्ग पर रिवई पंचायत में तीन गंाव आते हैं। यहां खेतो में अभी तक 25 तालाब बने। इनमें से अधिकांश तालाब गांव के रसूखदार बड़े लेागेां के खेत में हैं। हकीकत तो यह है कि तैयार की गई संरचना को तालाब तो नहीं कहा जा सकता। यह कुंड हैं जोकि चार मीटर गहरा है और उसकी लंबाई चौड़ाई 30 गुणा 25 मीटर लगभग हैं। यह पूरा काम पानी की आवक या निकासी के गणित को सोच बगैर पोकलैंड मशीनों से करवाया जाता है और इसका असल खर्च सरकारी अनुदान से भी कम होता हैं। कहने की जरूरत नहीं कि अर्जी को सरकारी मेज पर खिसकाने, पोकलैंड मशीन लाने व ऐसे ही कई कामों में मध्यस्थ के बगैर बात नहीं बनती और इसके लिए कुछ एनजीओबाज लेाग सक्रिय भी हैं। यह भी जानना जरूरी है कि तालाब महज एक गड्ढा नहीं है, जिसमें बारिश का पानी जमा हो जाए और लोग इस्तेमाल करने लगें। तालाब कहां खुदेगा, इसको परखने के लिए वहां की मिट्टी, जमीन पर जल आगमन व निगमन की व्यवस्था, स्थानीय पर्यावरण का खयाल रखना भी जरूरी होता है। तालाब की सीधी चार मीटर की गहराई में कोई मवेशी तो नीचे उतर कर पानी पी नहीं सकता, , इंसान का भी वहां तक पुहंचना खतरे से खाली नहीं हैं। लापेारिया, राजस्थान में कई तालाब बनाने वाले लक्ष्मण सिंह का कहना है कि इस संरचना को तालाब तो कहते नहीं है और इस तरह की आकृति भले ही तात्कालिक रूप से जमीन की नमी बनाए रखने या सिंचाई में काम आए, लेकिन इसकी आयु ज्यादा नहीं होती।
गत दो दशकों से पानी और तालाब जैसे मुद्दो के प्रति संवेदनशील बेलाताल के पत्रकार कैलाश सोनी मुख्यमंत्री व सांसद उमा भारती द्वरा बनाई गई जल सलाहकार समिति के सदस्य भी हैं। श्री सोनी के अनुसार यह योजना मायावती के समय मुख्य सचिव रहे एक अफसर ने बनाई थी, जिसे अभी कुछ एनजीओ ने फिर से प्रस्तुत किया। इसके तहत बनी संरचना तालाब तो है नहीं, हां, इससे मवेशी, रात-बिरात खेत से गुजर रहे लोगों के गिरने का खतरा जरूर खड़ा हो गया है।
यह भी देखा गया है ग्रेनाईट संरचना वाले इलाकों में कुएं या तालाब खुदे, रात में पानी भी आया और कुछ ही घंटों में किसी भूगर्भ की झिर से कहीं बह गया। दूसरा , यदि बगैर सोचे -समझे पीली या दुरमट मिट्टी में तालाब खोद तो  धीरे-धीरे पानी जमीन में बैठेगा, फिर दल-दल बनाएगा और फिर उससे ना केवल जमीन नश्ट होगी, बल्कि आसपास की जमीन के प्राकृतिक लवण भी पानी के साथ बह जाएंगे। षुरूआत में भले ही अच्छे परिणाम आएं, लेकिन यदि नमी, दलदल, लवण बहने का सिलसिला महज पंद्रह साल भी जारी रहा तो उस तालाब के आसपास लाइलाज बंजर बनना वैज्ञानिक तथ्य है।
दिल्ली व भोपाल से गए पत्रकारों को एक खेत-कंुड या तालाब दिखाया गया और बताया गया कि यह पहली बारिश में इतना भर गया। असल में हुआ यूं कि इस तालाब या कुंड से सटा खेत निचाई पर है और उसमें एक दिन बरसा जबरदस्त पानी भर गया। इस खेत में एक चौडा सीमंेट पाईप लगा कर उस कुंड को भरा गया। असल में धनंजय ंिसंह के उस खेत में बने तालाब में पानी आने का रास्ता ही नहीं है।इस तालबा के पानी की असलियत खोल दी उसी पंचायत में डेढ किलोमीटर दूर स्थित मालगुजारी तालबाभगवंत सागर ने। यह तालाब रिवई पंचायत के ही सुनेचा गांव की हद से लगा हैं और 22 बीघे का है। यहां पर नोएडा की एक कारपोरेट फर्म ने समाज सेवा कर कर बचाने की योजना के तहत तालाब के गहरीकरण का प्रकल्प किया था। वहां पत्रकारों के आने की खबर के पांच दिन पहले बड़ी-बड़ी मशीने लगाकर बेतरतीब खुदाई कर दी गई । जिस तरफ तालाब का पहले से उंचा हिस्सा था, उसके पाल पर मिअ्टी डाल दी और निचले हिस्से को खुला छोड़ दिया। ख्ुादाई भी ऐसी ककि हीं एक फुट तो कही पांच फुट। इस तालाब की छह इंच गहराई तक मिट्टी में नमी नहीं थी। जरा सोचें कि क्या यह संभव है कि एक बारिश में एक जगह दो फुट पानी भर जा और उससे दो किलोमीटर से भी कम स्थान पर मिट्टी मंें नमी भी ना हो। सनद रहे हैं कि अकेले इसी पंचात के तहत पुराने चर तालाब हैं जो देखभाल या कब्जों के चलते समाप्त हो गए हैं। तालाबबाज एनजीओ ऐसे तालाबों के संरक्षण से बचते हैं और उसमें कारपोरेट को घुसेडते हैं, उनकी असली रूचि सरकार से सबसिडी ले कर तालाब के नाम पर मशीनों से गढडे खोदने में हैं।
इसमें कोई षक नहीं कि नए तालाब जरूर बनें, लेकिन आखिर पुराने तालाबों का जिंदा करने से क्यांे बचा जा रहा है? लेकिन तालाब के नमा पर महज गढडे खेादना इसका विकल्प नहीं है। तालाब गांव की लेाक भावना का प्रतीक हैयानि सामूहिक, सामुदायिक, जबकि खेतों में खुदे कुंड निजी। उसमें भी पैसे वाले कसिान जोकि 52 हजार जेब में रखता हो, उन्हीं के लिए। ऐसे खेत तालाब तात्कालिक रूप् से तो उपयेागी हो सकते हैं, लेकिन दूरगामी सोच तो यही होगी कि मद्रास रेसीडेंसी के ‘ऐरी तालाब प्रणाली’’ के अनुरूप् सार्वजनिक तालाबों को संरक्षित किया जा व उसका प्रबंधन समाज को सौंपा जाए।


गुरुवार, 7 जुलाई 2016

Aadhar will be mandatary for rail ticket

रेलवे के लायक तो मजबूत नहीं है ‘आधार’ का आधार

राज एक्सप्रेस
                                                                     पंकज चतुर्वेदी
इसमें कोई शक नहीं है भारत में रेलवे 163 साल पुरानी होने के बाद भी यात्रियों की उम्मीदों की कसौटी पर खरी नहीं उतर पा रही है। भीड़ इसकी सबसे बड़ी दिक्कत है व उससे ही उपज रही है गंदगी, लेटलतीफी, सार्वजनिक सुविधाओं की कमी आदि। पिछले दो दशक के दौरान कंप्यूटर से आरक्षण व्यवस्था लागू होने के बाद से ही रेलवे की बड़ी चुनौती इसमें भ्रश्टाचार, बिचौलिये, दलाल व अत्याधुनिक तकनीक को भी गच्चा दे कर जायज यात्रियों की सीटें उड़ाकर बउ़े कमीशन में बेचना रहा है।  फिलहाल रेलवे ने तय किया है कि अब हर टिक्ट खरीदने वाले को अपना आधा नंबर जरूर बताना होगा। यह योजना कुछ चरणों में लागू होगी व आने वाले छह महीने में इस पर पूरी तरह अमल हो जाएगा। इसमें कोई षक नहीं कि आधार से टिकट जुड़ने के कई लाभ हैं लेकिन हमारी ‘‘आधार -व्यवस्था’’ और रेल कर्मचारियों की कमजोर नियत को देखते हुए षक ही है कि यह योजना पूरी तरह कारगर होगी।
रेलवे टिकटों की कालाबाजरी रोकने और आरक्षित टिकटों के गोरखधंधे से निबटने में असफल रेलवे के लंबे-चौड़े अमले को अब सात साल पुरानी आधार याजना का सहारा है। गौर करना जरूरी है कि पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट सरकारी योजनओं में लाभ पाने के लिए आधार की अनिवार्यता पर पांबदी लगा चुकी है। ऐसे में रेलवे टिकट पर आधार की अनिवार्यता किस तरह लागू हो पाएगी, इस पर सवाल खड़े है।। शुरुआत में आधार कार्ड की जरूरत सिर्फ रिजर्वेशन कराने के लिए ही जरूरी होगा लेकिन बाद में इसे सभी प्रकार के टिकटों के लिए अनिवार्य कर दिया जाएगा। पहले चरण में वरिष्ठ नागरिक, स्वतंत्रता संग्राम सैनानी ,विकलांग जैसी विशेश छूट वालांे के लिए आधार कार्ड जरूरी किया जाएगा। अनुमान है कि जुलाई महीने के अंत तक यह लागू हो जाएगा। उसके बाद आधार कार्ड की जरूरत सिर्फ आरक्षित टिकट बुक कराने के लिए ही अनिवार्य होगी। आगे चल कर सभी प्रकार के टिकटों के लिए इसे अनिवार्य कर दिया जाएगा। सरकार का दावा है कि देश की 96 फीसदी आबादी आधार नंबर पा चुकी है। योजना के अनुसार टिकट बुकिंग के समय आधार कार्ड संख्या यात्रा टिकट पर छपी होगी। चलती ट्रेन में टिकट निरीक्षक एक डिवाईस के साथ चैकिंग करेंगे व आधार नंबर डालते ही उनके सामने यात्री का फोटो व अन्य विवरण होगा। ऐसे में फर्जी नाम से टिकट बुक करवाना या यात्रा करना असंभव हो जाएगा।
यह येाजना कितनी सफल होगी, उसके लिए पिछले साल राजस्थान के सीकर की इस घटना को याद कर लें, जहां .हनुमानजी के नाम से भी आधार कार्ड जारी हो चुका है। कार्ड पर उनकी तस्वीर छपी है। पिता के नाम के आगे ‘पवनजी’ लिखा है। उस पर पता ‘वार्ड नंबर-छह दांतारामगढ़, पंचायत समिति के पास, जिला सीकर’ लिखा है। फोटो भी हनुमानजी का। इस आधार कार्ड पर पंजीयन क्रमांक 1018/18252/01821 है। कार्ड का नंबर है 209470519541। देश के दूरस्थ अंचल की क्या कहें राजधानी दिल्ली के राश्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आने वाले गाजियाबाद जिले के षहरी इलाकों के आधार कार्ड आए रोज कूड़े में या लावारिस मिलते रहते हैं। यहां लेागों का आधार पंजीयन तो हो गया, लेकिन उन तक र्काउ नहीं पहुंचे। जो कंप्यूटर जानते हैं या जिनकी मजबूरी रही, उन्होंने तो खुद अपना कार्ड प्राप्त कर लिया, लेकिन नियमानुसार होने वाली सरकारी डिलेवरी यहां षत प्रतिशत असफल रही है।  इन हालातों में आधार का रिकार्ड क्या वास्तव में 96 फीसदी आबादी का उपलब्ध है और वह प्रामाणिक है, इस पर सवालिया निशान तो है ही।
जहां तक रेलवे टिकटों के धंधे की बात है तो यह मान लें कि बगैर स्टाफ की मिलीभगत के यह होता नहीं है। हर ट्रैन के हर प्लेटफसर्म पर पहुंचने पर टीटी के पास खड़ी भीड़, अचानक एसी प्रथम में अवांछित लोगों को सोने को मिल जाना , आम बात है और यह सब बगैर किसी जायज टिकट या आरक्षण के रेलवे के चैकिंग कर्मचारियों की सहमति या मिलीभगत से ही हेाता है। ऐसे में आधार कार्ड कहां तक उपरी कमाई को रोक पाएगा।  फिर बगैर आरक्षण के यात्रा करने वले गरीब लोगों या आकस्मिक यात्रा करने वलों का ट्रेन में चढ़ना संभव ही नहीं होगा, क्योंकि फिलहाल यह संभव नहीं लगता कि इंसान हर समय अपने साथ आधार कार्ड ले कर चलेगा।
ऐसा नहीं है कि आधार से यात्री टिकट को जोड़ने में कुछ गलती है। यह एक आदर्श स्थिति है और इससे रेलवे स्टेशन पर जमा होने वाली बेवहज की अवांछित भीड़ को नियंत्रित किया जा सकता है। दूसरा देलवे में होने वाले अपराध, आकस्मिक दुघर्टना की स्थिति में लापता लेागों की वास्तविक संख्या व पहचान को तलाशना भी सरल होगा। लेकिन यह भी जान लें कि यह तभी संभव है जब रेलवे की कुल भीड़ के लिए पर्याप्त सीट उपलब्ध हों, छोटे स्टेशनों पर आगमन व निर्गमन की चाक चौंबंद व्यवस्था हो और स्टाफ कर्मठ ,ईमानदार और प्रतिबद्ध हो।
आधार का पूरा डाटा रेलवे के कर्मचारियों को उपलब्ध करवा देने का बससे बड़ा संकट है कि पूरी आबादी के डाटा बेस के लीक होने, बेचने व दुरूप्योग की संभावना। यदि ऐसा होता है तो यह देश की सुरक्षा और व्यक्ति की निजता पर बड़ा खतरा होगा। रेलवे को आधार की अनिवार्यता षुरू करने से पहले एक बार फिर उपलब्ध सुविधाओं, ट्रैन में स्थान, गाडियों की लेटलतीफी, उसमें सफाई जैसी सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। भारतीय रेल हमारे देश की कैसी छबि यात्रियों के समक्ष प्रस्तुत करती है, इसके लिए दिल्ली निजामुद्दन स्टेशन से फरीदाबाद का बामुश्किल 20 किलेामीटर का सफर बोगी के दरवाजे पर खड़े हो कर कर लें,- दोनेा तरफ कूड़ें गंदगी का अंबार, पटरी पर षराब पीते लोग, ख्ुाली नालियां, बदबू , बता देगी कि डिजिटल इंडिया के बनिस्पत मूलभूत सुविधाअें ंपर ध्यान देना जरूरी हे। हो सकता है कि किसी कंपनी से थोक में डाटा वाली हैंड डिवाईस खरीी का अनुबंध योजना की असली जड़ हो, तभी बगैर किसी तैयारी के इसे लागू करने पर रेल मंत्रालय अड़ा हुआ है।

सोमवार, 4 जुलाई 2016

Drops of hope in drought prone bundelkhand

Farm pond can not be a lake or pond

कम से कम यह तालाब तो नहीं है
पंकज चतुर्वेदी
दैनिक जागरण 5-7-16
बुंदेलखंड क्षेत्र के कुलपहाड़ कस्बे के देहाती क्षेत्र की पंचयात है-इनौरा। पिछले दिनों कुछ अफसर व एनजीओ वाले उनके यहां आए, वन विभाग की जमीन पर बने पुराने तालाब पर एक घंटे पोकलैंड मशीन चलाई, दूसरे तालाब पर एक घंटे में पत्थर लगवाए, फोटो खिंचवाए और चले गए। ग्राम सरपंच वीरेन्द्र यादव (भान सिंह का खुड़ा) उनसे कहते रहे कि इसमें पानी नहीं टिकेगा क्योंकि इसके निचले हिस्से को खुला छोड़ दिया है, पर किसी ने सुनी नहीं। एक जुलाई को पानी बरसा तो उसमें पानी तो ठहरा नहीं, दूसरी तरफ वहां से निकली पानी की धार ने ढेर सारी जमीन काट और दी। सरचंप श्री यादव दुखी हैं कि यह योजना तालाब बचाने से यादा फोटो खिंचाने की है। हाल ही में सेंटर फार साइंस एंड इनवायरमेंट (सीएसई) ने बुंदेलखंड के सूखे पर झांसी में एक सेमीनार और अगले दिन महोबा और बांदा जिले के कुछ ऐसे इलाकों के भ्रमण का अयोजन किया, जहां तालाब खेत बनाए जा रहे हैं। इस आयोजन में राजस्थान के लापोडिया में तालाब गढने वाले लक्ष्मण सिंह से ले कर मराठवाड़ा से ललित बाबर व पंडित वासरे, बुंदेलखंड से ही कई पानी-सहेजने वाले अनुभवी लोग शामिल हुए थे। झांसी से 225 किलोमीटर के रास्ते में यह देखना सुखद था कि सड़क के दोनों तरफ किसानों ने अपने खेतों में तालाब से निकली काली गाद को बिछा रखा था। सनद रहे इलाके के कई बड़े तालबों की सफाई व गहराई का काम कहीं सरकार तो बहुत सी जगह आम लोग कर रहे हैं। पहली ही बारिश में उसका असर भी दिखा और जल-निधियां तर हो गईं।
एक दशक के दौरान कम से कम तीन बार उम्मीद से कम मेघ बरसना बुंदेलखंड की सदियों की परंपरा रही है। यहां के पारंपरिक कुएं, तालाब और पहाड़ कभी भी समाज को इं्रद्र की बेरूखी के सामने झुकने नहीं देते थे। जिन लोगों ने तालाब बचाए, वे प्यास व पलायन से निरापद रहे। अनेक विद्वानों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बनी जल संचय प्रणालियों का गहन अध्ययन कर उनका विवरण प्रस्तुत किया है। इस विवरण में जल संरचनाओं की विविधता के साथ-साथ उस क्षेत्र की जलवायु से उनका सह-संबंध प्रतिपादित होता है।
केंद्र सरकार के पिछले महीने आए बजट में यह बात सुखद है कि सरकार ने स्वीकार कर लिया कि देश की तरक्की के लिए गांव व खेत जरूरी हैं, दूसरा खेत के लिए पानी चाहिए व पानी के लिए बारिश की हर बूंद को सहेजने के पारंपरिक उपाय यादा कारगर हैं। तभी खेतों में पांच लाख तालाब खोदने व उसे मनरेगा के कार्य में शामिल करने का उल्लेख बजट में किया गया है। खेत में तालाब यानि किसान के अपने खेत के बीच उसके द्वारा बनाया गया तालाब, जिससे वह सिंचाई करे, अपने इलाके का भूजल स्तर को समृद्ध करे और तालाब में मछली, सिंघाड़ा आदि उगा कर कमाई बढ़ाए। ऐसा भी नहीं है कि यह कोई नया या अनूठी योजना है। इससे पहले मध्य प्रदेश में बलराम तालाब, और ऐसी ही कई योजनाएं व हाल ही में उ.प्र. के बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाके में कुछ लोग ऐसे प्रयोग कर रहे हैं। सरकारी सोच की तारीफ इसलिए जरूरी है कि यह तो माना कि बड़े बांध के व्यय, समय और नुकसान की तुलना में छोटी व स्थानीय सिंचाई इकाई यादा कारगर हैं।
सबसे बड़े सवाल खड़े हुए खेत-तालाब योजना पर। इस योजना में उत्तर प्रदेश सरकार कुल एक लाख पांच हजार का व्यय मान रही है और इसका आधा सरकार जमा करती है, जबकि आधा किसान वहन करता है। असल में इस येाजना को जब राय सरकार के अफसरों ने कुछ एनजीओं के साथ मिलकर तैयार किया था तो उसमें मशीनों से काम करवाने का प्रावधान नहीं था। यह खुदाई इंसान द्वारा की जानी थी, सो इसका अनुमानित व्यय एक लाख रखा गया था। बाद में पलायन के कारण यहां मजूदर मिले नहीं, लक्ष्य को पूरा करना था, सो आधे से भी कम व्यय में मशीने लगा कर कुंड खोदे गए। यही नहीं इसके लिए किसान को पंजीकरण उप्र सरकार के कृषि विभाग के पोर्टल पर ऑनलाइन करना होता है। कहने की जरूरत नहीं कि यह किसान के लिए संभव नहीं है। और यहीं से बिचौलियों की भूमिका शुरू हो जाती है।
हालांकि यह भी सही है कि जो संरचना तैयार की गई है, उसे तालाब तो नहीं कहा जा सकता। यह कुंड है जो कि चार मीटर गहरा है और उसकी लंबाई चौड़ाई 30 गुणा 25 मीटर लगभग हैं। यह पूरा काम पानी की आवक या निकासी के गणित को सोचे बगैर पोकलैंड मशीनों से करवाया जाता है और इसका असल खर्च सरकारी अनुदान से भी कम होता हैं।
तालाब की सीधी चार मीटर की गहराई में कोई मवेशी तो नीचे उतर कर पानी पी नहीं सकता। इंसान का भी वहां तक पुहंचना खतरे से खाली नहीं हैं। फिर यहां की पीली मिट्टी, जो कि धीरे-धीरे पानी को सोखती हैं व गहराई से दलदल का निर्माण करती है। लापोरिया, राजस्थान में कई तालाब बनाने वाले लक्ष्मण सिंह का स्वयं कहना है कि इस तरह की संरचना को तालाब तो नहीं ही कह सकते हैं। इस तरह की आकृति भले ही तात्कालिक रूप से जमीन की नमी बनाए रखने या सिंचाई में काम आए, लेकिन इसकी आयु यादा नहीं होती।
इसमें कोई शक नहीं कि नए तालाब जरूर बनें, लेकिन आखिर पुराने तालाबों को जिंदा करने से क्यांे बचा जा रहा है? लेकिन तालाब के नाम पर महज गड्ढे खोदना इसका विकल्प नहीं है। तालाब गांव की लेाक भावना का प्रतीक हैं यानि सामूहिक, सामुदायिक, जबकि खेतों में खुदे कुंड निजी। उसमें भी पैसे वाले किसान जो कि 52 हजार जेब में रखता हो, उन्हीं के लिए। ऐसे खेत तालाब तात्कालिक रूप से तो उपयेागी हो सकते हैं, लेकिन दूरगामी सोच तो यही होगी कि मद्रास रेसीडेंसी के ‘ऐरी तालाब प्रणाली’’ के अनुरूप सार्वजनिक तालाबों को संरक्षित किया जाए व उसका प्रबंधन समाज को सौंपा जाए।
चाहे कालाहांडी हो या बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना; देश के जल-संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार भी होते थे। तालाब महज पानी सहेजने का जरिया नहीं होते, उका पूरा एक पर्यावणीय तंत्र होता है। जो पंक्षी, मछली, पेड़, गाद, समाज को एक-दूसरे पर निर्भर रहने का संदेश देता है। जबकि खेत में बनाए गए कुंड दिखावे या तात्कालिक जरूरत की पूर्ति के लिए हैं। पुराने तालाब मछली, कमल गट्टा , सिंघाड़ा, कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी ; यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं। तालाबों का पानी यहां के कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे। शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है।
काश किसी बड़े बांध पर हो रहे समूचे व्यय के बराबर राशि एक बार एक साल विशेष अभियान चला कर पूरे देश के पारंपरिक तालाबों की गाद हटाने, अतिक्रमण मुक्त बनाने में खर्च कर दिया जाए तो भले ही कितनी भी कम बारिश हो, ना तो देश का कोई कंठ सूखा रहेगा और ना ही जमीन की नमी मारी जाएगी।

शनिवार, 2 जुलाई 2016

Talaab Pimps are active in Bundelkhand

दलाल अब तालाब भी नहीं छोड रहे हैं 

बुंदेलखंड के उप्र के महोबा जिले की रिवई पंचायत के तीन गांव हैं पास पास ही, वहां खेतों में तालाब बनाने की योजना के तहत 26 तालाब बन गए जिसमें किसानों को उनके खाते में सीधे 52 हजार पांच सौ का भुगतान हुआ.बहरहाल यह अलब बहस है कि क्‍या केवल चौरस खोदा गया गढडा तालाब कहलाएगा या नहीं . जिसमें मवेशी या इंसान नीचे तक नहीं उतर सकता. लेकिन यहां चार पुराने तालाब भी हैं जो लगभग समाप्‍त हो रहे हैं, एक में गांव की गंदी नालियां जा रही हैं, तालाब प्रेमी बन कर उभरे कतिपय समाजसेवियों को उनकी चिंता नहीं रही. इसमें कारपोरेट भी घुस आयाा. नोएडा का एक समूह है धरमपाल सत्‍यपाल = रजनीगंधा के नाम से उत्‍पाद हैं उनके. उनका भी इलाके में कारपोरेट सोशल रिस्‍पोंसेबिलीटी के तहत प्रोजेक्‍ट है. सुनेचा गांव के बाहर एक पुराना तालाब है भगवत सागर, शायद चार सौ साल पुराना मालगुजारी तालाब, लगभग 22 बीघे का होगा. इसमें पानी अाने के पारंपरिक हिस्‍से को घेर कर खेत बना लिया गया. पुलिया में पत्‍थर फंसा दिए गए, लेकिन जैसे ही खबर मिली कि दिल्‍ली से कुछ पत्रकार आ रहे हैं तो चार दिन जेसीबी व पोकलैंड मशीन लगा कर उसकी बेतरतीब खुदाई करवा दी गई. कहीं एक फुट गहरा तो कहीं पांच फुट, कहीं बिल्‍कुल नहीं. फिर काम बंद कर दिया गया. कोई सामान्‍य नजर से भी देखेगा तो पता चल जाएगा कि पुराने बुंदेली मालगुजारी तालाब के बडे हिस्‍से पर लेाग कब्‍जा कर चुके हैं और यह पूरी तरह खाली पडा है. इसमें खुदाई के नाम पर दखिावा भी हुआ, लेकिन इसमें पानी कभी नहीं भरेगा. यह है तालाब बाजों के कारनामे जाे अब कारपोरेटों को सामाजिक जिम्‍मेदारी के नाम पर तालाबों के साथ इस तरह की छेडछाड करने के लिए आमंति्रत कर रहे हैं और दो हजार गडढे खुदवाने का काम तो चल ही रहा है. जरा इन चित्रो में देखें, तालाब का जो हिस्‍सा उंचा हैं वहां मिट्रटी खोदक र डाल दी और जहां से निकासी होना चाहिए उसे खुला छोड दिया गया. गांव के पास स्थित मंगल तालाब जिसका रकवा आठ हेक्टेयर से अधिक है मोती तालाब का रकवा पांच हेक्टेयर से अधिक है तथा हनुमान तलैया का रकवा भी चार हेक्टेयर के आसपास है। फिर भी इन तालाओं के गहरीकरण कराये जाने की शासन प्रशासन सुध नही ले रहा है।ऐसे ही दलाल आज फोन कर गाली दे रहे हैा मुझे,धमकी दे रहे है, मैं सन 1986 से बुंदेलखंड के तालबों पर लखि रहा हूं और दलाल मुझे घटिया लेखक कह रहे हैं जिन्‍होंने इस इलाके को अभी दो साल पहले ही देखा होगा. यह उनकी खीज है, आगे भी और ऐसे ही खुलासे करूंगा.यहां भी और अन्‍य माध्‍यमों पर भी.
यहां कर्जा दिलवाने, मशीने किराये पर लाने, कारपोरेट के अधूरे कामों को वाह वाही दिलवाने के बाकायदा दलाल सक्रिय हैं जिनके चैहरे जल्‍द ही बेनकाब होंगे 







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