My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

रविवार, 8 मई 2016

Preparing ourselves for water conservation

जल और जीवन को संवारते लोग

पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकारFirst Published:08-05-2016 09:16:23 PMLast Updated:08-05-2016 09:16:23 PM
अब लोगों ने अपना चंदा जोड़ा व उसकी सफाई व उस पर एक स्टॉप डैम बनाने का काम शुरू कर दिया। वहीं दूसरी तरफ, पन्ना के मदन सागर को अपने पारंपरिक रूप में लौटाने के लिए वहां का समाज भरी गरमी में सारे दिन कीचड़ में उतर रहा है। 75 एकड़ के इस तालाब का निर्माण  1745 के आसपास हुआ था। इसमें 56 ऐसी सुरंंगें बनाई गई थीं, जो शहर की बस्तियों में स्थित कुओं तक जाती थीं। इससे काफी दूर बस्तर के दलपतसागर तालाब को कंक्रीट का जंगल बनने से बचाने के लिए पूरा समाज लामबंद हो गया है। परंपरागत जल साधनों को संवारने के ऐसे ढेर सारे उदाहरण सामने आ रहे हैं।
आमतौर पर हमारी सरकारें बजट का रोना रोती हैं कि पारंपरिक जल संसाधनों की सफाई के लिए बजट का टोटा है। हकीकत में तालाब की सफाई और उसके गहरीकरण का काम अधिक खर्चीला नहीं होता, न ही इसके लिए भारी-भरकम मशीनों की जरूरत होती है। तालाबों में भरी गाद, सालों-साल से सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ट पदार्थों के कारण ही उपजी है, जो वास्तव में उम्दा दर्जे की खाद है। किसानों को अगर इस खाद रूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपा जाए, तो वे सहर्ष इस काम के लिए राजी हो जाते हैं। राजस्थान के झालावाड़ जिले में 'खेतों में पॉलिश' के नाम से यह प्रयोग अत्यधिक सफल व लोकप्रिय हो रहा है। कर्नाटक में समाज के सहयोग से कोई 50 तालाबों का कायाकल्प हुआ है, जिनमें गाद की मुफ्त ढुलाई करने वालों ने इस खाद को बेचकर पैसा कमाया।
जल-संकट से जूझ रहे लोग अब जगह-जगह नदी को तालाब से जोड़ने, गहरे कुओं से तालाब भरने, पहाड़ पर नालियां बनाकर उसका पानी तालाब में जमा करने, उपेक्षित पड़ी झिरिया का पानी तालाब में एकत्र करने जैसे अनगिनत प्रयोग कर रहे हैं। इसके विपरीत जहां सरकार इसके लिए सक्रिय है, वहां नतीजे उतने अच्छे नहीं हैं। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के अंधियारा तालाब की कहानी पर गौर करें।
काफी पहले वहां सूखा राहत के तहत तालाब को गहरा करने का काम शुरू किया गया था। खोदने वालों ने तालाब के बीचोबीच खूब गहरी खुदाई कर दी। जब इंद्र देवता मेहरबान हुए, तो तालाब एक रात में लबालब हो गया, पर अगली सुबह ही उसकी तली दिख रही थी। बगैर सोचे-समझे की गई खुदाई में तालाब की वह झिर टूट गई, जिसका संबंध इलाके की ग्रेनाइट भू-संरचना से था। यह काम सरकारी अमले व ठेकेदार की बजाय स्थानीय ज्ञान से ही बेहतर हो सकता है। लोग अब यही कर रहे हैं।

Naxalism can not be combat with fake administrative claims

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खात्मे के फर्जी दावे 

नक्सलवाद
                                                 पंकज चतुर्वेदी
एक खबर को छत्तीसगढ़ की राज्य शासन ने जम कर प्रसारित किया कि अब आम ग्रामीणों का नक्सलियों से भरोसा उठ रहा है और सुकमा जिले के एक गांव कुमाकालेंग के लोगों ने अपने इलाके में नक्सलियों को घुसने से रोकने के लिए खुद मोर्चाबंदी कर ली है। बताया गया कि पंचायत के दो गांव-कुमाकालेंग और नामा के कोई युवा अपने पारंपरिक हथियारों के साथ अपने गांव में पहरा दे रहे हैं व नक्सलियों को अपने यहां घुसने नहीं दे रहे हैं। सनद रहे यह गांव तोंगापाल थाने से 22 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-30 पर स्थित है।याद करें, इसी तोंगपाल थाने के पांच किलोमीटर के दायरे में नक्सली पिछले दो सालों में कई बड़ी वारदातें कर चुके हैं। ठीक उसी समय बस्तर में नक्सलियों की दंडकारण्य विंग ने दो दिन के बंद का आयोजन किया। चार-पांच मई के बंद के दौरान इलाके में 95 प्रतिशत बसें चलीं, बीजापुर मुख्यालय सहित अधिकांश बाजार बंद रहे। कई जगह हाट-बाजार भी। नहंटा 78 किलोमीटर और सुकमा-दंतेवाड़ा 80 किलोमीटर मागरे पर हर बीस किलोमीटर दूरी पर सुरक्षा बलों के कैप हैं और ये ग्रामीणों, व्यापारियों व बस चालाकों को यह भरोसा नहीं दिला पाए कि उनके रहते नक्सली कुछ नहीं कर पाएंगे। इतनी फोर्स होने के बावजूद इलाके में नक्सलियों के पच्रे बंटे, कई जगह पेड़ काट कर सड़क जाम की गई। यह दो दिन बंद की बानगी है कि जिस कुमाकालेंग को बदलाव का प्रतीक बता कर प्रचारित किया जा रहा है, उसकी असलियत क्या है।लोग अब भी नहीं भूले हैं सलवा जुड़ुम को जिसमें स्थानीय युवाओं को प्रशासन ने नक्सलियों के विरुद्ध हथियार थमा दिए थे और उसके बाद ऐसा खून-खराबा हुआ कि हजारों लोग गांव-घर छोड़ कर भागे, गांव के गांव जलाए गए। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा व सलवा जुडुम को अवैध बता कर उसको समाप्त करने के आदेश दिए गए। बाद में सलवा जुड़ुम के प्रणोता व बस्तर के सबसे कद्दावर नेता महेन्द्र कर्मा की नृशंस हत्या कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के साथ कर दी गई। इतनी बड़ी घटना के बाद भी बस्तर के किसी गांव से यह आवाज नहीं आई थी कि वे नक्सलियों का बहिष्कार करेंगे। आदिवासी इलाकों की कई करोंड़ो-अरबों की प्राकृतिक संपदा पर अपना कब्जा जताने के लिए पूंजीवादी घरानों को समर्थन करने वाली सरकार सन 1996 में संसद द्वारा पारित आदिवासी इलाकों के लिए विशेष पंचायत कानून (पेसा अधिनियम) को लागू करना तो दूर उसे भूल ही चुकी है। इसके तहत ग्राम पंचायत को अपने क्षेत्र की जमीन के प्रबंधन और रक्षा करने का पूरा अधिकार था। इसी तरह परंपरागत आदिवासी अधिनियम 2006 को संसद से तो पारित करवा दिया लेकिन उसका लाभ दंडकारण्य तक नहीं गया, कारण वह बड़े घरानों के हितों के विपरीत है। असल में यह समय है, उन कानूनों-अधिनियमों के क्रियान्वयन पर विचार करने का, लेकिन हम बात कर रहे हैं कि जनजीय इलाकों में सरकारी बजट कम किया जाए, क्योंकि उसका बड़ा हिस्सा नक्सली लेवी के रूप में वसूल रहे हैं। नक्सली इलाकों में सुरक्षा बलों को ‘‘खुले हाथ’ दिए गए हैं। बंदूकों के सामने बंदूकें गरज रही हैं, लेकिन कोई मांग नहीं कर रहा है कि स्थाई शांति के लिए कहीं से पहल हो। इसके बीच पिस रहे हैं आदिवासी, उनकी संस्कृति, सभ्यता, बोली और मानवता।इतिहास गवाह है कि चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र बड़े से बड़े ताज जमीन पर गिरे हैं, लेकिन मानवता हर समय जीवंत रही है। नक्सलियों के कुछ सवाल भी जायज हैं। हां उनका तरीका गलत है, लेकिन इस आधार पर उनकी बात अनसुनी नहीं की जा सकती। सुरक्षा बलों को अपनी ड्यूटी निभाने के लिए हथियार ले कर जंगल में जाना ही होगा, लेकिन यह जरूरी नहीं कि उनकी हर गोली केवल अपराधी या नक्सली को ही लगे। पिछले छह महीने के दौरान सुरक्षा बलों ने कई सौ नक्सलियों को मार गिराने का दावा किया है। आत्मसमर्पण तो लगभग हर रोज हो रहे हैं। यदि इन सब की संख्या जोड़ लें तो लगेगा कि जंगल में जितने असली नक्सली नहीं हैं, उनसे ज्यादा या तो मार दिए गए या उनका हृदय परिवर्तन हो गया। जाहिर है कि प्रशासन की फर्जी कार्यवाहियां व दावे उसका केवल एक ही पहलू है-नक्सलवादियों की मजबूती और जनता में अपनी विश्वसनीयता को सवालों में खड़ा करना। लेकिन ताश के घर हवा के एक झोके से ढह जाया करते हैं और ऐसे में हवा खुद को मजबूत साबित करती है।

शुक्रवार, 6 मई 2016

Those who win over drought

जिन्होंने दी सूखे को मात




जब बात हाथ से निकल गई, जब सुखाड़ के दुष्प्रभाव अपने चरम पर आ गए, तब दिल्ली के मीडिया को खयाल आया कि उनसे महज पांच सौ किलोमीटर दूर बुंदेलखंड की आधी आबादी पानी की कमी के कारण पलायन कर चुकी है। सूखे कुएं, बंद घरों और तड़क चुकी जमीन के फोटो के साथ आएरोज खबरें तैर रही हैं। यह भी इतना नपातुला गणित हो चुका है, दिल्ली से पत्रकार जाता है, वहां वह कतिपय एनजीओबाज के पास होता है और वह अपने नजरिए से हालात दिखा देता है। आकर रपट फाइल हो जाती है। ऐसे में वे लोग तो गुमनाम ही रहते हैं, जिनके कार्य असल में पूरे समाज व सरकार के लिए अनुकरणीय बन सकते हैं। लगातार तीसरे साल अल्पवर्षा की मार से कराहते, बेहाल बंुदेलखंड से गांव और अपने जीवन तक से पलायन, प्यास से परेशानी और पेट पालने की जटिलताओं की कहानियां बढ़ती गरमी के साथ तेजी से फैल रही हैं। जब हालात पूरी तरह हाथ से निकल गए, तब मीडिया, प्रशासन और समाज की दीर्घ तंद्रा टूटी और सरकारी शेर कागजों पर दहाड़ने लगे। इस दौड़-भाग से उपजी मृग मरीचिका प्यासे बुंदेलखंडियों में भ्रम ही फैला रही है।
ऐसी निराशा के बीच समाज के वे लोग चर्चा में हैं ही नहीं, जिन्होंने इस सूखे व जल-संकट के समक्ष अपने हथियार नहीं डाले। विकट हालातों में भी स्थानीयता के पारंपरिक ज्ञान को याद किया और 45 डिग्री से अधिक गर्मी वाले इलाकों में भी सुखाड़ उन पर बेअसर है। एक दशक के दौरान कम से कम तीन बार उम्मीद से कम मेघ बरसना बुंदेलखंड की सदियों की परंपरा रही है। यहां के पारंपरिक कुएं, तालाब और पहाड़ कभी भी समाज को इंद्र की बेरुखी के सामने झुकने नहीं देते थे। जिन लोगों ने तालाब बचाए, वे प्यास व पलायन से निरापद रहे। ब्रितानी हुकूमत के दौर में ‘पॉलिटिकल एजेंट’ का मुख्यालय रहे नौगांव जनपद के करारा गांव की जल-कुंडली आज शेष बुंदेलखंड से बिल्कुल विपरीत हो गई है। पहले यहां के लोग भी पानी के लिए पैदल चलकर तीन किलोमीटर दूर जाया करते थे। इस साल जनवरी में जब ग्रामीणों को समझ आ गया कि सावन बहुत संकट के साथ आएगा तो उन लोगों ने गांव के ही एक कुएं के भीतर बोरिंग करवा दी, जिसमें खूब पानी मिला। फरवरी आते-आते पूरे गांव ने जुटकर अपने पुराने बड़े तालाब की सफाई, मरम्मत व गहरीकरण कर दिया। लगभग सौ फुट लंबा एक पाइप कुएं से तालाब तक डाला गया। फिर दो महीने में जब बिजली आती, मोटर चलाकर तालाब भरा जाता। आज यहां भरे पानी से घर के काम, मवेशियों के लिए पानी तो र्प्याप्त मिल ही रहा है, पूरे गांव के अन्य कुओं व हैंडपंप का जलस्तर भी शानदार हो गया है। सब एकमत है कि इस बार बारिश से तालाब को भरेंगे। पानी बचाने के लिए पहाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका को महसूस किया घुवारा ब्लॉक के बमनौराकलां गांव के समजा ने। दस हजार से अधिक आबादी और ढाई हजार मवेशियों वाला यह गांव बुंदेलखंड की अन्य बसावटों की ही तरह चारों तरफ पहाड़ों से घिरा है। पिछली बारिश शुरू होने से पहले समाज ने पहाड़ों पर ऊपर से नीचे की तरफ लगभग डेढ़ किलोमीटर लंबाई की एक फुट तक गहरी नालियां बना दीं। जब पानी बरसा तो इन नालियों के दस सिरों के माध्यम से बरसात की हर बूंद गाव के विशाल ‘चंदिया तालाब’ में जमा हो गई। आज पूरे गांव में कोई बोरवेल सूखा नहीं है, घरों में 210 नलों के जरिए पर्याप्त जल पहुंच रहा है। अब ग्रामीणों ने नालियों को और गहरा करने व पहाड़ पर हरियाली का संकल्प लिया है। सनद रहे बुंदेलखंड के सभी गांव, कस्बे, शहर की बसाहट का एक ही पैटर्न है, चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैया और उनके किनारों पर बस्ती। पहाड़ के पार घने जंगल व उसके बीच से बहती बरसाती या छोटी नदियां। आजादी के बाद यहां के पहाड़ बेहिसाब काटे गए, जंगलों का सफाया हुआ व पारंपरिक तालाबों को पाटने में किसी ने संकोच नहीं किया। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुंदेलखंड के हर गांव-कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। जिन्होंने पहाड़ बचाए, वे प्यास से नहीं हारे।दमोह शहर की जनता भले ही एक-एक बूंद पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही हो, लेकिन जिला मुख्यालय के करीबी गांव इमलाई में पानी का किसी तरह का संकट नहीं है। यहां की तेंदू तलैया का गहरीकरण व सफाई खुद गांव वालों ने कर ली थी। जब थोड़ी सी बारिश की हर बूंद इस कुदरती बचत खाते में जमा हुई तो उसके ब्याज से ही गांव वालों का कंठ तर हो गया। इसी जिले के तेंदूखेड़ा के पाठादो व उससे सटे तीन गांवों को पानीदार बनाने के लिए ग्रामीणों ने एक उपेक्षित पड़ी झिरिया का सहारा लिया। झिरिया यानी छोटा सा झरना, जहां से पानी का स्रोत फूटता है। यह झिरिया बरसात में खूब पानी देती है, गर्मी में इसकी रफ्तार कम हो जाती है। गांव वलों ने इस झिरिया से निकल कर बहने वाले पानी के रास्ते में एक तलैया बना दी, एक कुआं भी खोद दिया। नतीजा, बगैर किसी बड़े व्यय के पूरे इलाके की नमी बरकरार है। गांव के बुजुर्ग पूरे दिन इसी झिरिया के किनारे रहते हैं व लोगों को किफायत से पानी खर्चने की सीख देते हैं। टीकमगढ़ जिले में पारंपरिक ज्ञान पर आधारित बराना गांव के चंदेलकालीन तालाब को जामनी नदी से जोड़ने की योजना बेहद सफल रही है। इससे 18 गांव लाभान्वित हो रहे हैं। ऐसे कई-कई उदाहरण पानी के लिए बेहाल बस्तर से ले कर झारखंड तक में हैं, जहां समाज ने ही अपनी समस्या का निदान पारंपरिक ज्ञान के सहारे खोज लिया। कर्नाटक में तो समाज ने अपने व्यय व श्रम से खूब तालाब बना डाले और सूखे को ठेंगा दिखा दिया। जान लें कि देश की जल समस्या का निदान भारी-भरकम तकनीक के साथ अरबों रुपए व्यय के बाद दशकों तक अधूरी रहने वाली योजनाओं से मिलने से रहा। झारखंड के गुमला जिले के भरनो प्रखंड के खरतंगा पहाड़ टोला के लोगों का संकल्प तारीफ के काबिल है। उन लोगों ने आपस में मिलकर 250 फुट लंबा, 200 फुट चौड़ा और दस फुट गहरा तालाब खोद लिया। यदि यह ताल भर जाता है तो पूरे इलाके में कभी जल-संकट होगा ही नहीं।हालांकि कुछ लोग ऐसे उदाहरणों से सीख लेकर इस भरी गरमी में आने वाले दिनों में पानी को सहेजने के लिए कमर कस चुके हैं। नौगांव शहर के जब सारे नलकूप सूख गए व पानी मिलने की हर राह बंद हो गई तो वहां के समाज ने एक स्थानीय छोटी सी नदी को सहेजने का जिम्मा खुद उठा लिया। बिलहरी से निकल कर भडार तक जाने वाली कुम्हेडी नदी बीते कई दशकों से गंदगी, रेत व गाद के चलते चुक गई थी। अब लोगों ने अपना चंदा जोड़ा व उसकी सफाई व उस पर एक स्टॉप डेम बनाने का काम शुरू कर दिया। पन्ना के मदन सागर को अपने पारंपरिक रूप में लौटाने के लिए वहां का समाज भरी गरमी में सारे दिन कीचड़ में उतर रहा है। सनद रहे कोई 75 एकड़ के इस तालाब का निर्माण सन् 1745 के आसपास हुआ था। इस तालाब में 56 ऐसी सुरंगंे बनाई गई थीं, जो शहर की बस्तियों में स्थित कुओं तक जाती थीं व उन्हें लबालब रखती थीं। आधुनिकता की आंधी में ये सब चौपट हो गया था। आज यहां बच्चे अपनी बचत व जन्मदिन में मिले पैसों को इस कार्य के लिए दान कर रहे हैं। बस्तर के दलपतसागर तालाब को कंक्रीट का जंगल बनने से बचाने को पूरा समाज लामबंद हो गया है। झारखंड से ले कर मालवा तक ऐसे ही उदाहरण सामने आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के सभी जिलों में राज्य सरकार ने छोटे किसानों के खेतों में तालाब बनाने की शुरुआत कर दी है, जिसके तहत महोबा जिले में 500 और शेष जिलों- झांसी, ललितपुर, चित्रकूट, जालौन और बांदा में ढाई-ढाई सौ तालाबों की खुदाई का काम किसानों ने भरी धूप में पूरा कर दिया है। यदि इसमें पानी भर जाता है तो एक एकड़ के खेत में हर तालाब दो बार तराई कर सकेगा।यह जान लें कि यहां पानी तो इतना ही बरसेगा, यह भी जान लें कि आधुनिक इंजीनियरिंग व तकनीक यहां कारगर नहीं है। बंुदेलखंड, झाारखंड, बस्तर या फिर मालवा को बचाने का एकमात्र तरीका है- अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। समाज जानता है कि तालाब महज पानी जमा नहीं करते, वे बेकार हो जाने वाले बारिश के पानी को साधते भी हैं। तालाबों की अधिकता से नदी-दरिया में बह कर जाने वाला बरसात का पानी गंदला नहीं होता, क्योंकि तालाब पानी की मिट्टी को अपने में जज्ब कर लेते हैं। यहां से उछल कर गया पानी ही नदी में जाता है। यानी पहाड़ या जमीन से जो मिट्टी तालाब की तलहटी में आई, उससे खेत को भी संपन्नता मिलती है। ऐसे लोकज्ञान को महज याद करने, उसमें समय के साथ मामूली सुधार करने और उनका क्रियान्वयन स्थानीय स्तर पर ही करने से हर इंसान को जरूरत मुताबिक पानी मिल सकता है। आवश्यकता है, ऐसे ही सफल प्रयोगों को सहेजने, सराहने और संवारने की।
= पंकज चतुर्वेदी

बुधवार, 4 मई 2016

Plantation and Water conservation in Abu Dhabi

रेगिस्तान में पानी की कमी तो है ही। अबूधाबी में सड़क के किनारे खूब हरियाली है। यहां सीवर के पुनरशोधित जल को पतले पतले पाईप के जरिये पेड़ पौधों की जड़ में पहुंचाया जाता है। निश्चित समय पर पम्प चलता है और हरियाली को पानी से जीवन मिल जाता है। दिल्ली में टेंकर के मोटे पाईप से सींचा जाता है। उसमें आधा पानी फ़ैल कर बेकार जाता है। फिर पांच आदमी, टेंकर के धुएं व् उससे उपजे जाम का प्रदुषण। कम लागत में, किफायती सलीका। हाँ यहां पॉइप चोरी होने का कोई खतरा नहीं होता। सड़क पर कहीं पुलिस नहीं दिखती। केमरे से निरीक्षण ,कड़े क़ानून का डर और उससे उपजा आत्म अनुशासन। पानी व् पौधे दोनों सहेजता है।

Society and women In Abudhabi

जो लोग अरब देशों के बारे में बेहद स्‍टीरियो टाईप छबि रखते हैं, उन्‍हें यहां आ कर बदलाव को जरूर देखना चाहिए, अबुधाबी पुस्‍तक मेले में हर रोज हजारों हजार महिलांए आ रही हैं, स्‍कूली बच्‍चे उनमें भी लडकियां, स्‍टॉल के पीछे पुस्‍तकें बेचतीं, सूचना केंद्रों पर जानकारी देतीिं, बच्‍चें के साथ कहानी सुनातीं...... हर जगह महिलाएं हैं, संख्‍या में पुरूषों से ज्‍यादा, ये स्‍थानीय अरबी महिलाएं हैं, बुरके या हिजाब में होती हैं लेकिन शानदार अंग्रेजी बोलती हैं, हिंदी समझती हैं पुस्‍तकें खरीद कर बिल कटवाती औरतें ही ज्‍यादा हैं, वे सांईंस, फिक्‍शन, दुनिया के बारे में इतिहास जैसे मसलों पर पुस्‍तकें उठाती हैं , अबुधाबी की राजकुमारी बगैर बुरके या हिजाब के अखबारों में फोटो देती हैं व बच्‍चों के लिए काम कर रही हैं, यहां की शिक्षा मंत्री भी एक महिला हैं व प्रेस से सामना करने में उन्‍हें कोई हिचक नहीं होती

My tour to Abu Dhabi 26 April-04 May

03 May 2016




आज दुनिया के सबसे महंगे होटल 'द एमेरेट पेलेस'' गया. यह एक सात सितारा होटल है और अबुधाबी सरकार का शासकीय अतिथि गृह भी. समु्रद तअ पर लगभग 85 हैक्‍टेयर में फैले इस शानदार महल के आंगन में हेलीकाप्‍टर भी उतर जाते हैं. इसका निर्माण सन 2001 में शुरू हुआ था. लगभग तीन बिलयिन अमंरिकी डालर खर्च कर यह चार साल में पूरा हुआ, इसका आर्किटक्‍ट डिजाईन मशहूर WATG यानि बिंबरले, एलीजन टॉग एंड गूस कपंनी ने तैयार किया था, यह होटल सन 2005 में शुरू हुआ .यहां कोरल, पर्ल और डायमंड केटेगरी के 302 कमरे हैं, जिनका किराया 179 से ले कर 325 डालर तक है .कमरे की बालकनी में शानदीर बगीचा है और उससे समुद्र सामने दखिता हैा, 114 गुंबद, 200 फव्‍वारे 14 रेस्‍तरां वाला यह होटल हुआ. यहां की हरियाली, कला देखने लायग हैा इसके ठीक सामने हयात जैसे दो तीन होटल हैं दो एत्‍तेहाद टावर है, कई आलीशान भव हैं इलाके में शेख लोगों के आलीशान मकान बेहद आकर्शक हैं यहां कुछ फोटो होटल के बाहर के हैं व कुछ भीतर के रेस्‍त्‍रा वाले इलाके सेभीतर के फोटो खींचने की अनुमति नहीं
है
Pankaj Chaturvedi's photo.
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PUBLIC TRANSPORT AND TAXIES IN ABU DHABI 
अबुधाबी में सार्वजनिक परिवहन की दो ही व्‍यवस्‍था हैं, बस या फिर टैक्‍सी. पहले चर्चा बस की, यहां बस बेहद सस्‍ती है,दो देहरम में शहर में कही भी जा सकते हो, बस बस के नंबर व रूट पता हों, हालांकि बस पर अं्रेेजी में आखिरी मुकाम का नाम लखिा होता है, लेकिन उस रूट के बांकी स्‍टापेज नहीं, सो यह स्‍थानीय लोगों के उपयोगी है, बढिया लो फ्लोर वाली एसी बसें. यदि अबुधाबी से दुबई जाना हो तो बुर्ज खलीफा तक का टैक्‍सी का बिल कम से कम 270 दिहरम होगा, जबकि बस महज 25 दिहरम में पहुंचा देगीा
टैक्‍सी व्‍यवस्‍था शानदार, सुरक्षित व बगैर धोखाधडी की हैा यहां छह कंपयिों की गाडियां चलती हैं लेकिन उन सभी का नियंत्रण स्‍थानीय म्‍यूनिस्‍पल के पास हैा सभी कंपनियों का किराया, कानून एक ही हैं सवारी के लिए और चालक के लिए भी . सभी गाडिया टोयटा की केमरी हैं सभी का रंग स्‍लेटी है, सभी में ड्ायवर के करीब डेश बोड पर बडी सी तख्‍ती होती है जिसमें ड्ायवर का नाम व फोटो अ्रंग्रेजी में होता है. यहीं पर दखिता रहता है कि आपका बिल कितना हुआ, सवारी के बैठते ही चालक एक लीवर दबाता है व मीटर शुरू और उतरते ही कंप्‍यूटरीरक़त बिल आ जाता है, यहां छुट्रटा वापिस ना करना या टिप देने की कतई रिवाज नहीं हैं , अधिकांश ्ड्रायवर नेपाली, पाकिस्‍तानी व बांग्‍लादेशी हैं जों हिंदी अच्‍छी तरह बोलते व समझते हैं.
यहां ड्रायविंग लाईसेंस पाना तो कठिन है ही, उससे भी जटिल है टैक्‍सी चलाने का परमिट पाना. इसके लिए लिखित परीक्षा होती है, वह भी आनलाईन जिसमें अरबी, अंग्रेजी भाषा का ज्ञान, रास्‍तों की जानकारी, चिन्‍हों को पहचानना आदि में 90 फीसदी से ज्‍यादा अंक पाना जरूरी होता है.
ड्रायवर को कंपनी आठ सौ दिहरम मासिक का वेतन और कुल चले मीटर पर कमीशन देती है, यदि कंपनी के पास गाडी ना हो या फिर ड्रायवर साल में एक बार एक महीने को घर जाना चाहता हो तो भी उसका वेतन मिलता है. ड्रायवर को मेडिकल बीमा की सुवधिा कंपनी देती है जिसका प्रीमियम कंपनी ही भरती है. ड्रायवर किसी भी बउे अस्‍पताल में जा कर भर्ती या इलाज करवा सकता है, बस दवा के 30 फीसदी देने होते हैं इतनी ुसवधिा पर कडा अनुशासन जरूरी है व उनकी हर पल निगरानी होती है क्‍योंकि हर कार में कैमरे होते हैं जिनकी रिकार्डिंग होती रहती हैद्व इसके अलावा सडक पर आम कारों में खुफिया पुलिस वाले होते हैं, कहीं कायदा तोडा कि ना जाने किस कार पर सायरन बजने लगे व ड्रायवर धर लिया जाए . व्‍यवस्‍था अच्‍छी लगी, काश दिल्‍ली में इस तरह का ्रपयोग हो, कोई एक दशक पहले इंदौर में कलेक्‍टर ने मेट्रो टैक्‍सी के नाम से ऐसी सर्विस शुरू की थी, फिर उसकी दुर्गति हुई जब उसका जिम्‍मा नगर निगम के पास चला गया .
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मंगलवार, 3 मई 2016

Leaf burning :threat to ecology

पर्यावरण : भविष्य को जलाता समाज



पंकज चतुर्वेदी
लेखक




पर्यावरण : भविष्य को जलाता समाज
शिशिर ऋतु में माघ और फाल्गुन असल में पतझड़ के दिन होते हैं. दिन में जब धूप तेज लगती है तो पेड़ की छांव में जाने का जी करता है, लेकिन ऊपर से सूख-सूख कर पत्ते गिरते हैं.
कुछ लोगों के लिए यह झड़ते पत्ते महज कचरा हैं और वे इसे समेट कर जलाने को परंपरा, मजबूरी, मच्छर मारने का तरीका व ऐसे ही नाम देते हैं. असल में यह न केवल गैरकानूनी है, बल्कि अपनी प्रकृति के साथ अत्याचार भी है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने तो बड़े सख्त लहजे में कहा है कि पेड़ों से गिरने वाली पत्तियों को जलाना दंडनीय अपराध है व प्रशासनिक अमले यह सुनिश्चित करें कि आगे से ऐसा ना हो.
पिछले साल लुटियन दिल्ली में एक सांसद की सरकारी कोठी में ही पत्ती जलाने पर मुकदमा कायम हुआ है. कई जगह तो नगर को साफ रखने का जिम्मा निभाने वाले स्थानीय निकाय खुद ही कूड़ें के रूप में पेड़ से गिरी पत्तियों को जला देते हैं. असल में पत्तियों को जलाने से उत्पन्न प्रदूषण तो खतरनाक है ही, सूखी पत्तियां कई मानों में बेश्कीमती हैं व प्रकृति के विभिन्न तत्वों का संतुलन बनाए रखने में उनकी महती भूमिका है.
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिसम्बर 1997 में ही आदेश पारित कर चुकी थी कि चूंकि पत्तियों को जलाने से गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा हो रहा है अत: इस पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जाए. सन 2012 में दिल्ली सरकार ने  पत्ते जलाने पर एक लाख रुपये जुर्माने व पांच साल तक की कैद का प्रावधान किया था. प्रदूषण कम करने के विभिन्न कदमों में हरित न्यायाधिकरण ने पाया कि महानगर में बढ़ रहे पीएम यानी पार्टीकुलेट मैटर का 29.4 फीसद कूड़ा व उसके साथ पत्तियों को जलाने से उत्पन्न हो रहा है.पेड़ की हरी पत्तियों में मौजूद क्लोरोफिल यानी हरा पदार्थ, वातावरण में मौजूद जल-कणों या आद्र्रता हाईड्रोजन व आक्सीजन में विभाजित कर देता है. हाईड्रोजन वातावरण में मौजूद जहरीली गैस कार्बन डायआक्साईड के साथ मिल कर पत्तियों के लिए शर्करायुक्त भोजन उपजाता है जबकि ऑक्सीजन तो प्राण वायु है ही. जब पत्तियों का क्लोरोफिल चुक जाता है तो उसका हरापन समाप्त हो जाता है व वह पीली या भूरी पड़ जाती हैं. हालांकि यह पत्ती पेड़ के लिए भोजन  बनाने के लायक नहीं रह जाती है, लेकिन उसमें नाईट्रोजन, प्रोटिन, विटामिन, स्टार्च व शर्करा आदि का खजाना होता है.


ऐसी पत्तियों को जब जलाया जाता है तो कार्बन, हाईड्रोजन, नाईट्रोजन व कई बार सल्फर से बने रसायन उत्सर्जित होते हैं. इसके कारण वायुमंडल की नमी और ऑक्सीजन तो नष्ट होती ही हैं. कार्बन मोनो ऑक्साइड, नाईट्रोजन ऑक्साइड, हाईड्रोजन सायनाइड, अमोनिया, सल्फर डायआक्साइड जैसी दम घोटने वाली गैस वातावरण को जहरीला बना देती हैं. इन दिनों अजरुन, नीम, पीपल, इमली, जामुन, ढाक, अमलतास, गुलमोहर, शीशम जैसे पेड़ से पत्ते गिर रहे हैं और यह मई तक चलेगा. अनुमान है कि दिल्ली एनसीआर में दो हजार हैक्टेयर से ज्यादा इलाके में हरियाली है व इससे हर रोज 200 से 250 टन पत्ते गिरते हैं और इसका बड़ा हिस्सा जलाया जाता है.
एक बात और पत्तों के तेज जलाने की तुलना में उनके धीरे-धीरे सुलगने पर ज्यादा प्रदूषण फैलता है. एक अनुमान है कि शरद के तीन महीनों के दौरान दिल्ली एनसीआर इलाके में जलने वाले पत्तों से पचास हजार वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएं के बराबर जहर फैलता है. यानी चाहे जितना सम-विषम वाहन फामरूला लागू कर लो, पतझड़ के दो महीने में सालभर की जहर हवा में घुल जाता है. सनद रहे पत्ते जलने से निकलने वाली सल्फर डाई आक्साइड, कार्बन मोनो डाय आक्साइड आदि गैसे दमघोटूं होती हैं.  शेष बची राख भी वातावरण में कार्बन की मात्रा तो बढ़ती ही है, जमीन की उर्वरा क्षमता भी प्रभावित होती है.
यदि केवल एनसीआर की हरियाली से गिरे पत्तों को धरती पर यों ही पड़ा रहने दें तो जमीन की गर्मी कम होगी, मिट्टी की नमी घनघोर गर्मी में भी बरकरार रहेगी. यदि इन पत्तियों को महज खंती में दबा कर कंपोस्ट खाद में बदल लें तों लगभग 100 टन रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम किया जा सकता है. इस बात का इंतजार करना बेमानी है कि पत्ती जलाने वालों को कानून पकड़े व सजा दे. इससे बेहतर होगा कि समाज  तक यह संदेश भली भांति पहुंचाया जाए कि सूखी पत्तियां पर्यावरण-मित्र हैं और उनके महत्त्व को समझना, संरक्षित करना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है. हम इसे ही निभाने में कोताही कर रहे हैं. पर्यावरण विनाश का यही मूल कारण है.

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