My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

रविवार, 7 जून 2015

Terrorism in North East on boiling point

राष्ट्रीय सहारा ]८ जून 15

पूर्वोत्तर में आतंक की अनदेखी का अंजाम


                                             पंकज चतुर्वेदी 
चार  जून को मणिपुर में सेना पर हुए हमले से पहले दो अप्रैल और छह फरवरी को अरुणाचल में सेना पर हमले हो चुके है। इन सभी हमलों का शक नगालैंड के पृथकतावादी संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल आफ नगालैंड के खपलांग गुट पर है। मुल्क में जब कभी आतंकवाद से निबटने का मुद्दा सामने आता है तो क्या आम लोग और क्या नेता और अफसरान , सभी कश्मीर पर आंसू बहाने लगते हैं। लंबे समय से यह बात नजरअंदाज की जाती रही है कि हमारे ‘‘सेवन सिस्टर्स’ राज्यों में अलगाववाद और आतंकवाद कश्मीर से कहीं ज्यादा है और उससे सटी सीमा के देशों- चीन, म्यांमार, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश ही नहीं थाईलैंड, जापान तक इन संगठनों के आका बैठकर अपनी समानांतर हुकूमत चला रहे हैं। अभी मणिपुर की सरकार म्यांमार से सहयोग मांग रही है। उत्तर-पूर्वी राज्यों मणिपुर, असम, नगालैंड, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम में कोई पच्चीस उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं। यहां बीते बारह सालों के दौरान कोई बीस हजार लोग मारे गए जिनमें चालीस फीसद सुरक्षाकर्मी हैं। जब किसी राज्य में कुछ महीने शांति रहती है तो माना जाता है कि सरकार ने उग्रवादी संगठनों को मनमाने तरीके से उगाही की छूट दे दी है। हालांकि पूर्वोत्तर में उग्रवाद का संबंध चीन के कम्यूनिस्ट आंदोलन से जोड़ा जाता है, लेकिन यह भी गौरतलब है कि पूरे क्षेत्र में कभी र्चच या मिशिनरी के किसी भी दल, संपत्ति या गतिविधि पर उग्रवादी मार नहीं पड़ी।असम में उल्फा, एनडीबीएफ, केएलएनएलएफ और यूपीएसडी के लड़ाकों का बोलबाला है। अकेले उल्फा के पास अभी भी 1600 लड़ाके हैं जिनके पास 200 एके राइफलें, 20 आरपीजी और 400 दीगर किस्म के असलहा हैं। राजन दायमेरी के नेतृत्व वाले एनडीबीएफ के आतंकवादियों की संख्या 600 है जो 50 एके तथा 100 अन्य किस्म की राइफलों से लैस हैं। बीते साल असम में बड़े नरसंहार करने वाले एनडीबीएफ के सांगबीजित गुट का मुखिया आईके संगबीजित म्यांमार में रह कर अपने व्यापार करता है। आश्र्चयजनक है कि बोडो के नाम पर खूनखराबा करने वाला यह अपराधी खुद बोडो नहीं है। नगालैंड में पिछले एक दशक के दौरान अलग देश की मांग के नाम पर डेढ़ हजार लोग मारे जा चुके हैं। वहां एनएससीएन के दो घटक- आईएम और खपलांग- बाकायदा सरकार के साथ युद्धविराम की घोषणा कर जनता से चौथ वसूलते हैं। इनके आका विदेश में रहकर भारत सरकार से संपर्क में रहते हैं और इनके गुगरे को अत्याधुनिक प्रतिबंधित हथियार लेकर सरेआम घूमने की छूट होती है। यहां तक कि राज्य की सरकार का बनना और गिरना भी इन्हीं उग्रवादियों के हाथों में होता है। यह बात हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में सामने आ चुकी है। कांग्रेस बहुत प्रचार कर रही थी कि आईएम गुट के साथ जल्दी ही शांति समझौता हो जाएगा, लेकिन सत्ताधारी नगा
RAJ EXPRESS BHOPAL 9-6-15
नेशनल फ्रंट आईएम गुट को यह विास दिलाने में सफल रहा कि उसकी सरकार फिर से बनने पर उनके लिए राहत होगी। बांग्लादेश की सीमा से सटे त्रिपुरा में एनएलएफटी और एटीटीएफ की तूती बोलती है। इन दोनों संगठनों के मुख्यालय, ट्रेनिंग कैंप और छिपने के ठिकाने बांग्लादेश में हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इन संगठनों को उकसाने व मदद करने का काम हुजी व हरकत उल अंसार जैसे संगठन करते हैं। छोटे राज्य मणिपुर में स्थानीय प्रशासन पूरी तरह पीएलए, यूएनएलएफ और पीआरइपीएके जैसे संगठनों का गुलाम हैं। यहां सरकारी कर्मचारियों को अपने वेतन का एक हिस्सा आतंकवादियों को देना ही होता है। बाहरी लोगों की यहां खैर नहीं है। केवाईकेएल यानि कांग्लेई यावोल कन्न ललुप संगठन भी राज्य के पहाड़ी इलाकों में सक्रिय है। बीते दस सालों के दौरान यहां पांच हजार से ज्यादा लोग अलगाववाद के शिकार हो चुके हैं। इसके अलावा नगा-कुकी तथा कुकी-जोमियो संघर्ष में सात सौ से ज्यादा जानें गई हैं। यहां सबसे ज्यादा ताकतवर संगठन यूनाइटेड नेशनलिस्ट लिबरेशन फ्रंट है जिसके पास 1500 लोग हैं। दूसरे सबसे खतरनाक संगठन पीपुल लिबरेशन आर्मी के 400 सदस्य हैं। ये सभी संगठन अत्याधुनिक हथियारों व संचार उपकरणों से लैस हैं। मेघालय में एएनयूसी और एचएनएलएल नामक संगठन अलगाववाद के झंडाबरदार हैं, वहीं मिजोरम में एनपीसी और बीएनएलएफ राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग हैं। इसके अलावा असम को आधार बनाकर कई गुमनाम संगठन भी अलगाववाद की रट लगाए हैं। इनमें से कई सीधे-सीधे पाकिस्तानी आईएसआई की पैदाइश हैं। असम में छोटे-बड़े 36 आतंकवादी संगठनों का अस्तित्व सरकारी रिकार्ड स्वीकार करता है। मणिपुर में 39, मेघालय में पांच, मिजोरम में दो, नगालैंड में तीन, त्रिपुरा में 30 और अरुणाचल प्रदेश में महज एक अलगाववादी संगठन है। इनमें से अधिकांश को पाकिस्तान और बांग्लादेश में बने बेस कैंपों से खाद-पानी मिलता है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में बहुत से संगठन सक्रिय हैं और वहां उग्रवाद कश्मीर से कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद श्रीनगर में हथगोला फटने की खबर टीवी व अखबारों पर छायी होती है, जबकि उत्तर-पूर्व के भीषण नरसंहार भी बमुश्किल जगह पाते हैं। यहां यह भी जानना जरूरी है कि बांग्लादेश से लगी सीमा के 4096 किलोमीटर पर भारत सरकार पहले ही कंटीले तारों की बाड़ लगा चुकी हैं, जबकि म्यांमार से सटी सीमा पर 1643 किलोमीटर पर गहरी खाई हैं। इसके अलावा सीमा सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल आदि के हजारों जवान भी लगे हैं। साफ जाहिर है कि इन राज्यों में आतंकवादियों को सीमापार आने के लिए आंख चुराकर आने की जरूरत नहीं पड़ती है। वे कई बार फर्जी पासपोर्ट या अन्य जरियों से भीतर आते-जाते रहते हैं। अनूप चेतिया और परेश बरुआ के मामले में सामने आ चुका है कि इन लोगों ने बैंकाक और ढाका में पांच सितारा होटल से लेकर जहाज कंपनी तक के व्यापार विधिवत खोल रखे हैं। यह तय भारत सरकार की खुफिया एजेंसियों को कई साल पहले पता था कि बांग्लादेश का काक्स बाजार बंदरगाह हथियारों के सौदागरों का प्रमुख अड्डा बना हुआ है और वहां पहुंचने के लिए अंडमान सागर का इस्तेमाल किया जाता है। एक अमेरिकी खुफिया रपट बताती है कि गोल्डन ट्राइंगल से म्यामार के रास्ते हथियारों के बदले नशीली दवाओं के व्यापार पर भारत सरकार न जाने क्यों कड़ी कार्रवाई करने से बचती है। यह वही जगह है जहां से श्रीलंका में खूनखराबे के दिनों में लिट्टे तक हथियारों की खेप पहुंचती थी। जिस तरह से उत्तर-पूर्वी राज्यों के उग्रवादी अत्याधुनिक हथियारों तथा उसके लिए जरूरी गोला-बारूद से लैस रहते हैं, उससे यह तो साफ है कि कोई तो है जो दक्षिण-पूर्व एशिया में अवैध खतरनाक हथियारों की खपत बनाए रखे हुए है। बंदूक के बल पर लोकतंत्र को गुलाम बनाने वालों को हथियार की सप्लाई म्यांमार, थाईलैंड, भूटान, बांग्लादेश से हो रही है। मणिपुर को, जहां सबसे ज्यादा उग्रवाद है, नशे की लत से बेहाल और उससे उपजे एड्स के लिए देश का सबसे खतरनाक राज्य कहा जाता है। कहना गलत नहीं होगा कि यहां नारकोटिक्स व्यापार के बदले हथियार की खेप पर कड़ी नजर रखना जरूरी है। 


     

Do not divide national personalities in cast or sect

जाति ना पूछो साधु की !

प्रभात, मेरठ 7 जून 15
                                                                 पंकज चतुर्वेदी

बीतें दिनों दो घटनांए बड़ी विचित्र हुई - जो दिनकर देशभर में राष्‍ट्रकवि के तौर पर मान्य थे, अचानक ही पता चला कि वे जाति से भूमिहार हैं। दिल्ली के मावलंकर हाॅल में संपन्न वैश्‍य सम्मेलन में गांधीजी को इस लिए चित्र व माल्यार्पण में शामिल कर लिया गया, क्योंकि वे जाति से वैश्‍य थे। आज से छह सौ साल पहले जब कबीर को लगा कि सामाजिक समरसता व योग्यता पर जात-बिरादरी असर डाल रही है तो उन्‍होंने लिखा था कि ‘‘जाति ना पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।'' दुख होता है कि 21वीं सदी की ज्ञानवान पीढी एक बार फिर तलवार की  धार नहीं म्यान की चमक का सौदा करने में गर्व महस्ूास कर रही है।
‘‘वे उस दौर के सर्वमान्य नेता थे । सन 1900 के आसपास दिल्ली में होने वाला कोई भी जलसा उनके बगैर हो ही नहीं सकता था । वे जमायते इस्लामी के सम्मेलन की सदारत करते थे । कांग्रेस के शीर्ष नेता थे, 1927 तक गांधीजी के प्रमुख सलाहकार रहे । वे भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के हिमायती थी, व डाक्टर के तौर पर उनकी षोहरत पूरे एषिया में थी । आज से 90 साल पहले वे मरीज देखने के लिए दिल्ली से बाहर जाने की फीस पूरे एक हजार रूपए लेते थे । दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया उनकी देन है । यहां तक कहा गया कि यदि हकीम साहब जिंदा होते तो देष का विभाजन ही नहीं होता ।’’ ऐसे प्रख्यात राष्‍ट्रवादी हकीम अजमल खां को यदि याद करना है तो यह जामिया या उर्दू की कोई संस्था ही करेगी और उस आयोजन की खबर भी उर्दू के कुछ अखबारों में ही छपेगी।  इस बात पर चिंता करना जरूरी है कि हमारी महान हस्तियों को हिंदु और मुसलमान  या फिर जाति , राज्य  में बांट कर देखा जाता रहा है ।
देष में जैसे जैसे जातिवादी सियासत जड़ें जमा रही है, वैसे-वैसे हमारे निर्विवाद देश -सेवकों को किसी दायरे में बांधने की कुत्सित कवायद तेज हो रही है । रानी लक्ष्मीबाई के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाली झलकारी बाई कोरियों की और अवंती बाई लोधी समाज की हो गई। बुंदेलखंड केसरी महाराजा छत्रसाल को सभी जाति-धर्म के लेाग भगवान की तरह पूजते हैं, लेकिन छत्रसाल जयंती पर ठाकुर समुदाय उन्हें ‘‘केवल अपना’’ बताने के हरसंभव प्रयास करता है । ठीक यही महराणा प्रताप के साथ राजस्थान में होता है । सर छोटूराम के नाम पर हरियाणा में जाट-राजनीति की चैसर बिछ गई है । परषुराम जयंती पर ब्राहणों व वाल्मिकी जयंती पर सफाईकर्मचारियों के जुलुस इन महान व्यक्तित्वों के व्यक्तित्व और कृतित्व का अवमूल्यन ही करते हैं ।  कबीर जयंती हो या अग्रसेन जयंती एक जाति, समाज विषेश के लोग उन्हें पूजने का एकाधिकर जताते हैं। अंबेडकर जयंती पर अनुसूचित जातियों के लेाग अन्य को अपने आयोजन में घुसने नहीं देना चाहते।
देष की आजादी और नवनिर्माण में असंख्य ऐसे लेागों का योगदान रहा है, जोकि राश्ट्रीय परिदृष्य में कम चर्चित रहे ।  ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं हैं जिन्हांेने आजादी के बाद देष के लेाकतांत्रिक और सामाजिक मूल्यों को सुदृढ़ करने में असीम योगदान दिया । वे बाबू जयप्रकाष नारायण हैं, राजेन्द्रप्रसाद और लालबहादुर शास्त्री भी, उनमें मदर टेरेसा भी हैं और  बाबा आम्टे भी ।  क्या हमें यह नजरिया बदलना नहीं होगा कि केआर नारायणन राष्‍ट्रपति बनें , क्योंकि वे दलित थे, या लगातार दस साल तक प्रधानमंत्री रहने वाले मनमोहन सिंह केवल एक ‘‘सिख’’ प्रधानमंत्री थे या फिर एक मुसलमान को देष का राश्ट्रपति बनाया गया । श्री नारायणन, मनमोहन सिंह या श्री अबुलकलाम का सार्वजनिक जीवन में जो भी योगदान है, उससे उनकी जाति-समाज का कोई वास्ता नहीं है । उनका संघर्श या उपलिब्धयां देष के लिए मिसाल हैं, ना कि किसी वर्ग-विषेश के लिए ।
बड़े राजनेता भी यह कहते सुने जा सकते है। कि फलां मुसलमानों का नेता है और वह दलितों काम मसीहा । जबकि चुनावों के आंकड़े गवाह हें कि आज देष का मुसलमान या दलित वेाट देते समय व्यापक नजरिया अपनाने लगा है । ऐसे में जाति-धर्म की दुहाई देने वाले एक मरे हुए प्रेत को जबरदस्ती जिलाने की कोषिष तो कर ही रहे हैं, सामाजिक न्याय के रास्ते कें अडंगा भी खड़ा कर रहे हैं । आम लोगों को विकास से मतलब है और विकास समग्र समाज का होता है, नाकि किसी जाति या विषेश का और कतिपय जाति, समाज के लेाग जब सार्वजनिक जीवन में थे तो उन्होंनंे भी समग्र समाज के लिए काम किया था। राश्ट्रीय विभूतियों को वर्ग में बांट कर देखने की ही त्रासदी है कि आज का युवा फिल्मी सितारों या क्रिकेट खिलाडि़यों में अपना आदर्ष तलाषता है ना कि उन असली हीरों में जिन्होंने विशम हालातों में देष का सम्मान बनाए रखा।
किसी भी महान व्यक्ति का व्यतित्व और कृतित्व महज उसका जीवन संघर्श नहीं हेाता इसमें कई और जीवनियां भी साथ-साथ चलती हैं, वे उस काल की बानगी होती हैं। ऐसी विभूतियों को जाति व क्षेत्र के बाहर रख कर उनका मूल्यांकन इस पीढी को प्रस्तुत करना देष को नई दिषा देगा । इसके लिए लेखकों, संस्थाओं और समाज को अपने संकुचित नजरिए से उबरना होगा ।

पंकज चतुर्वेदी

शुक्रवार, 5 जून 2015

Smgullers are targeting biodiversity of India

पेड़-पौधें भी हैं तस्करों के निशाने पर !



                                              पंकज चतुर्वेदी

तस्करी के अपराध का नाम आते ही हथियार, मादक दवाओं की तिजारत का विचार दिमाग में घूम जाता है । लेकिन भारत में तस्करों की पसंद वे नैसर्गिक संपदा है, जिसके प्रति भारतीय समाज लापरवाह हो चुका था , लेकिन पाश्‍चात्य देश उनका महत्व समझ रहे हैं । मुक्त व्यापार की दुनिया में जब हर देश के दरवाजे खुले पड़े हैं, अवैध रूप से पेड़-पौधों व जानवरों की तस्करी आश्‍चर्यजनक तरीके से बढ़ी है । गौरतलब है कि यह महज नैतिक और कानूनसम्मत अपराध ही नहीं है, बल्कि देष की जैव विविधता के लिए ऐसा संकट है, जिसका भविष्‍य में कोई समाधान नहीं होगा। भारत में लगभग 45 हजार प्रजातयों के पौधों की जानकारी है , जिनमें से कई भोजन या दवाईयों के रूप  में बेहद महत्वपूर्ण हैं ।
नई दवाओं के परीक्षण के लिए बंदरों ,चूहों व अन्य की अंतरराश्ट्रीय मांग का बड़ा हिस्सा भारत से हो रहा है । दुर्लभ कछुओं, कैंकडों और तितलियों को अवैध तरीके से देश से बाहर भेजने के कई मामले अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अड्डे पर पकड़े जा चुके हैं । पाकिस्तान व बांग्लादेश
प्राकृतिक संपदा से भरपूर यहां के जंगलों पर माफिया की समानांतर सरकार चल रही है । सितंबर से मार्च महीने तक उत्तराखंड के हिमालय से सटे इलाकों में हिमपात होता है । ऐसे में वहां के जानवर निचली घाटियों की ओर आते हैं व घात लगाए बैठे शिकारियों के हाथों मारे जाते हैं । इनकी चमड़ी, व अन्य उपांग टनकपुर व अन्य रास्तों से नेपाल व वहां से दुनिया के अन्य देशों में चले जाते हैं ।  सीमांत जिलों अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, उत्तर काशी आदि में जंगलों में आग लगाने वाले गिरोह संगठित रूप से संचालित हैं ।
न्‍यू ब्राईट स्‍टार, हरियाणा 8 जून 15
वैसे तो भारत सरकार ने इलाके की 41 जड़ी बूटियों के दोहन पर रोक लगा रखी है । इसके बावजूद अतीश, दंदासा, तालीस, कुटकी, डोलू, गंद्रायण, सालम मिस्री, जटामोसी, महामेदा, सोम आदि स्थानीय बाजार में सस्ते दामों में बिकती मिल जाती है । यहां हालात इतने गंभीर हैं कि गढ़वाल की भिलंगना घाटी में गत एक दशक के दौरान 22 पादप प्रजातियां  विलुप्त हो गईं, 60 प्रजातियों का जीवन-चक्र सिर्फ 3-4 साल का रह गया है । अनुमान है कि कुमाऊं और पिथौरागढ़ की शारदा नदी के किनारे के वनों से कोई 40 प्रजाति के पौघे आगामी पांच सालों में नदारत हो जाएंगे ।



लक्षमण की मूर्छा का इलाज करने के लिए हनुमान संजीवनी बूटी के लिए पूरा विंध्यांचल पहाड़  उखाड़ कर ले आए थे । वैसे ही कई आधुनिक हनुमान नेपाल की सीमा पर धनगढ़ी, रक्सौल, वीरगंज,  हेटोडा, नेपालगंज के महंगे होटलों में लेपटाप, फैक्स, मोबाईल से लैसे सारे साल डटे रहते हैं । ये लोग उन जड़ी-बूटियों और उनके खरीदारों के सतत संपर्क में रहते हैं, जिनकी मांग अमेकिा व यूरोप में है, लेकिन भारत में उन पर पाबंदी है । भारत के हर्बल सौंदर्य प्रसाधनों व दवाईयों की बाहर जबरदस्त मांग है। अरब के अय्याश शेखों को र्यान-शक्ति बढ़ाने वाली दवाओं के नाम पर केवल भारतीय जड़ी-बूटियां ही भाती हैं व इसके लिए वे कुछ भी भुगतान करने को तैयार रहते हैं ।
नेशनलज क्ेंसे इंस्टीट्यूट , अमेरिका(एनसीआई) ने कोई दस साल पहले एक शोध किया कि भारत के पहाड़ों पर मिलने वाली आयुर्वेदिक वनौषधि ‘ टेक्सोल’ में गर्भाशय का कैंसर रोकने की जबरदस्त क्षमता है ।  फिर क्या था , देखते ही देखते नेपाल की सीमा से सटे हिमालय इलाके के ‘तालीस पत्र’ नामक पेड़ पर जैसे कहर आ गया हो । यही तालीस पत्र टेक्सोल है और अब कभी चप्पे-चप्पे पर मिलने वाले इसके पेड़ अब दुलर्भ हो गए हैं । डाबर, नेपाल ने तो बाकायदा इसकी खेती व उसे अमेरिका व इटली को बेचने के अनुबंध कर रखे हैं ।
अरूणाचल प्रदेश की दिबांग और लोहित घाटियों में ‘‘ मिशामी टोटा’’ का टोटा होना अभी की ही बात हैं । डिब्रुगढ़ के बाजार में अचानक इसकी मांग बढ़ी और देखते ही देखते इसकी नस्ल ही उजाड़ दी गई । स्थानीय लोग इस जड़ी का इस्तेमाल पेट दुखने व बुखार के इलाज के लिए सदियों से करते आ रहे थे । डिब्रुगढ़ में इसके दाम दो हजार रूपए किलो हुए तो कोलकाता के बिचैलियों ने इसे पांच हजार में खरीदा । वहां से इसे तस्करी के पंख लगे और जापान व स्वीट्जरलैंड में इसके जानकारों ने पचास हजार रूपए किलो की दर से भुगतान कर दिया ।
ठी यही हाल ‘अगर’ नाम सुगंधित औषधि का हुआ । इसके तेल की मांग अरब देशो में बहुत है ।  यहां तक कि सौ ग्राम तेल के एक लाख रूपए तक मिलते हैं । इस तेल की जांच बड़े विचित्र तरीके से होती है । इसका छोटा सा इंजेक्शन चूहे को दिया जाता है, यदि तेल शुद्ध होता है तो चूहे की पूंछ तन कर खड़ी हो जाती है व वह कई घंटों तक उछलता है । अरब के कामुक शेख इसके लिए बेकरार रहते हैं । इन सभी जड़ी-बूुटियों  को जंगल से बाहर निकालने व उन्हें भूटान या नेपाल के रास्ते तस्करी करने के काम पर वहां के उग्रवादियों का एकछत्र राज्य है ।
एड्स और कैंसर जैसी खतरनाक रोगों का इलाज खोज रहे विदेषी वैज्ञानिकों की नजर अब भारत के जंगलों में मिलने वाले कोई एक दर्जन पौधों पर हैं, । यहां जानना जरूरी है कि बासमती चावल और नीम जैसे भारतीय उत्पादों पर कतिपय विदेषियों द्वारा पैटेंट पहले ही प्राप्त किया जा चुका है । अमेरिका व यूरोप के कुछ वनस्पति वैज्ञानिक और दवा बनाने वाली कंपनियों के लेाग गत कुछ वर्शों से पर्यटक बन कर भारत आ रहे हैं और स्थानीय लोगों की मदद से जड़ी-बूटियों के पारंपरिक इस्तेमाल की जानकारियां प्राप्त कर रहे हैं । विदित हो सन 1998 में मध्यप्रदेष के जंगलों में जर्मनी की एक दवा कंपनी के प्रतिनिधियों को उस समय रंगे हाथों पकड़ा गया था, जब वे स्थानीय आदिवासियों की मदद से कुछ पौधों की पहचान कर रहे थे ।
राजस्थान के रणथंभौर अभ्यारण इलाके में विदेषी लोगों द्वारा कतिपय पौधों के बारे में जानकारी मांगने की बात राजस्थान विष्वविद्यालय के एक षोध में भी उल्लेखित की गई है । 1994 में दिल्ली के अंतरराश्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक जर्मनी पर्यटक के पास हजारें की ंसख्या में मरे कीड़े-मकोड़े जब्त किए गए थे । तब तो उसे अजीबो गरीब हरकत करने वाला मान कर छोड़ दिया गया था, लेकिन अब स्पश्ट होने लगा है कि भारत की जैव विविधता पर विदेषी निगाहें कई सालों से गड़ी हुई हैं ।
देष के रेगिस्तानी इलाकों में मिलने वाली गूगल(कांपीफोरा वाईट्री) की एक विषेश प्रजाति में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो कि द्ददय रोग के कारक कोलेस्ट्रोल को कम करने की क्षमता रखता है । अष्वगंधा यानी विथानिया सोम्नीफेर तो याददाष्त, मानसिक रोगों, षारीरीक दुर्बलता जैसे विकारों में राम बाणा माना जाता है । इस बूटी में कैंसर -रोधी गुण भी हैं और इसी कारण इसकी बड़ी मात्रा में तस्करी हो रही है । सांस संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए पुष्तैनी रूप से इस्तेमाल होने वाले एक पौधे की भी खासी मांग है, इसे वैज्ञानिक भाशा में ‘‘ इफेड्रा फोलियाटा’’ कहा जाता है । अमेरिका में इस पौघे से दिल की ओर जाने वाली धमनियों को खेालने की दवा बनाने के प्रयोग चल रहे हैं । यदि ये सभी प्रयोग सफल हुए तो विदेषी कंपनियां हमारी इन जड़ी-बूटियों को अपने तरीके से पैटंट करवा कर सारी दुनिया में व्यापार करेंगी ।
राजधानी दिल्ली का खारी बावली इलाका कई दुलर्भ व प्रतिबंधित औषधियों की खरीद-फरोक्ष्त का अड्डा है । यहां  ‘सालम पंजा’, मुगली , जटामासी आदि अफरात मिल जाती हैं । यही नहीं नगद भुगतान करने पर नेपाल की सीमा के पास तक पहुचाने का जिम्मा भी ये ही व्यापारी लेते हैं । कटरा तंबाकू, गली बताशा जैसी संकरी गलियों के आलीशान आफिसों में हांगकांग, जर्मनी, लंदन के जड़ी-बूटी प्रेमियों की भीड़ देखी जा सकती है ।  सुगंध कोकिला, चिरायता के कई ट्रक हर सप्ताह दिल्ली से विदेश जाते हैं ।
कैंसर के इलाज के लिए प्रयुक्त दवा ‘ आईसो हैक्सनीलन्पथाइजरिंस’’ भले ही आज विदेषी औशधि है, लेकिन इसका निर्माण मध्य भारत में लावारिस से मिलने वाले पौधे ‘अर्नेबिया हिस्पीडिसीमा’’ से हुआ है । अरावली पर्वतमाला में मिलने वाले पौधे ‘बैलानाईट्स एजीप्टीनिया’ से ऐसा गर्भ निरेधक तैयार किया गया है , जिसके कोई साईड-इफैक्ट नहीं हैं । हिमालय क्षेत्र में मिलने वाले गुलाबी फूलों ‘ बरबेरिस एरिस्टाका’ से आंख की बेहतरीन  दवा तैयार की गई है । यहीं मिलने वाले टेक्सस बकाठा से कैंसर निदान में महत्वपूर्ण दवा मिली है । हैपीटाइटस जैसे घातक रोग का इलाज भी भारत में मिलने वाली बूटी फाइलान्थर निसरी में खोजा गया है ।
नीम हमारे लोक जीवन का अभिन्न हिस्सा है । कई बीमारियों व खेती-किसानी में इसका उपयोग होता है । परंपरागत रूप् से नीम भारतीय पेड़ है, इसके बावजूद सन 1995 में यूरोपीय पेटेंट प्राधिकरण ने अमेरिका के कृषि विभाग व अमेरिका की रसायन कंपनी डब्लू.जी. ग्रेस एंड कंपनी के नाम नीम के तेल से कीटनाशक बनाने का पेटेंट  जारी कर दिया । समय रहते इस निर्णय को चुनौती दी गई, तब डब्लू. जी. ग्रेस कंपनी ने कई प्रमाण प्रस्तुत किए कि वे लंबे समय से इस दिशा में शोध कर रहे हैं । हालांकि कंपनी का दवा खारिज हुआ, लेकिन उस घटला से पता चला कि किस तरह अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से भारत से नीम के तेल की तस्करी कर ही थीं ।  ठीक ऐसा ही हल्दी के साथ भी हो चुका है ।  दक्षिण एशिया के किसानों के बासमती के पेटेेट पर भी अमेरिकी दावे हो चुके हैं ।
यहां जानना जरूरी है कि हमारे  देष की पारंपरिक जड़ी-बूटियों की थोड़ी सी मात्रा ही विदेषी वैज्ञानिकों के लिए काफी होती है । ये लोग इन औशधियों के गुणों व उसके मुख्य तत्वों का विष्लेशण करते हैं और फिर उन्हीं तत्वों के आधार पर दवाएं बना कर पैटेंट करवा लेते हैं । हमारे पारंपरिक ज्ञान की रासायनिक बनावट को विदेषों में भेजने वाले कई गिरोह बाकायदा काम कर रहे हैं । यह बड़ा सुरक्षित धंधा है , ना तो कोई बड़ा सा कंसाईमेंट बनाना है और ना ही ढृलाई का झंझट है । इस काम में कई पर्यटक तो कुछ योग के विषेशज्ञ और कुछ तो दोहरी नागरिकता वाले अप्रवासी लगे हैं । ये लेाग अपने हर आगमन पर कुछ ग्राम वनस्पितियां ले जाते हैं । इस पर कस्टम वालों को भी षक नहीं होता है और ये लोग इसके एवज में लाखों-लाख कमाते हैं । यदि कानूनी रूप से कोई इन वनस्पितियों को देष से ले जाएगा तो उसे सरकार से अनुमति लेनी होगी व रायल्टी का भ्ुागतान भी करना होगा । सबसे बड़ी बात उक्त पौघे के गुणों पर आधारित किसी दवा का विदेष में पैटेंट संभव नहीं होगा ।
आस्ट्रेलिया की मिट्टी, फूल, पत्ती या कोई भी जैव पदार्थ को छुपा कर ले जाते हुए पकड़े जाने पर 50 हजार डालर के जुर्माने का कड़ा कानून हैं । भारत जैसे जैव-संपन्न देष में इस बाबत सषक्त कानून ना होना विडंबना ही है । संसद ने सन 2002 में जैव विविधता कानून को मंजूरी दी थी । एक राष्टीय जैव विविधता प्राधिकरण के गठन की भी योजना बनाई गई थी । गोया यह सरकार में बैठे लोग भी स्वीकारते हैं कि जैव तस्करी पर कारगर रूप से अंकुश लगाने की दृष्टि से यह कानून बेहद कमजोर है ।  ªहमारे बौद्धिक व पारंपरिक ज्ञान व जैव विविधता का सौदा करने वाले लेाग एक तरह से देष की अर्थ व्यवस्था पर प्रहार कर रहे हैं । इस बाबत सरकार भले ही देर से चेते पर समाज को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना होगा ।

पंकज चतुर्वेदी
पेड़-पौधें भी हैं तस्करों के निषाने पर !
पंकज चतुर्वेदी

तस्करी के अपराध का नाम आते ही हथियार, मादक दवाओं की तिजारत का विचार दिमाग में घूम जाता है । लेकिन भारत में तस्करों की पसंद वे नैसर्गिक संपदा है, जिसके प्रति भारतीय समाज लापरवाह हो चुका था , लेकिन पाष्चात्य देष उनका महत्व समझ रहे हैं । मुक्त व्यापार की दुनिया में जब हर देष के दरवाजे खुले पड़े हैं, अवैध रूप से पेड़-पौधों व जानवरों की तस्करी आष्चर्यजनक तरीके से बढ़ी है । गौरतलब है कि यह महज नैतिक और कानूनसम्मत अपराध ही नहीं है, बल्कि देष की जैव विविधता के लिए ऐसा संकट है, जिसका भविश्य में कोई समाधान नहीं होगा। भारत में लगभग 45 हजार प्रजातयों के पौधों की जानकारी है , जिनमें से कई भोजन या दवाईयों के रूप  में बेहद महत्वपूर्ण हैं ।
नई दवाओं के परीक्षण के लिए बंदरों ,चूहों व अन्य की अंतरराश्ट्रीय मांग का बड़ा हिस्सा भारत से हो रहा है । दुर्लभ कछुओं, कैंकडों और तितलियों को अवैध तरीके से देष से बाहर भेजने के कई मामले अंतरराश्ट्रीय हवाई अड्डे पर पकड़े जा चुके हैं । पाकिस्तान व बांग्लादेष से सटी सीमाओं पर गाय, गधों व ऊंटों की नाजायज तिजारत सरेआम चल रही है । इसके साथ ही चीनी, पेट्रोल, साईकिलों जैसे उत्पाद भी इधर से उधर होते हैं । भारत जैव विविधता के मामले में विष्व के समृद्धतम देषों में से है । हमारा जल, मिट्टी, फसल और जीवन इन्हीं विविध जीवों व फसलों के आपसी सामंजस्य से सतत चलता है । खेतों में चूहे भी जरूरी हैं और चूहों का बढ़ना रोकने के लिए सांप भी । सांप पर काबू पाने के लिए मोर व नेवले भी हैं । लेकिन कहीं खूबसूरत चमड़ी या पंख के लिए तो कहीं जैव विविधता की अनबुझ पहेली के गर्भ तक जाने केा व्याकुल वैज्ञानिकों के प्रयोगों के लिए भारत के जैव संसार  पर तस्करेंा की निगाहें गहरे तक लगी हुई हैं ।  भारत ही साक्षी है कि पिछले कुछ वर्शों के दौरान चावल और गेहूं की कई किस्मों, जंगल के कई जानवरों व पंक्षियों को हम दुर्लभ बना चुके हैं  और इसका खामियाजा भी समाज भुगत रहा है ।
प्राकृतिक संपदा से भरपूर यहां के जंगलों पर माफिया की समानांतर सरकार चल रही है । सितंबर से मार्च महीने तक उत्तराखंड के हिमालय से सटे इलाकों में हिमपात होता है । ऐसे में वहां के जानवर निचली घाटियों की ओर आते हैं व घात लगाए बैठे शिकारियों के हाथों मारे जाते हैं । इनकी चमड़ी, व अन्य उपांग टनकपुर व अन्य रास्तों से नेपाल व वहां से दुनिया के अन्य देशों में चले जाते हैं ।  सीमांत जिलों अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, उत्तर काशी आदि में जंगलों में आग लगाने वाले गिरोह संगठित रूप से संचालित हैं ।
वैसे तो भारत सरकार ने इलाके की 41 जड़ी बूटियों के दोहन पर रोक लगा रखी है । इसके बावजूद अतीश, दंदासा, तालीस, कुटकी, डोलू, गंद्रायण, सालम मिस्री, जटामोसी, महामेदा, सोम आदि स्थानीय बाजार में सस्ते दामों में बिकती मिल जाती है । यहां हालात इतने गंभीर हैं कि गढ़वाल की भिलंगना घाटी में गत एक दशक के दौरान 22 पादप प्रजातियां  विलुप्त हो गईं, 60 प्रजातियों का जीवन-चक्र सिर्फ 3-4 साल का रह गया है । अनुमान है कि कुमाऊं और पिथौरागढ़ की शारदा नदी के किनारे के वनों से कोई 40 प्रजाति के पौघे आगामी पांच सालों में नदारत हो जाएंगे ।



लक्षमण की मूर्छा का इलाज करने के लिए हनुमान संजीवनी बूटी के लिए पूरा विंध्यांचल पहाड़  उखाड़ कर ले आए थे । वैसे ही कई आधुनिक हनुमान नेपाल की सीमा पर धनगढ़ी, रक्सौल, वीरगंज,  हेटोडा, नेपालगंज के महंगे होटलों में लेपटाप, फैक्स, मोबाईल से लैसे सारे साल डटे रहते हैं । ये लोग उन जड़ी-बूटियों और उनके खरीदारों के सतत संपर्क में रहते हैं, जिनकी मांग अमेकिा व यूरोप में है, लेकिन भारत में उन पर पाबंदी है । भारत के हर्बल सौंदर्य प्रसाधनों व दवाईयों की बाहर जबरदस्त मांग है। अरब के अय्याश शेखों को र्यान-शक्ति बढ़ाने वाली दवाओं के नाम पर केवल भारतीय जड़ी-बूटियां ही भाती हैं व इसके लिए वे कुछ भी भुगतान करने को तैयार रहते हैं ।
नेशनलज क्ेंसे इंस्टीट्यूट , अमेरिका(एनसीआई) ने कोई दस साल पहले एक शोध किया कि भारत के पहाड़ों पर मिलने वाली आयुर्वेदिक वनौषधि ‘ टेक्सोल’ में गर्भाशय का कैंसर रोकने की जबरदस्त क्षमता है ।  फिर क्या था , देखते ही देखते नेपाल की सीमा से सटे हिमालय इलाके के ‘तालीस पत्र’ नामक पेड़ पर जैसे कहर आ गया हो । यही तालीस पत्र टेक्सोल है और अब कभी चप्पे-चप्पे पर मिलने वाले इसके पेड़ अब दुलर्भ हो गए हैं । डाबर, नेपाल ने तो बाकायदा इसकी खेती व उसे अमेरिका व इटली को बेचने के अनुबंध कर रखे हैं ।
अरूणाचल प्रदेश की दिबांग और लोहित घाटियों में ‘‘ मिशामी टोटा’’ का टोटा होना अभी की ही बात हैं । डिब्रुगढ़ के बाजार में अचानक इसकी मांग बढ़ी और देखते ही देखते इसकी नस्ल ही उजाड़ दी गई । स्थानीय लोग इस जड़ी का इस्तेमाल पेट दुखने व बुखार के इलाज के लिए सदियों से करते आ रहे थे । डिब्रुगढ़ में इसके दाम दो हजार रूपए किलो हुए तो कोलकाता के बिचैलियों ने इसे पांच हजार में खरीदा । वहां से इसे तस्करी के पंख लगे और जापान व स्वीट्जरलैंड में इसके जानकारों ने पचास हजार रूपए किलो की दर से भुगतान कर दिया ।
ठी यही हाल ‘अगर’ नाम सुगंधित औषधि का हुआ । इसके तेल की मांग अरब देशो में बहुत है ।  यहां तक कि सौ ग्राम तेल के एक लाख रूपए तक मिलते हैं । इस तेल की जांच बड़े विचित्र तरीके से होती है । इसका छोटा सा इंजेक्शन चूहे को दिया जाता है, यदि तेल शुद्ध होता है तो चूहे की पूंछ तन कर खड़ी हो जाती है व वह कई घंटों तक उछलता है । अरब के कामुक शेख इसके लिए बेकरार रहते हैं । इन सभी जड़ी-बूुटियों  को जंगल से बाहर निकालने व उन्हें भूटान या नेपाल के रास्ते तस्करी करने के काम पर वहां के उग्रवादियों का एकछत्र राज्य है ।
एड्स और कैंसर जैसी खतरनाक रोगों का इलाज खोज रहे विदेषी वैज्ञानिकों की नजर अब भारत के जंगलों में मिलने वाले कोई एक दर्जन पौधों पर हैं, । यहां जानना जरूरी है कि बासमती चावल और नीम जैसे भारतीय उत्पादों पर कतिपय विदेषियों द्वारा पैटेंट पहले ही प्राप्त किया जा चुका है । अमेरिका व यूरोप के कुछ वनस्पति वैज्ञानिक और दवा बनाने वाली कंपनियों के लेाग गत कुछ वर्शों से पर्यटक बन कर भारत आ रहे हैं और स्थानीय लोगों की मदद से जड़ी-बूटियों के पारंपरिक इस्तेमाल की जानकारियां प्राप्त कर रहे हैं । विदित हो सन 1998 में मध्यप्रदेष के जंगलों में जर्मनी की एक दवा कंपनी के प्रतिनिधियों को उस समय रंगे हाथों पकड़ा गया था, जब वे स्थानीय आदिवासियों की मदद से कुछ पौधों की पहचान कर रहे थे ।
राजस्थान के रणथंभौर अभ्यारण इलाके में विदेषी लोगों द्वारा कतिपय पौधों के बारे में जानकारी मांगने की बात राजस्थान विष्वविद्यालय के एक षोध में भी उल्लेखित की गई है । 1994 में दिल्ली के अंतरराश्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक जर्मनी पर्यटक के पास हजारें की ंसख्या में मरे कीड़े-मकोड़े जब्त किए गए थे । तब तो उसे अजीबो गरीब हरकत करने वाला मान कर छोड़ दिया गया था, लेकिन अब स्पश्ट होने लगा है कि भारत की जैव विविधता पर विदेषी निगाहें कई सालों से गड़ी हुई हैं ।
देष के रेगिस्तानी इलाकों में मिलने वाली गूगल(कांपीफोरा वाईट्री) की एक विषेश प्रजाति में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो कि द्ददय रोग के कारक कोलेस्ट्रोल को कम करने की क्षमता रखता है । अष्वगंधा यानी विथानिया सोम्नीफेर तो याददाष्त, मानसिक रोगों, षारीरीक दुर्बलता जैसे विकारों में राम बाणा माना जाता है । इस बूटी में कैंसर -रोधी गुण भी हैं और इसी कारण इसकी बड़ी मात्रा में तस्करी हो रही है । सांस संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए पुष्तैनी रूप से इस्तेमाल होने वाले एक पौधे की भी खासी मांग है, इसे वैज्ञानिक भाशा में ‘‘ इफेड्रा फोलियाटा’’ कहा जाता है । अमेरिका में इस पौघे से दिल की ओर जाने वाली धमनियों को खेालने की दवा बनाने के प्रयोग चल रहे हैं । यदि ये सभी प्रयोग सफल हुए तो विदेषी कंपनियां हमारी इन जड़ी-बूटियों को अपने तरीके से पैटंट करवा कर सारी दुनिया में व्यापार करेंगी ।
राजधानी दिल्ली का खारी बावली इलाका कई दुलर्भ व प्रतिबंधित औषधियों की खरीद-फरोक्ष्त का अड्डा है । यहां  ‘सालम पंजा’, मुगली , जटामासी आदि अफरात मिल जाती हैं । यही नहीं नगद भुगतान करने पर नेपाल की सीमा के पास तक पहुचाने का जिम्मा भी ये ही व्यापारी लेते हैं । कटरा तंबाकू, गली बताशा जैसी संकरी गलियों के आलीशान आफिसों में हांगकांग, जर्मनी, लंदन के जड़ी-बूटी प्रेमियों की भीड़ देखी जा सकती है ।  सुगंध कोकिला, चिरायता के कई ट्रक हर सप्ताह दिल्ली से विदेश जाते हैं ।
कैंसर के इलाज के लिए प्रयुक्त दवा ‘ आईसो हैक्सनीलन्पथाइजरिंस’’ भले ही आज विदेषी औशधि है, लेकिन इसका निर्माण मध्य भारत में लावारिस से मिलने वाले पौधे ‘अर्नेबिया हिस्पीडिसीमा’’ से हुआ है । अरावली पर्वतमाला में मिलने वाले पौधे ‘बैलानाईट्स एजीप्टीनिया’ से ऐसा गर्भ निरेधक तैयार किया गया है , जिसके कोई साईड-इफैक्ट नहीं हैं । हिमालय क्षेत्र में मिलने वाले गुलाबी फूलों ‘ बरबेरिस एरिस्टाका’ से आंख की बेहतरीन  दवा तैयार की गई है । यहीं मिलने वाले टेक्सस बकाठा से कैंसर निदान में महत्वपूर्ण दवा मिली है । हैपीटाइटस जैसे घातक रोग का इलाज भी भारत में मिलने वाली बूटी फाइलान्थर निसरी में खोजा गया है ।
नीम हमारे लोक जीवन का अभिन्न हिस्सा है । कई बीमारियों व खेती-किसानी में इसका उपयोग होता है । परंपरागत रूप् से नीम भारतीय पेड़ है, इसके बावजूद सन 1995 में यूरोपीय पेटेंट प्राधिकरण ने अमेरिका के कृषि विभाग व अमेरिका की रसायन कंपनी डब्लू.जी. ग्रेस एंड कंपनी के नाम नीम के तेल से कीटनाशक बनाने का पेटेंट  जारी कर दिया । समय रहते इस निर्णय को चुनौती दी गई, तब डब्लू. जी. ग्रेस कंपनी ने कई प्रमाण प्रस्तुत किए कि वे लंबे समय से इस दिशा में शोध कर रहे हैं । हालांकि कंपनी का दवा खारिज हुआ, लेकिन उस घटला से पता चला कि किस तरह अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से भारत से नीम के तेल की तस्करी कर ही थीं ।  ठीक ऐसा ही हल्दी के साथ भी हो चुका है ।  दक्षिण एशिया के किसानों के बासमती के पेटेेट पर भी अमेरिकी दावे हो चुके हैं ।
यहां जानना जरूरी है कि हमारे  देष की पारंपरिक जड़ी-बूटियों की थोड़ी सी मात्रा ही विदेषी वैज्ञानिकों के लिए काफी होती है । ये लोग इन औशधियों के गुणों व उसके मुख्य तत्वों का विष्लेशण करते हैं और फिर उन्हीं तत्वों के आधार पर दवाएं बना कर पैटेंट करवा लेते हैं । हमारे पारंपरिक ज्ञान की रासायनिक बनावट को विदेषों में भेजने वाले कई गिरोह बाकायदा काम कर रहे हैं । यह बड़ा सुरक्षित धंधा है , ना तो कोई बड़ा सा कंसाईमेंट बनाना है और ना ही ढृलाई का झंझट है । इस काम में कई पर्यटक तो कुछ योग के विषेशज्ञ और कुछ तो दोहरी नागरिकता वाले अप्रवासी लगे हैं । ये लेाग अपने हर आगमन पर कुछ ग्राम वनस्पितियां ले जाते हैं । इस पर कस्टम वालों को भी षक नहीं होता है और ये लोग इसके एवज में लाखों-लाख कमाते हैं । यदि कानूनी रूप से कोई इन वनस्पितियों को देष से ले जाएगा तो उसे सरकार से अनुमति लेनी होगी व रायल्टी का भ्ुागतान भी करना होगा । सबसे बड़ी बात उक्त पौघे के गुणों पर आधारित किसी दवा का विदेष में पैटेंट संभव नहीं होगा ।
आस्ट्रेलिया की मिट्टी, फूल, पत्ती या कोई भी जैव पदार्थ को छुपा कर ले जाते हुए पकड़े जाने पर 50 हजार डालर के जुर्माने का कड़ा कानून हैं । भारत जैसे जैव-संपन्न देष में इस बाबत सषक्त कानून ना होना विडंबना ही है । संसद ने सन 2002 में जैव विविधता कानून को मंजूरी दी थी । एक राष्टीय जैव विविधता प्राधिकरण के गठन की भी योजना बनाई गई थी । गोया यह सरकार में बैठे लोग भी स्वीकारते हैं कि जैव तस्करी पर कारगर रूप से अंकुश लगाने की दृष्टि से यह कानून बेहद कमजोर है ।  ªहमारे बौद्धिक व पारंपरिक ज्ञान व जैव विविधता का सौदा करने वाले लेाग एक तरह से देष की अर्थ व्यवस्था पर प्रहार कर रहे हैं । इस बाबत सरकार भले ही देर से चेते पर समाज को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना होगा ।

पंकज चतुर्वेदी

गुरुवार, 4 जून 2015

Water is future, Special on IBN-7 blog

आई बी एन -७ के ब्लॉग पेज पर मेरा विशेष आलेख विश्व पर्यावरण दिवस पर "जल हें तो कल हें " विशेषकर तालाब पर केंद्रितhttp://khabar.ibnlive.com/blogs/author/71.html



तालाबों की सुध समाज को ही लेनी होगी


कलम और तलवार दोनों के समान रूप से धनी महाराज छत्रसाल ने 1707 में जब छतरपुर शहर की स्थापना की थी तो यह वेनिस की तरह हुआ करता थ। चारों तरफ घने जंगलों वाली पहाड़ियों और बारिश के दिनों में वहां से बहकर आने वाले पानी की हर बूंद को सहजेने वाले तालाब, तालाबों के बीच सड़क व उसके किनारे बस्तियां। 1908 में ही  इस शहर को नगर पालिका का दर्जा मिल गया था। आसपास के एक दर्जन जिले जो बेहद पिछड़े थे, वहां से व्यापार, खरीदारी, सुरक्षित आवास आदि के लिए लोग यहां आकर बसने लगे। आजादी मिलने के बाद तो यहां का बाशिंदा होना गर्व की बात कहा जाने लगा। लेकिन इस शहरीय विस्तार के बीच धीरे-धीरे यहां की खूबसूरती, नैसर्गिकता और पर्यावरण में सेंध लगने लगी। अभी 80 के दशक तक शहर में कभी पानी का टोटा नहीं था और आज नल तो रीते हैं ही, कुएं व अन्य संसाधन भी साथ छोड़ गए हैं।  हालांकि अब वहां की जनता जागी है तालाबों को बचाने के लिए।
पिछले दिनों शहर के सबसे बड़े ग्वाल मगरा तालाब की जलकुंभी की सफाई का जिम्मा शहर के लोगों ने ही उठाया। इन दिनों प्रताप सागर पर भी काम हो रहा है। लेकिन खतरा वही है- लोग तालाब संरक्षण, सौंदर्यीकरण व उसके मूल स्वरूप को अक्षुण रखने में अंतर नहीं कर पा रहे हैं। जैसा कि नदियों के साथ हो रहा है। उसके तटों को सुंदर बनाने पर अरबों फूंके जाते हैं लेकिन उसकी जल धारा को सहेजने पर चुप्पी रहती है। छतरपुर के तालाबों से लोग जल कुंभी साफ कर रहे हैं, कुछ गाद भी हटा रहे हैं, लेकिन उसमें पानी आने व उसके अतिरिक्त जल को दूसरे तालाब तक जाने के पारंपरिक मार्गों को अतिक्रमण से मुक्त करने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है। तालाबों में शहरी गंदगी का निस्तार, पॉलीथीन के जमा होने पर कोई नीति नहीं है। होता यह है कि सौंदर्यीकरण के नाम पर तालाबों को कुछ सिकोड़ दिया जाता है व उससे निकली जमीन पर अट्टालिकाएं रोप दी जाती हैं।  इस तरह तालाब के नाम पर एक रुके हुए पानी का गड्ढा बन जाता है जो बदबू मारता है।
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छतरपुर में ही जिस तालाब की लहरें कभी आज के छत्रसाल चौराहे से महल के पीछे तक और बसोरयाना से आकाशवाणी तक उछाल मारती थीं, वहां अब गंदगी, कंकरीट के जंगल और बदबू रह गई है। भले ही मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के सामने है, लेकिन यह तय है कि पूरे साल पानी के लिए कराहते छतरपुर शहर को अपने सबसे बड़े व नए ‘किशोर सागर’ की दुर्गति करने का खामियाजा तो भुगतना ही पड़ेगा।
बुंदेलखंड का मिजाज है कि हर पांच साल में दो बार यहां कम बारिश होगी, इसके बावजूद अस्सी के दशक तक छतरपुर में पानी का संकट नहीं था। इस बीच यहां बाहर से आने वाले लोगों की बाढ़ आ गई। उनकी बसाहट और व्यापार के लिए जमीन की कमी आई तो शहर के दर्जनभर तालाबों के किनारों पर लोगों ने कब्जा शुरू कर दिया। उन दिनों तो लोगों को लगा था कि पानी की आपूर्ति नल या हैंडपंप से होती है। जब तक लोगों को समझ आया कि नल या भूजल का अस्तित्व तो उन्हीं तालाबों पर निर्भर है जिन्हें वे हड़प गए हैं, बहुत देर हो चुकी थी। किशोर सागर कानपुर से सागर जाने वाले राजमार्ग पर है, उसके आसपास नया छतरपुर बसना शुरू हुआ था , सो किशोर सागर पर मकान, दुकान, बाजार, मॉल, बैक्वेट सभी कुछ बना दिए गए हैं।  कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह से कब्जे करने वालों में अधिकांश रसूखदार ही हैं।  अभी कुछ सालों में बारिश के दौरान वहां बनी कॉलोनी के घरों में पानी भरने की दिक्कतें आनी शुरू हुईं। कुछ लोगों ने प्रशासन को कोसना भी शुरू किया, उन्हें पता नहीं था कि तालाब उनके घर में नहीं, बल्कि वे तालाब में घुसे बैठे हैं। बीच-बीच में कुछ शिकायतें होती रहीं, कई बार जांच भी हुईं लेकिन हर बार भूमाफिया, राजस्व अफसर साठगांठ कर ऐसे दस्तावेज सामने रखते कि छतरपुर के सरकारी स्कूल से लेकर अस्पताल तक तो तालाब पर अवैध कब्जे दिखते, लेकिन वहां जल निधि के बीच बने घर और दुकानें निरापद रहते।
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किशोर सागर के बंदोबस्त रिकॉर्ड के मुताबिक 1939-40 से लेकर 1951-52 तक खसरा नंबर 3087 पर इसका रकबा 8.20 एकड़ था।  1952-53 में इसके कोई चौथाई हिस्से को कुछ लोगों ने अपने नाम करवा लिया। आज पता चल रहा है कि उसकी कोई स्वीकृति थी ही नहीं, वह तो बस रिकॉर्ड में गड़बड़ कर  तालाब को किसी की संपत्ति बना दिया गया था। उन दिनों यह इलाका शहर से बाहर निर्जन था और किसी ने कभी सोचा भी नहीं था कि आने वाले दिनों में यहां की जमीन सोने के भाव होगी। अब तो वहां का कई साल का बंदोबस्त बाबत पटवारी का रिकॉर्ड  उपलब्ध ही नहीं है।
यह बात हमारे संविधान के मूल कर्तव्यों में दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में समय-समय पर कहता रहा है, पर्यावरण मंत्रालय के दिशा निर्देश भी हैं और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का आदेश भी कि किसी भी नाले, नदी या तालाब, नहर, वन क्षेत्र जो कि पर्यावरण को संतुलित करने का काम करते हैं, वहां किसी भी तरह का पक्का निर्माण नहीं किया जा सकता। यही नहीं ऐसी जल-निधियों के जल ग्रहण क्षेत्र या केचमंट एरिया के चारों और चालीस फुट दायरे में भी कोई निर्माण नहीं हो सकता। किशोर सागर में तो निर्माण कर उसे डेढ़ एकड़ में समेट दिया गया।  मामला ग्रीन ट्रिब्यूनल की भोपाल शाखा में गया।  चूंकि इसमें घपलों, गड़बड़ियों की अनंत श्रृंखलाएं हैं, सो सही स्थिति जानने में कई बाधाएं आईं। यही नहीं ट्रिब्यूनल जिला कलेक्टर के खिलाफ गैर जमानती वारंट भी जारी कर चुका है। भू अभिलेख कार्यालय, ग्वालियर ने सेटेलाइट व अत्याधुनिक तकनीक वाली टीएसएम से तालाब के असली रकबे की जांच हुई। उसके बाद 7 अगस्त 2014 को एनजीटी की भोपाल पीठ के न्यायमूर्ति दलीप सिंह ने विस्तृत ऑर्डर जारी कर 1978 के बाद निर्मित तथा तालाब के मूल स्वरूप के जलग्रहण क्षेत्र से नौ मीटर भीतर के सभी निर्माण गिराने, , तालाब के आसपास हरियाली विकसित करने के आदेश दिए। जब जमीन की लूट में सब शामिल हों तो तालाब की नपाई, गिराए जाने वाले मकानों को तय करने में रोड़े तो अटकाए जाने ही हैं। 11 बार नाप जोख होने के बावजूद अभी तक धरातल पर तालाब नहीं उभर पाया है। चूंकि अब तालाब पर सैकड़ों मकान बन गए हैं सो यह मानवीय, सियासती मुद्दा भी बन गया है। तालाब बचाने की मुहिम वाले किशोर सागर के पुरातन स्वरूप को लौटाने के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं लेते। जाहिर है कि अभी समाज को यह भी सीखना है कि तालाब को बचाना है तो करना क्या है।
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किशोर सागर तो एक बानगी मात्र है। छतरपुर शहर के दो दर्जन, जिले के हजार, बुंदेलखंड के बीस हजार और देशभर के कई लाख तालाबों की त्रासदी लगभग इसी तरह की है। कभी जिन तालाबों का सरोकार आमजन से हुआ करता था, उन तालाबों की कब्र पर अब हमारे भविष्य की इमारतें तैयार की जा रही हैं। ये तालाब हमारी प्यास बुझाने के साथ-साथ खेत-खलिहानों की सिंचाई के माध्यम हुआ करते थे।  तालाब लोगों के जीवकोपार्जन का जरिया भी थे और तपती धरती को ठंडा करने का माध्यम भी। तालाब खेत के लिए भी उपजाते थे व झोपड़ी के लिए पोतना भी, तालाब पालतू मवेशियों के लिए जीवनदायी होते थे और  पर्यावरण संतुलन का मूल मंत्र भी। आज भी जिस समाज ने अपनी पारंपरिक जल निधियों को संरक्षित रखा है, वहां मौसम की मार का वार बेअसर होता है। जबकि जहां जलाशयों को उजाड़ा गया, वहां सारे साल मनहूसियत व पानी के लिए रिरियाना  बना रहता है।
एक आंकड़े के अनुसार, मुल्क में आजादी के समय लगभग 24 लाख तालाब थे। बरसात का पानी इन तालाबों में इकट्ठा हो जाता था, जो भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी होता था। देश भर में फैले तालाबों ,बावड़ियों और पोखरों की 2000-2001 में गिनती की गई थी। तब पाया गया कि हम आजादी के बाद कोई 19 लाख तालाब-जोहड़ पी गए। देश में इस तरह के जलाशयों की संख्या साढे पांच लाख से ज्यादा है, इसमें से करीब 4 लाख 70 हजार जलाशय किसी न किसी रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं, जबकि करीब 15 प्रतिशत बेकार पड़े हैं। 10वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2005 में केंद्र सरकार ने जलाशयों  की मरम्मत, नवीकरण और जीर्णोंद्धार (आरआरआर) के लिए योजना बनाई। 11वीं योजना में काम शुरू भी हो गया, योजना के अनुसार राज्य सरकारों को योजना को अमलीजामा पहनाना था। इसके लिए कुछ धन केंद्र सरकार की तरफ से और कुछ विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से मिलना था। इस योजना के तहत इन जलाशयों की क्षमता बढ़ाना, सामुदायिक  स्तर पर  बुनियादी ढांचे का विकास करना था।
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दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने नए तालाबों का निर्माण तो नहीं ही किया, पुराने तालाबों को भी पाटकर उन पर इमारतें खड़ी कर दीं। भू-मफियाओं ने तालाबों को पाटकर बनाई गई इमारतों का अरबों-खरबों रुपये में सौदा किया और खूब मुनाफा कमाया। इस मुनाफे में उनके साझेदार बने राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी। माफिया-प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं की इस जुगलबंदी ने देश को तालाबविहीन बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। यह तो सरकारी आंकड़ों की जुबानी है, इसमें कितनी सच्चाई है, यह किसी को नहीं पता। सरकार ने मनरेगा के तहत फिर से तालाब बनाने की योजना का सूत्रपात किया है। अरबों रुपये खर्च हो गए, लेकिन वास्तविक धरातल पर न तो तालाब बने और न ही पुराने तालाबों का संरक्षण ही होता दिखा।
जरा अपने आसपास देखें, ना जाने कितने किशोर सागर समय से पहले मरते दिख रहे होंगे, ना जाने कितने ग्वाल मगरा में जलकुंभी की सफाई हो रही होगी। असल में ये तालाब नहीं मर रहे हैं, हम अपने आने वाले दिनों की प्यास को बढ़ा रहे हैं, जलसंकट को बढ़ा रहे हैं, धरती के तापमान को बढ़ा रहे हैं।

For a better Eco world, avoid garbage, manage garbage

विश्व पर्यावरण दिवस पर लें सफाई का संकल्प

                                                                                                                               
दैनिक जागरण नेशनल एडीशन ५ जून १५ 
पंकज चतुर्वेदी

बीते एक साल के दौरान प्रधानमंत्री से लेकर अफसरान तक ने झाड़ू थामी - कूड़ा साफ करने के लिए। वे जानते हैं कि हमारा देश केवल साफ सफाई ना होने के कारण उत्पन्न संकटों के कारण हर साल 54 अरब डालर का नुकसान सहता है। इसमें बीमारियां, व्यापारिक व अन्य किस्म के घाटे शामिल है।। यदि भारत में लेाग कूड़े का प्रबंधन व सफाई सीख लें तो औसतन हर साल रू.1321 का लाभ होना तय है। आम लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक बनाने के लिए प्रधान मंत्रीजी व अन्य नामी गिरामी हस्तियों द्वारा सावर्चजनिक सफाई कार्य करना  अच्छा कदम है, लेकिन हमें यह भी विचार करना होगा कि आखिर कूड़ा कम कैसे हो, क्योंकि कूड़ा घर-मुहल्ले से निकाल बाहर करना समस्या का निदान नहीं है, असल समस्या तो उसके बाद षुरू होती है कि कूड़े का निबटान कैसे हो। यह बात भी गौरतलब है कि भारत में पर्यावरणीय संकट के आधे से ज्यदा मसले कूड़ा या उसका ठीक से निबटान ना होने से उपजे है? जिसकी चपेट में जमीन व जल के हालात तो बेहद बुरे हो चुके हैं।
षायद ही कोई ऐसा दिन जाता होगा जब हमारे देश  में किसी ना किसी कस्बे-शहर में कूड़े को ले कर आम लोगों का आक्रोश  या फिर अपने घर-मुहल्ले के करीब कचरे का डंपिंग ग्राउंड ना बनने देने के आंदोलन ना होते हों। लोगों की बढ़ती आय व जीवन-स्तर ने कूड़े को बढ़ाया है और अब कूड़ा सरकार व समाज दोनों के लिए चिंता का विषय  बनता जा रहा है। भले ही हम कूड़े को अपने पास फटकने नहीं देना चाहते हों, लेकिन विडंबना है कि यह कूड़ा हमारी गलतियों या बदलती आदतों के कारण ही दिन-दुगना, रात-चैगुना बढ़ रहा है। वह कूड़ा जिसे नष्ट करना  संभव नहीं है, जिसमें प्लास्टिक शामिल है ; अणु बम से भी ज्यादा खतरनाक है और वह आने वाली कई पीढि़यों के लिए संकट है।
दिनांक 18 दिसंबर 2014 को दिल्ली हाई कोर्ट चेतावनी दे चुका है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो दिल्ली जल्दी ही ठोस कचरे के ढेर में तब्दील हो जाएगी। दिल्ली में अभी तक कोई दो करोड मीट्रिक टन कचरा जमा हो चुका है और हर दिन आठ हजार मीट्रिक टन कूड़ा पैदा हो रहा है जिसमें से एक हजार टन प्लास्टिक का लाइलाज कचरा होता है। इसके निस्तारण के लिए कहीं जमीन भी नहीं बची है। मौजूदा लेंडफिल साईट डेढ सौ फुट से ऊंची हो गई हैं और उन पर अब अधिक कचरा नहीं डाला जा सकता। षायद यही हाल देष के हर छोटे बडे षहर-कस्बों के हैं। कई जगह लापरवाही व चालाकी से जल संसाधनों, जैसे समुद्र, तालाब, नहर, नदी, जोहड़ में कुड़ा डाल कर लोग अपने कर्तव्य की इतिश्री मान रहे हैं, यह जाने बगैर कि वह कितबने बड़े खतरे को न्यौता दे रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देष में हर रोज 45 लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है, इसमें से केवल 2500 लाख टन के निस्तारण की ही व्यवसथा है, यानि हर रोज दो हजार लाख टन कचरा हमारे आसपास जुड़ रहा है।  हमारे देष में औसतन प्रति व्यक्ति 20 ग्राम से 60 ग्राम कचरा हर दिन निकलात है। इसमें से आधे से अधिक कागज, लकड़ी या पुट्ठा होता है, जबकि 22 फीसदी कूड़ा-कबाड़ा,  घरेलू गंदगी होती है। कचरे का निबटान पूरे देष के लिए समस्या बनता जा रहा है। दिल्ली की नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर तक दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाष रही है। जरा सोचें कि इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढो कर ले जाना कितना महंगा व जटिल काम है।  यह सरकार भी मानती है कि देष के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिषत का ईमानदारी से निबटान हो पाता है।  राजधानी दिल्ली का तो 57 फीसदी कूड़ा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यमुना में बहा दिया जाता है।  कागज, प्लास्टिक, धातु  जैसा बहुत सा कूड़ा तो कचरा बीनने वाले जमा कर रिसाईकलिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके, खाने-पीने की चीजें, मरे हुए जानवर आदि कुछ समय में सड़-गल जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए विकराल संकट का रूप लेता जा रहा है।
असल में कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला फाउंटेन पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल-पेन आए, जिनकी केवल रिफील बदलती थी। आज बाजार मे ंऐसे पेनों को बोलबाला है जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं।  देष की बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। जरा सोचें कि तीन दषक पहले एक व्यक्ति साल भर में बामुष्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह षेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले ‘यूज एंड थ्रो’ वाले रेजर ही  बाजार में मिलते हैं। अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन ले कर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देष में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फैंकी जाती हैं। मेकअप का सामान, घर में होने वाली पार्टी में डिस्पोजेबल बरतनों का प्रचलन, बाजार से सामन लाते समय पोलीथीन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग ;ऐसे ही ना जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। घरों में सफाई  और खुषबू के नाम पर बढ़ रहे साबुन व अन्य रसायनों के चलन ने भी अलग किस्म के कचरे को बढ़ाया है। सरकारी कार्यालयों में एक-एक कागज की कई-कई प्रतियां बनाना, एक ही प्रस्ताव को कई-कई टेबल से गुजारना, जैसे कई कार्य हैं जिससे कागज, कंप्ूयटर के प्रिंिटग कार्टेज् आदि का वययव बढता है। इसको कम करने की योजना बनाना जरूरी है।
सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों और मोबाईल का है। इसमें पारा, कोबाल्ट, और ना जाने कितने किस्म के जहरीले रसायन होते हैं। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलो ग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा लेड और 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता हे। षेश हिस्सा प्लास्टिक होता है। इसमें से अधिकांष सामग्री गलती-’सड़ती नहीं है और जमीन में जज्ब हो कर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने  और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने  का काम करती है। भारत में यह समस्या लगभग 25 साल पुरानी है, लेकिन सूचना प्रोद्योगिकी के चढते सूरज के सामने इसे पहले गौण समझा गया, जब इस पर कानून आए तब तक बात हाथ से निकल चुकी थी। आज अनुमान है कि हर साल 10 लाख टन ई कचरा हमारा देश उगल रहा है, जिसमें से बामुश्किल दो फीसदी का ही सही तरह से निस्तारण हो पाता हे। शेष कचरे से अवैज्ञानिक तरीके से जला कर या तोड़ कर कीमती धतु निकाली जाती है व शेष को यूं हीक हीं फैंक दिया जाता है। इससे रिसने वाले रसायनांे का एक अद्श्य लेकिन भयानक तथ्य यह है कि इस कचरे कि वजह से पूरी खाद्य श्रंखला बिगड़ रही है । ई - कचरे के आधे - अधूरे तरीके से निस्तारण से मिट्टी में खतरनाक रासायनिक तत्त्व मिल जाते हैं जो पेड़ - पौधों के अस्तित्व पर खतरा बन रहा है। इसके चलते पौधों में प्रकाश संशलेषण की प्रक्रिया ठीक से नहीं हो पाती है और जिसका सीधा असर वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा पर होता है। इतना ही नहीं, कुछ खतरनाक रासायनिक तत्त्व जैसे पारा, क्रोमियम , कैडमियम , सीसा, सिलिकॉन, निकेल, जिंक, मैंगनीज, कॉपर, भूजल पर भी असर डालते हैं. जिन इलाकों में अवैध रूप से रीसाइक्लिंग का काम होता है उन इलाकों का पानी पीने लायक नहीं रह जाता। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाईलो ंसे भी उपज रहा है।  भले ही अदालतें समय-समय पर फटकार लगाती रही हों, लेकिन अस्पतालों से निकलने वाले कूड़े का सुरक्षत निबटान दिल्ली, मुंबई व अन्य महानगरों से ले कर छोटे कस्बों तक संदिग्ध व लापरवाहीपूर्ण रहा है।
राजधानी दिल्ली में कचरे का निबटान अब हाथ से बाहर निकलती समस्या बनता जा रहा है। अभी हर रोज आठ हजार मीट्रिक टन कचरा उगलने वाला महानगर 2021 तक 16 हजार मीट्रिक टन कचरा उपजाएगा। दिल्ली के अपने कूड़-ढलाव पूरी तरह भर गए हैं और आसपास 100 किलोमीटर दूर तक कोई नहीं चाहता कि उनके गांव-कस्बे में कूड़े का अंबार लगे। कहने को दिल्ली में दो साल पहले पोलीथीन की थैलियों पर रोक लगाई जा चुकी है, लेकिन आज भी प्रतिदिन 583 मीट्रिक टन कचरा प्लास्टिक का ही है। इलेक्ट्रानिक और मेडिकल कचरा तो यहां के जमीन और जल को जहर बना रहा है।
कूड़ा अब नए तरह की आफत बन रहा है, सरकार उसके निबटान के लिए तकनीकी व अन्य पयास भी कर रही है। लेकिन असल में कोषिष तो कचरे को कम करने की होना चाहिए। प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल, पुराने कंप्यूटर व मोबाईल के आयात पर रोक तथा बेकार उपकरणों को निबटाने के लिए उनके विभिन्न अवयवों को अलग करने की व्यवस्था करना, होगा। सामानों की मरम्मत करने वाले हाथों को तकनीकी रूप से सषक्त बनाने व उन्हें मदद करने से उपकरणों को कंडम कर फैंकने की प्रवृति पर रोक लग सकती है। बिजली के घरेलू उपकरणो से ले कर वाहनों के नकली व घटिया पाटर््स की बिक्री पर कड़ाई भी कचरे को रोकने में मददगार होगी। स्तरीय उपकरण ज्यादा चलते हैं व उसके कबाड हाने के गति कम होती है । सबसे बड़ी बात उच्च होती जीवन-षैली में कचरा-नियंत्रण और उसका निबटान की षिक्षा स्कूली स्तर पर अनिवार्य बनाना जरूरी है। कचरे को कम करना, उसके निबटान का प्रबंधन आदि के लिए दीर्घकालीन योजना और षिक्षा उतना ही जरूरी है, जितना बिजली, पानी और स्वास्थ्य के बारे में सोचना।


पंकज चतुर्वेदी
सहायक संपादक
नेषनल बुक ट्रस्ट इंडिया
 नेहरू भवन, वसंत कुंज इंस्टीट्यूषनल एरिया फेज-2
 वसंत कुंज, नई दिल्ली-110070
 संपर्क- 9891928376

world environment day : Save the sea

धरती के लिए जरूरी है समुद्र को बचाना
आज है विश्व पर्यावरण दिवस


उन दिनों इंसान के लिए समुद्र एक अनबूझ पहेली की तरह था। आज मानव ने समुद्र की गहराईयों को बहुत हद तक नाप लिया है। भौतिक सुखों का माध्यम बन गई है यह अथाह जल निधि। समुद्र केवल परिवहन या मछली का साधन नहीं रह गया, वहां से ईंधन, दवाई व बहुत कुछ प्राप्त किया जा रहा है। लेकिन इंसान के लिए भले ही यह उपलब्धि हो, लेकिन समुद्र के लिए तो यह अस्तित्व का खतरा बन रही है। आज जब पर्यावरण संरक्षण पर हर स्तर पर हल्ला मचा हुआ है, ऐसे में भी समुद्रों की अनूठी पारिस्थिति व्यवस्था के छिन्न-भिन्न होने पर कम ही चर्चा हो रही है। पृथ्वी के अधिकतर हिस्से पर कब्जा जमाए सागरों की विशालता व निर्मलता मानव जीवन को काफी हद तक प्रभावित करती है, हालांकि आम आदमी इस तथ्य से लगभग अनभिज्ञ है। पृथ्वी पर मौसम और वातावरण में नियमित बदलाव का काफी कुछ दारोमदार समुद्र पर ही होता है। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आने वाले दिनों में धरती पर जीवन का दारोमदार समुद्रों पर ही होगा। इसके बावजूद समुद्रों के दूषित होने के मसले को नदी या वायु प्रदूषण की तरह गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। समुद्र वैज्ञानिक इस बात से चिंतित हैं कि सागर की निर्मल गहराईयां खाली बोतलों, केनों, अखबारों व शौच-पात्रों के अंबार से पटती जा रही हैं। मछलियों के अंधाधुंध शिकार और मंूगा की चट्टानों की बेहिसाब तुड़ाई के चलते सागरों का पर्यावरण संतुलन गड़बड़ाता जा रहा है। धरती के बाशिंदे समुद्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। शहरों की गंदी नालियां, कचरा और कारखानों का अपशिष्ट सीधे ही समुद्रों में उड़ेला जा रहा है। आज समुद्र-प्रदूषण का 70 फीसदी धरती के निवासियों की लापरवाही के कारण है।यह आश्चर्यजनक लेकिन सत्य है कि गंदी नालियों की सीमित मात्रा यदि समुद्र जल में मिले तो फायदेमंद है। घरों की निकासी में मौजूद नाईट्रेट और फास्फेट समुद्र को उपजाऊ बनाते हैं। इससे छोटे पौधों की पैदावार बढ़ती है और इससे मछलियों को बेहतरीन भोजन मिलता है। लेकिन यदि इन लवणों की मात्रा बढ़ जाए तो इससे समुद्र को खतरा बढ़ जाता है। छोटे पौधों की संख्या बढ़ने से जल की गहराई में काई की परत मोटी हो जाती है। फलस्वरूप सूर्य का प्रकाश भीतर तक नहीं जा पाता है और प्रकाश संश्लेषण की क्रिया या तो कम हो जाती है या फिर पूरी तरह रुक जाती है। साथ ही कार्बन डाई आक्साइड की अधिक मात्रा उत्सर्जित होने लगती है व इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन का खर्च बढ़ जाता है। सनद रहे कि यह ऑक्सीजन पानी में घुली ऑक्सीजन से ही प्राप्त होती है। इस तरह एल्गी यानी काई नष्ट होने लगती है। निर्जीव एल्गी में वैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते हैं व इससे पानी में सड़न पैदा हो जाती है। इस तरह पानी में प्राण वायु का स्तर बेहद कम हो जाता है और तभी वहां जल-जीव मरने लगते हैं। ठीक यही हालत समुद्र में तेल रिसने पर होती है। खाड़ी देशों में लगातार युद्ध के चलते गत एक दशक में कई लाख गैलन तेल समुद्र में फैलता रहा है और इसका सीधा असर वहां के जीवों के जीवन पर पड़ा है। जब तटों के करीब की मछलियां शहरी प्रदूषण के कारण मरीं तो मछली मारने की बड़ी मशीनों ने गहराई में जाना शुरू कर दिया। अनुमान है कि हर साल 150,000 मीट्रिक टन प्लास्टिक के जाल व रस्सियां समुद्र में पड़ी रह जाती हैं और उसे खा कर लाखों व्हेल, सील व डाल्फिन जैसी मछलियां बेमौत मारी जाती हैं। भारत में तो गणेश व दुर्गा पूजा के बाद प्रतिमाओं के विसर्जन ने कई किलोमीटर तक समुद्र को जीव-विहीन बना दिया है। कारखानों से निकला दूषित मलबा सागरों के लिए बड़ा खतरा है। साथ ही समुद्र में बढ़ता यातायात भी वहां के पर्यावरण का दुश्मन बन गया है। समुद्री जहाजों से गिरने वाला तेल, पेट्रोलियम पदार्थ, कीटनाशक, विषैली गैसों के खाली सिलेंडर आदि दिनों-दिन समुद्र के मिजाज को जहरीला बना रहे हैं। इस बढ़ते प्रदूषण के चलते समुद्र तटों, खाड़ियों आदि में मछली पकड़ने वालों पर विपरीत असर पड़ रहा है। पानी के विषैला होने के कारण जलचर जीवों के विकास, वृद्धि, भोजन, श्वसन क्रिया और उनमें रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। भारत में पश्चिम के गुजरात से नीचे आते हुए कोंकण, फिर मलाबार और कन्याकुमारी से ऊपर की ओर घूमते हुए कोरामंडल और आगे बंगाल के सुंदरबन तक कोई 5600 किलोमीटर सागर तट है। यहां नेशनल पार्क व सेंचुरी जैसे 33 संरक्षित क्षेत्र हैं। इनके तटों पर रहने वाले करोड़ों लोगों की आजीविका का साधन समुद्र की मछली व अन्य उत्पाद ही हैं। लेकिन विडंबना है कि हमारे समुद्री तटों का पर्यावरणीय संतुलन तेजी से गड़बड़ा रहा है। मुंबई महानगर को कोई 40 किलोमीटर समुद्र तट का प्राकृतिक आशीर्वाद मिला हुआ है, लेकिन इसके नैसर्गिग रूप से छेड़छाड़ का ही परिणाम है कि यह वरदान अब महानगर के लिए आफत बन गया है। इस महानगर में कई चौपाटियां हैं जो कि पर्यावरणीय त्रासदी का वीभत्स उदाहरण हैं। कफ परेड से गिरगांव चौपाटी तक कभी केवल सुनहरी रेत, चमकती चट्टानें और नारियल के पेड़ झूमते दिखते थे। कोई 75 साल पहले अंग्रेज शासकों ने वहां से पुराने बंगलों को हटा कर मरीन ड्राइव और बिजनेस सेंटर का निर्माण करवा दिया। उसके बाद तो मुंबई के समुद्री तट गंदगी, अतिक्रमण और बदबू के भंडार बन गए। जुहू चौपाटी के छोटे से हिस्से और फौज के कब्जे वाले नवल चौपाटी यानी कोलाबा के अलावा समूचा समुद्री किनारा कचरे व मलबे के ढेर में तब्दील हो गया है। तभी थोड़ी सी बरसात या ज्वार-भाटा में शहर कराहने लगता है। देश की पर्यटन राजधानी कहलाने वाले गोवा के कालानगुटे, बागा, अंजुना, बागटोर आदि चर्चित समुद्री तट पर्यटकों द्वारा फेंके गए कचरे से पट रहे हैं। शहर का कचरा भी लहरों के साथ किनारे पर आ जाता है और कीचड़ की गहरी परत छोड़ जाता है। चैन्नई के मरीना बीच के सौंदर्यीकरण पर तो खूब खर्चा हो रहा है, लेकिन पर्यावरणीय छेड़छाड़ पर कोई रोक-टोक नहीं है। पुरी में हाईकोर्ट के सख्त आदेश के बावजूद समुद्र से 500 मीटर के दायरे में कई होटल बन गए हैं। समुद्र के किनारे बसे शहरों व होटलों से उत्सर्जित कचरे व अपशिष्टों के चलते जीवन-रेखा कहलाने वाले समुद्र तट बंजर और वीरान हो गए हैं। मछली पकड़ने के लिए बड़ी व शक्तिशाली मोटर बोटों की व्यवस्था करना बहुत कम मछुआरों के लिए ही संभव है। इस तरह समुद्री प्रदूषण लाखों लोगों के लिए रोजी-रोटी का संकट भी बन गया है। समुद्र तटों के संरक्षण के कई कानून हैं, कई अदालतों ने भी निर्देश दिए हैं, लेकिन इस दिशा में समाज से जिस जागरूकता की अपेक्षा है, उसका सर्वथा अभाव दिखता है।(लेखक नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया में सहायक संपादक हैं)
= पंकज चतुर्वेदी

बुधवार, 3 जून 2015

GROUND WATER ON ALARM

भूजल पर मंडराता खतरा

JANSANDESH TIMES LUCKNOW 4-6-15
जमीन की गहराईयों में पानी का अकूत भंडार है । यह पानी का सर्वसुलभ और  स्वच्छ जरिया है, लेकिन यदि एक बार दूशित हो जाए तो इसका परिश्करण लगभग असंभव होता है । भारत में जनसंख्या बढ़ने के साथ घरेलू इस्तेमाल, खेती और औद्योगिक उपयोग के लिए भूगर्भ जल पर निर्भरता साल-दर-साल बढ़ती जा रही है  । पाताल से  पानी निचोड़ने की प्रक्रिया में सामाजिक व सरकारी कोताही के चलते भूजल खतरनाक स्तर तक जहरीला होता जा रहा है ।ं भारत में दुनिया की सर्वाधिक खेती होती है । यहां 50 मिलियन हेक्टर से अधिक जमीन पर जुताई होती है, इस पर 460 बी.सी.एन. पानी खर्च होता है । खेतों की जरूरत का 41 फीसदी पानी सतही स्त्रोतों से व 51 प्रतिषत भूगर्भ से मिलता है । गत् 50 सालों के दौरान भूजल के इस्तेमाल में 115 गुणा का इजाफा हुआ है । भूजल के बेतहाषा इस्तेमाल से एक तो जल स्तर बेहद नीचे पहंुच गया है, वहीं लापरवाहियों के चलते प्रकृति की इस अनूठी सौगात जहरीली होती जा रही है ।
सनद रहे कि देष के 360 जिलों को भूजल स्तर में गिरावट के लिए खतरनाक स्तर पर चिन्हित किया गया है । भूजल रिचार्ज के लिए तो कई प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन खेती, औद्योगिकीकरण और षहरीकरण के कारण जहर होते भूजल को ले कर लगभग निश्क्रियता का माहौल है ।  बारिष, झील व तालाब, नदियों और भूजल के बीच यांत्रिकी अंतर्संबंध है । जंगल और पेड़ रिचार्ज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । इसी प्रक्रिया में कई जहरीले रसायन जमीन के भीतर रिस जाते हैं । ऐसा ही दूशित पानी पीने के कारण देष के कई इलाकों में अपंगता, बहरापन, दांतों का खराब होना, त्वचा के रोग, पेट खराब होना आदि महामारी का रूप ले चुका है । ऐसे अधिकांष इलाके आदिवासी बाहुल्य हैं और वहां पीने के पानी के लिए भूजल के अलावा कोई विकल्प उपलब्ध नहीं हैं ।
भारत में खेती, पेयजल व अन्य कार्यों के लिए अत्यधिक जल दोहन से धरती का भूजल भंडार अब दम तोड़ रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर 5723 ब्लॉकों में से 1820 ब्लॉक में जल स्तर खतरनाक हदें पार कर चुका है. जल संरक्षण न होने और लगातार दोहन के चलते 200 से अधिक ब्लॉक ऐसे भी हैं, जिनके बारे में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने संबंधित राज्य सरकारों को तत्काल प्रभाव से जल दोहन पर पाबंदी लगाने के सख्त कदम उठाने का सुझाव दिया है. लेकिन देश के कई राज्यों में इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा सका है. उत्तरी राज्यों में हरियाणा के 65 फीसदी और उत्तर प्रदेश के 30 फीसदी ब्लॉकों में भूजल का स्तर चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है. लेकिन वहां की सरकारें आंखें बंद किए हुए हैं. इन राज्यों को जल संसाधन मंत्रालय ने अंधाधुंध दोहन रोकने के उपाय भी सुझाए हैं. इनमें सामुदायिक भूजल प्रबन्धन पर ज्यादा जोर दिया गया है. इसके तहत भूजल के दोहन पर रोक के साथ जल संरक्षण और संचयन के भी प्रावधान किए गए हैं. राजस्थान जैसे राज्य में 94 प्रतिषत पेयजल योजनाएं भूजल पर निर्भर हैं। और अब राज्य के तीस जिलों में जल स्तर का सब्र समाप्त हो गया है। भूजल विषेशज्ञों के मुताबिक आने वाले दो सालों में राज्य के140 ब्लाकों में षायद ही जमीन से पानी उलेचा जा सके।
भूजल के बेतहाषा दोहन की ही त्रासदी है कि उत्तर प्रदेष के कई जिले- कानपुर, लखनउ, आगरा आदि भूकंप संवेदनषील हो गए हैं व चेतावनी है कि यहां कभी भी बड़ा भूकंप  व्यापक जन हानि कर सकता है। पष्चिमी उप्र में तो भूजल में जहर इस कदर घुल गया है कि गांव के गांव कैंसर जैसी बीमारियों के गढ़ बन गए हैं। देश में वैसे जल की कमी नहीं है. हमारे देश में सालाना 4 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है. इस पानी का बहुत बड.ा भाग समुद्र में बेकार चला जाता है इसलिए बरसात में बाढ. का, तो गर्मी में सूखे का संकट पैदा हो जाता है. पानी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो सरकार लोगों को पानी न मुहैया करा सके, उसे शासन करने का कोई अधिकार नहीं है. अदालत के निर्देश पर एक उच्चस्तरीय समिति खारे पानी को पीने लायक बनाने और बरसाती पानी के प्रबंधन के सस्ते और आसान तरीके ढूंढने के लिए बनाई गई थी. इस समिति की रिपोर्ट पर क्या हुआ कोई नहीं जानता?
देष की राजधानी दिल्ली , उससे सटे हरियाणा व पंजाब की जल कुंुंडली में जहरीले गृहों का बोलबाला है । यहां का भूजल खेतों में अंधाधुंध रासायनिक खादों के इस्तेमाल और कारखानों की गंदी निकासी के जमीन में रिसने से दूशित हुआ है । दिल्ली में नजफगढ् के आसपास के इलाके के भूजल को तो इंसानों के इस्तेमाल के लायक नहीं करार दिया गया है । गौरतलब है कि खेती में रासायनिक खादों व दवाईयों के बढ़ते प्रचलन ने जमीन की नैसर्गिक क्षमता और उसकी परतों के नीचे मौजूद पानी को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है । उर्वरकों में मौजूद नाईट्रोजन, मिट्टी के अवयवों से मिल कर नाईट्रेट के रूप में परिवर्तित हो कर भूजल में घुल जाते हैं ।
मध्यप्रदेष में तो पूरा जल-तंत्र ही भूजल पर निर्भर हो गया है, जबकि बुंदेलखंड जैसे इलाके, जहां ग्रेनाईट संरचना है, भूजल के लिए माकूल ही नहीं हैं। वहां बारिष के सीपेज वाटर पर हैंडपंप रोप कर झूठी वाह वाही लूटी जाती है और गर्मी आने पर उससे पानी निकलना बंद हो जता है। आता भी है तो साथ में बीमारियां लेकर आता है। राजस्थान के कोई 20 हजार गांवेंा में जल की आपूर्ति का एकमात्र जरिया भूजल ही है और उसमें नाईट्रेट व फ्लोराईड की मात्रा खतरनाक स्तर पर पाई गई है । एक तरफ प्यास है तो दूसरी ओर जमीन की गहराई से निकला जहरीला पानी । लोग ट्यूबवेल का पानी पी रहे हैं और बीमार हो रहे हैं । ‘‘चमकते गुजरात’’ के तो 26 में से 21 जिले खारेपन की चपेट में हैं और 18 में फ्लोराईड की मार।
दिल्ली सहित कुछ राज्यों में भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बनए गए हैं, लेकिन भूजल को दूशित करने वालों पर अंकुष के कानून किताबों से बाहर नहीं आ पाए हैं । यह अंदेषा सभी को है कि आने वाले दषकों में पानी को ले कर सरकार और समाज को बेहद मषक्कत करनी होगी । ऐसे में प्रकृतिजन्य भूजल का जहर होना मानव जाति के अस्तित्व पर प्रष्न चिन्ह लगा सकता है ।

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