My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

wild fire in valley of flower

 फूलों की घाटी में बांस के अंगारे, एक चिंगारी इस सुंदर स्थान के लिए बन जाती है काल 



पूर्वोत्तर ही नहीं, पूरे देश के सबसे खूबसूरत ट्रेकिंग इलाके और जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध और संवेदनशील दजुकू घाटी में 29 दिसंबर, 2020 से जो शोले भड़कने शुरू हुए, अभी भी शांत नहीं हो पा रहे हैं। 11 जनवरी, 2021 को जब आपदा प्रबंधन टीम ने यह सूचित किया कि अब कोई नई आग नहीं लग रही है, तब तक इस जंगल का 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जलकर राख हो चुका था। यह स्थान नगालैंड व मणिपुर की सीमा के करीब है। दस दिन बाद भी आग पूरी तरह शांत नहीं हुई है। यह सुरम्य घाटी दुनिया भर में केवल एकमात्र स्थान पर पाई जाने वाली दजुकू-लिली के फल के साथ अपने प्राकृतिक वातावरण, मौसमी फूलों और वनस्पतियों व जीवों के लिए जानी जाती है। गत दो दशकों के दौरान यहां यह दसवीं बड़ी आग है।


अप्रैल से सितंबर तक के मौसम में इस घाटी को ‘फूलों की घाटी’ कहा जाता है। वहीं पूरे साल यहां की घाटी व पहाड़ पर बौने बांस का साम्राज्य होता है। विदित हो बांस की यह प्रजाति पूर्वी हिमालय और उत्तर-पूर्वी भारत की दजुकू घाटी और आसपास की पहाड़ियों पर पाई जाती है। यह जंगल पूरी तरह से बौने बांस से ढके हैं, जो दूर से खुली घास के मैदान की तरह दिखाई देते हैं। प्रकृति  की यह अनमोल छटा ही यहां की बर्बादी का बड़ा कारण है। बांस का जंगल इतना घना है कि कई जगह एक मीटर में सौ से पांच सौ पौधे। इस मौसम में हवा चलने से ये आपस में टकराते हैं, जिससे उपजी एक चिंगारी इस सुंदर स्थान के लिए काल बन जाती है। दजुकू घाटी और आसपास की पहाड़ियों के प्राचीन जंगलों को जंगल की आग से बड़े पैमाने पर खतरा है। यहां की अनूठी जैव विविधता जड़मूल से नष्ट हो रही है और घने जंगल के जानवर आग के ताप व धुएं से परेशान होकर जब बाहर आते हैं, तो उनका टकराव या तो इंसान से होता है या फिर हैवान रूपी शिकारी से। 



इस जंगल में जब सबसे भयानक आग वर्ष 2006 में लगी थी, तो कोई 70 वर्ग किलोमीटर के इलाके में राख ही राख थी। यहां तक की जाज्फू पहाड़ी का खूबसूरत जंगल भी चपेट में आ गया था। उसके बाद जनवरी-2011, फरवरी-2012,  मार्च-2017 में भी जंगल में आग लगी। नवंबर -2018 में भी जंगल सुलगे थे। इस बार की आग मणिपुर के सेनापति जिले में भी फैल गई है और राज्य की सबसे ऊंची पर्वतीय चोटी ‘माउंड इसो’ का बहुत कुछ भस्म हो गया है। बीते दस दिनों से नगालैंड पुलिस, वन विभाग, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के साथ-साथ दक्षिणी अंगामी यूथ एसोसिएशन के सदस्य आग बुझाने में लगे है। भारतीय वायु सेना के एमआइ-15वी हेलीकाप्टर एक बार में 3,500 लीटर पानी लेकर छिड़काव कर रहे है। वहीं लगातार तेज हवा चलने से आग बेकाबू तो हो ही रही है, राहत कार्य भी प्रभावित हो रहा है। इस समय विभिन्न संस्थाओं के दो हजार लोग आग को फैलने से रोकने में लगे है। हालांकि नगा समाज इस आग को साजिश मान रहा है। कोरोना के चलते दक्षिणी अंगामी यूथ एसोसिएशन के सदस्यों ने इस घाटी में आम लोगों के आवागमन को गत वर्ष मार्च से ही बंद किया हुआ है। नवंबर, 2018 में मणिपुर और नगालैंड सरकार के बीच हुए एक समझौते के मुताबिक, इस घाटी में प्रवेश के दो ही रास्ते खुले हैं- एक मणिपुर से, दूसरा उनके अपने राज्य से। कोरोना के समय यहां किसी का भी प्रवेश पूरी तरह रोक दिया गया था, जो अब भी जारी है।


नगा लोगों को शक है कि आग जानबूझ कर लगाई गई है व उसके पीछे दूसरे राज्य की प्रतिद्वंद्वी जनजातियां हैं। फिलहाल तो राज्य सरकार की चिंता आग के विस्तार को रोकना है। लेकिन साल दर साल जिस तरह यहां आग लग रही है, वह अकेले उत्तर-पूर्व ही नहीं, भारत देश व हिमालय क्षेत्र के अन्य देशों के लिए बड़ा खतरा है। हालांकि भारत में तमिलनाडु से लेकर थाईलैंड तक तेजी से बढ़ते बांस और उसमें आग की घटनाओं पर नियंत्रण के लिए कई शोध हुए हैं व तकनीक भी उपलब्ध है। विडंबना है कि हमारे ये शोध पत्रिकाओं से आगे नहीं आ पाते। जंगलों की जैव विविधता पर मंडराते खतरे से उपजे कोरोना और उसके बाद पक्षियों की रहस्यमय मौत से हम सबक नहीं ले रहे और प्रकृति की अनमोल भेंट इतने प्यारे जंगलों को सहेजने के स्थायी उपाय नहीं कर पा रहे हैं।


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शनिवार, 9 जनवरी 2021

Delhi can be topples due to earth quick

 कहीं दिल्ली की धरती डोल गई तो

पंकज चतुर्वेदी 


साल 2020 में दिल्ली व उसके आसपास के दायरे में कुल 51 बार घरती थर्राई। दिसंबर में तो दस दिन के भीतर दो बार  प्रकृति ने सबको झकझोर दिया। इस साल आए भूकंपो ंमें से तीन तो ‘पीली श्रेणी’ अर्थात रिक्टर पैमाने पर चार अंक से अधिक के थे। अभी 17 दिसंबर का भूकंप 4.2 का था और इसका केंद्र दिल्ली से बहुत करीब रेवाड़ी था। तीन जुलाई को आया 4.7 ताकत के भूकंप का केंद्र अलवर और 29 मई के 4.5 वाले जलजले का केंद्र रोहतक था। नेषनल सेंटर फार सिस्मोलोजी ने दिल्ली को खतरे के लिए तय जोन चार में आंका है। अर्थात यहां भूकंप आने की संभावनांए गंभीर स्तर पर हैं। यह सच है कि  धरती कब डोलेगी, इसका आकलन करना अभी बहुत मुष्किल है, लेकिन यह भी कड़वा सच है कि  भूकंप के संभावित नुकसान के कई  कारणों को ना केवल समाज ने खुद उपजाया है, बल्कि उसके प्रति अभी भी बेपरवाही है। 

भूकंप संपत्ति और जन हानि के नजरिए से सबसे भयानक प्राकृतिक आपादा है, एक तो इसका सटीक पूर्वानुमान संभव नहीं, दूसरा इससे बचने के कोई सषक्त तरीके हैं नहीं। महज जागरूकता और अपने आसपास को इस तरह से सज्ज्ति करना कि कभी भी धरती हिल सकती है, बस यही है इसका निदान। हमारी धरती जिन सात टेक्टोनिक प्लेटों पर टिकी है, यदि इनमें कोई हलचल होती है तो धरती कांपती है। .भारत आस्ट्रेलियन प्लेट पर टिका है और हमारे यहां अधिकतर भूकंप इस प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने के कारण उपजते हैं।  

कोई 1482 वर्ग किलोमीटर में फैली राजधानी दिल्ली की आबादी सवा दो करोड़ के करीब है और दिल्ली की किसी भी भूगर्भीय गतिविधि से गाजियाबाद, नोएडा, गुरूग्राम फरीदाबाद आदि को अलग किया नहीं जा सकता। यह सवा तीन करोड़ लोगों की बसावट का चालीस फीसदी इलाका अनाधिकृत है तो 20 फीसदी के आसपास बहुत पुराने निर्माण। बाकी रिहाईषों में से बामुष्किल पांच प्रतिषत का निर्माण या उसके बाद यह सत्यापित किया जा सका कि यह भूकंपरोधी है। बहुमंजिला मकान, छोटे से जमीन के टुकड़े पर एक के उपर एक डिब्बे जैसी संरचना, बगैर किसी इंजीनियर की सलाह के बने परिसर, छोटे से घर में ही संकरे स्थान पर रखे ढेर सारे उपकरण व फर्नीचर--- भूकंप के खतरे से बचने की चेतावनियों को नजरअंदाज करने की मजबूरी भी हैं और कोताही भी। सबसे बड़ी बात महानगर की हर दिन बढ़ती आबादी की इस भयानक खतरे की प्रति गैर जागरूकता ।

दिल्ली एनसीआर में  भूकंप के झटकों का कारण भूगर्भ से तनाव-उर्जा उत्सर्जन होता है। यह उर्जा अब भारतीय प्लेट के उत्तर दिशा में बढ़ने और फॉल्ट या कमजोर जोनों के जरिये यूरेशियन प्लेट के साथ इसके टकराने के चलते एकत्र हुई है। वाडिया इंस्टीट्यूट के मुताबिक दिल्ली एनसीआर में कई सारे कमजोर जोन और फॉल्ट हैंः दिल्ली-हरिद्वार रिज, महेंद्रगढ़-देहरादून उपसतही फॉल्ट, मुरादाबाद फॉल्ट, सोहना फॉल्ट, ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट, दिल्ली-सरगोधा रिज, यमुना नदी लीनियामेंट आदि। जानना जरूरी है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है और इसी से प्लेट बाउंड्री पर तनाव ऊर्जा संग्रहित हो जाती है जिससे क्रस्टल छोटा हो जाता है और चट्टानों का विरुपण होता है। ये ऊर्जा भूकंपों के रूप में कमजोर जोनों एवं फाल्टों के जरिए सामने आती है । 

सन 2016 में भारत सरकार के नेषनल सेंटर फार सिस्मोलोजी ने कोई 450 स्थानों पर गहन षोध कर भूकंप की संभावना के सूक्ष्म अध्ययन पर एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें इलाके की मिट्टी, भूजल, पत्थर की संरचना आदि के आधार पर दिल्ली पर मंडरा रहे भूकंप के खतरे को विस्तार से समझाया गया था। ‘ए रिपोर्ट आन सेस्मिक हजार्ड : माइक्रो जोनेषन आफ एनसीटी दिल्ली’’ षीर्शक की इस रिपोर्ट ने  स्पश्ट कर दिया था कि दिल्ली एक तरह दुनिया के सबसे युवा पहाड़, जहां लगातार भूगर्भीय हलचलें चलती हैं, हिमाचल के बहुत करीब है तो दूसरा यह अरावली पर्वतमाला के अंतिम सिरे पर है।  दिल्ली की सबसे बड़ी चिंता इसकी बसावट का आधे से ज्यादा हिस्सा यमुना के बाढ़ क्षेत्र में बसा होना है। खासकर गांधीनगर से ले कर ओखला तक बसी आबदी तो यमुना के दलदल पर ही बसी है और यह पूरा सघन आबादी वाला बहुमंजिल इमारतों का क्षेत्र है।  यह जानना जरूरी है कि भूकंप की संभावना और उसके नुकसान का सबसे बड़ा आकलन इलाके के मिट्टी की प्रकृति से होता है। ठीक यही हाल गाजियाबाद और नाएडा की नई गगनचुबी इमारत वाली बस्तियों का है जो कि हिंडन या यमुना नदी के  बाढ़ क्षेत्र में बसा दी गई हैं। जान लें कोई भी नदी अपना रास्ता दो सौ साल नहीं भूलती, आज नदी का रस्ता बदलने से खाली हुई जमीन पर यदि पक्का निर्माण कर लिया तो दो सदी में कभी भी नदी अपनी जमीन वापिस मांग सकती है। इसका मूल कारण है कि भले ही सीमेंट पोत कर धरती का उपरी कायाकल्प कर लें, उसकी भीतरी परत, उसके भीतर की भूगर्भीय संरचना बदलती नहीं। 

राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआइ) , हैदराबाद के एक शोध से स्पश्ट हुआ है कि भूकंप का एक बड़ा कारण धरती की कोख से जल का अंधाधुंध दोहन करना भी है। भू-विज्ञानी के अनुसार भूजल को धरती के भीतर लोड यानि की एक भार के तौर पर उपस्थित होता है। इसी लोड के चलते फाल्ट लाइनों में भी संतुलन बना रहता है। बाहरी दिल्ली में वे इलाके भूकंप की दृश्टि से अधिक संवेदनषील माने गए है जहां  भूजल पाताल में चला गया है। एनजीआरआइ के मुख्य विज्ञानी डॉ. विनीत के. गहलोत की मानें तो, “दिल्ली-एनसीआर में हाल ही में आए भूकंपों पर अध्ययन अभी भी चल रहा है. जिसमें प्राथमिक तौर पर गिरता भू-जल ही जिम्मेदार है। हालांकि इसके अन्य कारणों का भी अध्ययन किया जा रहा है।


 



सरकारी रिकार्ड के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर के फॉल्ट में सन् 1700 से अब तक चार बार 6 या इससे अधिक तीव्रता के भूकंप आ चुके हैं। 27 अगस्त 1960 में 6 की तीव्रता का भूकंप आया था जिसका केंद्र फरीदाबाद था। वहीं, सन् 1803 में 6.8 तीव्रता का भूकंप आया था जिसका केंद्र मथुरा था। यदि अब राजधानी में 6.5 तीव्रता का भूकंप आता है तो तबाही की कल्पना भी नहीं की जा सकती। 

आज जरूरत है कि दिल्ली में  आबादी का घनत्व कम किया जाए, जमीन पर मिट्टी की ताकत मापे बगैर कई मंजिला भवन खड़े करने और बेसमेंट बनाने  पर रोक लगाई जाए। भूजल के दोहन पर सख्ती हो, इसके साथ ही राजधानी में 42 लाख से अधिक भवनों का भूकंप रोधी रेट्रोफिटिंग करवाई जाए। सन 2012 में डीडीए में इसकी योजना भी बनी थी, रेट्रोफिटिंग के लिए ही एक अलग डिविजन बनाने की बात थी, लेकिन इसके बाद यह काम फाइलों में दब गया।


शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

bEfore election reforms election-literacy is must

 ‘एक देश-एक चुनाव’ के साथ ही जरूरी हैं चुनाव सुधार 

पंकज चतुर्वेदी




यह विडंबना है कि हमारे देश में लगभग हर साल चुनाव होते रहते हैं, आचार संहिता लागू हो जाती है, राजनेता  व जिम्मेदार लोग अपना काम-ध्ंाधा छोड़ कर चुनाव प्रचार में लग जाते हैं। इससे ना केवल  सरकारी व्यय बढ़ता है, बल्कि प्रशासनिक मशीनरी, राजनीतिक तंत्र भी अपने मूल उद्देश्य से लंबे समय तक विमुख रहता है। लेकिन यदि चुनाव साथ ही करवाने हैं तो अन्य चुनाव सुधार भी साथ ही लागू करना अनिवार्य है। इसमें सबसे प्राथमिक है मतदाता का बेहतर प्रशिक्षण । 

यह अब आम हो गया है कि चुनाव में जनता के मुद्दे नदारद है रहते हैं। सांसद का चुनाव लड़ने वाले नाली साफ करवाने या बगीचा या सड़क बनवाने के वायदे करते दिखते हैं।  असल में ये काम तो स्थानीय निकाय के पार्शद या सरपंच के होते हैं। न तो उम्मीदवार और न ही जनता समझ पा रही है कि हमें सरपंच के साथ-साथ सांसद की जरूरत क्यों है। और सांसद का असली काम क्या है। सांसद  और विधायक के काम क्या हैं ? उन्हें हम चुन कर किस काम से भेजते हैं, वे जिस सदन में बैठते हैं वहां वे क्या काम करते हैं ? पंचायत से ले कर संसद तक के चुनाव प्रचार में गाय, जिन्ना, पाकिस्तान और उससे आगे निजी आरोप-गालीगलौज की जो भरमार हो चुकी है उससे साफ हो गया कि सियासत का जन सरोकार से कोई वास्ता रह नहीं गया है।  यह केवल राजनेतओं का दोष नहीं है, जन प्रतिनिधि कोई दूसरे ग्रह से नही आता, वह भी हमारे समाज का हिस्सा होता है और हम जैसे होते हैं उसी भावना के प्रतिनिधि को चुनते हैं।  एक देश-’एक चुनाव के लिए सबसे बड़ी चुनौती तो यही है। 

हालांकि हमारे देश में कोई चार बार एकसाथ चुनाव हुए हैं। लेकिन राज्यों में अलग से चुनाव होने का असल कारण आयाराम-गयाराम की राजनीति रहा। दलबदल विरोधी कानून आज के हालात में अप्रासंगिक है। कोई कभी भी दल बदल कर नए दल से चुनाव लड़ कर तस्वीर बदल देता हे। कई जगह तो दल बदल विरोधी नियमों को सदन के अध्यक्ष ही धता बताते रहते हैं। इसका मूल तो दलों के चुनाव के प्रचार अभियान साबित हो जाता  कि लाख पाबंदी के बावजूद चुनाव ना केवल महंगे हो रहे हैं, बल्कि सियासी दल जिस तरह एक दूसरे पर षुचिता के उलाहने देते दिखेे, खुद को पाक-साफ व दूसरे को चोर साबित करते रहे हैंें, असल में समूचे कुंए में ही भांग घुली हुई हैं। लोकतंत्र के मूल आधार निर्वाचन की समूची प्रणाली ही अर्थ-प्रधान हो गई हैं और विडंबना है कि सभी राजनीतिक दल चुनाव सुधार के किसी भी कदम से बचते रहे हैं। वास्तव में यह लोकतंत्र के समक्ष नई चुनौतियों की बानगी मात्र था, यह चरम बिंदू है जब चुनाव सुधार की बात आर्थिक -सुधार के बनिस्पत अधिक प्राथमिकता से करना जरूरी है। जमीनी हकीकत यह है कि कोई भी दल ईमानदारी से चुनाव सुधारों की दिषा में काम नहीं करना चाहता है। 

आधी-अधूरी मतदाता सूची, कम मतदान, पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की मतदान में कम रूचि, महंगी निर्वाचन प्रक्रिया, बाहुबलियों और धन्नासेठों की पैठ, उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या, जाति-धर्म की सियासत, चुनाव करवाने के बढ़ते खर्च, आचार संहिता की अवहेलना - ये कुछ ऐसी बुराईयां हैं जो स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए जानलेवा वायरस हैं और इस बार ये सभी ताकतवर हो कर उभरी हैं। कहीं पर हजारों मतदाताओं के नाम गायब हैं तो नगालैंड में एक राजनेता कैमरे के सामने 11 वोट डाल लेता है। गाजियाबाद में रहने वाले पुर्व मुख्य चुनाव आयुक्त या कर्नाटक निर्वान आयोग के ब्रंाड एंबेसेडर राहुल द्रविड का नाम ही मतदाता सूची में नहीं होता और किसी भी जिम्मेदार पर कड़ी कार्यवाही होती नहीं। कई बार निर्वाचन आयोग असहाय सा दिखा और फिर आयोग ने ही अपने खर्चे इतने बढ़ा लिए हैं कि वह आम आदमी के विकास के लिए जरूरी बजट पर डाका डालता प्रतीत होता है।

जाति, गौत्र, धर्म के नाम पर या षराब, साड़ी के लालच में या फिर बाहुबल से धमका कर मतदान को अपने पक्ष में करने की जुगाड़ अब नई बात नहीं। चुनाव लड़ाने के लिए अब जनता की नहीं,  प्रबंधन एजेंसियों की जरूरत होती है । बड़े-बड़े रणनीतिकार  मतदाता सूची का विष्लेशण कर तय करे लेते हैं कि हमें अमुक जाति या समाज के वोट चाहिए ही नहीं। यानी जीतने वाला क्षेत्र का नहीं, किसी जाति या धर्म का प्रतिनिधि होता है। यह चुनाव लूटने के हथकंडे इस लिए कारगर हैं, क्योंकि हमारे यहां एक वोट या पांच लाख वोट से जीते दोनेां तरह के सांसदों के समान अधिकार होते हैं। यदि राश्ट्रपति चुनावों की तरह किसी संसदीय क्षेत्र के कुल वोट और उसमें से प्राप्त मतों के आधार पर सांसदों की हैंसियत, सुविधा आदि तय कर दी जाए तो नेता पूरे क्षेत्र के वोट पाने के लिए प्रतिबद्ध होंगे, ना कि केवल किसी वर्ग विशेष के। केबिनेट मंत्री बनने के लिए या संसद में आवाज उठाने या फिर सुविधाओं को ले कर सांसदों का वर्गीकरण माननीयों को ना केवल संजीदा बनाएगा, वरन उन्हें अधिक से अधिक मतदान भी जुटाने को मजबूर करेगा।

यह एक विडंबना है कि कई राजनीतिक कार्यकर्ता जिंदगीभर मेहनत करते हैं और चुनाव के समय उनके इलाके में कहीं दूर का उम्मीदवार आ कर चुनाव लड़ जाता है और ग्लेमर या पैसे या फिर जातीय समीकरणों के चलते जीत भी जाता है। ऐसे में सियासत को दलाली या धंधा समझने वालों की पीढ़ी बढ़ती जा रही है। संसद का चुनाव लड़ने के लिए निर्वाचन क्षेत्र में कम से कम पांच साल तक सामाजिक काम करने के प्रमाण प्रस्तुत करना, उस इलाके या राज्य में संगठन में निर्वाचित पदाधिकारी की अनिवार्यता ‘जमीन से जुड़े’’ कार्यकर्ताओं को संसद तक पहुंचाने में कारगर कदम हो सकता है। इससे थैलीषाहों और नवसामंतवर्ग की सियासत में बढ़ रही पैठ को कुछ हद तक सीमित किया जा 

सांसद का चुनाव लड़ने के लिए क्षेत्रीय दलों पर अंकुष भी स्थाई व मजबूत सरकार के लिए जरूरी है। कम से कम पांच राज्यों में कम से कम दो प्रतिषत वोट पाने वाले दल को ही सांसद के चुनाव में उतरने की पात्रता जैसा कोई नियम ‘दिल्ली में घोडा़ मंडी’’ की रोक का सषक्त जरिया बन सकता है। ठीक इसी तरह के बंधन राज्य स्तर पर भी हो सकते हैं। निर्दलीय चुनाव लड़ने की षर्तों को इस तरह बनाना जरूरी है कि अगंभीर प्रत्याषी लोकतंत्र का मजाक ना बना पाएं। 



एक बात और हमें पाकिस्तान से सीख लेना चाहिए कि चुनाव से पहले सरकार भ्ंाग हो और किसी वरिश्ठ न्यायाधीष को कार्यवाहक सरकार का जिम्मा दे दी जाए। इससे चुनाव में सरकारी मषीनरी के इस्तेमाल की कुरीति से बचा जा सकता हे। आज प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री सरकारी जहाज व सुविधा पर प्रचार करते हैं, कई जगह चुनाव निष्पक्षता से करवाने की ड्यूटी में लगे अफसरों को प्रभाचित करने की खबरें भी आती हैं। 

पंकज चतुर्वेदी ,

साहिबाबाद गाजियाबाद 201005 फोन-9891928376







शनिवार, 2 जनवरी 2021

Traditional water tanks are only solution of water crisis

 तालाबों के प्रति कोताही क्यों ?

पंकज चतुर्वेदी



सन 2016 के  खेतों में पांच लाख तालाब बनाने की बात हो या फिर उप्र में योगी सरकार के पहले सौ दिनों में तालाब विकास प्राधिकरण का संकल्प या फिर राजस्थान में कई सालों पुराना झील विकास प्राधिकरण या फिर मप्र में सरोवर हमारी धरोहर या जल अभिषेक  जैसे नारों के साथ तालाब-झील सहेजने की योजनाएं, हर ाबर लगता है कि अब देश  के नीति निर्धारकों को समझ आ गया है कि बारिश  की हर बूंद को सहेजने के पारंपरिक उपाय ज्यादा कारगर हैं। तभी  जब गर्मी शुरू  होते ही देश  में पानी की मारा-मार, खेतों के लिए नाकाफी पानी और पाताल में जाते भूजल के आंकड़े उछलने लगते हैं तो समझ आता है कि असल में तालाब को सहजेने की प्रबल इच्छा शक्ति  में या तो सरकार का पारंपरिक ज्ञान का सहारा न लेना आड़े आ रहा है या फिर तालाबों की बेषकीमती जमीन को धन कमाने का जरिया समझने वाले ज्यादा ताकतवर हैं। यह अब सभी के सामने हैं किसिंचाई की बड़ी परियोजनाएं व्यय, समय और नुकसान की तुलना में छोटी व स्थानीय सिंचाई इकाई ज्यादा कारगर है। इसके बावजूद तालाबों को सहेजने का जज्बा कहीं नजर नहीं आता। 

पूरे भारत के हर एक भौगोलिक क्षेत्रों में वैदिक काल से लेकर आज-अभी तक शासन और समाज ने अपनी जरूरतों के मुताबिक जल संरचनाओं और जल प्रणालियों को विकसित किया। इनमें सबसे ज्यादा तालाब या झील या उन पर आधारित योजनाएं ही हैं। रेगिस्तान हो या बंदेलखंड जहां भी पानी मिलना दूभर हुआ तालाबों को सागर की उपमा दे दी गई।  ऋग्वेद में सिंचित खेती, कुओं और गहराई से पानी खींचने वाली प्रणालियों का उल्लेख मिलता है। हडप्पा एवं मोहनजोदडो (ईसा से 3000 से 1500 साल पूर्व) में जलापूर्ति और मल निकासी की बेहतरीन प्रणालियों के अवषेष मिले हैं। कौटिल्य के अर्थषास्त्र में भी जल संरचनाओं के बारे में अनेक विवरण उपलब्ध हैं। इन विवरणों से पता चलता है कि तालाबों का निर्माण राज्य की जमीन पर होता था। स्थानीय लोग तालाब निर्माण की सामग्री जुटाते थे। असहयोग और तालाब की पाल को नुकसान पहुँचाने वालों पर राजा द्वारा जुर्माना लगाया जाता था। तत्कालीन नरेष चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा यह व्यवस्था ईसा से 321-297 साल पहले लागू की गई थी। बरसात के पानी को संचित करने के लिये तटबन्ध, जलाषय और तालाबों का निर्माण आम था। सूखे इलाकों में कुये और बावड़ियों के बनाने का रिवाज था। मेगस्थनीज ने भी अपने यात्रा विवरणों में उत्तर भारत में पानी का वितरण करने वाली जलसुरंगों का जिक्र किया है।  बुंदेलखंड में लाख उपेक्ष के बावजूद नौ सौ से बारहवी सदी के चंदेलकालीन तालाब अभी भी वर्षा  को समेट रहे हैं।  



यदि तालाबों को ध्यान दें तो यह महज कहीं खोदा गया विषाल गढ्ढा या फिर ऐसी प्राकृतिक संरचना मात्र नहीं थे जहां जल जा हो जाता था। पानी को एकत्र करने के लिए इलाके की जलवायु, न्यूनतम  बरसात का आकलन, मिट्टी का परीक्षण, भूजल की स्थिति, सदानीरा , उसके बाद निर्माण सामग्री का चयन, गहराई का गणित जैसी कई बातों का ध्यान रखा जाता है। यह कड़वा सच है कि अंग्रेजीदां इंजीनियरिंग की पढ़ाई ने युवा को सूचनओं से तो लाद दिया लेकिन देषद ज्ञान उसकी पाठ्य पुस्तकों में कभी रहा नहीं। तभी जब सरकारी इंजीनियर को तालाब सहेजने का कहा जाता है तो वह उस पर स्टील की सैलिंग लगाने, उसके किनारे बगीचा व जल कुंभी मारने को मषीन या गहरा खेदने से अधिक काम कर नहीं पाता। पुरानी संरचनाएं बानगी हैं कि उस काल में भी उन्नत जल-विज्ञान और कुशल जलविज्ञानी मौजूद थे। कई बार लगता है कि जल संरचनाओं के निर्माणकर्ताओं के हाथों में अविष्वसनीय कौषल तथा प्राचीन वास्तुविदों की प्रस्तुति में देष की मिट्टी और जलवायु की बेहतरीन समझ की सोंधी गंध मौजूद थी।



यह समझाना जरूरी है कि यानि यह तय है कि तालाब महज एक गड्ढा नहीं है, जिसमें बारिष का पानी जमा हो जाए और लोग इस्तेमाल करने लगें। तालाब कहां खुदेगा, इसको परखने के लिए वहां की मिट्टी, जमीन पर जल आगमन व निगमन की व्यवस्था, स्थानीय पर्यावरण का खयाल रखना भी जरूरी होता है। वरना यह भी देखा गया है ग्रेनाईट संरचना वाले इलाकों में कुएं या तालाब खुदे, रात में पानी भी आया और कुछ ही घंटों में किसी भूगर्भ की झिर से कहीं बह गया। दूसरा , यदि बगैर सोचे -समझे पीली या दुरमट मिट्टी में तालाब खोद तो  धीरे-धीरे पानी जमीन में बैठेगा, फिर दल-दल बनाएगा और फिर उससे ना केवल जमीन नष्ट  होगी, बल्कि आसपास की जमीन के प्राकृतिक लवण भी पानी के साथ बह जाएंगे। यदि नमी, दलदल, लवण बहने का सिलसिला महज पंद्रह साल भी जारी रहा तो उस तालाब के आसपास लाइलाज बंजर बनना वैज्ञानिक तथ्य है। 

हाल की अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट  हों या फिर 1944 की बंगाल दुर्भिक्ष के बाद गठित आयोग का दस्तावेज, सभी में साफ जताया गया है कि भारत जैसे देश  में  सिंचाई के लिए तालाब ही मजबूत जरिया हैं।खासकर जब हमारे सामने जलवायु परिवर्तन के खतरे मुंह बाए खड़े हैं, अन्न में पौश्टिकता की कमी, रासायनिक खाद-दवा के अतिरेक से जहर होती फसल , बढ़ती आबादी  का पेट भरने की चुनौती, फसलों में विविधता का अभाव और प्राकृतिक आपदाओं की त्वरित मार, सहित कई एक चुनौतियां खेती के सामने हों, तो तालाब ही एकमात्र सहारा बचता है। 

नए तालाब जरूर बनें, लेकिन आखिर पुराने तालाबों का जिंदा करने से क्यां बचा जा रहा है? सरकारी रिकार्ड कहता है कि मुल्क में आजादी के समय लगभग 24 लाख तालाब थे। सन 2000-01 में जब देष के तालाब, पोखरों की गणना हुई तो पाया गया कि हम आजादी के बाद कोई 19 लाख तालाब-जोहड़ पी गए। देश में इस तरह के जलाशयों की संख्या साढे पांच लाख से ज्यादा है, इसमें से करीब 4 लाख 70 हजार जलाशय किसी न किसी रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं, जबकि करीब 15 प्रतिशत बेकार पड़े हैं। 

यदि सरकार तालाबों के संरक्षण के प्रति गंभीर है तो गत पांच दशकों के दौरान तालाब या उसके जल ग्रहण क्षेत्र में हुए अतिक्रमण हटाने, तालाबों के जल आगमन क्षेत्र में बाधा खड़े करने पर कड़ी कार्यवाही करने , नए तालाबों के निर्माण के लिए आदि-ज्ञान हेतु समाज से स्थानीय योजनाएं तैयार करवना जरूरी है। और यह तभी संभव है जब देष में  न्यायीक अधिकार संपन्न तालाब विकास प्राधिकरण का गठन ईमानदारी से किया जाए। दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने नए तालाबों का निर्माण तो नहीं ही किया, पुराने तालाबों को भी पाटकर उन पर इमारतें खड़ी कर दीं। भू-माफियाओं ने तालाबों को पाटकर बनाई गई इमारतों का अरबों-खरबों रुपये में सौदा किया और खूब मुनाफा कमाया। इस मुनाफे में उनके साझेदार बने राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी। माफिया-प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं की इस जुगलबंदी ने देश को तालाब विहीन बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। 

काश  नदी-जोड जैसी किसी एक योजना का समूचे व्यय के बराबर राशि  एक बार एक साल विशेष  अभियान चला कर पूरे देश  के पारंपरिक तालबों की गाद हटाने, अतिक्रमण मुक्त बनाने और उसके पानी की आवक-जावक  के रास्ते को निरापद बनाने में खर्च कर दिया जाए तो भले ही कितनी भी कम बारिष हो, ना तो देष का कोई कंठ सूखा रहेगा और ना ही जमीन की नमी मारी जाएगी। 


शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

story for children

 कजली की बखरी

                                                                                                                                    पंकज चतुर्वेदी 





गली के कुत्ते अजब-गजब होते हैं, वे ना जाने कहां से अचानक आते हैं, किसी के घर के दरवाजे को अपना समझ लेते हैं । फिर उन्हें कोई प्यार करे या ना करे, उन्हें कोई खाना मिले या ना मिले, वे अपना काम करते रहते हैं। कोई झोला लिए कबाड़ा बीनने वाला निकले या फिर किसी दूसरी गली का जानवर आ जाए, वे उसे अपने इलाके से बाहर निकाल कर ही दम लेते हैं। उसका नाम ना जाने कैसे कजली पड़ गया, दिखने में भी कोई खास सुंदर नहीं, चितकबरा सा, धारियोना वाला । 

कालेानी में एक खाली जमीन का टुकड़ा था। उस पर चोहद्दी बनी हुई थी। भीतर रघु व उसकी पत्नी रहती थी। वहां मकान बनाने की ढेर सारी सामग्री भी रखी थी और कजली उसी पर बैठा रहता । दोनो मेहनत-मजदूरी करते, सारे दिन घर से बाहर रहते और कजली का डेरा उस दीवार के भीतर रहता। षाम को रघु घर लौटता तो उसे रोटी मिल जाती।

वैसे उस कालोनी में और भी कुत्ते थे - कालू, रोमियो, लाभू, पिद्दी, गोल्डी। ये सब एकसाथ गुट बना कर रहते। परंतु कजली का कोई दोस्त नहीं। जब मौका मिलता कालू-रोमियो का गिरोह कजली को पीटने भी आता तो वह कूद कर अपनी दीवार के पार रघु के मकान में आ जाता। रघु की घरवाली कहती-‘यह तो कजली की बखरी है। ’

एक दिन सुबह से कजली को उसकी बखरी से बाहर कर दिया गया, कुछ लोग आए और उन्होंने सबसे पहले रघु की झोपड़ी तोड़ दी। कजली गुर्राया, काटने दौड़,  लेकिन रघु व उसकी घरवाली ने उसे पकड़ लिया, ‘‘ नहीं कजली, ऐसा नहीं करते। चलो भागो।’’ 

कजली समझ नहीं पा रहा था कि उसकी बखरी टूट रही है और उसका मालिक रघु उल्टे कजली को ही डांट  रहा है।  दिन होते-हाते बहुत से लोग वहां आ गए। उन्होंने चूने से सफेद लाईन डाली और खुदाई करने लगे। रघु और दूसरे काम करने वालों के लिए अलग से बखरी बन गईं।  कजली को यह तो संतोश था कि रघु वहीं है लेकिन अब संकट था कि यदि कालू का गैंग मारने आया तो भाग कर कहां जाएगा। 

उधर कालू-रोमियो भी देख रहे थे कि कजली का मकान छिन गया है। इन्होंने अपनी तरफ से युद्ध-विराम जैसा कर दिया। षाम तक कई ट्रक बालू-रेत आ गई और रेत के एक ऊंचे से ढेर पर कजली ने डरते-डरते अपना कब्जा कर लिया। अब कालू वगैरह भी इसी रेत में कूदते, एक दूसरे को पटकते, पंजे से धूल उड़ाते। बस अब कजली को पीटते नहीं। शायद , कजली के अधिकार क्षेत्र में उन्हें इतनी रेत में खेलने को जो मिल गया था। कुछ ही दिनो ंमें वहां तीन मंजीला इमारत का ढांचा बन गया। हर मंजिल पर चार फ्लेट। एब बार फिर रघु व उने साथ्यिों की झोपड़ियां टूटीं व अब वे लोग इन्हीं अधबने फ्लेट में पहुंच गए। 

कजली भी अब तीसरी मंजिल की छत तक जाता, वहां से भौंकता। कालू-रोमियो गैंग को लगा कि अब कजली को घमंड आ गया है। वे एक बार फिर कजली को पीटने का मौका देखने लगे, लेकिन कजली भी खतरा देख कर तीसरी मंजिल के ऊपर वाले छज्जे पर भाग जाता। हालांकि उसकी आत्मा तो नीते रेत-बालू में बैठने में ही फंसी रहती। कजली को पिटता देख रघु वगैरह भी कालू के साथियों को भगा देते। कालू-रोमियो गैग की इच्छा होती कि रेत पर खेलें तो मजदूर कुत्तों के संभावित झगड़े के डर से उन्हें भगा देते।

 निर्माण का काम कई दिनों से चल रहा था। अब काम कराने वाला ठेकेदार भी पहचान गया कि कजली यहीं का कुत्ता है। वह भी दिन में अपने खाने से उसके लिए कुछ ना कुछ निकाल देता। फिर पूरे भवन में भी कई अन्य काम करने वाले थे। कजली को भरपूर खाना मिल रहा था। उसकी चौकीदारी भी बढ़ती जा रही थी। एक रात तो कोई सीमेंट चुरा रहा था और कजली ने भौंक-भौंक कर सभी को जगा लिया। कजली की आवाज के साथ कालू-रोमियो गैग के कुत्ते भी पहुंच गए। रघु और उसे साथी भी आ गए। इस तरह कजली के लिए सभी का प्रेम बढ़ गया और कजली का दूसरे कुत्ता-समूह से टकराव भी कुछ कम हुआ। एकबार फिर वे सभी रेत-बालू में खेलने लगे। 

देखते-देखते मकान पूरा हो गया। रंगाई-पुताई हो गई। रघु और दूसरे मजदूरों की बखरी फिर उजड़ गई। पता ही नहीं चला कि वे कहां गए। कजली कोई तीन साल से उनके पास था। कजली को उनकी याद भी आती, लेकिन किससे कहता? कैसे कहता? वह तो भला हो ठेकेदार का कि हर दिन कजली के लिए खाना ले आता। 

फिर मकान में लोग भी रहने आ गए। बाहर से रेत भी उठ गई। एक बार फिर कजली बेघर हो गया। बस, कजली ने उस घर का दरवाजा नहीं छोड़ा,जहां उसकी आंख खुली थी। सबसे नीचे वाली मंजिल पर जो लोग रहने आए, उनका बेटा रमन कजली को देख रहा था। ठेकेदार ने बताया, ‘‘यह कजली है। यहीं रहता है। इसने एक बार चोर भी पकड़वाए थे।’’

रमन ने डरते-डरते कजली के सिर पर हाथ रखा और कजली ने भी अपनी आंखें मींच लीं व जमीन पर लेट गया।  कजली को रमन ने ब्रेड खाने को दी और वह उनके आंगन में आ गया। लेकिन यह क्या? 

‘‘छी, यह गंदा कुत्ता कैसे भीतर आ गए? रमन बाहर करो इसे।’’ मम्मी इतनी जोर से चिल्लाईं कि कजली खुद घर से बाहर हो गया। मम्मी इस बात पर राजी थीं कि कजली को खाना मिलेगा, लेकिन घर के भीतर नहीं आएगा। 

दीवाली की शाम सभी जगह धूम-धड़ाके के पटाखे चल रहे थे और कजली डर के मारे इधर-उधर भाग रहा था। रमन की मम्मी को यह अच्छा नहीं लगा और उन्होंने उसे घर के भीतर कर लिया। उसके बाद कजली को छूट थी कि वह कभी भी भीतर आए, बाहर जाए। बांकी उसने अपनी ड्ूटी तो संभाल ही ली थीं। वह कूरियर वालों को घर के बाहर फटकने नहीं देता। 

कालोनी में नई सड़क बनने का काम षुरू हो गया। गिट्टी-पत्थर पड़ गए। रोड़-रोलर से उन्हें समतल किया गया। जगह-जगह बालू और लाल मुरम के ढेर लगा दिए गए। कजली और कालू गिरोह देानेां के लिए यह मौज-मस्ती का समय था। रेत-बालू के इतने बड़े-बड़े ढेर, खूब गुलाटी मारो, एक दूसरे को पटको, पीठ खुजलाओ। 

हल्ला हो गया कि कोरोना वायरस के कारण पूरा देष बंद रहेगा। कोई काम-धंधा नहीं चलेगा। बाजार बंद- बस-ट्रेन बंद। लोगों का सड़क पर निकलना बंद।  इस सड़क से सुबह से दिन तक पचास से ज्यादा तो स्कूल की बसें निकलती थीं। बहुत सारी पिकअप वेन भी। लेकिन लाॅक डाउन ऐसा हुआ कि सब तरफ सन्नाटा। 

अब ना तो सड़क पर कोई आ जा रहा था और ना ही सड़क काक मा चल रहा था। कजली के जीवन के ये शायद सबसे शान दार दिन थे। शान से रेत पर बैठा रहता। रमन भले ही बुलाए, घर के भीतर जाने को राजी ही नहीं होता। बस खानाा खाया और रेत पर कब्जा जमा लिया। दिन की तीखी गरमी में जरूर चुपके से रमन के आंगन में टपकते नल के नीेच बैठ जाता। जैसे सी धूप ढलती, रेत का ढेर उसका ठिकाना होता। 

पहले-पहल रमन की मम्मी ने भी उसे खूब बुलाया, लेकिन उसे रेत से ज्यादा अच्छा कुछ नहीं लगता। उसने माल लिया था कि अब उसे किसी बखरी की जरूरत नहीं। रेत से ज्यादा सुख कहां मिलेगा। ? यहीं उसकी बखरी हुई। भले ही उसको रेत में बैठने का सुख था, लेकिन ऐसा नहीं कि कजली अपनी ड्यूटी भूल गया हो। 

उस तरफ कालू को कोई बीमारी हुई और वह मर गया। इससे उनका गुट थोड़ा कमजोर हो गया। फिर उनके हिस्से में भी रेत-बालू के कई टिब्बर आए थे तो कजली से भिड़ने का कोई कारण उन्हें समझ नहीं आ रहा था।  कजली अपनी रेत में मस्त था और रोमियो-पिद्दी इधर। 

पांच महीने की नीम शान्ति  के बाद अनलाॅक शुरू  हो गया। एक दिन सुबह से जेसीबी मशीन, डपंर, रोड़ रोलर गड़गड़ाने लगे। इतने दिनों की शांति  के बाद इस तरह का शोर  कजली को दीवाली के धमाके की याद दिला रहा था। उसने पूंछ दबाई और चुपके से रमन के घर में घुस गया। मम्मी ने पहले गुस्से में फिर आश्चर्य  से देखा- आखिर आज इसे क्या हुआ है? 

शा म तक रेत के ढेर सड़क पर बिछ गए थे। कजली का ‘स्वर्ग’ बिखर गया था। षाम को उसने खाना भी नहीं खाया। रमन की ओर डबडबाई आंखों से देखता रहा। जैसे पूछ रहा हो - ‘‘मेरी रेत की बखरी क्यों उजाड़ दी?’’

0 बखरी -बुंदेलखंड में बखरी का अर्थ होता है मकान, घर, झोपड़ी, हवेली--


शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

Understand the reasons for the longest peasant movement in the world

 

गुस्सा अकेले पंजाब के किसान का ही नहीं है –

पंकज चतुर्वेदी

 


वैसे तो सारे देश में किसान अपनी मेहनत, लागत और उससे होने वाली आय को ले कर निराश हैं और किसान बिल ने उन्हें विरोध  करने का एक स्वर दे दिया है , लेकिन यह बात बार -बार हो रही है कि आखिर पंजाब में ही ज्यादा रोष क्यों  है ? यह जान लें कि कृषि बिल को ले कर  किसान का असल  दर्द तो यह है कि उसे अपना अस्तित्व ही खतरे में लग रहा है , शायद भारत खेती के मामले में अमेरिका का मॉडल अपनाना चाहता है जहां कुल आबादी का महज डेढ़ फीसदी लोग ही खेती करते हैं , उनके खेत अर्थात विशाल कम्पनी संचालित, मशीनों से बोने-काटने वाले, कर्मचारियों द्वारा प्रबंधित और बाज़ार को नियंत्रित करने वाले किसान, हां , उन्हें सरकार औसतन प्रति किसान सालाना 45 लाख डॉलर सब्सिडी देती है और हमारे यहा ? प्रति किसान सालाना बामुश्किल बीस हज़ार . असल में किसान बिल से अलग अलग किसानों की दिक्कते हैं और इस अवसर पर वे फूट कर बाहर आ रही हैं .



पंजाब में कोई ग्यारह लाख परिवार खेती-किसानी पर निर्भर हैं , इसके अलावा ,पंजाब की खेती के बदौलत बिहार से बुंदेलखंड तक के लाखों श्रमिकों के घर बरकत आती  है . भारत के सालाना गेहूं उत्पादन में पंजाब का योगदान 11.9 फीसद  और धान में 12.5 फीसद है.इस राज्य में किसान पर कर्ज भी बहुत अधिक है और बीते दस सालों में  लगभग साढ़े तीन सौ किसान ख़ुदकुशी कर चुके हैं . बीते साल अकेले पंजाब में अनाज की सरकारी खरीदी 52  सौ करोड रूपये की थी , जाहिर है कि मंडी, सरकारी खरीद और एम् एस पी पंजाब के किसान के लिए महत्वपूर्ण है . संकट अकेले अच्छी फसल के लिए पानी , बिजली का संकट और नकली बीज-खाद-दवा का खतरा ही नहीं है, बल्कि उत्पाद का सही दाम मिलना भी एक चुनौती है .



इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर द्वारा जारी वैस्टलैंड एटलस-2019’  में उल्लेखित बंजर जमीन को खेती लायक बदलने की सरकारी गौरव गाथाओं के बीच यह दुखद तथ्य भी छुपा है कि हमारे देश में खेती के लिए जमीन साल-दर-साल कम हो रही है, जबकि आबादी बढ़ने से खाद्य की मांग बढ़ रही है और इस दिशा में देश की दुनिया के दीगर देशों पर निर्भरता  बढ़ती जा रही है।  जानना जरूरी है कि भारत के पास दुनिया की कुल धरती का 2.4 प्रतिशत है, जबकि विश्व की आबादी के 18 फीसदी हमारे बाशिंदे हैं।  भारत में खेती की जमीन प्रति व्यक्ति औसतन 0.12 हैक्टर रह गई है, जबकि विश्व में यह आंकड़ा 0.28 हैक्टर है।



सरकार भी मानती है कि पंजाब जैसे कृषि  प्रधान राज्य में देखते ही देखते 14 हजार हैक्टर अर्थात कुल जमीन का 0.33 प्रतिशत  पर खेती बंद हो गई। इस राज्य में जोत छोटी होती जा रही है और आज
72 फीसद जोत 5 एकड़ से कम है. पश्चिम बंगाल में 62 हजार हैक्टर खेत सूने हो गए तो केरल में 42 हजार हैक्टर से किसानों का मन उचट गया। देश  के सबसे बड़े खेतों वाले राज्य उत्तर प्रदेश  का यह आंकड़ा अणु बम से ज्यादा खतरनाक है कि राज्य में विकास के नाम पर हर साल 48 हजार हैक्टर खेती की जमीन को उजाड़ा जा रहा है। मकान, कारखानों, सड़कों के लिए जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे अधिकांश  अन्नपूर्णा रही हैं। इस बात को भी नजरअंदाज किया जा रहा है कि कम होते खेत एक बार तो मुआवजा मिलने से प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में भी इजाफा करते हैं। यह भी सच है कि मनरेगा में काम बढ़ने से खेतों में काम करने वाले मजदूर नहीं मिल रहे है और  मजदूर ना मिलने से हैरान-परेशान किसान खेत को तिलांजली दे रहे हैं।

नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक देश में 14 करोड़ हैक्टर खेत हैं।  विभाग की ‘‘भारत में पारिवारिक स्वामित्व एवं स्वकर्षित जोत’’ संबंधित रिपोर्ट का आकलन बहेद डरवना है। सन 1992 में ग्रामीण परिवारों के पास 11.7 करोड़ हैक्टर भूमि थी जो 2013 तक आते-आते महज 9.2 करोड़ हैक्टर रह गई।  यदि यही गति रही तो तीन साल बाद अर्थात 2023 तक खेती की जमीन आठ करोड़ हैक्टर ही रह जाएगी।
आखिर खेत की जमीन कौन खा जाता है इसके मूल कारण तो खेती का अलाभकारी कार्य होना, उत्पाद की माकूल दाम ना मिलना, मेहनत की सुरक्षा आदि तो हैं ही, विकास ने सबसे ज्यादा खेतों की हरियाली का दमन किया है। पूरे देश में इस समय बन रहे या प्रस्तावित छह औद्योगिक कॉरीडोर के लिए कोई 20.14 करोड़ हैक्टर जमीन की बली चढ़ेगी, जाहिर है इसमें खेत भी होंगे।

यह सब सरकारी रिकार्ड में दर्ज है कि देश में कोई 14 .5 करोड़ किसान परिवार हैं इनमें से छियासी फीसदी छोटे या सीमान्त किसान हैं अर्थात जिनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन  हैं . इनमें से भी 68 प्रतिशत वे हैं जिनकी जोत का रकवा एक हेक्टेयर से भी कम है . देश में सबसे ज्यादा किसान उत्तर प्रदेश में हैं -2.38 करोड़ , फिर बिहार में 1.68 करोड़ , उसके बाद महाराष्ट्र में 1.52 और मध्य प्रदेश में कोई एक करोड़ . इन किसानों में आधे से अधिक 52.5 फीसदी कर्ज में दबे हैं , वह भी औसतन एक लाख या अधिक् के कर्ज में . दुर्भाग्य है कि हमारे देश में इस बात पर कोई संवेदना नहीं होती कि खेती पर निर्भर औसतन हर दिन 28 लोग आत्म ह्त्या करते हैं और इनमें सर्वाधिक महाराष्ट्र में हैं .

किसान को अपने अस्तित्व की फिकर है और यह बात इस आंकड़े से उजागर होती है कि जहां सन 2016 में 45 .14 करोड़ लोग खेती से अपना घर-बार चलाते थे , यह संख्या सन  2020 आते –आते  41.49 करोड़ रह गयी है . विडम्बना है कि यह संख्या हर साल घटती रही और भाग्य विधाता बेपरवाह रहे – सन 2017 में यह संख्या 44.05 हुई , सन 2018 में 43.33 , 2019  में खेती पर निर्भर 42.39 हो गये .

किसान भारत का स्वाभिमान है और देश  के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका शोषण अंतहीन है - नकली बीज व खाद की भी निरंकुश समस्या तो खेत सींचने के लिए बिजली का टोटा है, कृषि  मंडियां दलालों का अड्डा बनी है व गन्ना, आलू जैसी फसलों के वाजिब दाम मिलना या सही समय पर कीमत मिलना लगभग असंभव जैसा हो गया हे। जाहिर है कि ऐसी घिसी-पिटी व्यवस्था में नई पीढ़ी तो काम करने से रही, सो वह खेत छोड़ कर चाकरी करने पलायन कर रही है।
जब तक खेत उजड़गे, दिल्ली जैसे महानगरों की ओर ना तो लोगों का पलायन रूकेगा और ना ही अपराध रूकेंगे , ना ही जन सुविधाओं का मूलभूत ढ़ांचा लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप होगा। आज किसानों के प्रदर्शन  के कारण दिल्ली  व अन्य महानगर त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, कल जमीन से उखड़े ये बेरोजगार और हताष लोगों की भीड़ कदम-कदम पर महानगरों का रास्ता रोकेगी। यदि दिल से चाहते हो कि कभी किसान दिल्ली की ओर ना आए तो सरकार व समाज पर दवाब बनाएं कि दिल्ली या लखनऊ उसके खेत पर लालच से लार टपकाना बंद कर दें । किसान के श्रम का सही मुल्यांकन हो , किसान की मर्जी के बगैर कोई कानून –कायदे बनाए ना जाएँ .

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

companies-should-also-take-responsibility-for-poisonous-waste

जहरीले कचरे की जिम्मेदारी भी लें कंपनियां




भारत में हर साल कोई 4.4 खरब लीटर पानी को प्लास्टिक की बोतलों में पैक कर बेचा जाता है। यह बाजार 7,040 करोड़ रुपये सालाना का है। जमीन के गर्भ से या फिर बहती धारा से प्रकृति के आशीर्वाद स्वरूप निःशुल्क मिले पानी को कुछ मशीनों से गुजार कर बाजार में लागत के 160 गुणा ज्यादा भाव से बेच कर मुनाफे का पहाड़ खड़ा करने वाली ये कंपनियां हर साल देश में पांच लाख टन प्लास्टिक बोतलों का अंबार भी जोड़ती हैं। शीतल पेय का व्यापार तो इससे भी आगे है और उससे उपजा प्लास्टिक कूड़ा भी यूं ही इधर-उधर पड़ा रहता है। चूंकि ये बोतलें ऐसे किस्म की प्लास्टिक से बनती हैं, जिनका पुनर्चक्रण हो नहीं सकता, सो कबाड़ी इन्हें लेते नहीं हैं। या तो यह प्लास्टिक टूट-फूट कर धरती को बंजर बनाता है या फिर इसे एकत्र कर ईंट-भट्ठे या ऐसी ही बड़ी भट्ठियों में झोंक दिया जाता है, जिससे निकलने वाला धुआं दूर-दूर तक लोगों का दम घोंटता है। ठीक यही हाल हर दिन लाखों की संख्या में बिकने वाली कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों, दूध की थैलियों, चिप्स आदि के पैकेट का है। यह बानगी है कि देश के जल-जंगल-जमीन को संकट में डालने वाले उत्पादों को मुनाफा कमाने की तो छूट है, लेकिन उनके उत्पाद से उपजे जहरीले कचरे के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।


असल में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के चलते नैसर्गिकता में आए बदलाव का मूल कारण हमारा प्रकृति पर निर्भरता से दूर होना है। विडंबना है कि कुछ संगठन व व्यापारी यह कहते नहीं अघाते कि प्लास्टिक के आने से पेड़ बच गए। हकीकत यह है कि पेड़ से मिलने वाले उत्पाद, चाहे वे रस्सी हों या जूट या कपड़ा, या कागज, इस्तेमाल के बाद प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाते थे। पेड़ का दोहन करें, तो उसे फिर से उगा कर उसकी पूर्ति की जा सकती है, लेकिन एक बार प्लास्टिक धरती पर किसी भी स्वरूप में आ गया, तो उसका नष्ट होना असंभव है और वह समूचे पर्यावरणीय-तंत्र को ही हानि पहुंचाता है। यह मसला अकेले पानी की बोतलों का ही नहीं है, खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर हर तरह के सामान की पैकिंग में प्लास्टिक या थर्मोकॉल का इस्तेमाल बेधड़क हो रहा है, लेकिन कोई भी निर्माता यह जिम्मेदारी नहीं लेता कि इस्तेमाल होने वाली वस्तु के बाद उससे निकलने वाले इस जानलेवा कचरे का उचित निष्पादन कौन करेगा। 


मोबाइल फोन, कंप्यूटर व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की कंपनियों का मुनाफा असल उत्पादन लागत का कई सौ गुणा होता है, लेकिन करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च करने वाली ये कंपनियां इनसे उपजने वाले ई-कचरे की जिम्मेदारी लेने को राजी नहीं होतीं। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों से भी उपज रहा है। इनसे निकलने वाले जहरीले तत्व और गैसें मिट्टी व पानी में मिलकर उन्हें बंजर और जहरीला बना देती हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों का मूल आधार ऐसे रसायन होते हैं, जो जल, जमीन, वायु, इंसान और समूचे पर्यावरण को इस हद तक नुकसान पहुंचाते हैं कि उससे उबरना लगभग नामुमकिन है। इस कबाड़ को भगवान भरोसे प्रकृति को नष्ट करने के लिए छोड़ दिया जाता है। यही नहीं, ऐसे नए उपकरण खरीदने के दौरान पैकिंग व सामान की सुरक्षा के नाम पर कई किलो थर्मोकोल व पॉलिथीन का इस्तेमाल होता है, जिन्हें उपभोक्ता कूड़े में ही फेंकता है।

क्या यह अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए कि इस तरह के पैकेजिंग मटेरियल कंपनी खुद तत्काल उपभोक्ता से वापस ले लें? यह तो किसी छिपा नहीं है कि विभिन्न सरकारों द्वारा पर्यावरण बचाने के लिए करों से उनका खजाना जरूर भरा हो, कभी पर्यावरण संरक्षण के ठोस कदम तो उठे नहीं। भारत जैसे विशाल और दिन-दोगुनी, रात चौगुनी प्रगति कर रहे उपभोक्तावादी देश में अब यह अनिवार्य होना चाहिए कि प्रत्येक सामान के उत्पादक या निर्यातक उसके उत्पाद की पैकेजिंग या कंडम होने से उपजे कबाड़ या प्रदूषण के निष्पादन की तकनीक और जिम्मेदारी स्वयं ले। यह तो कतई नैतिक व न्यायोचित नहीं है कि कंपनियां चॉकलेट-बिस्कुट, मोबाइल फोन, पानी-शीतल पेय इत्यादि बेच कर जम कर मुनाफा कमाएं और उनकी वजह से होने वाले प्रदूषण से समाज व सरकार जूझें।



The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...