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गुरुवार, 7 दिसंबर 2023

silkiyara tunnel incident is beginning

 

सिलक्यारा सुरंग तो शुरुआत है

पंकज चतुर्वेदी



सिल्क्यारा की सुरंग में फंसे 41 श्रमिक तो  भारत के पारंपरिक ज्ञान – “रेट मायनिंग” की तकनीक और सेना के निर्देशन से बाहर  आ गए , लेकिन समझना होगा कि यह इंसान द्वारा पैदा की गई एक आपदा का महज निदान था ,असलियत तो यह है कि उत्तराखंड के पहाड़ के मिजाज को समझे बगैर वहां खुदाई करना पूरे पहाड़ के अस्तित्व का संकट है . जोशीमठ के धंसने और सैंकड़ों लोगों के निराश्रित होने की त्रासदी अभी हल हो नहीं पाई और पहाड़ पर चौड़ी  सडक बनाने का काम शुरू कर दिया गया . इस बात को  सलीके से छुपाया जा रहा है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट का “पर्यावरण प्रभाव आकलन “  हुआ ही नहीं . इस आकलन से बचने के लिए समूची परियोजना को छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ कर दिखा दिया गया . इससे पहले भी उत्तराखंड में विभिन्न परियोजनाओं में चार बार सुरंगें धंस चुकी है. इस बात को क्यों नजरंदाज़ किया जाता है कि  हिमालय जैसे युवा और बढ़ते पहाड़ का भूवैज्ञानिक  सर्वेक्षण  किसी सरकारी एजेंसी से ही नहीं करवाया गया .

जिन पहाड़ों , पेड़ों, नदियों ने पांच हज़ार् साल  से अधिक तक मानवीय सभ्यता, आध्यात्म, धर्म, पर्यावरण को विकसित होते देखा था, वह विकास के  विद्रूप प्रतिमान में बिखर चुके थे . जब जोशीमठ धंस रहा था और आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित  स्थान, मूल्य और संस्कार के उजड़ने से बेखबर तंत्र महज मुआवजे और विस्थापन की योजना बना रहा था ,तभी स्पष्ट हो ज्ञाता कि इस देवधरा पर प्रकृति प्रकोप और गहराएगा . अभी कुछ दशक पहले तक आस्था, विश्वास  और संकल्प के सतह बूढ़े भी इस पहाड़ पर कई कई दिनों का सफ़र कर पैदल चढ़ कर जाया करते थे  और विश्व को भरोसा देते थे कि सनातन का सत्व कायम है . कुछ किलोमीटर मोटर कम चले और और कुछ समय बच जाए इसके लिए पहाड़ के मूल स्वरुप से गंभीर छेड़छाड़ की परिणति है इस तरह सुरंग  का धंसना .

जब दुनिया पर जलवायु परिवर्तन का कहर  सामने दिख रहा है, हिमालय पहाड़ पर, विकास की नई परिभाषा गढ़ने की तत्काल जरूरत महसूस हो  रही है . जान लें यह केवल यमुनोत्री  हाई वे की बात नहीं है , पहाड़ पर जहां –जहां सर्पीली सडक पहुँच रही है, पर्यटक का बोझा बढ़ रहा है, पहाड़ों के दरकने-सरकने की घटनाएँ बढ़ रही हैं . यह सर्कार के रिकार्ड में दर्ज है कि उत्तराखंड में जहां अभी कम खुदाई हुई है वहां  भूस्खलन बेहद कम ही हुआ है . उत्तराखंड सरकार के  आपदा प्रबंधन विभाग और  विश्व  बैंक ने सन 2018 में एक अध्ययन करवाया था जिसके अनुसार  छोटे से उत्तराखंड  में 6300 से अधिक स्थान  भूस्खलन ज़ोन के रूप में चिन्हित किये गये  . रिपोर्ट कहती है कि राज्य में चल रही हज़ारों करोड़ की विकास परियोजनाएं पहाड़ों को काट कर या जंगल उजाड़ कर ही बन रही हैं और इसी से  भूस्खलन ज़ोन की संख्या में इजाफा हो रहा है.

दुनिया के सबसे युवा और जिंदा पहाड़ कहलाने वाले हिमालय में हरियाली उजाड़ने की कई परियोजनाएं खतरा बनी हुई हैं. नवंबर -2019 में राज्य की कैबिनेट से स्वीकृत नियमों के मुताबिक कम से कम दस हेक्टेयर में फैली हरियाली को ही जंगल कहा जाएगा. यही नहीं वहां न्यूनतम पेड़ों की सघनता घनत्व 60 प्रतिशत से कम ना हो और जिसमें 75 प्रतिशत स्थानीय वृक्ष प्रजातियां उगी हों. जाहिर है कि जंगल की परिभाषा  में बदलाव का असल इरादा  ऐसे कई इलाकां को जंगल की श्रेणी से हटाना है जो कि कथित विकास के राह में रोड़े बने हुए हैं. उत्तराखंड में बन रही पक्की सड़कों के लिए 356 किलोमीटर के वन क्षेत्र में कथित रूप से 25 हजार पेड़ काट डाले गए. मामला एनजीटी में भी गया लेकिन तब तक पेड़ काटे जा चुके थे. यही नहीं सड़कों का संजाल पर्यावरणीय लिहाज से संवेदनशील उत्तरकाशी की भागीरथी घाटी के से भी गुजर रहा है ..उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों को जोड़ने वाली सड़क परियोजना में 15 बड़े पुल, 101 छोटे पुल, 3596 पुलिया, 12 बाइपास सड़कें बन रही  है. इधर ऋषिकेश से कर्णप्रयाग और वहां से जोशीमठ तक रेल मार्ग परियोजना, जोकि नब्बे फ़ीसदी पहाड़ में छेद कर सुरंग से हो कर जायेगी , ने पहाड़ को थर्रा कर रखा  दिया है .यहाँ भी पिछले साल सुरंग धंस चुकी हैं .

सनद रहे हिमालय पहाड़ ना केवल हर साल बढ़ रहा है, बल्कि इसमें भूगर्भीय उठापटक चलती रहती हैं. यहां पेड़ भूमि को बांध कर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं जो कि कटाव व पहाड़ ढहने से रोकने का एकमात्र उपाय है. हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है और इसी से प्लेट बाउंड्री पर तनाव ऊर्जा संग्रहित हो जाती है जिससे क्रिस्टल छोटा हो जाता है और चट्टानों का विरुपण होता है. ये ऊर्जा भूकंपों के रूप में कमजोर जोनों एवं फाल्टों के जरिए सामने आती है.  जब पहाड़ पर तोड़फोड़ या धमाके होते हैं, जब उसके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड होती है तो भूकंप के खतरे तो बढ़ते हैं .

पहाड़ के उजड़ने के कारणों को बारीकी से देखे तो स्पष्ट हो जाता है कि जलवायु परिवर्तन की मार , अंधाधुंध  जल बिजली परियोजनाएं, बेतरतीब सडक निर्माण के साथ साथ  इन हालातों के लिए स्थानीय लोग भी कम दोषी नहीं हैं . चार धाम के पर्यटन से जीवकोपार्जन करने वालों को जब अधिक पैसा कमाने का चस्का लगा और उन्होंने अपनी जीवन शैली ही बदल डाली तो धीरे धीर यह हालात बने . प्रशासन ने घर-घर नल पहुंचा दिए। पहले जिसे जितनी जरूरत होती थी, नदी के पास जाता था और पानी का इस्तेमाल कर लेता था, अब जो घर में टोंटी लगी तो एक गिलास के लिए एक बाल्टी फैलाने का लोभ लग गया। सनद रहे इस इलाके में ठंड के दिनों में औसतन प्रति व्यक्ति 10 लीटर व गरमी में अधिकतम 21 लीटर पानी की जरूरत होती थी। कंक्रीट बढ़ने के साथ यह मांग औसतन 75 लीटर तक हो गई। जब इतना पानी इस्तेमाल होगा तो जाहिर है कि बेकार गए पानी   को बहने के लिए रास्ता भी चाहिए। अब पहाड़ों की ढलानों पर बसे मकानों के नीचे नालियों की जगह जमीन काट कर पानी तेजी से नीचे आने लगा, इससे ना केवल आधुनिक कंक्रीट वाले, बल्कि पारंपरिक मकान भी ढहने लगे। यही नहीं ज्यादा पैसा  बनाने के लोभ ने जमीनों पर कब्जे, दरिया के किनारे पर्यटकों के लिए आवास का लालच भी बढ़ाया।

यहाँ सड़क का इस्तेमाल  सामरिक से अधिक धार्मिक पर्यटन के लिए ज्यादा है और इसके पीछे  एक राजनीती भी है. इतने पर्यटक आने से स्थानीय व्यापार  बढ़ रहा है, आज कई हज़ार लोग  राज्य की विभिन्न परियोजनाओं में रोजगार पा रहे हैं , सो निश्चित ही यह स्थानीय लोगों के लिए सम्रद्धि दिखता है . इस तरह सुविधापूर्ण सड़कें और चकाचौंध करने वाली जन सुविधाएँ देश में सन्देश देती हैं कि अमुक सरकार ने हिन्दू तीर्थों में काम किया . यह तो कोई जानता नहीं कि इन सुविधाओं को  मुहैया कराने  के लिए किस तरह पर्यावरण को नुक्सान. जरूरत है कि उत्तराखंड के  हर हिस्से के  सघन भूगर्भीय आकलन की, ताकि जाना जा सके कि खान मजबूत चट्टान हैं और खान चुने के ढहने वाले पहाड़ . सिल्कियारा बानगी है कि महज 60 मीटर के दायरे में मिटटी या पहाड़ का मिजाज क्या है ? यह आंकने में देश-विदेश के वैज्ञानिक और इंजीनियर असमर्थ रहे हैं और आज भी अलग-अलग प्रयोग कर मात्र 12 मीटर गहराई  का मलवा हटाने कि कोशिशों में दो हफ्ते से अधिक का समय लग गया .

 

 

Need of a new United Nations

 

 

                    जरूरत है नए संयुक्त राष्ट्र की

                        


पंकज चतुर्वेदी

 

 

इजराइल पर किये गए हमास के हमले और उसके बाद गाजा पट्टी में खड़े हुए बड़े मानवीय संकट की बीच दुनिया की पहरेदार और मध्यस्थ संस्था संयुक्त राष्ट्र अर्थात यू एन  हताश सी बयान देती रही और दोनों तरफ से निर्दोष मारे जाते रहे . संकट के अस्थाई समाधान के लिए कतर जैसे देश को ही दखल देना पड़ा. युक्रेन और रूस का युद्ध सवा साल से चल रहा है . लोग मर रहे हैं , लगातार बारूद के इस्तेमाल से पर्यावरण प्रभावित हो रहा है . इस्ससे पहले कुछ ऐसे ही हालात हमने अफगानिस्तान में देखे थे . संयुक्त राष्ट्र ब्यान देता रहता है और ताकतवर देश मनमानी अक्र्ते हैं, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में  कुख्यात आतंकियों के विरुद्ध जब जब भारत ने बात की चीन जैसे देश ने माकूल कारवाही में अडंगा लगाया . दुनिया के सामने आज सबसे बड़ा संकट जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का है . इस विषय पर भी संयुक्त राष्ट्र में विकसित देश अपनी मनमर्जी चलाते हैं .  ऐसे में यह तो दिखने लगा है कि संयुक्त राष्ट्र का वर्तमान स्वरुप  वैश्विक समस्याओं के निराकरण में सक्षम नहीं हैं .


वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने जहां ऐसी समस्याओं में बढ़ौतरी की हैं जो एक-दूसरे पर निर्भर हैं , वहीं गरीबी तथा अमीरी के बीच की दूरियों को भी बढ़ाया है । बाजार दिनों-दिन वैश्विक होता जा रहा है, जबकि बाजार के लोकतांत्रिक, निष्पक्ष और कार्यक्षम संचालन पर निगाह रखने के लिए जिम्मेदार राजनैतिक संस्थाओं की भूमिका उसी दर से कमजोर होती जा रही है । वैश्विक आर्थिक संस्थाएं बाजार और बड़ी कंपनियों के पक्ष में ऐसी नीतियां का तेजी से विस्तार कर रही हैं । जलवायु परिवर्तन, युद्ध, अशांति, आतंकवाद, पर्यावरणीय समस्या, भूख, शरणार्थी समस्याओं में जहां बेतहाशा बढ़ौतरी हुई हैं वहीं, इसके निदान के लिए कोई 78 साल पहले बनी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं या तो असहाय हैं या फिर बेअसर। शांति और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कमजोर होने व हाशिये पर आ जाने के कारण ही अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया सहित दर्जनभर देशों में स्थाई अशांति हो गई है।


अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मानवता के इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव रही हैं । लेकिन समय के साथ इन संस्थाओं के कामकाज के तरीकों में कुछ ऐसी कमियां महसूस की गईं, जिनके चलते से संस्थाएं वर्तमान विश्व की जमीनी समस्याओं को सुलझाने में अप्रासंगिक हो गई हैं । अत्एव अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में ऐसे सुधार अत्यावश्वक हो गए हैं, जिससे दुनिया को एक बार फिर से निष्पक्ष, स्वतंत्र, विविधतापूर्ण, स्वीकार्य और शांत बनाए रखने का संकल्प साकार हो सके ।



‘‘लोकतंत्रीकरण’’ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधारों के लिए मूल मंत्र है । अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे विविध लोगों के हितों और पूरी दुनिया के निवासियों की आवश्यकताओं व उम्मीदों को पूरा करने की दिशा में कार्य करें । इसके लिए आवश्यक है कि उत्तर और दक्षिण के देशों के बीच अधिकारों को निष्पक्ष ढंग से व नए सिरे से निर्धारित किया जाए । साथ ही नागरिकों, नागरिक संस्थाओं, प्रशासन के विभिन्न स्तरों आदि की अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं व मंचों पर अधिक से अधिक सहभागिता की संभावनाओं का विस्तार किया जाना होगा ।



पारदर्शिता, जनता के प्रति जवाबदेही, अधिकारों का विकेंद्रीकरण और आम लोगों को मदद की नीतियां ; लोकतंत्रीकरण की इस प्रक्रिया के मूलभूत गुण हो सकते हैं । लेकिन यह समझना जरूरी है कि लोकतंत्रीकरण केवल कामकाज के सवाल पर ही केंद्रित नहीं है । संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की बैठकों में केवल देशों के प्रतिनिधियों की ही नहीं, दुनियाभर के आम नागरिकों की सीधी भागीदारी होना आवश्यक है । संयुक्त राष्ट्र को अपनी आम सभा का विस्तार करना होगा, धीरे-धीरे अन्य सभाओं और गोष्ठियों में एकरूपता लानी होगी, ताकि आम नागरिक पूरी व्यवस्था में अधिकार सहित निर्णायक भूमिका निभा सके । आवश्यक प्रस्तावों के मनोनयन तथा अन्य संस्थाओं, निकायों और व्यवस्था के कार्यक्रम तैयार करने वाले विभागों पर प्रभावी नियंत्रण उसके पास हो ।

 

बानगी के तौर पर सबसे पुरानी बहुपक्षीय संस्थाओं में से एक अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन(आईएलओ) को ही लें । व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए इस संस्था के लिए एक विशेष-सभा का गठन किया जा सकता है, जिसमें विभिन्न देशों के विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि और सामाजिक संस्थाओं के चर्चित लोगों को शामिल किया जा सकता है ।

     विवादों को रोकने शांति बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को अपनी क्षमताओं का विकास करना होगा । इसके लिए आवश्यक है कि मानवीय सुरक्षा की सामूहिक व्यवस्था लागू की जाए । इससे किसी विवाद को सुलझाने के लिए फौजी ताकत के बनिस्पत कानून व पंचायती-निबटारे की प्रवृति को बढ़ावा मिलेगा । शांति और सुरक्षा संबंधी मामलों की जिम्मेदारी निभाने वाले विभागों को सभी पक्षों के विचारों को संतुलित तरीके से सुनना चाहिए । इन विभागों के पास इस तरह के अधिकार होना चाहिए कि वे अपने निर्णय को मानने के लिए सभी पक्षों को बाध्य कर सकें । इस  उद्देश्य की पूर्ति के लिए मौजूदा सुरक्षा परिषद में बदलाव और उसे प्रभावी रूप से संयुक्त राष्ट्र आम-सभा के अंतर्गत करना होगा ।  विश्व के सभी हिस्सों से विभिन्न क्षेत्रों के लोगों का प्रतिनिधित्व आम-सभा में भी होना चाहिए । ‘वीटो’ के इस्तेमाल का अधिकार कुछ मुद्दों तक ही सीमित कर देना चाहिए , हालांकि इस विशेष-अधिकार को समाप्त करने के लिए सतत कदम उठाए जाने चाहिए । बेहद महत्वपूर्ण विषयों पर मतदान को ‘योग्यता-बहुमत’ की प्रक्रिया के अनुसार निर्धारित करना होगा ।

ये बदलाव, सभी तरह के विवादों को प्रभावी तरीके से सुलझाने में सक्षम तो होंगे ही, साथ ही क्षेत्रीय संस्थाओं की मदद से विवादों से बचाव का तंत्र विकसित करने तथा विश्व स्तर की ताकतवर शांति-सेना गठित करने में भी इससे मदद मिलेगी । साथ ही साथ दुनिया में निःशस्त्रीकरण की, विशेषरूप से गैर-पारंपरिक हथियारों के निःशस्त्रीकरण की, शुरूआत भी होगी । हालांकि हमें यह याद रखना होगा कि विश्व के सभी देशों के बीच आपसी विश्वास की भावना स्थापित करना इसके लिए आवश्यक है । 

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के वैश्विक व्यापक-अर्थशास्त्रीय प्रबंधन क्षमता का विस्तार वित्तीय, आर्थिक, व्यापार, सामाजिक और पर्यावरणीय नीतियों के माध्यम से होना चाहिए । इसमें सभी पक्षों के हितों को, विशेषरूप से गरीबों के हितों का ध्यान रखना होगा ।  विश्व की मुख्य समस्या - गरीबी और असमानता, के समाधान के लिए इन सभी नीतियों का क्रियान्वयन एकीकृत और समन्वित तरीके से किया जाना चाहिए । मानवाधिकारों को प्राथमिकता देनी होगी । आर्थिक नीतियों व सामाजिक अधिकारों तथा पर्यावरणीय मुद्दों के संदर्भित प्रसार हेतु अंतराष्ट्रीय -सभा में क्रमबद्ध प्राथमिकता तय करना अत्यावश्यक है ।

इस तरह के सुधारों के बदौलत विदेशी कर्ज, करों के बढ़ते बोझ, की समस्याओं के स्थाई हल का मार्ग प्रशस्त होगा । इससे सार्वभौमिक कराधान निगम जैसी परिकल्पना का साकार होना और  वैश्विक कर तथा विकास के कार्यों के लिए आधिकारिक रूप से धन की मदद में बढ़ौतरी भी होगी । खासकर जलवायु परिवर्तन कर और उसके उपयोग की प्रक्रिया परिणामोंमुखी बन सकती है .

इन सभी सुधारों और नीतियों के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सशक्त लोकतांत्रिक व्यवस्था तो अनिवार्य रूप से सशक्त होगी ही ; साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपराध, सार्वजनिक, आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय कानूनों की सुरक्षा के भी उपाय स्वतः हो जाएंगे । इसके लिए हमें कानून सम्मत वैश्विक  को सुनिश्चित करने के लिए आगे आना होगा ; वर्तमान अंतरराष्ट्रीय समझौतों को लागू करने की बाध्यता, मौजूदा अंतरराष्ट्रीय विधिक संस्थाओं को मजूबत बनाने और जिन अन्य क्षेत्रों में ऐसी संस्थाओं की आवश्कता हो, वहां नई संस्थाएं गठित करने के लिए त्वरित व परिणामदायी कदम उठाने होंगे । इन सबसे अधिक आवश्यक है कि सभी संस्थाओं को इन कानूनों के क्रियान्वयन के आवश्यक व अनिवार्य साधन व अधिकार उपलब्ध करवाए जाएं ।

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2023

should not This model of development overwhelm the mountain.?

 कही पहाड पर भारी ना पड़ जाए विकास का यह मॉडल

पंकज चतुर्वेदी

 
दिवाली की  रात उत्तराखंड में यमुनोत्री तक के मार्ग को कुछ किलोमीटर कम करने के लिए निर्माणाधीन  सडक की सिल्कियारा  सुरंग में फंसे लोगों के बाहर निकालने में आखिर भारतीय सेना को 18वें दिन सफलता मिल गई।  पहाड़ को सलीके से समझे बगैर उसके साथ  की गई छेड़छाड़ की नादानी का ही परिणाम है कि जिस अमेरिकी मशीन “औगर “ को पराक्रमी कहा  जा रहा था, लक्ष्य से 12 किलोमीटर दूर इस तरह टूटी कि उसे टुकडे-टुकड़े कर निकालना पड़ रहा है . लोगो को सुरक्षित निकालने के लिए जहां भी पहाड़ को छेदा जाता है , वहां मिल रही असफलता बता देती है कि इन्सान के विज्ञानं और तकनीक ज्ञान की तुलना में दुनिया का सबसे युवा पहाड़ हिमालय अभी भी बहुत विशाल है . 
प्रकृति में जिस पहाड़ के निर्माण में हजारों-हजार साल लगते हैं, हमारा समाज उसे उन निर्माणों की सामग्री जुटाने के नाम पर तोड़ देता है जो कि बमुश्किल सौ साल चलते हैं। पहाड़ केवल पत्थर के ढेर नहीं होते, वे इलाके के जंगल, जल और वायु की दशा  और दिशा तय करने के साध्य होते हैं। जहां सरकार पहाड़ के प्रति बेपरवाह है तो पहाड़ की नाराजी भी समय-समय पर सामने आ रही है। यदि धरती पर जीवन के लिए वृक्ष अनिवार्य है तो वृक्ष के लिए पहाड़ का अस्तित्व बेहद जरूरी है। वृक्ष से पानी, पानी से अन्न तथा अन्न से जीवन मिलता है। ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन की विश्वव्यापी समस्या का जन्म भी जंगल उजाड़ दिए गए पहाड़ों से ही हुआ है। यह विडंबना है कि आम भारतीय के लिए ‘‘पहाड़’’ पर्यटन स्थल है या फिर उसके कस्बे का पहाड़ एक डरावनी सी उपेक्षित संरचना।  विकास के नाम पर पर्वतीय राज्यों में बेहिसाब पर्यटन ने प्रकृति का हिसाब गड़बड़ाया तो गांव-कस्बों में विकास के नाम पर आए वाहनों, के लिए चौड़ी सड़कों के निर्माण के लिए जमीन जुटाने या कंक्रीट उगाहने के लिए पहाड़ को ही निशाना बनाया गया।

 
हिमालय भारतीय उपमहाद्धीप के जल का मुख्य आधार है और यदि नीति आयोग के विज्ञान व प्रोद्योगिकी विभाग द्वारा तीन साल पहले तैयार जल संरक्षण पर रिपोर्ट पर भरोसा करें तो हिमालय से निकलने वाली 60 फीसदी जल धाराओं में दिनों-दिन पानी की मात्रा कम हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग या धरती का गरम होना, कार्बन उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन और इसके दुष्परिणाम  धरती के शीतलीकरण का काम कर रहे ग्लेशियरों  पर आ रहे भयंकर संकट व उसके कारण समूची धरती के अस्तित्व के खतरे की बातें अब महज कुछ पर्यावरण-विषेशज्ञों तक सीमित नहीं रह गई हैं। धीरे से  कुछ ऐसे दावों के दूसरे पहलु भी सामने आने लगे कि जल्द ही हिमालय के हिम नद  पिघल जाएंगे, जिसके चलते नदियों में पानी बढ़ेगा और उसके परिणामस्वरूप जहां एक तरफ कई नगर-गांव जल मग्न हो जाएंगे, वहीं धरती के बढ़ते तापमान को थामने वाली छतरी के नष्ट होने से भयानक सूखा, बाढ़ व गरमी पड़ेगी और जाहिर है कि ऐसे हालात में मानव-जीवन पर भी संकट होगा। 


तीन साल पहले  भारत में कोरोना संकट के चलते लागू की गई बंदी में भले ही दफ्तर-बाजार आदि पूरी तरह बंद थे लेकिन 31 विकास परियोजनाओं के लिए 185 एकड़ घने जंगलों को उजाड़ने की अनुमति देने का काम जरूर होता रहा। सात अप्रैल 2020 को राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्लूएल ) की स्थाई समिति की बैठक वीडियो कांफ्रेस पर आयोजित की गई ढेर सारी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए घने जंगलों को उजाड़ने की अनुमति दे दी गई। समिति ने पर्यावरणय दृष्टि से संवेदनशील  2933 एकड़ के भू-उपयोग परिवर्तन के साथ-साथ 10 किलोमीटर संरक्षित क्षेत्र की जमीन को भी कथित विकास के लिए सौंपने पर समिति सहमत दी । इस श्रेणी में प्रमुख प्रस्ताव उत्तराखंड के देहरादून और टिहरीगढवाल जिलों में लखवार बहुउद्देशीय परियोजना (300 मेगावाट) का निर्माण और चालू है। यह परियोजना बिनोग वन्यजीव अभयारण्य की सीमा से 3.10 किमी दूर स्थित है और अभयारण्य के डिफ़ॉल्ट ईएसजेड में गिरती है। परियोजना के लिए 768.155 हेक्टेयर वन भूमि और 105.422 हेक्टेयर निजी भूमि की आवश्यकता होगी। परियोजनाओं को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी को पिछले साल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने निलंबित कर दिया था। इसके बावजूद इस परियोजना पर राष्ट्रीय बोर्ड द्वारा विचार किया जा रहा हे। 


दुनिया के सबसे युवा और जिंदा पहाड़ कहलाने वाले हिमालय  के पर्यावरणीय छेड़छाड़ से उपजी सन 2013 की केदारनाथ त्रासदी को भुला कर उसकी हरियाली उजाड़ने की कई परियोजनाएं उत्तराखंड राज्य के भविश्य  के लिए खतरा बनी हुई हैं। गत नवंबर -2019 में राज्य की कैबिनेट से स्वीकृत नियमों के मुताबिक कम से कम दस हेक्टेयर में फैली हरियाली को ही  जंगल कहा जाएगा। यही नहीं वहां न्यूनतम पेड़ों की सघनता घनत्व 60 प्रतिशत से कम ना हो और जिसमें 75 प्रतिशत स्थानीय वृक्ष प्रजातियां उगी हों। जाहिर है कि जंगल की परिभाशा में बदलाव का असल उद्देष्य ऐसे कई इलाकां को जंगल की श्रेणी से हटाना है जो कि कथित विकास के राह में रोड़े बने हुए हैं। उत्तराखंड में बन रही पक्की सड़कों के लिए 356 किलोमीटर के वन क्षेत्र में कथित रूप से 25 हजार पेड़ काट डाले गए। मामला एनजीटी में भी गया लेकिन तब तक पेड़ काटे जा चुके थे। यही नहीं सड़कों का संजाल पर्यावरणीय लिहाज से संवेदनशील उत्तरकाशी की भागीरथी घाटी के से भी गुजर रहा है ।.उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों को जोड़ने वाली सड़क परियोजना में 15 बड़े पुल, 101 छोटे पुल, 3596 पुलिया, 12 बाइपास सड़कें बनाने का काम चल रहा = है। कोई 12 हजार करोड़ रुपए के अलावा ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलमार्ग परियोजना भी स्वीकृति हो चुकी है, जिसमें ना सिर्फ बड़े पैमाने पर जंगल कटेंगे, वन्य जीवन प्रभावित होगा और पहाड़ों को काटकर सुरंगे और पुल निकाले जाएंगें। 


यह बात स्वीकार करना होगा कि पहाड़ के भू वैग्यंकी सर्वेक्षण किये बगैर बन रही परियोजनाओं के लिए हो रहे धमाकों व तोड़ फोड़ से शांत - धीर गंभीर रहने वाले जीवित हिम- पर्वत नाखुश  हैं। जान कर आश्चर्य होगा कि जिस  परियोजना के लिए सिल्कियारा सुरंग बनाई जा रही है , उसके पर्यवार्नीय प्रभाव आकलन की अनिवार्यता से बचने के लिए उसे छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ कर दिखाया गया . 
सनद रहे हिमालय पहाड़ ना केवल हर साल बढ़ रहा है, बल्कि इसमें भूगर्भीय उठापटक चलती रहती हैं। यहां पेड़ भूमि को बांध कर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं जो कि कटाव व पहाड़ ढहने से रोकने का एकमात्र उपाय है। जानना जरूरी है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है और इसी से प्लेट बाउंड्री पर तनाव ऊर्जा संग्रहित हो जाती है जिससे क्रस्टल छोटा हो जाता है और चट्टानों का विरुपण होता है। ये ऊर्जा भूकंपों के रूप में कमजोर जोनों एवं फाल्टों के जरिए सामने आती है।  जब पहाड़ पर तोड़फोडत्र या धमाके होते हैं, जब उसके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाउ होती है तो दिल्ली  तक भूकंप के खतरे तो बढ़ते ही हैं , यमुना में कम पानी का संकट भी खड़ा होता है।  अधिक सुरंग या  अविरल धारा को रोकने से पहाड़ अपने नैसर्गिक स्वरूप में रह नहीं पाता और उसके दूरगामी परिणाम विभिन्न प्राकृतिक आपदा के रूप में सामने  आ रहे हैं।



उम्मीद के मुताबिक सुरंग में फंसे 41 लोग भारतीय सेना की मेहनत और योजना के चलते सुरक्षित बाहर आ गए, लेकिन इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हमें अभी देश के  “जल-प्राण” कहलाने वाले हिमालय  के बारे में सतत अध्ययन और नियमित आकलन की बेहद जरूरत है। यह विचार करने की जरूरत है कि राज्य में  आस्था के केन्द्रों को कितना पर्यटन की मौज मस्ती में बदला जाए और यहाँ पर्यटन को किस हद तक व किस शर्त पर बढ़ावा दिया जाए। 


बुधवार, 22 नवंबर 2023

For Fresh air need control on source not technology

  

             तकनीकी से नहीं आत्म नियंत्रण से थमेगा साँसों का जहर
 

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पंकज चतुर्वेदी

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जब दिल्ली और उसके आसपास दो सौ किलोमीटर की साँसों पर संकट  छाया और सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नजरिया अपनाया  तो सरकार का एक नया शिगूफा  सामने आ गया - कृत्रिम बरसात . वैसे भी दिल्ली  के आसपास जिस तरह  सी एन जी वाहन अधिक है , वहां बरसात नए तरीके का संकट ला सकती हैं . विदित हो सी एन जी दहन से  नायट्रोजन ऑक्साइड और  नाइट्रोजन की ऑक्सीजन के साथ गैसें जिन्हें “आक्साईड आफ नाइट्रोजन “ का उत्सर्जन होता है . चिंता की बात यह है कि “आक्साईड आफ नाइट्रोजन “ गैस वातावरण में मौजूद पानी और ऑक्सीजन के साथ मिल कर तेजाबी बारिश कर सकती है ।

जिस कृत्रिम बरसात का झांसा दिया जा रहा है , उसकी तकनीक को समझना जरुरी है . इसके लिए हवाई जहाज से सिल्वर-आयोडाइड और कई अन्य रासायनिक  पदार्थो का छिडकाव किया जाता है, जिससे सूखी बर्फ के कण तैयार होते हैं . असल में सूखी बर्फ ठोस कार्बन डाइऑक्साइड ही होती है . सूखी बर्फ की खासियत होती है कि इसके पिघलने से पानी नहीं बनता और यह गैस के रूप में ही लुप्त ओ जाती है . यदि परिवेश के बादलों में थोड़ी भी नमी होती है तो यह  सूखी बर्फ के कानों पर चिपक जाते हैं और इस तरह बादल का वजन बढ़ जाता है , जिससे बरसात हो जाती है .


एक तो इस तरह की बरसात के लिए जरुरी है कि वायुमंडल में  कम से कम 40 फ़ीसदी नमी हो , फिर यह थोड़ी सी देर की बरसात ही होती है . इसके साथ यह ख़तरा बना रहता है कि वायुमंडल में कुछ उंचाई  तक जमा स्मोग और अन्य छोटे कण  फिर धरती पर  आजायें . साथ ही सिल्वर आयोडाइड, सूखी बर्फ के धरती पर गिरने से उसके संपर्क में आने वाले पेड़-पौधे , पक्षी और जीव ही नहीं, नदी-तालाब पर भी रासायनिक ख़तरा संभावित है .

हमारे नीति निर्धारक आखिर यह क्यों नहीं समझ रहे कि  बढ़ते प्रदुषण का इलाज तकनीक में तलाशने से ज्यादा जरुरी है प्रदूषण को ही कम करना . एक बात समझना होगा  यह मसला केवल दिल्ली टीके ही सीमित नहीं हैं – मुंबई, बंगलुरु  के हालात इससे बेहतर नहीं हैं .  ईर हर राजी की राजधानी भी इसी तरह  हाँफ रही है  और हर जगह  ऐसे ही किसी जादुई  तकनीक के सब्जबाग दिखाये जाते हैं ।


दिल्ली में अभी तक जितने भी तकनीकी  प्रयोग किये गये, वे विज्ञापनों में भले ही उपलब्धी  के रूप में  दर्ज हों लेकिन हकीकत में वे बे असर ही रहे हैं  . यह तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसकी एक टिपण्णी के चलते इस बार दिल्ली में  वाहनों का सम-विषम संचालन थम गया . याद दिलाना चाहेंगे कि तीन साल पहले एम्स के तत्कालीन निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया ने कह दिया था दूषित हवा से सेहत पर पड़ रहे कुप्रभाव का सम विषम स्थायी समाधान नहीं है। क्योंकि ये उपाय उस समय अपनाये जाते हैं जब हालात पहले से ही आपात स्थिति में पहुंच गये हैं। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट भी कह चुकी है कि जिन देशों में ऑड ईवन लागू है वहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट काफ़ी मजबूत और फ्री है. सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड अदालत को बता चुकी है कि ऑड ईवन से वायु-गुणवत्ता में कोई ख़ास  फायदा नहीं हुआ। प्रदूषण सिर्फ 4 प्रतिशत कम हुआ है ।


याद करें इससे पहले हम  “स्मोग टावर “ के हसीन सपनों  को तबाह होते देख चुके हैं . दिवाली के पहले जब दिल्ली में  वायु गुणवत्ता दुनिया में सबसे खराब थी तब राजधानी में लगे स्मोग टावर  धूल खा रहे थे .  सनद रहे 15 नवम्बर 2019 को जब दिल्ली हांफ रही थी तब सुप्रीम कोर्ट ने तात्कालिक  राहत के लिए प्रस्तुत किये गये विकल्पों में से  “ स्मोग टॉवर” के निर्देश दिए थे . एक साल बाद दिल्ली-यूपी सीमा पर 20 करोड़ लगा कर आनंद विहार में स्मॉग टावर लगाया . इससे पहले  23 अगस्त को कनॉट प्लेस में पहला स्मॉग टॉवर 23 करोड खर्च कर लगाया गया था । इनके विज्ञापन पर व्यय हुआ उसका फ़िलहाल हिसाब नहीं हैं . इसके संचालन और रखरखाव पर शायद इतना अधिक खर्चा था कि वे बंदकर दिए गये . इसी हफ्ते जब फिर सुप्रीम कोर्ट  दिल्ली की हवा के जहर होने पर चिंतित दिखा तो  टावर शुरू कर दिए गये . वैसे यह सरकारी रिपोर्ट में दर्ज है कि इस तरह के टावर  से समग्र रूप  से कोई लाभ हुआ नहीं. महज कुछ वर्ग मीटर में थोड़ी सी हवा साफ़ हुई । असल में स्मॉग टावर बड़े आकार का एयर प्यूरीफायर होता है , जिसमें  हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों को छानने के लिए कार्बन नैनोफाइबर फिल्टर की कई परतें होती हैं।  इसमें बड़े एक्जास्ट पंखे होते हैं जो आसपास की दूषित हवा को खींचते है, उसके सूक्ष्म कणों को कर  साफ हवा फिर से परिवेश  में  भेज देते हैं।


सन 2020 में एमडीपीआई (मल्टिडिसप्लेनरी डिजिटल पब्लिशिंग इन्स्टीट्यूट) के लिए किए गए शोध- “कैन वी वैक्यूम अवर एयर पॉल्यूशन प्रॉब्लम यूजिंग स्माग टॉवर”  में सरथ गुट्टीकुंडा और पूजा जवाहर ने बताया दिया था कि चूंकि वायु प्रदूषण की न तो कोई सीमा होती है और न ही दिशा, सो दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र- गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, फरीदाबाद, गुरुग्राम और रोहतक के सात हजार वर्ग किलोमीटर इलाके में कुछ स्मॉग टावर  बेअसर ही रहेंगे।


वैसे, दिल्ली में वायु प्रदूषण के एक अन्य उपाय भी काम चल रहा है। जापान सरकार  अपने एक विश्वविद्यालय के जरिये दिल्ली-एनसीआर में एक शोध-सर्वे करवा चुका है जिसमें उसने आकलन किया है कि आने वाले दस साल में सार्वजनिक परिवहन और निजी वाहनों में हाईड्रोजन और फ्यूल सेल-आधारित तकनीक के इस्तेमाल से उसे कितना व्यापार मिलेगा। हाईड्रोजन का इंर्धन के रूप में प्रयोग करने पर बीते पांच साल के दौरान कई प्रयोग हुए हैं। बताया गया है कि इसमें शून्य कार्बन का उत्सर्जन होता है और केवल पानी निकलता है। इस तरह के वाहन महंगे होंगे ही . फिर टायर घिसने और बेटरी के धुएं से  स्मोग बनाने  की संभावना तो बरकरार ही रहेगी ..


शहरों  में भीड़ कम हो, निजी वाहन कम हों , जाम न लगे , हरियाली बनी रहे – इसी से जहरीला धुंआ कम होगा . मशीने मानवीय भूल का निदान होती नहीं . हमें जरूरत है आत्म नियंत्रित ऐसी प्रक्रिया की जिससे  वायु को जहर बनाने वाले कारक ही जन्म न लें .

 

शुक्रवार, 17 नवंबर 2023

Why not celebrate Chhat as an environmental festival

 क्यों ना छट को पर्यावरण पर्व के रूप में मनाएं



दीपावली के ठीक बाद में बिहार व पूर्वी राज्यों में मनाया जाने वाला छठ पर्व अब प्रवासी बिहारियों के साथ-साथ सारे देश  में फैल गया है। गोवा से लेकर मुंबई और भोपाल से ले कर बंगलूरू तक, जहां भी पूर्वांचल के लोग बसे हैं, कठिन तप के पर्व छठ को हरसंभव उपलब्ध जल-निधि के तट पर मनाना नहीं भूलते है। वास्तविकता यह भी है कि छट को भले ही प्रकृति पूजा और पर्यावरण का पर्व बताया जा रहा हो, लेकिन इसकी हकीकत से दो चार होना तब पड़ता है जब उगते सूर्य को अर्ध्य दे कर पर्व का समापन होता है और श्रद्धालु घर लौट जाते हैं। पटना की गंगा हो या दिल्ली की यमुना या भोपाल का शाहपुरा तालाब या दूरस्थ अंचल की कोई भी जल-निधि, सभी जगह एक जैसा दृष्य होता है- पूरे तट पर गंदगी, बिखरी पॉलीथीन , उपेक्षित-गंदला रह जाता है वह तट जिसका एक किनारा पाने के लिए अभी कुछ देर पहले तक मारा-मार मची थी।


छट पर्व लोक आस्था का प्रमुख सोपान है- प्रकृति ने अन्न दिया, जल दिया, दिवाकर का ताप दिया, सभी को धन्यवाद और ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा’ का भाव। असल में यह दो ऋतुओं के संक्रमण-काल में श रीर को पित्त-कफ और वात की व्याधियों से निरापद रखने के लिए गढ़ा गया अवसर था। कार्तिक मास के प्रवेश के साथ छठ की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। भोजन में प्याज-लहसुन का प्रयोग पूरी तरह बंद हो जाता है। छठ के दौरान छह दिनों तक दिनचर्या पूरी तरह बदल जाती है। दीवाली के सुबह से ही छठ व्रतियों के घर में खान-पान में बहुत सारी चीजें वर्जित हो जाती है, यहां तक कि सेंधा नमक का प्रयोग होने लगता है।

सनातन धर्म में छट एक ऐसा पर्व है जिसमें किसी मूर्ति-प्रतिमा या मंदिर की नहीं, बल्कि प्रकृति यानि सूर्य, धरती और जल की पूजा होती है।  धरती पर जीवन के लिए, पृथ्वीवासियों के स्वास्थ्य की कामना और भास्कर के प्रताप से धरतीवासियों की समृद्धि के लिए भक्तगण सूर्य के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। बदलते मौसम में जल्दी सुबह उठना और सूर्य की पहली किरण को जलाश य से टकरा कर अपने श रीर पर लेना, वास्तव में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। वृत करने वाली महिलाओं के भेाजन में कैल्ष्यिम की प्रचुर मात्रा होती है, जोकि महिलाओं की हड्डियों की सुदृढता के लिए अनिवाय भी है। वहीं सूर्य की किरणों से महिलओं को साल भर के लिए जरूरी विटामिन डी मिल जाता है। यह विटामिन डी कैल्ष्यिम को पचाने में भी मदद करता है। तप-वृत से रक्तचाप नियंत्रित होता है और सतत ध्यान से नकारात्मक विचार मन-मस्तिश्क से दूर रहते हैं।


वास्तव में यह बरसात के बाद नदी-तालाब व अन्य जल निधियों के तटों ंपर बह कर आए कूड़े को साफ करने, अपने प्रयोग में आने वाले पानी को इतना स्वच्छ करने कि घर की महिलाएं भी उसमें घंटों खड़ी हो सके, दीपावली पर मनमाफिक खाने के बाद पेट को नैसर्गिक उत्पादों से पोशित करने और विटामिन के स्त्रोत सूर्य के समक्ष खड़े होने का वैज्ञानिक पर्व है।  पर्व में इस्तेमाल प्रत्येक वस्तु पर्यावरण को पपित्र रखने का उपक्रम होती है- बांस का बना सूप, दौरा, टोकरी, मउनी व सूपती तथा मिट्टी से बना दीप, चौमुख व पंचमुखी दीया, हाथी और कंद-मूल व फल जैसे ईख, सेव, केला, संतरा, नींबू, नारियल, अदरक, हल्दी, सूथनी, पानी फल सिंघाड़ा, चना, चावल (अक्षत), ठेकुआ, खाजा इत्यादि।


इसकी जगह ले ली- आधुनिक और कहीं-कहीं अपसंसकृति वाले गीतों ने , आतिश बाजी,घाटों की दिखावटी सफाई, नेातागिरी, गंदगी, प्लास्टिक-पॉलीथीन जैसी प्रकृति-हंता वस्तुओं और बाजारवाद ने। अस्थाई जल-कुंड या सोसायटी के स्वीमिग पुल में छट पूजा की औपचारिकता पूरा करना असल में इस पर्व का मर्म नहीं है। लोग नैसर्गिक जल-संसाधनों तक जाएं, वहां घाट व तटों की सफाई करें और फिर पूजा करें , इसके बनिस्पत अपने घर के पास एक गड्ढे में पानी भर कर पूजा के बाद उसके गंदा, बदबूदार छोड़ देना तो इसकी आत्मा को मारना ही है। यही नहीं जिस जल में वृत करने वाली महिलाएं खड़ी रहती हैं, वह भी इतना दूशित होता है कि उनके पैरों और यहां तक कि गुप्तांगों में संक्रमण की संभावना बनी रहती है। गंदी-जहरीली पोलीथीन में खाद्य  सामग्री ले जाने से उसकी पवित्रता प्रभावित होती है। यही नहीं जो काल शांत तप-आत्ममंथन और ध्यान का होता है, उसमें भौंडे गीत और फिल्मी पैरोडी पर भजनों का सांस्कृतिक व ध्वनि प्रदूषण अलग से होता है। जबकि पारंपरिक रूप से ढोलक या मंजीरा बजा कर गीत गाने से महिलाओं के संपूर्ण शरीर का व्यायाम , अपने पारंपरिक गीतों या मौखिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का उपक्रम होता था। उसका स्थान बाजार ने ले लिया । पर्व समाप्त होते ही चारों तरफ फैली पूजा सामग्री में मुंह मारते मवेशी और उसमें से कुछ अपने लिए कीमती तलाश ते गरीब बच्चे, आस्था की औपचारिकता को उजागर करते हैं।


काश , छठ पर्व की वैज्ञानिकता, मूल-मंत्र और आस्था के पीछे तर्क को भलीभांति समाज तक प्रचारित-प्रसारित किया जाए। जल-निधियों की पवित्रता, स्वच्छता के संदेश  को आस्था के साथ व्यावहारिक पक्षों के साथ लोक-रंग में पिरोया जाए, लोक को अपनी जड़ो की ओर लौटने को प्रेरित किया जाए तो यह पर्व अपने आधुनिक रंग में धरती का जीवन कुछ और साल बढ़ाने का कारगर उपाय हो सकता है। हर साल छट पर्व पर यदि देश  भर में हजार तालाब खोदने और उन्हें संरक्षित करने का संकल्प  हो, दस हजार पुराने तालाबों में गंदगी जाने से रोकने का उपक्रम हो , नदियों के घाट पर साबुन, प्लास्टिक  और अन्य गंदगी ना ले जाने की शपथ हो तो छट के असली प्रताप और प्रभाव को देखा जा सकेगा।

यदि छट के तीन दिनों को जल-संरक्षण दिवस, स्वच्छता दिवस जैसे नए रंग के साथ प्रस्तुत किया जाए और आस्था के नाम पर एकत्र हुई विषाल भीड़ को भौंडे गीतों के बनिस्बत इन्हीं सदेषों से जुड़े सांस्कृतिक आयोजनों  से शिशित किया जाए, छट के संकल्प को साल में दो या तीन बार उन्ही जल-घाटों पर आ कर दुहराने का प्रकल्प किया जाए तो वास्तव में सूर्य का ताप, जल की पवित्रता और खेतों से आई नई फसल की पौष्टिकता समाज को निरापद कर सकेगी।

छठ पूजा के दौरान जो भी प्रसाद होता है उससे सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और फिर सबकुछ लेकर व्रत करने वाले वापस आ जाते हैं। सामान अगर नदीं में छूटता है तो वह फूल-पत्ती होती है, जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती। इस तरह देखा जाए तो प्रकृति की पूजा का ये महापर्व पूरी तरह से प्रकृति-पूजा है।

छठ पूजा के अनुष्ठान के दौरान गाए जाने वाले- ‘केरवा जे फरले घवध से ओह पर सुग्गा मंडराय, सुगवा जे मरवो धनुश  से सुगा जइहे मुरझाए। सुगनी जे रोवेली वियोग से आदित होख ना सहाय.., जैसे गीत इस बात को दर्शाता हैं कि लोग पशु पक्षियों के संरक्षण की याचना कर उनके अस्तित्व को कायम रखना चाहते हैं। इसी तरह इस अनुष्ठान के क्रम में कोसी भरने के समय मिट्टी के वर्तन पर हाथी की आकृति बनाने की परंपरा भी जैव संरक्षण की प्रेरणा प्रदान करता है।

 

गुरुवार, 16 नवंबर 2023

Chhath festival: water resources should conserved throughout the year


                              छठ पर्व : काश सालभर जल-निधियों को सहेजा होता

पंकज चतुर्वेदी


दिल्ली है ही इसी लिए क्योंकि इसके बीच से यमुना बहती है  लेकिन  इस बार छठ का स्नान या पूजा यमुना में नहीं हो पाएगी . सारी दिल्ली में  अस्थाई तालाब बनाए जा रहे हैं . इसके लिए राज्य सरकार पैसा बाँट रही है .  पिछले साल 9 अक्टूबर, 2021 को  दिल्ली सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर   यमुना में छठ पर्व पर रोक लगी थी . कुछ संगठनों ने इस अधिसूचना को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया गया कि इस   अधिसूचना से  दिल्ली के लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता हैं . अभी 9 नवम्बर 23 को अदालत ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने टिप्पणी की कि प्रतिबंध यमुना में प्रदूषण को रोकने के लिए लगाया गया है। दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद की हिंडन नदी नाम की ही बची है , इसे नाबदान कहना बेहतर होगा. चूँकि यहाँ कई लाख पूर्वांचलवासी हैं सो इसे गंग- नहर से  थोडा सा पानी डाल कर तीन दिन को जिलाया जाएगा .

 यह विचार करना होगा कि जिस नदी के लिए सारे साल समाज बेपरवाह रहता है ,उसके घाटों पर झाड़ू- बुहारू होने लगी है . कहने को वहां  स्थाई पूजा के चबूतरे हैं लेकिन साल के 360 दिन यह  सार्वजनिक शौचालय अधिक होता है . जैसे ही पर्व का समापन ओता है . जिस नदी में भक्त खड़े थे, वह देखते ही देखते काला-बदबूदार नाला बन जाती है.  बस नाम बदलते जाएँ  देश के अधिकाँश नदी  और तालाबों की यहो गाथा है . सामाज कोशिश करता है कि  घर से दूर अपनी परम्परा का जैसे तैसे पालन हो जाये- चाहे सोसायटी के स्विमिंग पूल में या फिर  अस्थाई बनाए गए कुंड में, लेकिन वह बेपरवाह रहता है कि असली छठ  मैया  तो उस  जल-निधि की पवित्रता में बसती है जहाँ  उसे सारे साल सहेज कर रखने की आदत हो .

यह ऋतू के संक्रमण काल का पर्व है ताकि कफ-वात और पित्त दोष को नैसर्गिक रूप से नियंत्रित किया जा सके  और इसका मूल तत्व है जल- स्वच्छ जल . जीवनदायी कहलाने वाला यदि जल यदि स्वच्छ नहीं है तो जहर है .

छठ पर्व वास्तव में बरसात के बाद नदी-तालाब व अन्य जल निधियों के तटों पर बह कर आए कूड़े को साफ करने, अपने प्रयोग में आने वाले पानी को इतना स्वच्छ करने कि घर की महिलाएं भी उसमें घंटों खड़ी हो सकें, दीपावली पर मनमाफिक खाने के बाद पेट को नैसर्गिक उत्पादों से पोषित करने और विटामिन के स्त्रोत सूर्य के समक्ष खड़े होने का वैज्ञानिक पर्व है। दुर्भाग्य है कि अब इसकी जगह ले ली- आधुनिक और कहीं-कहीं अपसंसकृति वाले गीतों ने , आतिशबाजी,घाटों की दिखावटी सफाई, नेतागिरी, गंदगी, प्लास्टिक-पॉलीथीन जैसी प्रकृति-हंता वस्तुओं और बाजारवाद ने।

अस्थाई जल-कुंड या सोसायटी के स्वीमिग पुल में छट पूजा की औपचारिकता पूरा करना असल में इस पर्व का मर्म नहीं है। लोग नैसर्गिक जल-संसाधनों तक जाएं, वहां घाट व तटों की सफाई करें , संकल्प करें कि पूरे साल इस स्थान को देव-तुल्य सहेजेंगे और फिर पूजा करें । इसकी जगह अपने घर के पास एक गड्ढे में पानी भर कर पूजा के बाद उसके गंदा, बदबूदार छोड़ देना तो इसकी आत्मा को मारना ही है। यही नहीं जिस जल में व्रत करने वाली महिलाएं खड़ी रहती हैं, वह भी इतना दूषित होता है कि उनके पैरों और यहां तक कि गुप्तांगों में संक्रमण की संभावना बनी रहती है। पर्व समाप्त होते ही चारों तरफ फैली पूजा सामग्री में मुंह मारते मवेसही  और उसमें से कुछ अपने लिए कीमती तलाशते गरीब बच्चे, आस्था की औपचारिकता को उजागर करते हैं।

बिहार में सबसे बड़ा पर्व तो छठ ही है . वहां की नदियों के हालात भी यमुना- हिंडन से ही हैं . जलवायु परिवर्तन का सर इस राज्य पर भारी है सो, नदियों में अभी से पानी की मात्रा कम है .  लोगों को छोटी जल निधियों का सहारा है . जान लें बिहार में कोई एक लाख छः हज़ार तालाब, 34 सौ आहर और लगभग 20 हजार जगहों पर नहर का प्रवाह है।  लेकिन दिल्ली , जहां कोई एक तिहाई आबादी  पूर्वांचल की है . यमुना में छठ का अर्ग देने पर सियासत हो रही है, पिछले कुछ सालों झाग वाले दूषित यमुना- जल में  महिलाओं के सूर्योपासना के चित्रों ने दुनिया में किरकिरी करवाते हैं . इस बार दिल्ली में  कोई 400  अस्थाई तालाब बनाए जा रहे हैं  और इसके लिए हर वार्ड को चालीस हज़ार रूपये दिए जा रहे हैं , ताकि  लोग यमुना के बजाये  वहां छठ पर्व मनाएं – यहीं एक सवाल उठाता है कि इन तालाबों  या कुंड को नागरिक समाज को सौंप कर इन्हें स्थाई क्यों नहीं किया जा सकता  ?

हमारे पुरखों ने जब  छट जैसे पर्व की कल्पना की थी तब निश्चित ही उन्होंने  हमारी जल निधियों को एक उपभोग की वस्तु के बनिस्पत साल भर श्रद्धा व आस्था से सहेजने  के जतन के रूप में स्थापित किया होगा।

छट पर्व लोक आस्था का प्रमुख सोपान है- प्रकृति ने अन्न दिया, जल दिया, दिवाकर का ताप दिया, सभी को धन्यवाद और ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा’ का भाव।

सनातन धर्म में छट एक ऐसा पर्व है जिसमें किसी मूर्ति-प्रतिमा या मंदिर की नहीं, बल्कि प्रकृति यानि सूर्य, धरती और जल की पूजा होती है।  धरती पर जीवन के लिए, पृथ्वीवासियों के स्वास्थ्य की कामना और भास्कर के प्रताप से धरतीवासियों की समृद्धि के लिए भक्तगण सूर्य के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। बदलते मौसम में जल्दी सुबह उठना और सूर्य की पहली किरण को जलाशय से टकरा कर अपने शरीर पर लेना, वास्तव में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। व्रत करने वाली महिलाओं के भोजन  में कैल्शियम की प्रचुर मात्रा होती है, जोकि महिलाओं की हड्डियों की सुदृढता के लिए अनिवाय भी है। वहीं सूर्य की किरणों से महिलओं को साल भर के लिए जरूरी विटामिन डी मिल जाता है। यह विटामिन डी कैल्शियम को पचाने में भी मदद करता है। तप-व्रत  से रक्तचाप नियंत्रित होता है और सतत ध्यान से नकारात्मक विचार मन-मष्तिष्क से दूर रहते हैं।

काश , छट पर्व की वैज्ञानिकता, मूल-मंत्र और आस्था के पीछे तर्क को भलीभांति समाज तक प्रचारित-प्रसारित किया जाए। जल-निधियों की पवित्रता, सव्च्छता के संदेष को आस्था के साथ व्याहवारिक पक्षों के साथ लोक-रंग में पिरोया जाए, लोक को अपनी जड़ो की ओर लौटने को प्रेरित किया जाए तो यह पर्व अपने आधुनिक रंग में धरती का जीवन कुछ और साल बढ़ाने का कारगर उपाय हो सकता है। हर साल छट पर्व पर यदि देश  भर की जल निधियों को हर महीने  मिल-जुल कर स्वच्छ बनाने का, देशभर में हजार तालाब खोदने और उन्हें संरक्षित करने का संकल्प हो, दस हजार पुराने तालाबों में गंदगी जाने से रोकने का उपक्रम हो , नदियों के घाट पर साबुन, प्लास्टिक  और अन्य गंदगी ना ले जाने की शपथ हो तो छट के असली प्रताप और प्रभाव को देखा जा सकेगा।

 

 

सोमवार, 13 नवंबर 2023

The Supreme Court kept panting helplessly on the night of Diwali.

 दीपोत्सव की रात  बेबस सुप्रीम कोर्ट हांफता रहा

पंकज चतुर्वेदी



अमावस की गहरी अंधियारी रात में इंसान को बेहतर आवोहवा देने की सुप्रीम कोर्ट की उम्मीदों का दीप खुद ही इंसान ने बुझा दिया.  रात आठ बजे बाद जैसे-जैसे रात गहरी हो रही थी, केंद्र सरकार द्वारा संचालित सिस्टम- एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग  एंड रिसर्च अर्थात सफर के एप पर  दिल्ली एनसीआर के का एआईक्यू अर्थात एयर क्वालिटि इंडेक्स  खराब से सबसे खराब के हालात में आ रहा था।  गाजियाबाद में तो हालात गैस चैंबर के थे. यहाँ संजय नगर इलाके में शाम सात बजे एक्युआइ 68 था, फिर  10 बजे 160 यानी स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक हो गया .रात 11. 40 बजे यह 669  था .  यहां कई पीएम 2.5 और 10 का स्तर 700 के पार था। नोयडा और गुरुग्रं की हालत भी लगभग इतने ही खराब थे . आधी रात तक  पूरी तरह पाबंद पटाखे, जैसे लड़ी वाले, आकाश  में जा कर धमाके से फटने वाले बेरियम के कारण बहुरंगी सभी धड़ल्ल्े से चलते रहे। फिर स्मोग का घना अँधेरा छा गया . दुर्भाग्य यह है कि शिक्षित और धनवान लोगों के इलाकों में धमाके सर्वाधिक रहे .  भले ही इस बार आतिशबाजी चला कर सुप्रीम केर्ट को नीचा दिखाने वालों की संख्या पहले से बहुत कम रही, लेकिन उनके पाप आवोहवा के जहरीला बनाने के लिए पर्याप्त था और उनकी इस हरकत से लाखो वे लोग भी घुटते रहे जो आतिशबाजी से तौबा कर चुके है। सोमवार सुबह मुहल्लों की सड़के-गलियां आतिशबाजी से बचे कचरे से पटी हुई थीं और यह बानगी था कि स्वच्छता अभियान में हमारी कितनी आस्था है ?


साफ हो गया कि बीते सालों की तुलना में इस बार दीपावली की रात का जहर कुछ कम नहीं हुआ, कानून के भय सामाजिक अपील सबकुछ पर सरकार ने खूब खर्चा किया लेकिन भारी-भरकम मेडिकल बिल देने को राजी समाज ने सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश  के बाद भी समय, आवाज की कोई भी सीमा नहीं मानी । दुर्भाग्य यह है कि  जब देश  के प्रधानमंत्री  शून्य कार्बन उत्सर्जन जैसा वादा दुनिया के सामने कर रहे है,  तब  एक कुरीति के चलते देश की राजधानी सहित समूचे देश  में वह सबकुछ हुआ जिस पर पाबंदी है और उस पर रोक के लिए ना ही पुलिस और ना ही अन्य कोई निकाय मैदान में दिखा। यदि इतनी आतिशबाजी चली है तो जाहिर है कि यह बाज़ार में बिकी भी होगी . दिल्ली से सटे गाजियाबाद के स्थानीय निकाय का कहना है कि केवल एक रात में पटाखों के कारण दो सौ टन अतिरिक्त कचरा निकला। अगली सुबह लोग धड़ल्ले से कूड़ा जलाते दिखे । जाहिर है कि अभी सांसों के दमन का अंत नहीं हैं।


अकेले दिल्ली ही नहीं देश के बड़े हिस्से में जब रात ग्यारह बजे बाद हल्की ओस शुरू  हुई तो  स्मॉग ने दम घोंटना शुरू कर दिया। स्मॉग यानि फॉग यानि कोहरा और स्मोक यानि धुआं का मिश्रण। इसमें जहरीले कण शामिल होते हैं जो कि भारी होने के कारण उपर उठ नहीं पाते व इंसान की पहुंच वाले वायुमंडल में ही रह जाते हैं। जब इंसान सांस लेता है तो ये फैंफड़े में पहुच जाते हैं। किस तरह दमे और सांस की बीमारी के मरीज बेहाल रहे, कई हजार लोग ब्लड प्रेशर व हार्ट अटैक की चपेट में आए- इसके किस्से हर कस्बे, शहर में हैं।


इस बार एनसीआर में आतिशबाजी की दुकानों की अनुमति नहीं थी। यहां तक कि ग्रेप  पीरियेड होने के कारण  ग्रीन आतिशबाजी  की भी अनुमति नहीं थी, जहां थी वह भी केवल आठ बजे से दस बजे तक। परंतु ना प्रशासन  ने अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाई और ना ही पटाखेबाजों ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी। केवल एक रात में पूरे देश  में हवा इतनी जहर हो गई कि 68 करोड़ लेगों की जिंदगी तीन साल कम हो गई। हम सभिय्ह जान कर भी अनदेखा अक्र्ते हैं कि पटाखें जलाने से निकले धुंए में सल्फर डाय आक्साईड, नाईट्रोजन डाय आक्साईड, कार्बन मोनो आक्साईड, शीशा , आर्सेनिक, बेंजीन, अमोनिया जैसे कई जहर सांसों के जरिये शरीर में घुलते हैं। इनका कुप्रभाव पशु – पक्षियों पर भी होता है। यही नहीं इससे उपजा करोड़ों टन कचरे का निबटान भी बड़ी समस्या है। यदि इसे जलाया जाए तो भयानक वायु प्रदुषण होता है। यदि इसके कागज वाले हिस्से को रिसाईकल किया जाए तो भी जहर घर, प्रकृति में आता है। और यदि इसे डंपिंग में यूं ही पड़ा रहने दिया जाए तो इसके विशैले  कण जमीन में जज्ब हो कर भूजल व जमीन को स्थाई व लाईलाज स्तर पर जहरीला कर देते हैं।

सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट को इस तरह ख़ुदकुशी कर रहे समाज की सांसे बचाने के लिए अब कुछ करना ही नहीं चाहिए ? क्या यह मसला केवल कानून या कड़ाई से ही सुलझेगा ?  क्या समाज को जागरूक बनाने के प्रयास बेमानी हैं हैं ? यह तय है कि आतिशाब्जी का उत्पादन, परिवहन,  भण्डारण और विपणन पर जब तक कड़ाई से नियंत्रण नहीं होगा, तब तक इस तरह लोग मरते रहेंगे और अदालतें चीखती रहेंगी . एक बात जान लें लोकतंत्र का सबसे भरोसेमंद स्तंभ “न्याय पालिका “ को यदि पर्व के नाम पर इस तरह बेबस किया गया तो इसका दुष्परिणाम जल्द ही समाज  को ही भोगना होगा .

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...